8 अक्टूबर
अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने का आव्हान उनके आंदोलन की शक्ल पर छाई हुई धुंध को साफ कर देता है। आज जब देश की कोई भी पार्टी अन्ना हजारे की लोकपाल विधेयक को लेकर चली आ रही अंतहीन जिद के साथ पूरी तरह नहीं है और यूपीए और कांगे्रस ने अपनी सीमाओं को पार करके भी अन्ना हजारे के साथ कई कड़वे समझौते किए, तब हरियाणा के एक उपचुनाव में अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने को कहना और वहां पर खुलकर सीडी चलाकर प्रचार करना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं है, यह सीधे-सीधे कांगे्रस के खिलाफ मुखौटे में चल रहा एक राजनीतिक आंदोलन है। ऐसा करके अन्ना हजारे ने देश के समझदार तबके के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी है और बहुत से लोग उन्हें एक जिद्दी, अडिय़ल और ब्लैकमेलर मान रहे थे, अब वे कांगे्रस विरोधी एक राजनीतिक ताकत के रूप में भी खुलकर सामने आ गए हैं।
आज जब एक उपचुनाव में प्रचार करते हुए उनका सीधा हमला कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर है, तब एक और मुखौटा पहनकर अन्ना हजारे का आंदोलन और उनकी टोली आरएसएस के साथ अपने रिश्तों को दबाने-छुपाने की कोशिश और कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों को तब भी दिख रहा था जब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन कहने को तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे थे लेकिन असल में उनका पूरा निशाना यूपीए सरकार, कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी का परिवार था। ऐसी हालत में गांधीवाद के नाम पर, भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर इन दोनों गुटों द्वारा अलग-अलग या तालमेल से अलग-अलग समय पर किए गए आंदोलनों को समझने की जरूरत है। जिस तरह कोई चाकू या बंदूक की नोंक पर किसी मांग को पूरा करवाता है उस तरह अन्ना हजारे ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना दिखाते हुए केंद्र सरकार, राजनीतिक दलों और संसद, सबको एक साथ ब्लैकमेल करते हुए देश का एक सबसे जटिल भावी कानून फुटपाथ पर बनाने की जिद सामने रखी। देश के लोगों को अपनी जान के मुद्दे पर उकसाते और भड़काते हुए अन्ना हजारे ने दो बातों को सामने नहीं आने दिया। एक तो यह कि उत्तर-पूर्व के मणिपुर राज्य में शर्मिला नाम की एक महिला दस बरस से अधिक समय से अनशन कर रही है और उसकी मांग है कि वहां पर ज्यादती करने वाली भारतीय सेना के बचाव के लिए बनाए गए विशेष कानून को खत्म किया जाए। दूसरी बात यह कि इस देश में जैन समाज के लोग आए दिन पचीस-पचास दिनों का पूरी तरह का उपवास करते ही रहते हैं। इन दोनों मुद्दों को सामने न आने देकर सारा हल्ला कुछ इस तरह का किया गया कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कानून नहीं बना तो अन्ना हजारे जान दे देंगे। वहां से लेकर संसद और पार्टियों ने सिर झुका लिया और अन्ना की अधिकतर मांगों को पूरा करने का वायदा किया, पूरा लोकतंत्र इस धमकी के आगे झुके रहा, और वहां से लेकर आज कुछ हफ्तों के भीतर अन्ना हजारे फिर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार करते हुए मैदान में हैंं।
लोकतंत्र में जब कभी कोई नेक-नीयत इंसान भी तानाशाह की तरह खड़ा हो जाता है और उसकी बातों की वजह से कुछ वक्त के लिए उसकी पूजा होने लगती है तो वह इंसान आगे-पीछे लोकतंत्र के लिए घातक ही साबित होता है। लोकतंत्र के कुछ संस्थानों के नाकामयाब होने से, उनसे कुछ या कई गलतियां होने से उन सबको नकारते हुए एक तानाशाह अंदाज में नया कानून बनाने की जिद उठाई जाए और उसे पूरा किया जाए, यह लोकतंत्र नहीं है। हम किसी भी और कितने भी जनकल्याणकारी तानाशाह के मुकाबले निर्वाचित लोगों को बेहतर समझते हैं और लोगों से उनके निर्वाचन का अधिकार छीनकर अगर कोई जान देने की धमकी देकर कोई भला सा दिखता काम भी करवाना चाहता है तो हम उसे बहुत ही खतरनाक मानते हैं। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि तानाशाहों के कई नारे संतों की तरह के होते हैं। भारत में ही आपातकाल के दौरान संजय गांधी के नारे छोटे परिवार, दहेज के विरोध और पेड़ लगाने के थे। लेकिन उस वक्त की तानाशाही की हकीकत इन नारों के पीछे एक हत्यारी हकीकत थी। आज अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों के पीछे उनकी नीयत चुनाव में किसी राजनीतिक ताकत का विरोध करते हुए किसी दूसरी राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देने की तो साबित हो ही चुकी है, आने वाले दिनों में अगर उनके आंदोलन को लेकर कुछ दूसरे किस्म की साजिशें भी साबित होंगी तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।
अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने का आव्हान उनके आंदोलन की शक्ल पर छाई हुई धुंध को साफ कर देता है। आज जब देश की कोई भी पार्टी अन्ना हजारे की लोकपाल विधेयक को लेकर चली आ रही अंतहीन जिद के साथ पूरी तरह नहीं है और यूपीए और कांगे्रस ने अपनी सीमाओं को पार करके भी अन्ना हजारे के साथ कई कड़वे समझौते किए, तब हरियाणा के एक उपचुनाव में अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने को कहना और वहां पर खुलकर सीडी चलाकर प्रचार करना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं है, यह सीधे-सीधे कांगे्रस के खिलाफ मुखौटे में चल रहा एक राजनीतिक आंदोलन है। ऐसा करके अन्ना हजारे ने देश के समझदार तबके के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी है और बहुत से लोग उन्हें एक जिद्दी, अडिय़ल और ब्लैकमेलर मान रहे थे, अब वे कांगे्रस विरोधी एक राजनीतिक ताकत के रूप में भी खुलकर सामने आ गए हैं।
आज जब एक उपचुनाव में प्रचार करते हुए उनका सीधा हमला कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर है, तब एक और मुखौटा पहनकर अन्ना हजारे का आंदोलन और उनकी टोली आरएसएस के साथ अपने रिश्तों को दबाने-छुपाने की कोशिश और कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों को तब भी दिख रहा था जब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन कहने को तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे थे लेकिन असल में उनका पूरा निशाना यूपीए सरकार, कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी का परिवार था। ऐसी हालत में गांधीवाद के नाम पर, भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर इन दोनों गुटों द्वारा अलग-अलग या तालमेल से अलग-अलग समय पर किए गए आंदोलनों को समझने की जरूरत है। जिस तरह कोई चाकू या बंदूक की नोंक पर किसी मांग को पूरा करवाता है उस तरह अन्ना हजारे ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना दिखाते हुए केंद्र सरकार, राजनीतिक दलों और संसद, सबको एक साथ ब्लैकमेल करते हुए देश का एक सबसे जटिल भावी कानून फुटपाथ पर बनाने की जिद सामने रखी। देश के लोगों को अपनी जान के मुद्दे पर उकसाते और भड़काते हुए अन्ना हजारे ने दो बातों को सामने नहीं आने दिया। एक तो यह कि उत्तर-पूर्व के मणिपुर राज्य में शर्मिला नाम की एक महिला दस बरस से अधिक समय से अनशन कर रही है और उसकी मांग है कि वहां पर ज्यादती करने वाली भारतीय सेना के बचाव के लिए बनाए गए विशेष कानून को खत्म किया जाए। दूसरी बात यह कि इस देश में जैन समाज के लोग आए दिन पचीस-पचास दिनों का पूरी तरह का उपवास करते ही रहते हैं। इन दोनों मुद्दों को सामने न आने देकर सारा हल्ला कुछ इस तरह का किया गया कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कानून नहीं बना तो अन्ना हजारे जान दे देंगे। वहां से लेकर संसद और पार्टियों ने सिर झुका लिया और अन्ना की अधिकतर मांगों को पूरा करने का वायदा किया, पूरा लोकतंत्र इस धमकी के आगे झुके रहा, और वहां से लेकर आज कुछ हफ्तों के भीतर अन्ना हजारे फिर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार करते हुए मैदान में हैंं।
लोकतंत्र में जब कभी कोई नेक-नीयत इंसान भी तानाशाह की तरह खड़ा हो जाता है और उसकी बातों की वजह से कुछ वक्त के लिए उसकी पूजा होने लगती है तो वह इंसान आगे-पीछे लोकतंत्र के लिए घातक ही साबित होता है। लोकतंत्र के कुछ संस्थानों के नाकामयाब होने से, उनसे कुछ या कई गलतियां होने से उन सबको नकारते हुए एक तानाशाह अंदाज में नया कानून बनाने की जिद उठाई जाए और उसे पूरा किया जाए, यह लोकतंत्र नहीं है। हम किसी भी और कितने भी जनकल्याणकारी तानाशाह के मुकाबले निर्वाचित लोगों को बेहतर समझते हैं और लोगों से उनके निर्वाचन का अधिकार छीनकर अगर कोई जान देने की धमकी देकर कोई भला सा दिखता काम भी करवाना चाहता है तो हम उसे बहुत ही खतरनाक मानते हैं। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि तानाशाहों के कई नारे संतों की तरह के होते हैं। भारत में ही आपातकाल के दौरान संजय गांधी के नारे छोटे परिवार, दहेज के विरोध और पेड़ लगाने के थे। लेकिन उस वक्त की तानाशाही की हकीकत इन नारों के पीछे एक हत्यारी हकीकत थी। आज अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों के पीछे उनकी नीयत चुनाव में किसी राजनीतिक ताकत का विरोध करते हुए किसी दूसरी राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देने की तो साबित हो ही चुकी है, आने वाले दिनों में अगर उनके आंदोलन को लेकर कुछ दूसरे किस्म की साजिशें भी साबित होंगी तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।
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