68 बरस चौड़ी सरहद

14 जून 2011
कोशिश से खुदा मिल जाता है, फिर इंसान क्या चीज है....
सुनील कुमार
श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर), 14 जून (छत्तीसगढ़)। पर्यटकों के स्वर्ग कहे जाने वाले इस इलाके में पहुंचकर अचानक जब यह पता लगा कि इस प्रदेश के एक गांव का एक इंसान लंबे अरसे बाद पाकिस्तान से यहां आ पाया है तो इन बरसों की गिनती सुनकर एक पल को कलेजा कांप गया। चौदह-पंद्रह बरस की उम्र का एक लड़का आजादी के दो बरस पहले मटरगश्ती करते हुए घूमते-फिरते लाहौर चले गया था और अब वह इसी महीने लौटकर 68 बरस बाद अपने घर आ पाया है, महज एक महीने के लिए।
पहलगाम जिले के वुलुरहामा नाम के गांव की यह कहानी अचानक ही पता लगी और फिर 'द हिन्दूÓ अखबार के श्रीनगर के ब्यूरो के फोटोग्राफर निसार अहमद से इस गांव के पास के एक शहर अनंतनाग के एक अखबारनवीस खालिद गुल का पता लगा जिन्होंने वहां के एक अखबार में इसकी रिपोर्ट बनाई थी। श्रीनगर में अखबार पाना खासा मुश्किल था क्योंकि होटलों में इसका रिवाज नहीं है और सड़क किनारे अखबारों की दुकानें दिखती नहीं हैं। इसलिए सिर्फ टेलीफोन पर खालिद गुल से बात करके करीब 75 किलोमीटर दूर इस गांव को ढूंढते-ढूंढते जब यह संवाददाता वुलुरहामा पहुंचा तो कबीर शाह नाम के इस बुजुर्ग से बात करते हुए रौंगटे खड़े हो गए।
इस दुमंजिला मकान तक पहुंचते हुए इतने गांव और इतने पुल पार करने पड़े थे और किसी गांव में वहां के पते का एक बोर्ड भी नहीं लगा था, गांवों के नाम भी सिर्फ पूछने पर पता लगते थे। ऐसे में कबीर शाह के घर पहुंचने पर बाहर सड़क पर मिले एक पड़ोसी बुजुर्गवार ने जब कहा कि कबीर शाह तो रिश्तेदारी में दो दिन से दूसरे गांव गए हुए हैं तो दिल बैठ सा गया। लेकिन मकान के भीतर जाने पर पता लगा कि कुछ ही देर पहले वे दूसरे गांव से दावत खाकर लौटे थे और आंगन में बैठे एक स्थानीय टीवी चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे।
इस संवाददाता के वहां पहुंचने, छत्तीसगढ़ के अखबार का होने को लेकर उनके मन में शक का एक ग_ा था। उन्हें यह भी लग रहा था कि इस इंटरव्यू के बाद उनके बारे में क्या छपेगा और उस पर सरकार क्या सोचेगी। उनका शक बेबुनियाद इसलिए नहीं था कि एक पूरी जिंदगी बाहर गुजारकर पिछले 20-22 बरसों से लगातार लगातार कोशिश करने के बाद उन्हें जब अपने घर के देश आने की इजाजत मिली तो वे इस मौके को बर्बाद कैसे होने दें? इसलिए वे संभल-संभलकर बोल रहे थे, बहुत कम बोलना चाह रहे थे और उनकी हसरत थी कि उनकी बातों से किसी तरह का बखेड़ा खड़ा न हो।
कबीर शाह की कहानी को शुरू से देखें तो 14-15 की उम्र में वे 1943 में लाहौर चले गए थे और वहीं पर कुछ काम करने लग गए। यह पैदल सफर का वक्त था और लाहौर में कुछ अरसा मजदूरी करने के बाद वे कराची गए और वहां मजदूरी करने लगे। वहीं पर कुछ लोगों से यारी-दोस्ती हुई और उनमें से एक ने एक कश्मीरी लड़की से उनकी शादी करवा दी। कबीर शाह ने भारी दिक्कतों के साथ जिंदगी चलाई जो आगे उन्हीं के लफ्जों में बयां है। लेकिन
0 आप कब चले गए थे उस तरफ मुझे बताएंगे?
