10 अक्टूबर 2011
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के टेलीविजन चैनलों के बारे में बनाए गए नियम-कायदों को और कड़ा करते हुए यह तय किया है कि अगर कोई चैनल दस बरस के लिए मिले हुए लाइसेंस के दौरान सरकार की इस बारे में बनाई गई नीतियों और नियमों को पांच से अधिक बार तोड़ता है तो सरकार उसका लाइसेंस आगे बढ़ाने से मना कर सकती है। और सरकार के नियमों में अब जो बातें हैं उनमें अश्लीलता, भौंडापन, महिलाओं और बच्चों का अपमान, किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक होना, देश के हितों के खिलाफ होना या दूसरे देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों के खिलाफ होना, जैसी बातें शामिल हैं। सरकार ने प्रसारण के कारोबार से छोटे लोगों को बाहर करने के हिसाब से यह तय किया है कि गैरखबरी-ताजा मामलों, वाले चैनलों की पूंजी अब डेढ़ करोड़ रुपए की मौजूदा शर्त से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गई है। समाचार-ताजा मामलों के चैनलों के लिए लाइसेंस पाने को अब तीन करोड़ रुपए पूंजी की मौजूदा शर्त को बढ़ाकर बीस करोड़ रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा बहुत किस्म की और शर्तें जोड़ी गई हैं।
यह पूरी सोच एक पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है जो कि मीडिया के इस हिस्से पर लगाम लगाने के लिए और छोटे लोगों को धंधे से बाहर करने के लिए की गई है। इसे कुछ अधिक दूर तक समझने के लिए भारत के अखबारों की मिसाल ली जा सकती है। कल को अगर केंद्र सरकार अखबारों के लिए यह नियम बना दे कि अखबार निकालने वाले प्रकाशक के पास दस करोड़ की पूंजी होनी चाहिए, अखबार की मशीन एक बार में बीस पेज छापने वाली होनी चाहिए और अखबार कम से कम चौबीस पेज का होना चाहिए, तो ऐसे कारोबार में सिर्फ ऐसे बड़े लोग बच जाएंगे जिनके दूसरे कारोबार भी होंगे और जिन पर सरकार का लगाम लगाना आसान भी होगा। ऐसे छोटे लोग जो केवल अखबार की अर्थव्यवस्था के तहत अखबार निकालने की सोचते हों, वे तमाम लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े इस कारोबार में घुस भी नहीं सकेंगे। यह दो हिसाब से अलोकतांत्रिक होगा, एक तो लोकतंत्र के भीतर कारोबार करने की आजादी। और दूसरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उपयोग को सीमित करना। यह सिलसिला बहुत भयानक है। आज पहली नजर में यह सिर्फ टेलीविजन चैनलों के बारे में लगता फैसला है लेकिन यह सरकार की एक ऐसी सोच है जो आगे चलकर मीडिया के दूसरे हिस्सों को भी गिरफ्त में लेगी। मजे की बात यह है कि देश के कुछ बड़े कारोबारी अखबारों ने इस फैसले पर टेलीविजन प्रसारण के बड़े कारोबारियों से प्रतिक्रिया ली तो वे कम पंूजी वालों को इस धंधे से बाहर करने के सरकारी फैसले के हिमायती रहे। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी बड़े इस्पात कारखाने वाले से पूछा जाए कि छोटे-छोटे कारखाने बंद कर देना ठीक होगा या नहीं।
इस बारे में लिखते हुए कुछ दिन पहले ही ब्रिटेन में वहां की लेबर पार्टी का एक विचार पढऩे मिला जिसके तहत सरकार वहां इस पार्टी का संस्कृति (छाया) सचिव ऐसा प्रस्ताव रखने जा रहा है जिसमें वहां के पत्रकारों को एक पेशेवर संगठन के माध्यम से काम करने का लाइसेंस मिलेगा और वे अगर आचार संहिता को तोड़ेंगे तो उन्हें भविष्य में पत्रकारिता करने नहीं मिलेगा। भारत सरकार के ताजा फैसले को अगर देखें तो यह बात बहुत साफ है कि किसी भी चैनल को जिन बातों पर दस बरस पूरे होने पर आगे काम करने से रोका जा सकता है, वे तमाम बातें बहुत आसानी से सरकारी मर्जी से साबित की जा सकती हैं। किसी देश की आलोचना करने पर उसे भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों में दरार पैदा करने वाला करार दिया जा सकता है। किसी भी बात को देश के हित के खिलाफ माना जा सकता है और जिस देश में कल इमरजेंसी के दौरान इंदिरा इज इंडिया कहा गया था और आज अन्ना को संसद से ऊपर कहा जा रहा है वहां पर किसी भी बात को उस वक्त की मौजूदा सरकार अपनी नीतियों के हिसाब से, देशहित के खिलाफ मान सकती है।
