16 जून 2011
कहवे के साथ कश्मीर-2
सुनील कुमार
कश्मीर से लौटकर
कश्मीर के एक हफ्ते में पहले से लेकर आखिरी दिन तक हाथ पसारे हुए बच्चे, बूढ़े और औरतें देखना अच्छा नहीं लग रहा था। ऐसे लोगों में दो किस्म के लोग थे एक तो वे जो कि सीधे-सीधे भीख मांग रहे थे और दूसरे वे जो हर छोटे-मोटे काम के एवज में बख्शीश मांग रहे थे। इन दोनों ही बातों का वहां के इन दो किस्म के तबकों में चलन बन चुका है। राह चलते भेड़ के रेवड़ लेकर निकलने वाले लोगों की तस्वीरें लेने पर वे उसके लिए सीधे-सीधे बख्शीश की उम्मीद करते थे और कभी-कभी गाड़ी के पीछे दूर तक दौडऩे भी लगते थे।
दरअसल इस देश के स्वर्ग कहे जाने वाले इस इलाके में गरीबी खासी बड़ी है। लोगों के पास सैलानियों से कुछ कमा लेने और कुछ बख्शीश पा लेने से परे के काम कुछ गिने-चुने किस्मों के हैं। वहां खेती जरूर है लेकिन वह महंगी हो गई है। कश्मीर के गिने-चुने किस्म के हस्तशिल्प और हाथकरघा के ग्राहक भी मोटे तौर पर सैलानी ही हैं। इस बारे में सोचें कि हाथकरघा और कपड़ों पर कसीदाकारी का काम, कागज की लुग्दी बनाकर उससे तरह-तरह के खूबसूरत सामान बनाने का काम इतना अधिक क्यों होता है तो एक बात यह समझ आती है कि पिछले हुए मुस्लिम समाज में महिलाओं को घर पर रहकर ही काम करने की सहूलियत ऐसे ही कामों में अधिक रहती है और शायद वहां किसी संगठित कामकाजी जगह पर बहुत सी महिलाओं को काम करने की सामाजिक इजाजत न मिली हुुई हो।
खेतों में औरतें आदमियों से अधिक काम करते दिखीं और अधिक संख्या में भी दिखीं। श्रीनगर की मशहूर डल झील में शिकारे पर घूमते हुए जब मेरे कैमरे को एक ऐसा गैर-सैलानी शिकारा दिखा जिसमें एक परिवार जा रहा था तो उसे देखकर कुछ हैरानी हुई। इसे दो महिलाएं चप्पुओं से चला रही थीं और एक जवान आदमी उस पर बैठा हुआ था। वे जिस अंदाज में बैठे थे, उससे जाहिर था कि वे एक ही परिवार के हैं। वह शिकारा आकर उस तैरते हुए खाने-पीने के शिकारे के पास रूका जहां हम लोग भी रूककर कश्मीर का मशहूर कहवा पी रहे थे। इन दो महिलाओं में से एक अपने मोबाईल फोन पर बात करने लगी और दूसरी मेरे कैमरे से अपने चेहरे को कुछ छुपने, कुछ मुस्कुराने लगी। वह आदमी कोकाकोला की एक बड़ी बोतल खरीदकर उसे मुंह से लगाकर अकेले पीने लगा और फिर दोनों महिलाएं शिकारा को खेते हुए वहां से डल झील की बीच की बस्तियों में से किसी एक तरफ रवाना हो गईं।
खेतों में धान का रोपा लग रहा था और खेती में कम दिनों के इस कमरतोड़ काम की मजदूरी भी 200 रुपए से लेकर 300 रुपए तक थी। इसके साथ-साथ किसान अपने मजदूरों को दो-तीन वक्त की चाय भी देता है। सड़क किनारे के खेतों में जगह-जगह चाय के वक्त पर बैठे मजदूर दिखे और जब ऐसी एक टोली की तस्वीर अपनी गाड़ी से ही बैठे हुए मैं उतारने लगा तो उन्होंने हमारे कश्मीरी ड्राइवर से कहकर हम सबको चाय के लिए बुला लिया। चाय के साथ नानखटाई किस्म का बेकरी का बना एक बन उन्होंने खाने भी दिया और खुशी के साथ-साथ उन्हें यह डर भी सता रहा था कि यह नमकीन चाय हमें पसंद आएगी या नहीं। कुछ देर उनकी खातिरदारी पाने के बाद मैंने जब हिचकते हुए अपने ड्राइवर से धीरे से पूछा कि क्या इस चाय के लिए कुछ भुगतान करना ठीक होगा तो दूर से ही मेरी बात को समझकर उस टोली के एक बुजुर्ग मजदूर ने पूरी ताकत से मनाही कर दी। उनके बड़े दिल से निकली, उनकी मीठी मोहब्बत से भीगी नमकीन चाय के साथ बहुत सी तस्वीरें पाकर वहां से हम आगे बढ़े।
