छोटी सी बात



11 अक्टूबर
मुसीबतों से नुकसान तो होता है, लेकिन उनसे सबक लेकर आप आगे के लिए चौकन्ने हो जाएं, तो वह मुसीबत आगे की किसी बड़ी मुसीबत से आपको बचा भी लेती है।

यह सिर्फ सरकारी नहीं, सामाजिक हैवानियत भी


11 अक्टूबर
देश के सबसे बड़े और दौलतमंद महानगर मुंबई का हाल यह है कि वहां की महानगरपालिका के एक अस्पताल में एक गरीब औरत को बच्चे को जन्म देने के लिए भर्ती नहीं किया गया और आधी रात के बाद अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर उसका बेटा पैदा हुआ जो कि कुछ घंटों में मर गया। हम इसे एक गैरइरादतन हत्या मानते हैं और जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले ऐसे अस्पताल में जिन डॉक्टरों ने एक गरीब की जिंदगी के खिलाफ ऐसा फैसला किया उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाना भी हम जरूरी समझते हैं। मीडिया की पहुंच वाले शहरों से ऐसे मामले तो हर हफ्ते देश में कहीं न कहीं सामने आ रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि एक फीसदी मामलों तक भी न तो मीडिया के कैमरे पहुंच पाते और न ही हमारे लिखने की ऐसी नौबत आती। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ने कई मामलों में ऐसे आदेश दिए हैं कि किसी भी मरीज को सरकारी या निजी अस्पताल न लौटाएं, सरकारों ने गरीबों के लिए इलाज बीमा की योजना भी लागू करने की शुरुआत की है। लेकिन ऐसे में जब सरकारी या स्थानीय संस्थाओं वाले अस्पताल ऐसे हरकत करते हैं तो कुछ लोगों पर जुर्म कायम होना जरूरी है। इस अस्पताल ने यह भी माना है कि आधी रात एक गरीब गर्भवती को दूसरे अस्पताल जांच के लिए भेजते हुए भी यहां के डॉक्टरों ने एम्बुलेंस नहीं दी और जांच रिपोर्ट के बाद भर्ती करने से मना करके फिर दूसरे अस्पताल जाने को कहा। यह एक भयानक सरकारी इंतजाम है और पूरी तरह से हैवानियत का भी।
लेकिन गरीबों और कमजोर तबकों के लिए यह एक अनोखी बात नहीं है। सरकार और समाज से कमजोर लोगों को इसी तरह कुचला जाना पड़ता है। कदम-कदम पर लोकतंत्र के तहत गरीबों को जो हक मिलने चाहिए, उनको छीना जाता है, सरकार उनके लिए अपनी योजनाओं में जो जगह रखती है, उन्हें दूसरे लूट ले जाते हैं,  अदालतें अपने दरवाजे सिर्फ खर्च करने में काबिल लोगों के लिए खुले रखती हैं और देश की संसद और विधानसभाओं में लगातार खरबपति, अरबपति और करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं। ऐसे में यह जाहिर है कि सड़क के किनारे से ठेलों को जब चाहे तब उठाकर हटा दिया जाता है और इस पल जब हम मुंबई के एक अस्पताल में एक गरीब मरीज के बारे में यह लिख रहे हैं, उसी पल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बाहर से ठेले और खोमचे वालों को ट्रक में लादकर ले जाने की तस्वीरें हमारे सामने हैं।
दरअसल समाज में आज लोगों की राजनीतिक-सामाजिक चेतना गटर में जा चुकी है। न तो परिवार के भीतर नई पीढ़ी को तथाकथित इंसानियत की बातें सिखाना अब आम रह गया और न ही स्कूल या कॉलेज में ऐसी नसीहतों की कोई जगह है। समाज के भीतर भी लोगों से ऐसी प्रेरणा पाने का मौका नई पीढ़ी को नहीं मिलता। इसलिए आज के जो नौजवान डॉक्टर, या इससे पिछली पीढ़ी के भी जो डॉक्टर मरीजों को इस तरह से लौटाते हैं, उनकी राजनीतिक चेतना शून्य रहती है और कमजोर तबकों के लिए उनमें कोई हमदर्दी भी नहीं रहती। हम इसे सिर्फ सरकारी इंतजाम की खामी मानकर सिर्फ कानूनी कार्रवाई तक अपनी बात को सीमित रखना नहीं चाहते, हम इस मौके पर यह भी पूछना चाहते हैं कि समाज के भीतर इस परले दर्जे की हैवानियत को लेकर भी क्या कोई बातचीत होगी या फिर बीत चुके महान लोगों की महानता का साल में दो-दो बार, जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर, गुणगान करके ही भारत का समाज अपने आपको महान परंपराओं का वारिस मानता रहेगा?
भारत में हैवानियत दिखाने वाले लोगों को, धर्म, आध्यात्म और महत्वहीन अनुपात वाले दान से आत्मग्लानि से मुक्त होने का एक आसान जरिया मिला हुआ है। ऐसा अपराध करने वाले डॉक्टरों में से कोई ईश्वर की किसी दुकान पर जाकर अपने लिए पुण्य खरीदने को काफी समझता होगा और फिर वह किसी गरीब के साथ ऐसा जुल्म करके भी किसी पाप की सोच से मुक्त रहता होगा। तर्क से परे की जितने किस्म की आस्था होती है वह लोगों को लोकतंत्र, तथाकथित इंसानियत और नियम-कायदों को तोडऩे का हौसला जुटा देती है। मुंबई की इस घटना को लेकर समाज के भीतर एक व्यापक चर्चा की जरूरत है कि ऐसी नौबत जब आती है तब जिम्मेदार लोगों के भीतर का इंसान मरकर कहां जाकर दफन हुआ रहता है? ऐसी घटनाएं इस देश के लिए शर्म से डूबकर मर जाने की है कि जिन राजधानियों में ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोग गरीबों के हक के सरकारी खजाने को रात-दिन लूटने की साजिश बनाने में लगे रहते हैं वहीं पर भारत का एक नागरिक फुटपाथ पर पैदा होने को, और कुछ घंटों में मर जाने को बेबस रहता है। इसे महज एक और खबर मानकर जो लोग भुला देंगे, उन्हें किसी ईश्वर के दरबार में जाकर खड़े रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रहेगा।

