शौच साबित होने के पहले ही सोच को तौलने की व्यवस्था हो


7 सितंबर 2012
संपादकीय
कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज ने एक सुनवाई के दौरान कही अपनी बात से देश के महिला अधिकार पर एक नई बहस शुरू कर दी है। यह बहस कम है, और इस जज के खिलाफ लोगों की नाराजगी अधिक है। एक घरेलू मामले की सुनवाई के दौरान इस जज ने कहा जब तक कोई आदमी अपनी बीवी की ठीक-ठाक देखभाल करता है तो उसकी की गई घरेलू हिंसा और बीवी को पीटना सही है। एक केस के दौरान जस्टिस के. भक्तवत्सला यह टिप्पणी की। उक्त केस में एक महिला अपने पति से तलाक चाहती थी, जिसमें आधार दिया था कि उसका पति उसके साथ गाली-गलौच और मारपीट करता है। इससे पहले भी उक्त जज विवादित टिप्पणी कर चुके हैं। तलाक के एक केस की सुनवाई के दौरान उन्होंने एक महिला वकील से कहा था कि जिस वकील की शादी नहीं हुई हो, उसे तलाक वाले केसों में बहस करने के योग्य नहीं है। 
भारत में जजों की इस किस्म की अमानवीय बातों का एक लंबा इतिहास रहा है। लोगों को याद होगा कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने मुकदमे के दौरान ही सतीप्रथा का समर्थन किया था। और बहुत सी बातें जो खबरों में नहीं आ पातीं, वे बताती हैं कि जजों के पूर्वाग्रह किस तरह से मजबूत होते हैं, और उनके चलते वे किस तरह से कुछ किस्म के मामलों की सुनवाई करने के लायक नहीं होते। इस पर चर्चा करते हुए हमें अमरीका में जजों की नियुक्ति का तरीका याद पड़ता है। बड़ी अदालत के किसी जज को कुर्सी पर आने के पहले संसद की कमेटी की खुली सुनवाई से गुजरना पड़ता है, और वह सुनवाई खासी लंबी होती है, जिसमें उस जज से हर किस्म के विवादास्पद और संवेदनशील मामलों पर उसके विचार पूछे जाते हैं, और उनको रिकॉर्ड में दर्ज भी किया जाता है। इस दौरान उस व्यक्ति की पहले कही हुई या सुनी हुई बातों को लेकर भी सवाल-जवाब होते हैं और एक किस्म से भावी जज को उधेड़ कर रख दिया जाता है। 
भारत में किसी जज को उसकी विचारधारा को लेकर किसी सवाल-जवाब का सामना करना पड़ता हो, ऐसा कभी सुनने में नहीं आया। और किसी जज को उसकी विचारधारा के आधार पर कुछ किस्म के मामले सुनने के लायक न पाने की बात भी कभी सुनाई नहीं पड़ी है। हम यह भी मानते हैं कि कोई भी सोचने-विचारने वाले इंसान अपनी मान्यताओं, अपने विचारों और अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं रह सकते। लेकिन ऐसे में जब उनको अपनी विचारधारा से जुड़े हुए किसी मामले की सुनवाई करना हो, तो उन्हें अपने-आपको खुद ही अलग कर लेना चाहिए, या फिर न्याय-व्यवस्था में ऐसा इंतजाम रहना चाहिए कि उनको उस तरह के मामले दिए ही न जाएं। और फिर आज जिस मामले को लेकर, जिस जज की जिस टिप्पणी को लेकर यहां लिखने की नौबत आई है, वह तो देश में महिलाओं के बराबरी के दर्जे के खिलाफ है, महिलाओं की रक्षा के लिए बनाए गए कानून के खिलाफ है, और इंसानियत के भी खिलाफ है। इसलिए इसके बारे में तो कल से देश के बहुत से संगठनों द्वारा देश के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखी गई इस मांग को हम ठीक पाते हैं कि इस जज को महिलाओं पर ज्यादती से संबंधित मामले बिल्कुल नहीं देना चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि कुछ समय पहले जब राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष और आयोग के कुछ सदस्यों ने बहुत बेइंसाफी के बयान दिए थे, महिलाओं के हकों के खिलाफ बातें कही थीं, तब भी हमने उसका विरोध करते हुए इन लोगों को संवैधानिक कुर्सियों से हटाने की मांग की थी। अभी इस पर चर्चा करते हुए हमको यह भी लग रहा है कि देश की किसी भी संवैधानिक कुर्सी पर मनोनीत किए