00 1943 में
0 कैसे चले गए थे?
00 भाग गया घर से।
0 कितनी उम्र रही होगी?
00 करीब 14-15 साल की रही होगी, भाग गया था घर से
0 वहां किस शहर पहुंचे आप?
00 लाहौर में
0 उस उम्र के बाद में अभी लौटे हैं आप?
00 जी हां, 68 साल बाद
0 वहां क्या करते रहे इतने समय तक? गुजारा कैसे चला?
00 मजदूरी भी की, सारे काम किए, बड़ी परेशानियां उठाई हैं। आदमी के सामने यदि परेशानी आ जाती है तो देख समझकर उसका मुकाबला करना पड़ता है। कोई भी जगह हो। ऊपर वाले का शुक्र है, सबके साथ मुकाबला किया। अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है। अभी ठीक-ठाक है, शादियां की बच्चों की..अपनी शादियां की..
0 अभी आप वहां क्या काम करते हैं?
00  अभी मैं ट्रांसपोर्ट का काम करता हूं।
0 तो..इतने बरसों तक यहां के लोगों से आपका कोई वास्ता रहा कि नहीं रहा?       (बाकी पेजï 3 पर)
00 नहीं रहा, कोशिश बहुत की
0 आपने किस-किस तरह से कोशिश की?
00 पासपोर्ट बनवाया दो दफा, लेकिन वीजा ही नहीं मिला।
0 वीसा ही नहीं मिला?
00 हां, दो बार कोशिश की।
0 पहली बार वीसा के लिए कब एप्लाई किया?
00 पहले किया था...बताया न मैंने..
0 कितने बरस से वीजा की कोशिश कर रहे थे?
00 फिर मैंने कोशिश ही छोड़ दी..बाद में ये..कश्मीर का (बखेड़ा) आ गया न बीच में..तब इसमें सब फार्मेलटी पूरी किए, फिर भी ढाई-तीन साल बाद मिला मुझे।
0 आपको अपने गांव की याद भी, अपने ठिकाने की याद थी..
00 खुदा का शुक्र है, बच्चे (घर पर बचे भाईयों के) आ गए तो हो गई पहचान, अगर मैं अकेला आता तो नहीं हो पाती पहचान, अभी भी मैं पहचानता नहंीं..
0 यहां घर में कौन लोग मिले आपको आपके वक्त के?
00 मेरे भतीजे मिले..भाई मिले, मेरे दो भाई जिंदा हैं। एक मेरा बड़ा भाई है, एक छोटा भाई है ब्योर में है।
0 आप कैसे आए यहां तक, जब आपको परमिट या वीजा मिला?
00 (अपने भतीजे की ओर इशारा कर) आते ही हमने इनको टेलीफोन किया
0 इनसे संपर्क कितने साल से हो चुका था?
00 पहले.. मेरा ख्याल है साल दो साल से कांटेक्ट था। करीब ढाई साल से।
0 तो उस ढाई साल के पहले कोई बातचीत इतने बरसों से नहीं हो पाई थी..
00 नहीं हुआ था
0 नंबर आपको कैसे मिला ढाई साल पहले?
00 मैंने कोशिश बहुत की..भगवान मिल जाता है, खुदा मिल जाता है कोशिश से। इंसान क्या चीज है। कोशिश से.. मैंने कोशिश इतनी की जिसकी इंतहा कोई नहीं
0 जाहिर है..
00 आप आए हैं, हमसे मिलने के लिए..कोशिश से ही आए हैं।
0 बिल्कुल
00 इसी तरह ये भी है..
0 हम तो मामूली कोशिश से आए, लेकिन आपकी तो बरसों की कोशिश रही, जिसमें सरकारें बीच में थीं, सरहद बीच में थी, हमको तो कोई सरहद नहीं थी, राह बताने वाले लोग मिलते चले गए।
00 सही बात है.. आप कहां रहते हैं?
0 मैं छत्तीसगढ़ में रहता हूं। मध्यप्रदेश, भोपाल के और आगे है..मैं परिवार के साथ आया था श्रीनगर, कश्मीर घूमने के लिए, दो दिन पहले ही हम पहलगाम से लौटे, कल मुझे किसी ने बताया कि एक शख्स इतने इरस बाद यहां लौटकर आए हैं।
00 तो आपके दिल में जज्बा पैदा हा गया..