छोटी सी बात


10 अक्टूबर
जो लोग बिना बुलाए किसी के घर-दफ्तर बार-बार चले जाते हैं, देर तक बैठते हैं, वे अपनी बेइज्जती का पुख्ता इंतजाम करते चलते हैं। ऐसी छूट आज के जमाने में किसी से भी नहीं लेनी चाहिए। लोग जब आपसे कतराना शुरू करते हैं, तो फिर हो सकता है कि आपकी किसी बड़ी जरूरत के वक्त भी वे आपसे कतराएं। ऐसी नौबत न आने दें।

मीडिया, और मीडिया कारोबार पर रोक का सरकारी फैसला

10 अक्टूबर 2011
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के टेलीविजन चैनलों के बारे में बनाए गए नियम-कायदों को और कड़ा करते हुए यह तय किया है कि अगर कोई चैनल दस बरस के लिए मिले हुए लाइसेंस के दौरान सरकार की इस बारे में बनाई गई नीतियों  और नियमों को पांच से अधिक बार तोड़ता है तो सरकार उसका लाइसेंस आगे बढ़ाने से मना कर सकती है। और सरकार के नियमों में अब जो बातें हैं उनमें अश्लीलता, भौंडापन, महिलाओं और बच्चों का अपमान, किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक होना, देश के हितों के खिलाफ होना या दूसरे देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों के खिलाफ होना, जैसी बातें शामिल हैं। सरकार ने प्रसारण के कारोबार से छोटे लोगों को बाहर करने के हिसाब से यह तय किया है कि गैरखबरी-ताजा मामलों, वाले चैनलों की पूंजी अब डेढ़ करोड़ रुपए की मौजूदा शर्त से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गई है। समाचार-ताजा मामलों के चैनलों के लिए लाइसेंस पाने को अब तीन करोड़ रुपए पूंजी की मौजूदा शर्त को बढ़ाकर बीस करोड़ रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा बहुत किस्म की और शर्तें जोड़ी गई हैं।
यह पूरी सोच एक पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है जो कि मीडिया के इस हिस्से पर लगाम लगाने के लिए और छोटे लोगों को धंधे से बाहर करने के लिए की गई है। इसे कुछ अधिक दूर तक समझने के लिए भारत के अखबारों की मिसाल ली जा सकती है। कल को अगर केंद्र सरकार अखबारों के लिए यह नियम बना दे कि अखबार निकालने वाले प्रकाशक के पास दस करोड़ की पूंजी होनी चाहिए, अखबार की मशीन एक बार में बीस पेज छापने वाली होनी चाहिए और अखबार कम से कम चौबीस पेज का होना चाहिए, तो ऐसे कारोबार में सिर्फ ऐसे बड़े लोग बच जाएंगे जिनके दूसरे कारोबार भी होंगे और जिन पर सरकार का लगाम लगाना आसान भी होगा। ऐसे छोटे लोग जो केवल अखबार की अर्थव्यवस्था के तहत अखबार निकालने की सोचते हों, वे तमाम लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े इस कारोबार में घुस भी नहीं सकेंगे। यह दो हिसाब से अलोकतांत्रिक होगा, एक तो लोकतंत्र के भीतर कारोबार करने की आजादी। और दूसरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उपयोग को सीमित करना। यह सिलसिला बहुत भयानक है। आज पहली नजर में यह सिर्फ टेलीविजन चैनलों के बारे में लगता फैसला है लेकिन यह सरकार की एक ऐसी सोच है जो आगे चलकर मीडिया के दूसरे हिस्सों को भी गिरफ्त में लेगी।  मजे की बात यह है कि देश के कुछ बड़े कारोबारी अखबारों ने इस फैसले पर टेलीविजन प्रसारण के बड़े कारोबारियों से प्रतिक्रिया ली तो वे कम पंूजी वालों को इस धंधे से बाहर करने के सरकारी फैसले के हिमायती रहे। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी बड़े इस्पात कारखाने वाले से पूछा जाए कि छोटे-छोटे कारखाने बंद कर देना ठीक होगा या नहीं।