एक फर्लांग दूरी पर ही एक दूसरे खेत में रोपा लगाती हुईं महिलाओं के बीच एक छोटी सी बच्ची भी पूरी मेहनत से रोपा लगा रही थी। रूककर उसकी अनगिनत तस्वीरें खींचने के बाद पूछा तो पता लगा कि वह स्कूल जाती है, प्रायमरी स्कूल में पढ़ती है लेकिन अभी छुट्टियां होने से वह घरवालों के साथ यहां पर काम कर रही है। ये तमाम बातें हिन्दी में करने में भी कुछ दिक्कत होती है क्योंकि वहां गांव के लोग सिर्फ कश्मीरी जुबान में बोलते हैं। लेकिन उर्दू के अधिक लफ्जों के साथ अगर धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी बोली जाए तो काफी लोग काफी कुछ समझ भी लेते हैं।
डल झील के किनारे वहीं के पानी से ढेंस (कमल ककड़ी) निकालकर, वहीं उगी कुछ दूसरी सब्जियों के साथ बेचती हुई एक महिला सड़क किनारे फुटपाथ पर थी और मेरे कैमरे से कुछ नाखुश भी थी। लेकिन इतने बरसों में कैमरा यह सीख चुका था कि जब तक कोई विरोध न हो तब तक सार्वजनिक जगह पर कुछ हमलावर अंदाज बहुत सी तस्वीरें पाने का अकेला जरिया रहता है। किसी की जिंदगी का निजी दायरा कितना बड़ा माना जाए और खुली जगहों पर तस्वीरें लेने का हक कितना रहे यह एक मतभेद की बात रहती है और विरोध का थोड़ा सा खतरा उठाते हुए ही बहुत सी तस्वीरें मिल पाती हैं। लकड़ी की जिस पटिया पर यह महिला बैठी सब्जी बेच रही थी उसकी लकड़ी की लकीरों की तरह ही उसके पांवों में भी बिवाईयां पड़ी थीं। कश्मीर का यही हाल है जो कि देश के बहुत से दूसरे गरीब इलाकों का है। यह जन्नत अगर है तो सैलानियों के लिए है, वहां के कारोबारियों के लिए है, उन नेताओं और अफसरों के लिए है जिनके बारे में किसी को भी यह खुशफहमी नहीं है कि वे ईमानदार हैं। और बंदूकों के साथ तैनात उन लोगों के लिए यह जन्नत है जिन लोगों को एक खास कानून के तहत वहां पर ऐसे हक मिले हुए हैं कि वे बहुत सी मौतों के जिम्मेदार होने के बाद भी बचे रहते हैं।
और यह हाल जून के उस तपते हुए महीने में था जब यहां सैलानी साल के बाकी महीनों के मुकाबले सैकड़ों गुना रहते हैं। सर्दियों के जमे हुए महीनों में यहां आकर घूमने वाले सैलानी तकरीबन तस्वीरों में ही दिखते हैं और गिने-चुने ऐसे लोगों से कश्मीर के घरों को गर्म करने के लिए लकडिय़ां भी नहीं निकलतीं। सर्दियों में मजदूर और सैलानियों के काम में लगे लोग दिल्ली से लेकर गोवा तक अलग-अलग इलाकों में निकल जाते हैं और वहां तरह-तरह की मजदूरी करते हैं। यही वह वक्त रहता है जब कश्मीरी कपड़ों के ग_े लिए हुए वहां के लोग बाकी देश भर में उतर आते हैं, और खरीददारों से सालाना के रिश्ते बनाकर लौटते हैं। बहुत से ऐसे लोग मेरी पहचान के हैं जिनकी मामूली खरीददारी के चलते हुए भी कश्मीरी लोग उनके लिए हर बरस वहां से अखरोट या केसर जैसे तोहफे भी लेकर आते हैं।
