11 अक्टूबर
देश के सबसे बड़े और दौलतमंद महानगर मुंबई का हाल यह है कि वहां की महानगरपालिका के एक अस्पताल में एक गरीब औरत को बच्चे को जन्म देने के लिए भर्ती नहीं किया गया और आधी रात के बाद अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर उसका बेटा पैदा हुआ जो कि कुछ घंटों में मर गया। हम इसे एक गैरइरादतन हत्या मानते हैं और जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले ऐसे अस्पताल में जिन डॉक्टरों ने एक गरीब की जिंदगी के खिलाफ ऐसा फैसला किया उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाना भी हम जरूरी समझते हैं। मीडिया की पहुंच वाले शहरों से ऐसे मामले तो हर हफ्ते देश में कहीं न कहीं सामने आ रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि एक फीसदी मामलों तक भी न तो मीडिया के कैमरे पहुंच पाते और न ही हमारे लिखने की ऐसी नौबत आती। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ने कई मामलों में ऐसे आदेश दिए हैं कि किसी भी मरीज को सरकारी या निजी अस्पताल न लौटाएं, सरकारों ने गरीबों के लिए इलाज बीमा की योजना भी लागू करने की शुरुआत की है। लेकिन ऐसे में जब सरकारी या स्थानीय संस्थाओं वाले अस्पताल ऐसे हरकत करते हैं तो कुछ लोगों पर जुर्म कायम होना जरूरी है। इस अस्पताल ने यह भी माना है कि आधी रात एक गरीब गर्भवती को दूसरे अस्पताल जांच के लिए भेजते हुए भी यहां के डॉक्टरों ने एम्बुलेंस नहीं दी और जांच रिपोर्ट के बाद भर्ती करने से मना करके फिर दूसरे अस्पताल जाने को कहा। यह एक भयानक सरकारी इंतजाम है और पूरी तरह से हैवानियत का भी।
लेकिन गरीबों और कमजोर तबकों के लिए यह एक अनोखी बात नहीं है। सरकार और समाज से कमजोर लोगों को इसी तरह कुचला जाना पड़ता है। कदम-कदम पर लोकतंत्र के तहत गरीबों को जो हक मिलने चाहिए, उनको छीना जाता है, सरकार उनके लिए अपनी योजनाओं में जो जगह रखती है, उन्हें दूसरे लूट ले जाते हैं, अदालतें अपने दरवाजे सिर्फ खर्च करने में काबिल लोगों के लिए खुले रखती हैं और देश की संसद और विधानसभाओं में लगातार खरबपति, अरबपति और करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं। ऐसे में यह जाहिर है कि सड़क के किनारे से ठेलों को जब चाहे तब उठाकर हटा दिया जाता है और इस पल जब हम मुंबई के एक अस्पताल में एक गरीब मरीज के बारे में यह लिख रहे हैं, उसी पल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बाहर से ठेले और खोमचे वालों को ट्रक में लादकर ले जाने की तस्वीरें हमारे सामने हैं।
दरअसल समाज में आज लोगों की राजनीतिक-सामाजिक चेतना गटर में जा चुकी है। न तो परिवार के भीतर नई पीढ़ी को तथाकथित इंसानियत की बातें सिखाना अब आम रह गया और न ही स्कूल या कॉलेज में ऐसी नसीहतों की कोई जगह है। समाज के भीतर भी लोगों से ऐसी प्रेरणा पाने का मौका नई पीढ़ी को नहीं मिलता। इसलिए आज के जो नौजवान डॉक्टर, या इससे पिछली पीढ़ी के भी जो डॉक्टर मरीजों को इस तरह से लौटाते हैं, उनकी राजनीतिक चेतना शून्य रहती है और कमजोर तबकों के लिए उनमें कोई हमदर्दी भी नहीं रहती। हम इसे सिर्फ सरकारी इंतजाम की खामी मानकर सिर्फ कानूनी कार्रवाई तक अपनी बात को सीमित रखना नहीं चाहते, हम इस मौके पर यह भी पूछना चाहते हैं कि समाज के भीतर इस परले दर्जे की हैवानियत को लेकर भी क्या कोई बातचीत होगी या फिर बीत चुके महान लोगों की महानता का साल में दो-दो बार, जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर, गुणगान करके ही भारत का समाज अपने आपको महान परंपराओं का वारिस मानता रहेगा?
भारत में हैवानियत दिखाने वाले लोगों को, धर्म, आध्यात्म और महत्वहीन अनुपात वाले दान से आत्मग्लानि से मुक्त होने का एक आसान जरिया मिला हुआ है। ऐसा अपराध करने वाले डॉक्टरों में से कोई ईश्वर की किसी दुकान पर जाकर अपने लिए पुण्य खरीदने को काफी समझता होगा और फिर वह किसी गरीब के साथ ऐसा जुल्म करके भी किसी पाप की सोच से मुक्त रहता होगा। तर्क से परे की जितने किस्म की आस्था होती है वह लोगों को लोकतंत्र, तथाकथित इंसानियत और नियम-कायदों को तोडऩे का हौसला जुटा देती है। मुंबई की इस घटना को लेकर समाज के भीतर एक व्यापक चर्चा की जरूरत है कि ऐसी नौबत जब आती है तब जिम्मेदार लोगों के भीतर का इंसान मरकर कहां जाकर दफन हुआ रहता है? ऐसी घटनाएं इस देश के लिए शर्म से डूबकर मर जाने की है कि जिन राजधानियों में ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोग गरीबों के हक के सरकारी खजाने को रात-दिन लूटने की साजिश बनाने में लगे रहते हैं वहीं पर भारत का एक नागरिक फुटपाथ पर पैदा होने को, और कुछ घंटों में मर जाने को बेबस रहता है। इसे महज एक और खबर मानकर जो लोग भुला देंगे, उन्हें किसी ईश्वर के दरबार में जाकर खड़े रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रहेगा।