इस बारे में लिखते हुए कुछ दिन पहले ही ब्रिटेन में वहां की लेबर पार्टी का एक विचार पढऩे मिला जिसके तहत सरकार वहां इस पार्टी का संस्कृति (छाया) सचिव ऐसा प्रस्ताव रखने जा रहा है जिसमें वहां के पत्रकारों को एक पेशेवर संगठन के माध्यम से काम करने का लाइसेंस मिलेगा और वे अगर आचार संहिता को तोड़ेंगे तो  उन्हें भविष्य में पत्रकारिता करने नहीं मिलेगा। भारत सरकार के ताजा फैसले को अगर देखें तो यह बात बहुत साफ है कि किसी भी चैनल को जिन बातों पर दस बरस पूरे होने पर आगे काम करने से रोका जा सकता है, वे तमाम बातें बहुत आसानी से सरकारी मर्जी से साबित की जा सकती हैं। किसी देश की आलोचना करने पर उसे भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों में दरार पैदा करने वाला करार दिया जा सकता है। किसी भी बात को देश के हित के खिलाफ माना जा सकता है और जिस देश में कल इमरजेंसी के दौरान इंदिरा इज इंडिया कहा गया था और आज अन्ना को संसद से ऊपर कहा जा रहा है वहां पर किसी भी बात को उस वक्त की मौजूदा सरकार अपनी नीतियों के हिसाब से, देशहित के खिलाफ मान सकती है।
हम आए दिन टेलीविजन समाचार चैनलों के खराब काम और कारोबारी रूख के खिलाफ, उनकी गैरजिम्मेदारी और सनसनी के खिलाफ लिखते हैं। लेकिन हम ऐसी किसी भी रोक के खिलाफ हैं जिसमें कोई सरकार किसी गलती के आधार पर चैनल की जिंदगी खत्म कर दे। कल को क्या पांच समाचार गलत साबित होने पर अखबार बंद करवा दिया जाएगा? चुनाव में पांच नियम तोडऩे पर आगे चुनाव लडऩे पर रोक लग जाएगी? दफ्तर पांच बार लेट पहुंचने पर सरकारी नौकरी से निकाल दिया जाएगा? रोक लगाने की यह सोच पिछले एक-दो बरस में यूपीए सरकार को मीडिया, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाथों पहुंचे नुकसान की वजह से उपजी दिख रही है। इस दौरान हमने मीडिया को कई बार बहुत ही गैरजिम्मेदार पाकर उसके खिलाफ लिखा है लेकिन यह बात साफ है कि ऐसी गैरजिम्मेदारी, पे्रस काउंसिल जैसी किसी संस्था में कार्रवाई के लायक तो है, किसी चैनल को बंद करने लायक वह फिर भी नहीं है। दस बरस के बाद किसी चैनल को बंद करने का खतरा लोगों को काम की आजादी से पूरी तरह रोक देगा। आज भारत में मीडिया की आजादी पर चर्चा सिर्फ उसी समय होती है जब मीडिया के प्रकाशन-प्रसारण के कारोबार पर कोई वार होता है। उसके पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित कोई वार विरोध खड़ा नहीं कर पाता। यह एक भयानक स्थिति है जब सिर्फ कारोबार की स्वतंत्रता ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता रह गई है। इस बारे में सरकार से परे भी बात होनी चाहिए और इस ताजा सरकारी फैसले से परे भी बात होनी चाहिए।