कश्मीर में सरकारी खजानों पर डकैती करने वाले बड़े लोग तो महलों सी इमारतें बनाते दिखते हैं लेकिन उनके लिए मन में लबालब हिकारत वाले गरीब बहुत बेबस हैं। आतंक के चलते कश्मीर में सरकारों को बेहिसाब हक मिले हुए हैं और जब उनसे किसी किस्म की कानूनी बहस की गुंजाइश नहीं रह जाती तो नौजवान पीढ़ी हाथ में पत्थर उठा लेती है और बूढ़े उन दिनों को याद करने लगते हैं जिन दिनों कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए दिल्ली में तमाम किस्म की शर्तें मानी थीं और जिन्हें अब कूड़ेदान में डाल दिया गया है।
न तो कश्मीर में कोई कल-कारखाने हैं और न ही मजदूरी से बने सामानों से परे का कोई कारोबार। कुछ खेती धान की और कुछ अखरोट-बादाम, केसर जैसे महंगे सामानों की। यहां के मजदूर उड़ीसा के कुछ इलाकों के मजदूरों की तरह की भुखमरी को तो नहीं झेलते लेकिन गांव-गांव में उनके बच्चों की हालत बहुत अच्छी नहीं दिखती। इस सूबे के ढांचे में केंद्र सरकार से मिली इफरात मदद के चलते बहुत कुछ काम हुआ दिखता है। लेकिन मजदूरों के हकों का कोई ठिकाना नहीं दिखता।
पहलगाम में कई किलोमीटर लंबे असंभव से दिखने वाले पहाड़ी रास्तों पर सैलानियों को घोड़ों पर बिठाकर जो मजदूर दिन भर में कुछ घंटों वाले कई फेरे लगाते हैं, वे सैलानियों के इन महीनों में भी 16सौ रुपए महीने घोड़ों के मालिक से पाते हैं। जब अमरनाथ की यात्रा चलती है तो यह मजदूरी बढ़कर दो हजार रुपए महीने हो जाती है। हर दिन इस सैर-सपाटे पर हममें से हर किसी पर करीब इतना खर्च रहने-खाने-घूमने पर हो रहा था और यह अंदाज लगाना नामुमकिन था कि जन्नत में बसे फटेहाल ये गरीब लोग दो हजार रुपए महीने में या 16 सौ रुपए महीने में कैसे घर चलाते होंगे। यह भी अंदाज लगाना मुश्किल था कि वे बेहतर जिंदगी जी रहे थे या उनके घोड़े, जिनकी कि जरूरतें गिनी-चुनी रहती हैं। बहरहाल जितने खतरनाक चढ़ाव वाले रास्ते से मुझ जैसे भारी-भरकम इंसान को ढोकर जो घोड़ा ले गया था, लौटकर उसके लिए मैंने इन मजदूरों को अलग से भी एक बख्शीश दी कि उन घोड़ों को गुड़ और चना खिला दें।
श्रीनगर से सोनमर्ग की खस्ता हाल सड़क पर सायरनों की आवाज से हमारी गाड़ी को एकदम किनारे होना पड़ा तो मकबूल भाई ने शीशे में देखकर ही बता दिया कि पीछे से मुख्यमंत्री का काफिला आ रहा है। सड़क किनारे की बंदूकों के बीच के फासले कम होते चले गए थे और कुछ समय पहले से ही हमें लग रहा था कि यहां से कोई बड़ा माना जाने वाला इंसान निकलेगा। नौ गाडिय़ों के काफिले में नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला निकले तो काले रंग की एक बड़ी विदेशी 'ऑडीÓ कार के करीब आने के पहले ही मकबूल भाई ने बता दिया था कि उमर अब्दुल्ला खुद ही गाड़ी चलाते आएगा। और यही हुआ। तेज रफ्तार से गाड़ी चलाते उमर अब्दुल्ला इसके बाद भी एक और बार तब दिखे जब हम श्रीनगर से वापिस निकलने के लिए एयरपोर्ट पहुंच रहे थे और वे भी एयरपोर्ट में गाड़ी चलाते दाखिल हो रहे थे। (बाकी कल)
कहवे के साथ कश्मीर-2