जाने वाले लोगों के विचारों की खुली सुनवाई होनी चाहिए, और यह सिर्फ सत्ता का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए कि वह जिसे चाहे उसे मनोनीत कर दे। यहां पर हमने पहले भी एक बात लिखी थी कि मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, सूचना आयोग, बाल कल्याण परिषद जैसे बहुत से संवैधानिक दफ्तर हैं, जिनके काम का मिजाज ही सरकार के कामकाज से टकराव का रहता है। ऐसी जगहों पर सत्ता जब अपने पसंदीदा लोगों को, अपनी पार्टी के लोगों को, अपनी पार्टी की विचारधारा के लोगों को मनोनीत करती है, तो सरकार के गलत कामों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की संभावना खत्म हो जाती है। हमने गुजरात दंगों की सुनवाई के दौरान यह देखा था कि किस तरह मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दंगाईयों और हत्यारों की विचारधारा वाले, उन्हीं के संगठनों वाले सरकारी वकील तैनात किए थे, और उन्होंने किस तरह हत्यारों को अदालत से छुड़वाने का काम किया था, और अपनी सरकारी जिम्मेदारी के ठीक खिलाफ काम किया था। कमोबेश ऐसा ही काम देश भर में सत्ता के मनोनीत संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे लोग करते हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट के इस मामले के बहाने आज इस चर्चा की भी जरूरत है कि जहां-जहां लोगों के निजी विचार उनके कामकाज, उनकी जिम्मेदारी पर असर डाल सकते हैं, वहां-वहां उन लोगों को कोई जिम्मेदारी देने के पहले उनकी सोच को तौल लेना चाहिए। इसके साथ ही बाद में ऐसी कोई विचारधारा सामने आने पर, जिम्मेदारी से टकराव के आधार पर उन्हें उस कुर्सी से हटा ही देना चाहिए। जो बात एक हाईकोर्ट जज ने कही है, वह इस देश में महिलाओं पर सदियों से चले आ रहे जुल्म को बढ़ाने वाली बात भी है। हमारे हिसाब से इस जज पर कार्रवाई भी करनी चाहिए, और उन्हें औरत-मर्द के संबंधों से जुड़े मामलों से हमेशा के लिए अलग कर देना चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री सहित सत्ता और विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा अमरीका की तरफ पैर करके सोने से भी बचता है। इसलिए संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के वहां के तरीके पर यहां भी अमल करना चाहिए। शौच साबित होने के पहले ही सोच को तौलने की व्यवस्था होनी चाहिए।

बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकार का सिलसिला सोनिया खत्म करें


संपादकीय
6 सितंबर 2012
कोयला घोटाला उजागर होना अभी जारी ही है, लेकिन देश की धरती को खून निकाल देने तक दुह लेने के जो जुर्म सत्ता से जुड़े लोगों के सामने आ रहे हैं, वे भयानक हैं। और यह सत्ता राजनीति, बड़े कारोबार और कारखानेदारों के एक ऐसे बरमूडा त्रिकोण को सामने रख रहे हैं जिनमें लोकतंत्र और जनहित के सारे जहाज डूबते दिख रहे हैं, डूब चुके हैं। टेलीफोन घोटाले से लेकर कोयला घोटाले तक, जितने बड़े घोटाले ऐसे हैं जिनमें जालसाजी से, धोखाधड़ी से, सरकारी नीतियों को बदलकर हजारों-लाखों करोड़ लूटने का काम किया गया है, उन तमाम आबंटनों को तुरंत खत्म करना चाहिए। कुदरत ने इस धरती को इतने किस्म के खजाने इसलिए नहीं दिए हैं कि गिने-चुने लोग लोकतांत्रिक सत्ता पर काबिज होकर इसे खा जाएं। आज इस कोयले का धुआं इस कदर गहरा फैल चुका है, और यह आसमान तक जाकर टूजी के स्पेक्ट्रम के गले मिल रहा है, जिस तरह कोई एक लुटा हुआ, किसी दूसरे लुटे हुए से हमदर्दी दिखाए। और धरती के नीचे के कोयले से लेकर आसमान में तैरती तरंगों तक के बीच के हिन्दुस्तानी इंसान यह पूरा नजारा देखते हुए हक्का-बक्का हैं कि वे क्या करें? कहां जाएं? 