छोटी सी बात

9 अक्टूबर
सरकार को किसी भी तरह का चूना लगाने वालों को याद रखना चाहिए कि टैक्स चोरी से लेकर बाकी किस्म को बेईमानियों तक से वह दवा-खाना आ सकता था जिससे गरीबों की जान बची होती।

तुरंत तेलंगाना बनाने की जरूरत

9 अक्टूबर 2011
तेलंगाना को लेकर आंधप्रदेश में एक बड़ा तनाव बना हुआ है और आज के आंध्र से अलग होकर नया राज्य बनने के लिए बेमुद्दत हड़ताल पर चल रहा तेलंगाना इलाका तो सब कुछ बोल रहा है लेकिन आंध्र का बाकी हिस्सा अभी चुप है। कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार और आंध्र की कांगे्रस सरकार के सामने यह एक शिकस्त ही शिकस्त वाली नौबत है कि वह राज्य न बनाए तो तेलंगाना तो हाथ से निकला हुआ है ही, राज्य बनाए तो बाकी आंध्र को यह लगेगा कि उसके साथ बेइंसाफी हुई है, आज के अविभाजित आंध्र की राजधानी हैदराबाद की मौजूदगी उसके भौगोलिक इलाके तेलंगाना में होगी या उसे दोनों राज्यों के बीच एक केंद्र प्रशास्ति शहर, चंडीगढ़ की तरह बनाकर रखा जाएगा? ऐसे बहुत से विकल्प, संभावनाएं और अटकलें हवा में हैं और यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी की ही खड़ी की हुई है जिसके मंत्री चिदंबरम ने एक दिन अचानक ही तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा कर दी थी। उसके तुरंत बाद कांगे्रस और यूपीए सरकार को यह समझ आ गया था कि वह बयानबाजी की चूक हो गई और कांगे्रस ने न तो यूपीए के बाकी भागीदारों से बात की थी और न ही आंध्र में खुद अपनी पार्टी के लोगों से बात की थी। सोनिया के इस ताकतवर मंत्री की मुनादी धरी रह गई और तेलंगाना के बनने का आज तक रास्ता नहीं निकल पाया। इतने नाजुक मामले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने नौ दिसंबर 2009 को जो बयान दिया था उसकी मरम्मत करके एक पखवाड़े बाद में दूसरा बयान देना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनके पहले बयान को उनके दूसरे बयान के साथ जोड़कर ही पढ़ा जाए। यहां पर इस चर्चा का कोई प्रसंग तो नहीं है लेकिन यह बात यहां गिनाना ठीक होगा कि इसके पहले और इसके बाद कांगे्रस के केंद्रीय मंत्रियों और केंद्रीय नेताओं ने जितने किस्म की भयानकबयानी की है वह एक रिकॉर्ड है।
लेकिन आज हम अपनी बात को तेलंगाना और बाकी देश में नए राज्य बनने की चाह, और दावा रखने वाले इलाकों तक सीमित रखना चाहते हैं। आज ही एक खबर है कि महाराष्ट्र का विदर्भ का इलाका बड़ी दिलचस्पी और बेचैनी से तेलंगाना की राह देख रहा है। इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश और कुछ दूसरे इलाके भी राज्य बनना चाहते हैं। आज के इस हो-हल्ले के बीच कुछ लोगों से यह बात अनदेखी रह गई है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने किस खूबी के साथ बिना शोर-शराबे गोरखालैंड के आंदोलन पर वहां के संगठनों के साथ एक ऐसा समझौता कर लिया जिससे उस इलाके की 'आजादीÓ या स्वायत्तता की हसरत हिंसक नहीं हो पाई और अमनचैन से राज्य सरकार ने उस इलाके के जरूरत के लायक हक दे दिए। हम