सुनील कुमार
कश्मीर से लौटकर
कश्मीर के एक हफ्ते में पहले से लेकर आखिरी दिन तक हाथ पसारे हुए बच्चे, बूढ़े और औरतें देखना अच्छा नहीं लग रहा था। ऐसे लोगों में दो किस्म के लोग थे एक तो वे जो कि सीधे-सीधे भीख मांग रहे थे और दूसरे वे जो हर छोटे-मोटे काम के एवज में बख्शीश मांग रहे थे। इन दोनों ही बातों का वहां के इन दो किस्म के तबकों में चलन बन चुका है। राह चलते भेड़ के रेवड़ लेकर निकलने वाले लोगों की तस्वीरें लेने पर वे उसके लिए सीधे-सीधे बख्शीश की उम्मीद करते थे और कभी-कभी गाड़ी के पीछे दूर तक दौडऩे भी लगते थे।
दरअसल इस देश के स्वर्ग कहे जाने वाले इस इलाके में गरीबी खासी बड़ी है। लोगों के पास सैलानियों से कुछ कमा लेने और कुछ बख्शीश पा लेने से परे के काम कुछ गिने-चुने किस्मों के हैं। वहां खेती जरूर है लेकिन वह महंगी हो गई है। कश्मीर के गिने-चुने किस्म के हस्तशिल्प और हाथकरघा के ग्राहक भी मोटे तौर पर सैलानी ही हैं। इस बारे में सोचें कि हाथकरघा और कपड़ों पर कसीदाकारी का काम, कागज की लुग्दी बनाकर उससे तरह-तरह के खूबसूरत सामान बनाने का काम इतना अधिक क्यों होता है तो एक बात यह समझ आती है कि पिछले हुए मुस्लिम समाज में महिलाओं को घर पर रहकर ही काम करने की सहूलियत ऐसे ही कामों में अधिक रहती है और शायद वहां किसी संगठित कामकाजी जगह पर बहुत सी महिलाओं को काम करने की सामाजिक इजाजत न मिली हुुई हो।
खेतों में औरतें आदमियों से अधिक काम करते दिखीं और अधिक संख्या में भी दिखीं। श्रीनगर की मशहूर डल झील में शिकारे पर घूमते हुए जब मेरे कैमरे को एक ऐसा गैर-सैलानी शिकारा दिखा जिसमें एक परिवार जा रहा था तो उसे देखकर कुछ हैरानी हुई। इसे दो महिलाएं चप्पुओं से चला रही थीं और एक जवान आदमी उस पर बैठा हुआ था। वे जिस अंदाज में बैठे थे, उससे जाहिर था कि वे एक ही परिवार के हैं। वह शिकारा आकर उस तैरते हुए खाने-पीने के शिकारे के पास रूका जहां हम लोग भी रूककर कश्मीर का मशहूर कहवा पी रहे थे। इन दो महिलाओं में से एक अपने मोबाईल फोन पर बात करने लगी और दूसरी मेरे कैमरे से अपने चेहरे को कुछ छुपने, कुछ मुस्कुराने लगी। वह आदमी कोकाकोला की एक बड़ी बोतल खरीदकर उसे मुंह से लगाकर अकेले पीने लगा और फिर दोनों महिलाएं शिकारा को खेते हुए वहां से डल झील की बीच की बस्तियों में से किसी एक तरफ रवाना हो गईं।
खेतों में धान का रोपा लग रहा था और खेती में कम दिनों के इस कमरतोड़ काम की मजदूरी भी 200 रुपए से लेकर 300 रुपए तक थी। इसके साथ-साथ किसान अपने मजदूरों को दो-तीन वक्त की चाय भी देता है। सड़क किनारे के खेतों में जगह-जगह चाय के वक्त पर बैठे मजदूर दिखे और जब ऐसी एक टोली की तस्वीर अपनी गाड़ी से ही बैठे हुए मैं उतारने लगा तो उन्होंने हमारे कश्मीरी ड्राइवर से कहकर हम सबको चाय के लिए बुला लिया। चाय के साथ नानखटाई किस्म का बेकरी का बना एक बन उन्होंने खाने भी दिया और खुशी के साथ-साथ उन्हें यह डर भी सता रहा था कि यह नमकीन चाय हमें पसंद आएगी या नहीं। कुछ देर उनकी खातिरदारी पाने के बाद मैंने जब हिचकते हुए अपने ड्राइवर से धीरे से पूछा कि क्या इस चाय के लिए कुछ भुगतान करना ठीक होगा तो दूर से ही मेरी बात को समझकर उस टोली के एक बुजुर्ग मजदूर ने पूरी ताकत से मनाही कर दी। उनके बड़े दिल से निकली, उनकी मीठी मोहब्बत से भीगी नमकीन चाय के साथ बहुत सी तस्वीरें पाकर वहां से हम आगे बढ़े।