हम दिल्ली में संसद के चलने के हिमायती हैं, लेकिन जिस तरह की जानकारी रोज निकलकर सामने आ रही है उससे जाहिर है कि इस संसद में बैठे लोग जो कि दिल्ली की सत्ता पर भी काबिज हैं, या कि जिनकी पार्टियां कुछ राज्यों में काबिज हैं, उन सबने एक-दूसरे से हाथ मिलाकर एक इतना बड़ा बरमूडा त्रिकोण बना दिया है कि उसके बीच पूरा देश ही डूब जाए। भ्रष्टाचार के अंतरिक्ष छूते आंकड़ों को देखें तो लगता है कि सरहद पार के दुश्मन देश में फौज पर भारत का उतना खर्च नहीं करवा पाते, जितना कि देश के भीतर के लोग लूट लेते हैं। जब सत्ता पर बैठे लोग पूरी साजिश के साथ लूट के माल में भागीदार होते हैं, तो हमारा यह मानना है कि वे देशद्रोह कर रहे हैं। सत्ता के बाहर के लोग तो खुद होकर सत्ता के हिस्से के फैसले नहीं ले पाते, सरकारी फाइलों पर खुद दस्तखत नहीं कर पाते। इसलिए वे तो साजिश के भागीदार हो सकते हैं, वे पहले दर्जे के मुजरिम नहीं हो सकते। पहले दर्जे के मुजरिम तो सत्ता पर काबिज लोग ही हो सकते हैं। और जब हम कुदरत की दौलत की इस पैमाने की लूटपाट देखते हैं, और साथ में देश के कुपोषण को देखते हैं, तो यह जुर्म देश के साथ गद्दारी से कम का नहीं लगता। इसलिए हमारा मानना है कि सत्ता पर जो जितने ऊपर बैठा है, उसके लिए सजा उतनी ही अधिक होनी चाहिए, और इनकी ताकत और पहुंच को देखते हुए इनके लिए जमानत की रियायत खत्म कर देनी चाहिए। जो लोग एक लोकतांत्रिक सत्ता के मुखिया रहकर गब्बर सिंह की तरह के डकैत सरदार भी हो जाते हैं, और पुलिस से सलामी भी पाते हैं, उनकी जमानत ठीक नहीं है। ये बाहर आकर अपने खिलाफ पूरे मामले को खत्म करने की ताकत रखते हैं, और देश की न्याय प्रक्रिया को इस हमले से बचाना भी चाहिए। 
जहां तक यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का सवाल है, तो इसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के बारे में हमें कुछ बातें लगती है। एक तरफ तो यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी निजी स्तर पर अपने बेटे के साथ बेदाग बनी हुई है, लेकिन जिस सरकार की मुखिया होने के नाते विदेशी सर्वे उन्हें दुनिया के सौ सबसे ताकतवर इंसानों में गिनते हैं, उस सरकार के किसी कामकाज के लिए वे कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं है, न ही उनका बेटा राहुल गांधी कागज पर किसी गलत काम के लिए जिम्मेदार है। अब जो सर्वे सोनिया गांधी को इस देश की सबसे ताकतवर नेता बताते हैं, वह ताकत इसी सरकार की मुखिया होने की है, जो आधी कटघरे में खड़ी है, और आधी जेल जाने को तैयार खड़ी है। तो ऐसे हक और ऐसी अगुवाई जवाबदेही से आजाद कैसे रखे जा सकते हैं?  भारतीय लोकतंत्र का यह तकाजा है कि जो सत्ता की ताकत को सम्हाले, काबू में रखे, वह कानून के प्रति जवाबदेह भी रहे। अब ऐसा लगता है कि यूपीए नाम की कार की पिछली सीट पर बैठकर सोनिया-राहुल जिस तरह से ड्राइविंग कर रहे हैं, वह नैतिक रूप से और लोकतांत्रिक रूप से सही नहीं है। इनको एक सीधे-सादे माने जाने वाले ड्राइवर को रखकर अपनी मर्जी से ड्राइविंग करवाने का काम बंद करना चाहिए। पैसे वाले लोग अपनी गाड़ी के लिए ड्राइवर रखते हैं, अपनी मर्जी से गाड़ी चलवाते हैं और सड़क पर कोई हादसा हो जाने पर उसे जेल भेजने के लिए तैयार भी रखते हैं। पूंजीवादी समाज में गरीब या मातहत नौकर के शोषण का यह आम तरीका है, लेकिन दुनिया के इस सबसे विशाल लोकतंत्र के सरकारी मुखिया को इस तरह से इस्तेमाल करना, बहुत ही अलोकतांत्रिक बात है, और इतिहास इसे अच्छी तरह दर्ज भी कर रहा है। 

ईमानदारी और काबिलीयत से पूरी तरह दीवालिया!