यहां पर यह भी याद करना चाहेंगे कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांगे्रस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पहल करके विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव करवाया था कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, यह राजनीतिक नजरिए से अपने थाली की कुछ मिठाई को उठाकर किसी को देने जैसी बात भी थी। लेकिन ऐसी उदारता उन्होंने दिखाई थी और मध्यप्रदेश के साथ-साथ बिहार और उत्तरप्रदेश ने भी झारखंड और उत्तराखंड बनाने के प्रस्ताव विधानसभा में पास किए थे जिसके आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार राज्य बनाने का वह ऐतिहासिक फैसला लिया था। आज न तो कोई राज्य अपने किसी हिस्से को अलग करने को तैयार है और न ही दिल्ली में किसी में अटलजी जैसा साफ-साफ फैसला करने का आज साहस है।
फिर यह कि तेलंगाना का आज का आंदोलन केंद्र सरकार बहुत अधिक समय देते भी नहीं दिख रहा। ऐसा भी नहीं कि तेलंगाना का आज का तनाव ऐतिहासिक है। इसके बहुत पहले भी वहां के आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और पूरे देश में राज्य का दर्जा पाने के लिए इतनी बड़ी शहादत का इतिहास नहीं मिलता, पुलिस की गोलियों से कोई पौने चार सौ लोग मारे गए थे। और आज यह इलाका बेमुद्दत हड़ताल पर है जिसे लेकर वहां के लोगों का यह कहना है कि यह राज्य बनने तक जारी रहेगा। वहां के आंदोलनकारियों की शहादत का ऐसा मजबूत इतिहास कि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहने का आसार तो है, और यह भी हो सकता है कि लोग वहां आत्मदाह पर भी उतर आएं। यह मामला केंद्र सरकार के लिए एक ऐसी राजनीतिक चुनौती है जिससे जूझने की ताकत आज कांगे्रस में नहीं दिख रही है। और अब यह समय भी नहीं दिख रहा है कि कांगे्रस की लीडरशिप वाला यूपीए किसी राज्य पुनर्गठन आयोग की चर्चा छेड़े।
हमारा यह मानना है कि छोटे राज्य बनाए बिना और कोई चारा इस देश में नहीं है। और यह बात हम किसी मजबूरी या बेबसी की नौबत को देखकर नहीं कह रहे हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अनुभव को देखकर कह रहे हैं। ऐसी मिसाल भी गिनाई जा सकती है कि झारखंड या गोवा जैसे छोटे राज्य लगातार राजनीतिक अस्थिरता और भयानक भ्रष्टाचार, संवैधानिक संकट सभी कुछ तो भुगतते रहे हैं, भुगत रहे हैं। लेकिन ऐसा तो बड़े राज्यों के साथ भी होते आया है और सिर्फ ऐसे ही तर्कों के आधार पर छोटे राज्यों को रोका नहीं जा सकता। आंध्र देश के उन राज्यों में से है जहां एक बड़ी नक्सल मौजूदगी रही है। अगर किसी इलाके को उसका हक न मिले तो हिंसक आंदोलन दूसरे बैनरों तले भी शुरू हो सकते हैं। तेलंगाना को तुरंत बनाने और बाकी देश में भी छोटे राज्यों की मांग को तौलने की जरूरत है। आज ही।





 

छोटी सी बात

8 अक्टूबर
बिना काम किए, बिना मेहनत किए आप किसी को धोखा नहीं दे सकते। पसीना चमकता हुआ दिखता है और कामचोर की शक्ल पर मकड़ी के जाले से दिखते हैं। कामचोर सबसे बड़ा धोखा अपने आपको देते हैं।

अन्ना का मुखौटा उतरा

8 अक्टूबर
अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने का आव्हान उनके आंदोलन की शक्ल पर छाई हुई धुंध को साफ कर देता है। आज जब देश की कोई भी पार्टी अन्ना हजारे की लोकपाल विधेयक को लेकर चली आ रही अंतहीन जिद के साथ पूरी तरह नहीं है और यूपीए और कांगे्रस ने अपनी सीमाओं को पार करके भी अन्ना हजारे के साथ कई कड़वे समझौते किए, तब हरियाणा के एक उपचुनाव में अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने को कहना और वहां पर खुलकर सीडी चलाकर प्रचार करना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं है, यह सीधे-सीधे कांगे्रस के खिलाफ मुखौटे में चल रहा एक राजनीतिक आंदोलन है। ऐसा करके अन्ना हजारे ने देश के समझदार तबके के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी है और बहुत से लोग उन्हें एक जिद्दी, अडिय़ल और ब्लैकमेलर मान रहे थे, अब वे कांगे्रस विरोधी एक राजनीतिक ताकत के रूप में भी खुलकर सामने आ गए हैं।
आज जब एक उपचुनाव में प्रचार करते हुए उनका सीधा हमला कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर है, तब एक और मुखौटा पहनकर अन्ना हजारे का आंदोलन और उनकी टोली आरएसएस के साथ अपने रिश्तों को दबाने-छुपाने की कोशिश और कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों को तब भी दिख रहा था जब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन कहने को तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे थे लेकिन असल में उनका पूरा निशाना यूपीए सरकार, कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी का परिवार था। ऐसी हालत में गांधीवाद के नाम पर, भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर इन दोनों गुटों द्वारा अलग-अलग या तालमेल से अलग-अलग समय पर किए गए आंदोलनों को समझने की जरूरत है। जिस तरह कोई चाकू या बंदूक की नोंक पर किसी मांग को पूरा करवाता है उस तरह अन्ना हजारे ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना दिखाते हुए केंद्र सरकार, राजनीतिक दलों और संसद, सबको एक साथ ब्लैकमेल करते हुए देश का एक सबसे जटिल भावी कानून फुटपाथ पर बनाने की जिद सामने रखी। देश के लोगों को अपनी जान के मुद्दे पर उकसाते और भड़काते हुए अन्ना हजारे ने दो बातों को सामने नहीं आने दिया। एक तो यह कि उत्तर-पूर्व के मणिपुर राज्य में शर्मिला नाम की एक महिला दस बरस से अधिक समय से अनशन कर रही है और उसकी मांग है कि वहां पर ज्यादती करने वाली भारतीय सेना के बचाव के लिए बनाए गए विशेष कानून को खत्म किया जाए। दूसरी बात यह कि इस देश में जैन समाज के लोग आए दिन पचीस-पचास दिनों का पूरी तरह का उपवास करते ही रहते हैं। इन दोनों मुद्दों को सामने न आने देकर सारा हल्ला कुछ इस तरह का किया गया कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कानून नहीं बना तो अन्ना हजारे जान दे देंगे। वहां से लेकर संसद और पार्टियों ने सिर झुका लिया और अन्ना की अधिकतर मांगों को पूरा करने का वायदा किया, पूरा लोकतंत्र इस धमकी के आगे झुके रहा, और वहां से लेकर आज कुछ हफ्तों के भीतर अन्ना हजारे फिर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार करते हुए मैदान में हैंं।
लोकतंत्र में जब कभी कोई नेक-नीयत इंसान भी तानाशाह की तरह खड़ा हो जाता है और उसकी बातों की वजह से कुछ वक्त के लिए उसकी पूजा होने लगती है तो वह इंसान आगे-पीछे लोकतंत्र के लिए घातक ही साबित होता है। लोकतंत्र के कुछ संस्थानों के नाकामयाब होने से, उनसे कुछ या कई गलतियां होने से उन सबको नकारते हुए एक तानाशाह अंदाज में नया कानून बनाने की जिद उठाई जाए और उसे पूरा किया जाए, यह लोकतंत्र नहीं है। हम किसी भी और कितने भी जनकल्याणकारी तानाशाह के मुकाबले निर्वाचित लोगों को बेहतर समझते हैं और लोगों से उनके निर्वाचन का अधिकार छीनकर अगर कोई जान देने की धमकी देकर कोई भला सा दिखता काम भी करवाना चाहता है तो हम उसे बहुत ही खतरनाक मानते हैं। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि तानाशाहों के कई नारे संतों की तरह के होते हैं। भारत में ही आपातकाल के दौरान संजय गांधी के नारे छोटे परिवार, दहेज के विरोध और पेड़ लगाने के थे। लेकिन उस वक्त की तानाशाही की हकीकत इन नारों के पीछे एक हत्यारी हकीकत थी। आज अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों के पीछे उनकी नीयत चुनाव में किसी राजनीतिक ताकत का विरोध करते हुए किसी दूसरी राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देने की तो साबित हो ही चुकी है, आने वाले दिनों में अगर उनके आंदोलन को लेकर कुछ दूसरे किस्म की साजिशें भी साबित होंगी तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।