एक फर्लांग दूरी पर ही एक दूसरे खेत में रोपा लगाती हुईं महिलाओं के बीच एक छोटी सी बच्ची भी पूरी मेहनत से रोपा लगा रही थी। रूककर उसकी अनगिनत तस्वीरें खींचने के बाद पूछा तो पता लगा कि वह स्कूल जाती है, प्रायमरी स्कूल में पढ़ती है लेकिन अभी छुट्टियां होने से वह घरवालों के साथ यहां पर काम कर रही है। ये तमाम बातें हिन्दी में करने में भी कुछ दिक्कत होती है क्योंकि वहां गांव के लोग सिर्फ कश्मीरी जुबान में बोलते हैं। लेकिन उर्दू के अधिक लफ्जों के साथ अगर धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी बोली जाए तो काफी लोग काफी कुछ समझ भी लेते हैं।
डल झील के किनारे वहीं के पानी से ढेंस (कमल ककड़ी) निकालकर, वहीं उगी कुछ दूसरी सब्जियों के साथ बेचती हुई एक महिला सड़क किनारे फुटपाथ पर थी और मेरे कैमरे से कुछ नाखुश भी थी। लेकिन इतने बरसों में कैमरा यह सीख चुका था कि जब तक कोई विरोध न हो तब तक सार्वजनिक जगह पर कुछ हमलावर अंदाज बहुत सी तस्वीरें पाने का अकेला जरिया रहता है। किसी की जिंदगी का निजी दायरा कितना बड़ा माना जाए और खुली जगहों पर तस्वीरें लेने का हक कितना रहे यह एक मतभेद की बात रहती है और विरोध का थोड़ा सा खतरा उठाते हुए ही बहुत सी तस्वीरें मिल पाती हैं। लकड़ी की जिस पटिया पर यह महिला बैठी सब्जी बेच रही थी उसकी लकड़ी की लकीरों की तरह ही उसके पांवों में भी बिवाईयां पड़ी थीं। कश्मीर का यही हाल है जो कि देश के बहुत से दूसरे गरीब इलाकों का है। यह जन्नत अगर है तो सैलानियों के लिए है, वहां के कारोबारियों के लिए है, उन नेताओं और अफसरों के लिए है जिनके बारे में किसी को भी यह खुशफहमी नहीं है कि वे ईमानदार हैं। और बंदूकों के साथ तैनात उन लोगों के लिए यह जन्नत है जिन लोगों को एक खास कानून के तहत वहां पर ऐसे हक मिले हुए हैं कि वे बहुत सी मौतों के जिम्मेदार होने के बाद भी बचे रहते हैं।
और यह हाल जून के उस तपते हुए महीने में था जब यहां सैलानी साल के बाकी महीनों के मुकाबले सैकड़ों गुना रहते हैं। सर्दियों के जमे हुए महीनों में यहां आकर घूमने वाले सैलानी तकरीबन तस्वीरों में ही दिखते हैं और गिने-चुने ऐसे लोगों से कश्मीर के घरों को गर्म करने के लिए लकडिय़ां भी नहीं निकलतीं। सर्दियों में मजदूर और सैलानियों के काम में लगे लोग दिल्ली से लेकर गोवा तक अलग-अलग इलाकों में निकल जाते हैं और वहां तरह-तरह की मजदूरी करते हैं। यही वह वक्त रहता है जब कश्मीरी कपड़ों के ग_े लिए हुए वहां के लोग बाकी देश भर में उतर आते हैं, और खरीददारों से सालाना के रिश्ते बनाकर लौटते हैं। बहुत से ऐसे लोग मेरी पहचान के हैं जिनकी मामूली खरीददारी के चलते हुए भी कश्मीरी लोग उनके लिए हर बरस वहां से अखरोट या केसर जैसे तोहफे भी लेकर आते हैं।