0 जी, मैं आया तो छुट्टी मनाने था, लेकिन रोज-रोज तो ऐसे कोई मिल नहीं सकते!
00 कल, हम गए वेरानाल। वहां एक आदमी आया गुजरात का। बड़ा खुश हुआ, मिला-जुला, वो भी हिंदू था।
0 अभी किस राह से आए हैं यहां तक?
00 मुजफ्फराबाद की तरफ से, बस सर्विस से आया हूं।
0 तो आपकी फैमिली के और लोगों ने वीजा के लिए एप्लाई किया था, आपके साथ यहां आने के लिए?
00 किया है, कइयों को मिल गया, कइयों को नहीं मिला।
0 वहां पर..
00 हां
0 उनमें से आपके कुछ लोग पहले भी यहां आए थे क्या?
00 हां आए थे।
0 कौन आया था आपकी फैमिली का कोई था?
00 हमारे फैमिली के नहीं..यार-दोस्त थे, हमारी फैमिली का कोई नहीं आया।
0 उनकी दिलचस्पी है यहां आने के लिए?
00 है न पूरी दिलचस्पी, क्यों नहीं होगी
0 तो उन लोगों ने एप्लाई किया है वीजा के लिए?
00 हां, कइयों ने किया है, कुछ को मिले कुछ को नहीं मिले। मिल जाएंगे। कोशिश कर रहे हैं। हमने भी बड़ी कोशिश की थी। अगर कामयाबी हासिल नहीं होती, मैं कैसे आता?
0 यहां पर किस जगह आपको रिसीव किया लोगों ने?
00 श्रीनगर से।
0 बस से आप श्रीनगर पहुंचे तो घर से लोग यहां से श्रीनगर जाकर आपको लेकर आए..
00 हां, सरकार ने लाया वहां तक, वहां इन लोगों ने रिसीव किया। भाइयों ने मुझे पहचान लिया।
0 ये लोग तो बाद में हुए होंगे..
00 ये तो खून की कशिश होती है। हालांकि हमने इनको नहीं देखा था। पहले बच्चा आया तो उसने बोला तो उसने पूछा आप पाकिस्तान से आए कबीर शाह हैं? मैंने बोला हां। तो..खून की कशिश होती है।
0 आपके वक्त के कुछ दोस्त मिले यहां आपको?
00 कोई भी नहीं..सब मर गए, अब कोई नहीं है।
0 आपके भाई लोग रहे, जिन्होंने आपको देखा था।
00 हां।
0 गांव में कोई नहीं रहा, जिन्होंने पहले आपको देखा हो?
00 नहीं नहीं, आदमी ही नहीं रहे तबके, मर-खप गए। यहां जिसमें पढ़ता था, अब वो भी निजाम बदली हो गया। सल्हर में एक स्कूल में पढ़ता रहा। लेकिन उधर भी हालात मुख्तलिफ हो गए। अब वो हालात ही नहीं। खुदा का शुक्र है कि यह मुल्क तरक्की कर गया। बड़ी तरक्की। स्कूलें, सड़कें, बागीचे ये हमारे समय नहीं थीं। मकान हमारे कच्चे थे। अब तो बड़े पक्के मकान बने हैं, फस्र्टक्लास, वेरी-वेरी बेस्ट।
0 करांची में जहां आप रहते हैं, वहां और लोग इस इलाके के हैं?
00 नहीं हैं।
0 आपके आस-पास के कस्बों के लोग पाकिस्तान में नहीं मिले?
00 नहीं.. पाकिस्तान में कोई हैं बनारस के, हमारे पड़ोसी बनारसी हैं वहां पर। कोई काम करते हैं..बनारस के हैं। हमारा ऐसा रिश्ता उनके साथ है, जैसे हमारे भाई-बहन हैं। ऐसा माहौल है। यानी एक सुई भी दरवाजे में हो तो गायब नहीं होगी। आपस में मोहब्बत है, भाईचारा है।  जब मैं इस मुल्क आया तो तकरीबन 100 आदमी मेरे को रेल में चढ़ाने  वास्ते आए।
0 वहां पर?