छोटी सी बात


7 अक्टूबर
आपका कद जैसे-जैसे बढ़ते जाता है, आप आसान निशाना बनते जाते हैं। इसलिए कामयाबी के साथ-साथ चौकन्नापन भी बढ़ाते जाएं। यह भी याद रखें कि शिखर पर जाते हुए लोग अकेले भी होते जाते हैं।

मौलिक खूबियों से लेकर एक खामी तक की कहानी, स्टीव जॉब्स

7 अक्टूबर 2011
किसी कामयाब कारोबारी पर इस जगह लिखने का मौका कम ही आता है और एप्पल कम्प्यूटर के मार्फत दुनिया में अरबों घरों तक पहुंचने वाले स्टीव जॉब्स के बारे में लिखने की वजह न कामयाबी है और न ही कारोबार। उनकी जिंदगी इतनी दिलचस्प है और सामानों के बाजार में उनका योगदान इतना मौलिक है कि ये दो बातें उनके बारे में लिखने के लिए काफी है। और जिन्होंने एप्पल के बनाए सामान इस्तेमाल किए हैं उनमें से अधिकतर का यह मानना है और अनुभव है कि वे अपने किस्म के सामानों में सबसे अच्छे रहते हैं। यह क्वालिटी या उत्कृष्टता एक और बात है जो आज यहां उनके बारे में लिखने को मजबूर करती है।
एक बहुत मामूली और शायद दिक्कतों भरी हुई शुरूआत की जिंदगी कहां तक पहुंची यह देखना हो तो वैसे तो अमरीका में कुछ दूसरी कहानियां भी इस किस्म की मिल जाएंगी लेकिन स्टीव जॉब्स का मामला भी देखने और सीखने लायक है कि किस तरह कोई अभावों से ऊपर उठकर आसमान तक पहुंच सकता है और अपने काम की वजह से सितारे की तरह आसमान पर हमेशा टंगे भी रह सकता है। स्टीव जॉब्स का जन्म अमरीका में आकर बसे एक सीरियाई मुस्लिम आप्रवासी परिवार में हुआ और किन्हीं वजहों से उन्हें एक दूसरे परिवार को गोद दे दिया गया। अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ बच्चा स्कूल और कॉलेज के वक्त दोस्तों के कमरों में फर्श पर सोता था और खाना जुटाने के लिए इधर-उधर पड़ी खाली बोतलों को इक_ा करके बेचता था। हफ्ते के हफ्ते वह हरे कृष्ण मंदिर में मुफ्त का प्रसाद पाने भी चले जाता था और बाद के बरसों में वह भारत भी आया और बौद्ध बना।
हाल के बरसों तक अगर स्टीव जॉब्स को देखें तो अमरीका की कारोबारी दुनिया के मुखिया लोगों वाला कोई भी तौर-तरीका उनका नहीं था। पूरे वक्त खेल के जूते, साधारण नीली जींस और काली टी-शर्ट को उन्होंने मानों अपनी वर्दी बना रखी थी और यह पोशाक अमरीका में छुट्टी के वक्त तो बड़े लोग पहन लेते हैं लेकिन बड़े से बड़े समारोह में भी स्टीव जॉब्स सिर्फ इन्हीं कपड़ों में दिखते रहे। अपने रहन-सहन की उनकी इस मौलिक सोच की ही एक झलक उनके बनाए हुए सामानों में भी दिखती रही। एप्पल के कम्प्यूटर, लैपटॉप, आईपॉड और आईफोन से लेकर आईपैड तक उन्होंने जो-जो बनाया उनमें से हर किसी में एक बहुत ही अनोखापन था। और यही अनोखापन दुनिया के आज के कड़े मुकाबले वाले बाजार