हम आए दिन टेलीविजन समाचार चैनलों के खराब काम और कारोबारी रूख के खिलाफ, उनकी गैरजिम्मेदारी और सनसनी के खिलाफ लिखते हैं। लेकिन हम ऐसी किसी भी रोक के खिलाफ हैं जिसमें कोई सरकार किसी गलती के आधार पर चैनल की जिंदगी खत्म कर दे। कल को क्या पांच समाचार गलत साबित होने पर अखबार बंद करवा दिया जाएगा? चुनाव में पांच नियम तोडऩे पर आगे चुनाव लडऩे पर रोक लग जाएगी? दफ्तर पांच बार लेट पहुंचने पर सरकारी नौकरी से निकाल दिया जाएगा? रोक लगाने की यह सोच पिछले एक-दो बरस में यूपीए सरकार को मीडिया, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाथों पहुंचे नुकसान की वजह से उपजी दिख रही है। इस दौरान हमने मीडिया को कई बार बहुत ही गैरजिम्मेदार पाकर उसके खिलाफ लिखा है लेकिन यह बात साफ है कि ऐसी गैरजिम्मेदारी, पे्रस काउंसिल जैसी किसी संस्था में कार्रवाई के लायक तो है, किसी चैनल को बंद करने लायक वह फिर भी नहीं है। दस बरस के बाद किसी चैनल को बंद करने का खतरा लोगों को काम की आजादी से पूरी तरह रोक देगा। आज भारत में मीडिया की आजादी पर चर्चा सिर्फ उसी समय होती है जब मीडिया के प्रकाशन-प्रसारण के कारोबार पर कोई वार होता है। उसके पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित कोई वार विरोध खड़ा नहीं कर पाता। यह एक भयानक स्थिति है जब सिर्फ कारोबार की स्वतंत्रता ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता रह गई है। इस बारे में सरकार से परे भी बात होनी चाहिए और इस ताजा सरकारी फैसले से परे भी बात होनी चाहिए।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के टेलीविजन चैनलों के बारे में बनाए गए नियम-कायदों को और कड़ा करते हुए यह तय किया है कि अगर कोई चैनल दस बरस के लिए मिले हुए लाइसेंस के दौरान सरकार की इस बारे में बनाई गई नीतियों और नियमों को पांच से अधिक बार तोड़ता है तो सरकार उसका लाइसेंस आगे बढ़ाने से मना कर सकती है। और सरकार के नियमों में अब जो बातें हैं उनमें अश्लीलता, भौंडापन, महिलाओं और बच्चों का अपमान, किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक होना, देश के हितों के खिलाफ होना या दूसरे देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों के खिलाफ होना, जैसी बातें शामिल हैं। सरकार ने प्रसारण के कारोबार से छोटे लोगों को बाहर करने के हिसाब से यह तय किया है कि गैरखबरी-ताजा मामलों, वाले चैनलों की पूंजी अब डेढ़ करोड़ रुपए की मौजूदा शर्त से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गई है। समाचार-ताजा मामलों के चैनलों के लिए लाइसेंस पाने को अब तीन करोड़ रुपए पूंजी की मौजूदा शर्त को बढ़ाकर बीस करोड़ रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा बहुत किस्म की और शर्तें जोड़ी गई हैं।
यह पूरी सोच एक पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है जो कि मीडिया के इस हिस्से पर लगाम लगाने के लिए और छोटे लोगों को धंधे से बाहर करने के लिए की गई है। इसे कुछ अधिक दूर तक समझने के लिए भारत के अखबारों की मिसाल ली जा सकती है। कल को अगर केंद्र सरकार अखबारों के लिए यह नियम बना दे कि अखबार निकालने वाले प्रकाशक के पास दस करोड़ की पूंजी होनी चाहिए, अखबार की मशीन एक बार में बीस पेज छापने वाली होनी चाहिए और अखबार कम से कम चौबीस पेज का होना चाहिए, तो ऐसे कारोबार में सिर्फ ऐसे बड़े लोग बच जाएंगे जिनके दूसरे कारोबार भी होंगे और जिन पर सरकार का लगाम लगाना आसान