...जिन्हें जिन्ना की तस्वीर भी बर्दाश्त नहीं है उनको दिक्कत नहीं गोडसे-प्रतिमा की पूजा से

संपादकीय
9 मई 2018


पिछले कुछ दिनों से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगी हुई मोहम्मद अली जिन्ना की एक तस्वीर को लेकर बवाल मचा हुआ है, और इसे लेकर वहां जो हिंसा हुई और जो पुलिस कार्रवाई हुई उसका विरोध करते लोगों को भी जिन्ना समर्थक, पाकिस्तान का हिमायती, और भारत के विभाजन का समर्थक करार दिया जा रहा है। इसे लेकर एक बवाल मचा हुआ है, और लोगों के तबके का यह मानना है कि कर्नाटक के चुनाव के ठीक पहले ऐसा उन्माद खड़ा करके वोटों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। मीडिया के एक तबके ने इसे लेकर बहुत से तंज कसे हैं, कार्टून बनाए हैं, और सोशल मीडिया पर भी यह लिखा जा रहा है कि मतदान निपट जाने के बाद जिन्ना को फिर कब्र में सोने की इजाजत दी जाएगी। जो लोग भारत के विभाजन के इतिहास से वाकिफ नहीं हैं, उनके लिए यह बता देना ठीक होगा कि मोहम्मद अली जिन्ना विभाजन पर अड़े हुए थे, और उन्होंने गांधी की एक भी नहीं सुनी थी, पाकिस्तान बनवाकर दम लिया था। लेकिन जो लोग अविभाजित भारत से अलग होकर पाकिस्तान के बनने से दुखी हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश न बने होते, और ये तीनों हिस्से मिलकर भारत ही रहते, तो फिर भारत में आज के सत्रह फीसदी मुस्लिमों की जगह बत्तीस फीसदी मुस्लिम रहते, और धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर होने वाली चुनावी राजनीति की तस्वीर ही कुछ और होती। 
लेकिन इतिहास के पन्नों को निकालकर, उन्हें संदर्भ से काटकर, उनका इस्तेमाल अगर किसी भले काम के लिए, मोहब्बत फैलाने के लिए किया जाए, तो भी ठीक है। जब इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए किया जाता है, तो वह देश को नुकसान पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं करता। लोगों को अपने इतिहास के साथ जीना भी सीखना चाहिए। जो देश और समाज इतना बर्दाश्त विकसित नहीं कर पाते, वे आत्मघाती काम ही करते हैं, और देश की क्षमता और संभावना को इतिहास के भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर कम करते हैं, खत्म करते हैं। इससे देश के भीतर एक ऐसा गैरजरूरी तनाव भी उठ खड़ा होता है, जो कि देश की सारी उत्पादकता को सीमित कर देता है, और मौजूदा मिले-जुले समाज के तबकों के बीच खाई खोद देता है। मोहम्मद अली जिन्ना भारत के इतिहास में उस वक्त भी दर्ज थे जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी। उस वक्त उनका सावरकर के साथ भी संपर्क था, और आज सावरकर के भक्तजन ही जिन्ना के खिलाफ यह उन्माद खड़ा कर रहे हैं। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि जिस विभाजन की तोहमत लगाकर भारत से जिन्ना की तस्वीर भी मिटा देने का आंदोलन चल रहा है, उसी विभाजन की तोहमत लगाकर गोडसे ने गांधी की हत्या की थी। और गोडसे के भक्तजन उसके और किसी भी सामाजिक योगदान के बिना आज देश में जगह-जगह उसकी प्रतिमाएं स्थापित करते हैं, वहां पर उसकी पूजा करते हैं, और जिन्ना के आज के विरोधी गोडसे की पूजा का विरोध नहीं करते। इस बात को समझना जरूरी है कि जिन्ना की तस्वीर जिनको बर्दाश्त नहीं हैं, उनको गोडसे की प्रतिमा, और उसकी पूजा सुहाती है। 
भारत को इतिहास के एक ऐसे अंधेरे में धकेला जा रहा है कि जहां पर हाथ को हाथ नहीं सूझता, और यह भी समझ नहीं पड़ता कि पुराण को इतिहास से कैसे मिलाया जा रहा है, कैसे नामौजूद इतिहास के होने का दावा किया जा रहा है, कैसे अपनी पसंद की बातों को इतिहास का हिस्सा बताकर दर्ज किया जा रहा है, कैसे नापसंद बातों को इतिहास से मिटा दिया जा रहा है, उस इतिहास को जला दिया जा रहा है। और यह सब कुछ एक धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। इस बार मीडिया और सोशल मीडिया ने जिन्ना के जिन्न को ठीक चुनाव के वक्त मतदान के पहले बोतल से निकालने को पहचानकर उसके खिलाफ बहुत कुछ लिखा है। फिर भी अगर लोगों को यह बात समझ नहीं पड़ती है, तो फिर वे वैसा ही लोकतंत्र पाएंगे, जैसे लोकतंत्र के वे हकदार हैं। (Daily Chhattisgarh)

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