में उन्हें एकाधिकार सा दिला गया। उनके बारे में आज यहां लिखने का एक मकसद यह है कि एक मौलिकता, अनोखापन और उत्कृष्टता मिलकर क्या कर सकते हैं यह लोगों को देखने, समझने और सीखने की जरूरत है। दो बातें सोचने की हैं। एक तो यह कि दुनिया के तौर-तरीकों के खिलाफ एक बागी के अंदाज में भी कोई अपनी मर्जी के कपड़ों में सबसे बड़ी पूंजीवादी दुनिया में रह सकता है। दूसरी बात यह कि कल्पनाशीलता और उत्कृष्टता एक शानदार बाजार-व्यवस्था के साथ कहां तक पहुंच सकती है। उनके बारे में यह माना गया कि उन्होंने ये तमाम सामान उस किस्म के और उस वक्त बनाए जब लोगों को इस बात का अहसास भी नहीं था कि उन्हें वैसे किसी सामान की जरूरत है। बहुत ही गरीबी या साधारण हालत से उठकर कोई अगर मौलिक सामानों वाली, वक्त से दस कदम आगे चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी, कामयाब और मशहूर कंपनी बना सकता है और ऐतिहासिक कमाई करके भी दिखा सकता है, तो ऐसी अकेली कहानी शायद स्टीव जॉब्स की ही है।
स्टीव जॉब्स को दुनिया भर में एप्पल के ग्राहक जिस तकलीफ के साथ याद कर रहे हैं और फूल चढ़ा रहे हैं, वह देखने लायक है। क्या इसके पहले किसी कारोबारी को ऐसा कुछ नसीब हुआ था? एप्पल कंपनी के सबसे बड़े मुकाबले वाली माइक्रोसॉफ्ट  कंपनी के मुखिया बिल गेट्स के रिश्ते स्टीव जॉब्स से दोस्ती के भी रहे और गलाकाट मुकाबले के भी। लेकिन बिल गेट्स ने जिस अंदाज में दुनिया भर में समाज सेवा कर बीड़ा उठाया है और दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी आधी दौलत समाज के लिए देने के लिए प्रेरित किया है, वैसा कुछ भी स्टीव जॉब्स के साथ जुड़ा हुआ नहीं है। मिट्टी से उठकर उन्होंने एप्पल जैसी कंपनी बनाई, उसे छोड़कर निकल गए, फिर दूसरी कंपनी बनाकर उसकी कमाई से एप्पल को खरीद लिया और उसे तारों से ऊपर तक ले गए, लेकिन उन्होंने समाज के लिए कोई दान किया हो ऐसा किसी को नहीं मालूम है। बल्कि एप्पल पर दुबारा कब्जा करने के बाद उन्होंने उस कंपनी के समाजसेवा के सारे कार्यक्रम बंद भी करवा दिए। इस तरह एक अच्छे कारोबारी की जो जिम्मेदारी समाज के लिए होती है उसमें स्टीव जॉब्स ने शायद अपना आधा खाया जूठा सेब भी किसी भूखे को नहीं दिया। उनकी बहुत सी खूबियों को गिनाते हुए अगर इस बात की चर्चा न की जाए तो यह अधूरी बात ही होगी। उनकी कंपनी को शेयर बाजार में दुनिया की सबसे सफल कंपनी कहा लेकिन यह कंपनी अमरीका की सबसे कम समाज सेवा करने वाली कंपनी भी कहलाई। स्टीव जॉब्स की सामानों और तकनीक, मार्केटिंग और डिजाइन की सारी मौलिकता, बिल गेट्स की समाजसेवा की मौलिकता और आधी दौलत दान देने के अभियान के सामने धरी रह गई।