संपादकीय
19 मई 2018

कर्नाटक में इस वक्त विधानसभा में जो नाटक चल रहा है, उसे देखकर देश भर के लोगों के मन में भारतीय संसदीय राजनीति के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। यह पहला मौका नहीं है कि लोगों के मन में राजनीति के लिए नफरत हुई हो, इसके पहले भी कई ऐसे मौके आए, कई ऐसी पार्टियां आईं जिन्होंने खरीद-बिक्री का काम किया। कई बार पार्टियों ने खरीद-बिक्री नहीं की, तो सांसदों ने खुद ही अपने स्तर पर संसद में सवाल पूछने के लिए अपनी आत्मा को बेचने का काम किया, कैमरे पर कैद हुए, और संसद की सदस्यता गई, जेल शायद बाकी है। ऐसे में जब पिछले दो-चार दिनों से यह चर्चा चल रही है कि किस तरह कर्नाटक में एक-एक विधायक की खरीदी के लिए सौ-सौ करोड़ रूपए की बोली लग रही है, तो लोगों को लग रहा है कि क्या ऐसे चुनावों में वोट देने जाने का कोई मतलब है जिसमें बेईमान ही चुने जाएं, और वे अपने से बड़े बेईमान के हाथ बिककर पांच बरस तक राज्य को लूटने का ठेका दे दें?
ऐसे मौके पर जब देश की अदालत को देखें, तो लगता है कि वह महज तकनीकी आधार पर छोटे-छोटे आदेश कर रही है, और अपनी छवि बचाने में कामयाब हो रही है। लेकिन जो बड़ी बेइंसाफी, बड़ी बेईमानी सामने दिख रही है, उस पर या तो सुप्रीम कोर्ट का कोई काबू नहीं है, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी से कतरा रही है, और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परंपरा में दखल देने से बच रही है। इन दोनों में से चाहे जो बात हो, देश की आम जनता बहुत ही निराश है कि जब संसदीय संस्थाएं इस किस्म की मंडी बन गई दिख रही हैं, जब अदालतें बेबस हैं, जब सरकार का कोई रोल ऐसी नौबत में रह नहीं गया है, जब मीडिया भरोसेमंद नहीं रह गया है, तो अकेली जनता ही भला किस भरोसे पर, और भला किस उम्मीद में वोट देने जाती रहे?
हमने छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के वक्त भाजपा के दर्जन भर विधायकों को मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जेब में जाते देखा था। उसके बाद जब राज्य के पहले चुनाव हुए, तो बहुमत से आई भाजपा से सरकार बनाने का मौका लूटने की कोशिश करते फिर जोगी को देखा था, और छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद है कि इस तमाम खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग किस तरह नोटोंभरे बैग के साथ अरूण जेटली ने रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह शायद भारतीय राजनीति का पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री अपनी ही कांग्रेस पार्टी से निलंबित किया गया था। इसलिए आज जब भाजपा पर खरीद-बिक्री की तोहमत लगती है, तो छत्तीसगढ़ में इस तोहमत को दोहराते हुए राहुल गांधी या कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि अपने संपन्न दिनों में कांग्रेस ने ऐसी बहुत सी खरीदी की हुई है। अब आज शायद विधायक-सांसद महंगे इतने अधिक हो गए हैं, और कांग्रेस इतनी कंगाल हो गई है कि वह थोक में खरीद-बिक्री कर नहीं पा रही है।
भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता इतनी बुरी तरह बर्बाद होने का एक नुकसान यह हुआ है कि लोग चुनाव के वक्त अपने वोट बेचने में कुछ भी बुरा नहीं मानते क्योंकि उनको मालूम है कि उनके वोट पाकर जो सांसद या विधायक बनेंगे वो बाद में हो सकता है कि अपनी आत्मा ऊंचे दाम पर बेचने को मंडी में एक पैर पर खड़े रहें। इसका दूसरा नुकसान यह है कि देश में नेता और राजनीति सबके भ्रष्ट हो जाने की तस्वीर ऐसी बन गई है कि लोग अब सरकार को कोई भी टैक्स देना नहीं चाहते कि चोरों के हाथ क्यों कुछ दिया जाए। यह नौबत लोकतंत्र में आस्था की कमी का एक ऐसा बड़ा खतरा है जो कि जल्द दूर नहीं होने वाला है। अगर देश में कोई ईमानदार नेता, ईमानदार पार्टी आ भी जाए, तो भी उसकी ईमानदारी की साख बनते कई बरस लगेंगे। जनता दूध की जली हुई है, और वह छांछ भी फूंक-फूंककर पिएगी।
अब से कुछ घंटों में कर्नाटक का फैसला आ जाएगा। अभी उसके बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते लेकिन इस चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गज और प्रामाणिक भ्रष्ट लोगों का जैसा बोलबाला देखने मिला है, उससे ही देश में लोकतंत्र की साख कमजोर हुई है। अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को एक खुली सुनवाई करके इस बारे में विचार करना चाहिए कि क्या देश में लोकतंत्र को एक बार फिर साख दिलवाई जा सकती है? (Daily Chhattisgarh)
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