00 हां, 100 आदमी आए। रिश्तेदार, अपने, गैर, पराए, मिलने-जुलने वाले सब आ गए थे...ये दिल की मोहब्बत होती है। जिस आदमी को अपने वतन से मोहब्बत नहीं वो भी इंसान नहीं।
0 बिल्कुल...बिल्कुल
00 क्या बात है
0 बहुत खूब कहा आपने...
इतनी वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद छोटे से कैमरे की बैटरी खत्म हो गई और आगे की बातचीत एक-एक शब्द नहीं लिखी जा रही।
कबीर शाह ने बताया कि उनका जो दोस्त यहां आकर पता लेकर पाकिस्तान लौटा तो उससे मिले फोन नंबर पर बातचीत शुरू हुई और अभी दो-ढाई बरस पहले पहली बार वे अपने भाई और बहन से बात कर पाए, भतीजों के बारे में उन्हें पता लगा। लेकिन उनके भतीजे के बेटे अरशिद हुसैन शाह को इस बात का मलाल था कि वे हिन्दुस्तान से पाकिस्तान फोन नहीं कर पाते और जिस दिन कबीर शाह की एक बहन की मौत हुई, उस दिन भी वे यहां से खबर नहीं कर पाए और शाम अचानक पाकिस्तान से उनका फोन आया तो उन्हें यह खबर बतानी पड़ी कि उनकी बहन गुजर गई हैं और उनका कफन-दफन हो चुका है। वहां मौजूद तमाम लोगों ने इस संवाददाता से इस बात को लेकर एक अफसोस जाहिर किया कि कश्मीरियों की पाकिस्तान में इतनी रिश्तेदारियों के बाद भी यहां से वहां फोन नहीं लगाया जा सकता जबकि पाकिस्तान से कश्मीर फोन लगाने की छूट है।
अरशिद ने बताया कि वे जब 15 बरस के थे तब उनके दादा ने बताया था कि उनके एक भाई बचपन में ही पाकिस्तान चले गए थे। दो-ढाई बरस पहले उनके दोस्त आए तो उनका खत लेकर आए थे और यहां का नंबर लेकर दोस्त लौटे तब कबीर शाह का यहां फोन आया। अब 2 जून को वे यहां पहुंचे तो दो भाई ही बचे हुए हैं, बहन 3 महीने पहले जा चुकी।
कबीर शाह की आंखें यह पूरा सिलसिला बताते हुए और अपने परिवार के एक नौजवान के मुंह से बताना सुनते हुए भीग जाती हैं। वे भरी हुई आवाज में बताते हैं कि किस तरह पाकिस्तान से बस से रवाना होकर जब वे भारत की जमीन पर पहुंचे तो इस तरफ के कश्मीर के एक बाशिंदे ने उनकी कहानी सुनकर उन्हें अपना भारतीय मोबाईल फोन दिया कि वे घरवालों से बात कर लें। बस के सफर के बीच वे कुछ-कुछ देर में घरवालों को बताते चलते थे कि वे कहां तक पहुंच चुके हैं और श्रीनगर से कितनी दूर हैं। गांव का उनका परिवार ईमेल और इंटरनेट से दूर है लेकिन शायद कश्मीर से पाकिस्तान का संपर्क इतना भी नहीं है। इसलिए जब इस संवाददाता ने अरशिद से वायदा किया कि यह रिपोर्ट छपने पर इस अखबार का पन्ना उन्हें ईमेल से भेज देंगे तो उन्होंने अपने स्कूल का पता दिया कि वहां डाक से पेपर भेज दिया जाए वे ईमेल इस्तेमाल नहीं करते।
कबीर शाह की कहानी में दहशतगर्दी और हिंसा तो नहीं है लेकिन उनकी कहानी दहशत भी पैदा करती है और यह भी बताती है कि सरकारों के इंतजाम कितने हिंसक हैं, उनके मामले में खासकर भारत सरकार के इंतजाम। आधी सदी से अधिक की कोशिश के बाद वे किसी तरह उस घर लौट पाए जहां वे पैदा हुए थे और खेले-बड़े हुए थे। सरहद को कोई शायद लंबाई और चौड़ाई में नाप सकता हो, लेकिन कबीर शाह इस सरहद को सिर्फ बरसों में नाप सकते हैं, 68 बरस चौड़ी सरहद!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें