9 अक्टूबर 2011
तेलंगाना को लेकर आंधप्रदेश में एक बड़ा तनाव बना हुआ है और आज के आंध्र से अलग होकर नया राज्य बनने के लिए बेमुद्दत हड़ताल पर चल रहा तेलंगाना इलाका तो सब कुछ बोल रहा है लेकिन आंध्र का बाकी हिस्सा अभी चुप है। कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार और आंध्र की कांगे्रस सरकार के सामने यह एक शिकस्त ही शिकस्त वाली नौबत है कि वह राज्य न बनाए तो तेलंगाना तो हाथ से निकला हुआ है ही, राज्य बनाए तो बाकी आंध्र को यह लगेगा कि उसके साथ बेइंसाफी हुई है, आज के अविभाजित आंध्र की राजधानी हैदराबाद की मौजूदगी उसके भौगोलिक इलाके तेलंगाना में होगी या उसे दोनों राज्यों के बीच एक केंद्र प्रशास्ति शहर, चंडीगढ़ की तरह बनाकर रखा जाएगा? ऐसे बहुत से विकल्प, संभावनाएं और अटकलें हवा में हैं और यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी की ही खड़ी की हुई है जिसके मंत्री चिदंबरम ने एक दिन अचानक ही तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा कर दी थी। उसके तुरंत बाद कांगे्रस और यूपीए सरकार को यह समझ आ गया था कि वह बयानबाजी की चूक हो गई और कांगे्रस ने न तो यूपीए के बाकी भागीदारों से बात की थी और न ही आंध्र में खुद अपनी पार्टी के लोगों से बात की थी। सोनिया के इस ताकतवर मंत्री की मुनादी धरी रह गई और तेलंगाना के बनने का आज तक रास्ता नहीं निकल पाया। इतने नाजुक मामले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने नौ दिसंबर 2009 को जो बयान दिया था उसकी मरम्मत करके एक पखवाड़े बाद में दूसरा बयान देना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनके पहले बयान को उनके दूसरे बयान के साथ जोड़कर ही पढ़ा जाए। यहां पर इस चर्चा का कोई प्रसंग तो नहीं है लेकिन यह बात यहां गिनाना ठीक होगा कि इसके पहले और इसके बाद कांगे्रस के केंद्रीय मंत्रियों और केंद्रीय नेताओं ने जितने किस्म की भयानकबयानी की है वह एक रिकॉर्ड है।
लेकिन आज हम अपनी बात को तेलंगाना और बाकी देश में नए राज्य बनने की चाह, और दावा रखने वाले इलाकों तक सीमित रखना चाहते हैं। आज ही एक खबर है कि महाराष्ट्र का विदर्भ का इलाका बड़ी दिलचस्पी और बेचैनी से तेलंगाना की राह देख रहा है। इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश और कुछ दूसरे इलाके भी राज्य बनना चाहते हैं। आज के इस हो-हल्ले के बीच कुछ लोगों से यह बात अनदेखी रह गई है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने किस खूबी के साथ बिना शोर-शराबे गोरखालैंड के आंदोलन पर वहां के संगठनों के साथ एक ऐसा समझौता कर लिया जिससे उस इलाके की 'आजादीÓ या स्वायत्तता की हसरत हिंसक नहीं हो पाई और अमनचैन से राज्य सरकार ने उस इलाके के जरूरत के लायक हक दे दिए। हम यहां पर यह भी याद करना चाहेंगे कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांगे्रस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पहल करके विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव करवाया था कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, यह राजनीतिक नजरिए से अपने थाली की कुछ मिठाई को उठाकर किसी को देने जैसी बात भी थी। लेकिन ऐसी उदारता उन्होंने दिखाई थी और मध्यप्रदेश के साथ-साथ बिहार और उत्तरप्रदेश ने भी झारखंड और उत्तराखंड बनाने के प्रस्ताव विधानसभा में पास किए थे जिसके आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार राज्य बनाने का वह ऐतिहासिक फैसला लिया था। आज न तो कोई राज्य अपने किसी हिस्से को अलग करने को तैयार है और न ही दिल्ली में किसी में अटलजी जैसा साफ-साफ फैसला करने का आज साहस है।