कश्मीर में सरकारी खजानों पर डकैती करने वाले बड़े लोग तो महलों सी इमारतें बनाते दिखते हैं लेकिन उनके लिए मन में लबालब हिकारत वाले गरीब बहुत बेबस हैं। आतंक के चलते कश्मीर में सरकारों को बेहिसाब हक मिले हुए हैं और जब उनसे किसी किस्म की कानूनी बहस की गुंजाइश नहीं रह जाती तो नौजवान पीढ़ी हाथ में पत्थर उठा लेती है और बूढ़े उन दिनों को याद करने लगते हैं जिन दिनों कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए दिल्ली में तमाम किस्म की शर्तें मानी थीं और जिन्हें अब कूड़ेदान में डाल दिया गया है।
न तो कश्मीर में कोई कल-कारखाने हैं और न ही मजदूरी से बने सामानों से परे का कोई कारोबार। कुछ खेती धान की और कुछ अखरोट-बादाम, केसर जैसे महंगे सामानों की। यहां के मजदूर उड़ीसा के कुछ इलाकों के मजदूरों की तरह की भुखमरी को तो नहीं झेलते लेकिन गांव-गांव में उनके बच्चों की हालत बहुत अच्छी नहीं दिखती। इस सूबे के ढांचे में केंद्र सरकार से मिली इफरात मदद के चलते बहुत कुछ काम हुआ दिखता है। लेकिन मजदूरों के हकों का कोई ठिकाना नहीं दिखता।
पहलगाम में कई किलोमीटर लंबे असंभव से दिखने वाले पहाड़ी रास्तों पर सैलानियों को घोड़ों पर बिठाकर जो मजदूर दिन भर में कुछ घंटों वाले कई फेरे लगाते हैं, वे सैलानियों के इन महीनों में भी 16सौ रुपए महीने घोड़ों के मालिक से पाते हैं। जब अमरनाथ की यात्रा चलती है तो यह मजदूरी बढ़कर दो हजार रुपए महीने हो जाती है। हर दिन इस सैर-सपाटे पर हममें से हर किसी पर करीब इतना खर्च रहने-खाने-घूमने पर हो रहा था और यह अंदाज लगाना नामुमकिन था कि जन्नत में बसे फटेहाल ये गरीब लोग दो हजार रुपए महीने में या 16 सौ रुपए महीने में कैसे घर चलाते होंगे। यह भी अंदाज लगाना मुश्किल था कि वे बेहतर जिंदगी जी रहे थे या उनके घोड़े, जिनकी कि जरूरतें गिनी-चुनी रहती हैं। बहरहाल जितने खतरनाक चढ़ाव वाले रास्ते से मुझ जैसे भारी-भरकम इंसान को ढोकर जो घोड़ा ले गया था, लौटकर उसके लिए मैंने इन मजदूरों को अलग से भी एक बख्शीश दी कि उन घोड़ों को गुड़ और चना खिला दें।
श्रीनगर से सोनमर्ग की खस्ता हाल सड़क पर सायरनों की आवाज से हमारी गाड़ी को एकदम किनारे होना पड़ा तो मकबूल भाई ने शीशे में देखकर ही बता दिया कि पीछे से मुख्यमंत्री का काफिला आ रहा है। सड़क किनारे की बंदूकों के बीच के फासले कम होते चले गए थे और कुछ समय पहले से ही हमें लग रहा था कि यहां से कोई बड़ा माना जाने वाला इंसान निकलेगा। नौ गाडिय़ों के काफिले में नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला निकले तो काले रंग की एक बड़ी विदेशी 'ऑडीÓ कार के करीब आने के पहले ही मकबूल भाई ने बता दिया था कि उमर अब्दुल्ला खुद ही गाड़ी चलाते आएगा। और यही हुआ। तेज रफ्तार से गाड़ी चलाते उमर अब्दुल्ला इसके बाद भी एक और बार तब दिखे जब हम श्रीनगर से वापिस निकलने के लिए एयरपोर्ट पहुंच रहे थे और वे भी एयरपोर्ट में गाड़ी चलाते दाखिल हो रहे थे। (बाकी कल)
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