भी होगा। ऐसे छोटे लोग जो केवल अखबार की अर्थव्यवस्था के तहत अखबार निकालने की सोचते हों, वे तमाम लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े इस कारोबार में घुस भी नहीं सकेंगे। यह दो हिसाब से अलोकतांत्रिक होगा, एक तो लोकतंत्र के भीतर कारोबार करने की आजादी। और दूसरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उपयोग को सीमित करना। यह सिलसिला बहुत भयानक है। आज पहली नजर में यह सिर्फ टेलीविजन चैनलों के बारे में लगता फैसला है लेकिन यह सरकार की एक ऐसी सोच है जो आगे चलकर मीडिया के दूसरे हिस्सों को भी गिरफ्त में लेगी। मजे की बात यह है कि देश के कुछ बड़े कारोबारी अखबारों ने इस फैसले पर टेलीविजन प्रसारण के बड़े कारोबारियों से प्रतिक्रिया ली तो वे कम पंूजी वालों को इस धंधे से बाहर करने के सरकारी फैसले के हिमायती रहे। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी बड़े इस्पात कारखाने वाले से पूछा जाए कि छोटे-छोटे कारखाने बंद कर देना ठीक होगा या नहीं।
इस बारे में लिखते हुए कुछ दिन पहले ही ब्रिटेन में वहां की लेबर पार्टी का एक विचार पढऩे मिला जिसके तहत सरकार वहां इस पार्टी का संस्कृति (छाया) सचिव ऐसा प्रस्ताव रखने जा रहा है जिसमें वहां के पत्रकारों को एक पेशेवर संगठन के माध्यम से काम करने का लाइसेंस मिलेगा और वे अगर आचार संहिता को तोड़ेंगे तो उन्हें भविष्य में पत्रकारिता करने नहीं मिलेगा। भारत सरकार के ताजा फैसले को अगर देखें तो यह बात बहुत साफ है कि किसी भी चैनल को जिन बातों पर दस बरस पूरे होने पर आगे काम करने से रोका जा सकता है, वे तमाम बातें बहुत आसानी से सरकारी मर्जी से साबित की जा सकती हैं। किसी देश की आलोचना करने पर उसे भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों में दरार पैदा करने वाला करार दिया जा सकता है। किसी भी बात को देश के हित के खिलाफ माना जा सकता है और जिस देश में कल इमरजेंसी के दौरान इंदिरा इज इंडिया कहा गया था और आज अन्ना को संसद से ऊपर कहा जा रहा है वहां पर किसी भी बात को उस वक्त की मौजूदा सरकार अपनी नीतियों के हिसाब से, देशहित के खिलाफ मान सकती है।
हम आए दिन टेलीविजन समाचार चैनलों के खराब काम और कारोबारी रूख के खिलाफ, उनकी गैरजिम्मेदारी और सनसनी के खिलाफ लिखते हैं। लेकिन हम ऐसी किसी भी रोक के खिलाफ हैं जिसमें कोई सरकार किसी गलती के आधार पर चैनल की जिंदगी खत्म कर दे। कल को क्या पांच समाचार गलत साबित होने पर अखबार बंद करवा दिया जाएगा? चुनाव में पांच नियम तोडऩे पर आगे चुनाव लडऩे पर रोक लग जाएगी? दफ्तर पांच बार लेट पहुंचने पर सरकारी नौकरी से निकाल दिया जाएगा? रोक लगाने की यह सोच पिछले एक-दो बरस में यूपीए सरकार को मीडिया, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाथों पहुंचे नुकसान की वजह से उपजी दिख रही है। इस दौरान हमने मीडिया को कई बार बहुत ही गैरजिम्मेदार पाकर उसके खिलाफ लिखा है लेकिन यह बात साफ है कि ऐसी गैरजिम्मेदारी, पे्रस काउंसिल जैसी किसी संस्था में कार्रवाई के लायक तो है, किसी चैनल को बंद करने लायक वह फिर भी नहीं है। दस बरस के बाद किसी चैनल को बंद करने का खतरा लोगों को काम की आजादी से पूरी तरह रोक देगा। आज भारत में मीडिया की आजादी पर चर्चा सिर्फ उसी समय होती है जब मीडिया के प्रकाशन-प्रसारण के कारोबार पर कोई वार होता है। उसके पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित कोई वार विरोध खड़ा नहीं कर पाता। यह एक भयानक स्थिति है जब सिर्फ कारोबार की स्वतंत्रता ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता रह गई है। इस बारे में सरकार से परे भी बात होनी चाहिए और इस ताजा सरकारी फैसले से परे भी बात होनी चाहिए।
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