फिर यह कि तेलंगाना का आज का आंदोलन केंद्र सरकार बहुत अधिक समय देते भी नहीं दिख रहा। ऐसा भी नहीं कि तेलंगाना का आज का तनाव ऐतिहासिक है। इसके बहुत पहले भी वहां के आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और पूरे देश में राज्य का दर्जा पाने के लिए इतनी बड़ी शहादत का इतिहास नहीं मिलता, पुलिस की गोलियों से कोई पौने चार सौ लोग मारे गए थे। और आज यह इलाका बेमुद्दत हड़ताल पर है जिसे लेकर वहां के लोगों का यह कहना है कि यह राज्य बनने तक जारी रहेगा। वहां के आंदोलनकारियों की शहादत का ऐसा मजबूत इतिहास कि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहने का आसार तो है, और यह भी हो सकता है कि लोग वहां आत्मदाह पर भी उतर आएं। यह मामला केंद्र सरकार के लिए एक ऐसी राजनीतिक चुनौती है जिससे जूझने की ताकत आज कांगे्रस में नहीं दिख रही है। और अब यह समय भी नहीं दिख रहा है कि कांगे्रस की लीडरशिप वाला यूपीए किसी राज्य पुनर्गठन आयोग की चर्चा छेड़े।
हमारा यह मानना है कि छोटे राज्य बनाए बिना और कोई चारा इस देश में नहीं है। और यह बात हम किसी मजबूरी या बेबसी की नौबत को देखकर नहीं कह रहे हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अनुभव को देखकर कह रहे हैं। ऐसी मिसाल भी गिनाई जा सकती है कि झारखंड या गोवा जैसे छोटे राज्य लगातार राजनीतिक अस्थिरता और भयानक भ्रष्टाचार, संवैधानिक संकट सभी कुछ तो भुगतते रहे हैं, भुगत रहे हैं। लेकिन ऐसा तो बड़े राज्यों के साथ भी होते आया है और सिर्फ ऐसे ही तर्कों के आधार पर छोटे राज्यों को रोका नहीं जा सकता। आंध्र देश के उन राज्यों में से है जहां एक बड़ी नक्सल मौजूदगी रही है। अगर किसी इलाके को उसका हक न मिले तो हिंसक आंदोलन दूसरे बैनरों तले भी शुरू हो सकते हैं। तेलंगाना को तुरंत बनाने और बाकी देश में भी छोटे राज्यों की मांग को तौलने की जरूरत है। आज ही।
तेलंगाना को लेकर आंधप्रदेश में एक बड़ा तनाव बना हुआ है और आज के आंध्र से अलग होकर नया राज्य बनने के लिए बेमुद्दत हड़ताल पर चल रहा तेलंगाना इलाका तो सब कुछ बोल रहा है लेकिन आंध्र का बाकी हिस्सा अभी चुप है। कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार और आंध्र की कांगे्रस सरकार के सामने यह एक शिकस्त ही शिकस्त वाली नौबत है कि वह राज्य न बनाए तो तेलंगाना तो हाथ से निकला हुआ है ही, राज्य बनाए तो बाकी आंध्र को यह लगेगा कि उसके साथ बेइंसाफी हुई है, आज के अविभाजित आंध्र की राजधानी हैदराबाद की मौजूदगी उसके भौगोलिक इलाके तेलंगाना में होगी या उसे दोनों राज्यों के बीच एक केंद्र प्रशास्ति शहर, चंडीगढ़ की तरह बनाकर रखा जाएगा? ऐसे बहुत से विकल्प, संभावनाएं और अटकलें हवा में हैं और यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी की ही खड़ी की हुई है जिसके मंत्री चिदंबरम ने एक दिन अचानक ही तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा कर दी थी। उसके तुरंत बाद कांगे्रस और यूपीए सरकार को यह समझ आ गया था कि वह बयानबाजी की चूक हो गई और कांगे्रस ने न तो यूपीए के बाकी भागीदारों से बात की थी और न ही आंध्र में खुद अपनी पार्टी के लोगों से बात की थी। सोनिया के इस ताकतवर मंत्री की मुनादी धरी रह गई और तेलंगाना के बनने का आज तक रास्ता नहीं निकल पाया। इतने नाजुक मामले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने नौ दिसंबर 2009 को जो बयान दिया था उसकी मरम्मत करके एक पखवाड़े बाद में दूसरा बयान देना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनके पहले बयान को उनके दूसरे बयान के साथ जोड़कर ही पढ़ा जाए। यहां पर इस चर्चा का कोई प्रसंग तो नहीं है लेकिन यह बात यहां गिनाना ठीक होगा कि इसके पहले और इसके बाद कांगे्रस के केंद्रीय मंत्रियों और केंद्रीय नेताओं ने जितने किस्म की भयानकबयानी की है वह एक रिकॉर्ड है।
लेकिन आज हम अपनी बात को तेलंगाना और बाकी देश में नए राज्य बनने की चाह, और दावा रखने वाले इलाकों तक सीमित रखना चाहते हैं। आज ही एक खबर है कि महाराष्ट्र का विदर्भ का इलाका बड़ी दिलचस्पी और बेचैनी से तेलंगाना की राह देख रहा है। इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश और कुछ दूसरे इलाके भी राज्य बनना चाहते हैं। आज के इस हो-हल्ले के बीच कुछ लोगों से यह बात अनदेखी रह गई है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने किस खूबी के साथ बिना शोर-शराबे गोरखालैंड के आंदोलन पर वहां के संगठनों के साथ एक ऐसा समझौता कर लिया जिससे उस इलाके की 'आजादीÓ या स्वायत्तता की हसरत हिंसक नहीं हो पाई और अमनचैन से राज्य सरकार ने उस इलाके के जरूरत के लायक हक दे दिए। हम यहां पर यह भी याद करना चाहेंगे कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांगे्रस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पहल करके विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव करवाया था कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, यह राजनीतिक नजरिए से अपने थाली की कुछ मिठाई को उठाकर किसी को देने जैसी बात भी थी। लेकिन ऐसी उदारता उन्होंने दिखाई थी और मध्यप्रदेश के साथ-साथ बिहार और उत्तरप्रदेश ने भी झारखंड और उत्तराखंड बनाने के प्रस्ताव विधानसभा में पास किए थे जिसके आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार राज्य बनाने का वह ऐतिहासिक फैसला लिया था। आज न तो कोई राज्य अपने किसी हिस्से को अलग करने को तैयार है और न ही दिल्ली में किसी में अटलजी जैसा साफ-साफ फैसला करने का आज साहस है।
फिर यह कि तेलंगाना का आज का आंदोलन केंद्र सरकार बहुत अधिक समय देते भी नहीं दिख रहा। ऐसा भी नहीं कि तेलंगाना का आज का तनाव ऐतिहासिक है। इसके बहुत पहले भी वहां के आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और पूरे देश में राज्य का दर्जा पाने के लिए इतनी बड़ी शहादत का इतिहास नहीं मिलता, पुलिस की गोलियों से कोई पौने चार सौ लोग मारे गए थे। और आज यह इलाका बेमुद्दत हड़ताल पर है जिसे लेकर वहां के लोगों का यह कहना है कि यह राज्य बनने तक जारी रहेगा। वहां के आंदोलनकारियों की शहादत का ऐसा मजबूत इतिहास कि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहने का आसार तो है, और यह भी हो सकता है कि लोग वहां आत्मदाह पर भी उतर आएं। यह मामला केंद्र सरकार के लिए एक ऐसी राजनीतिक चुनौती है जिससे जूझने की ताकत आज कांगे्रस में नहीं दिख रही है। और अब यह समय भी नहीं दिख रहा है कि कांगे्रस की लीडरशिप वाला यूपीए किसी राज्य पुनर्गठन आयोग की चर्चा छेड़े।
हमारा यह मानना है कि छोटे राज्य बनाए बिना और कोई चारा इस देश में नहीं है। और यह बात हम किसी मजबूरी या बेबसी की नौबत को देखकर नहीं कह रहे हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अनुभव को देखकर कह रहे हैं। ऐसी मिसाल भी गिनाई जा सकती है कि झारखंड या गोवा जैसे छोटे राज्य लगातार राजनीतिक अस्थिरता और भयानक भ्रष्टाचार, संवैधानिक संकट सभी कुछ तो भुगतते रहे हैं, भुगत रहे हैं। लेकिन ऐसा तो बड़े राज्यों के साथ भी होते आया है और सिर्फ ऐसे ही तर्कों के आधार पर छोटे राज्यों को रोका नहीं जा सकता। आंध्र देश के उन राज्यों में से है जहां एक बड़ी नक्सल मौजूदगी रही है। अगर किसी इलाके को उसका हक न मिले तो हिंसक आंदोलन दूसरे बैनरों तले भी शुरू हो सकते हैं। तेलंगाना को तुरंत बनाने और बाकी देश में भी छोटे राज्यों की मांग को तौलने की जरूरत है। आज ही।
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