संपादकीय 
5 सितंबर 2012
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में अमरीका के एक प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट की चर्चा भारत में आज खबरों में है। एक गोरे देश में भारत के बारे में क्या लिखा जा रहा है, क्या कहा जा रहा है, इसे लेकर हीनभावना के शिकार इस देश में चाहे जो सोचा जा रहा हो, यह बात अपनी जगह सही है कि उन बातों का महत्व दुनिया के कारोबारियों की नजर में तो होता ही है। बाहर से कौन हिंदुस्तानी कारोबार में पूंजीनिवेश चाहेंगे, इस पर ऐसी खबरों का असर होता है। इसलिए इसे देश के भीतर के लिए महत्वहीन मानते हुए भी हम देश के बाहर के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। 
लेकिन इस अमरीका अखबार में मनमोहन सिंह के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है जिसे पिछले दो बरस में सौ-सौ बार न लिख चुके हों। मनमोहन सिंह का सारा सम्मान अर्थशास्त्र के एक जानकार के रूप में था, और शायद एक ठीक-ठाक वित्तमंत्री के रूप में वे दुनिया की पूंजीवादी ताकतों को पसंद भी थे। ईमानदारी और सादगी की, राजनीति और महत्वाकांक्षा से परे ही अपनी छवि के चलते वे कांग्रेस के पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री बनाने के लायक भी पाए गए, और बनाए गए। लेकिन इस देश की सरकार का मुखिया बनने के बात से लगातार उन्होंने अपनी साख खोई है, और एक मुखिया के रूप में भारी नाकामायी के साथ-साथ भारी बदनामी भी पाई है। हम इस अमरीका अखबार में आज छपे ढेर से सारे नकारात्मक विशेषणों को भी सही पाते हैं, और भारत के भीतर इस सरकार के बारे में कही गई इन बातों को भी सही पाते हैं कि यह आज तक की देश की सबसे बेईमान सरकार है, और किसी के कहे बिना भी यह बात तो इतिहास में दर्ज है ही कि मनमोहन सिंह इसके मुखिया हैं। 
जब भाजपा मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांग रही है, तो इसी पखवाड़े शुरू हुई यह मांग हमारे एक-दो बरस से लगातार लिखी जा रही बात को आज दोहराना ही है। हम लगातार यह मांग करते आ रहे हैं कि मनमोहन सिंह पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करना चाहिए क्योंकि उनकी आंखों के सामने उनके मातहत लगातार  भ्रष्टाचार करते रहे, और वे भ्रष्टाचार लगातार खबरों में भी आते रहे, और मनमोहन सिंह उन्हें अनदेखा करके जिम्मेदारियां मंत्रियों पर या मंत्रालयों पर डालते रहे। संविधान की शपथ अनदेखा करने के लिए नहीं ली जाती, और निजी ईमानदारी किसी भी पद के लिए कोई योग्यता नहीं है। यह तो एक बुनियादी जरूरत है जिसे हम कोई योग्यता नहीं गिनते। ऐसे में इस देश का प्रधानमंत्री अगर भ्रष्टाचार का इतिहास गढ़ा जाते देखते चले जाने का दो कार्यकाल का रिकॉर्ड बना रहा है, तो वह सिर्फ देशी-विदेशी आलोचना का हकदार नहीं है, वह अदालती कटघरे का हकदार है। हम भाजपा के संसद बहिष्कार के खिलाफ हैं, लेकिन मनमोहन सिंह का इस्तीफा इस देश के हित में, यूपीए सरकार के हित में, कांग्रेस पार्टी के हित में बिना देर किए होना चाहिए। हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि भ्रष्ट यूपीए गठबंधन के भीतर एक भी काबिल और ईमानदार मंत्री नहीं मिलेगा जिसे कि प्रधानमंत्री बनाया जा सके। भ्रष्टाचार का गवाह बने रहना, चुप्पी बनाए रखकर देश की लूटपाट का मौका अपने साथियों को देना किसी तरह की योग्यता अगर है, तो वह जेल जाने और कैद काटने की योग्यता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे ताकतवर ओहदे की जिम्मेदारियां एक मुर्दा गवाह से अधिक होती हैं, और यही बात अमरीका अखबार ने अपने शब्दों में लिखी हैं। 
मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बने रहने का सिलसिला अब खत्म होना चाहिए। हो सकता है कि यूपीए और कांग्रेस पार्टी को एक ईमानदार मुखौटे की जरूरत हो, इस देश को तो ऐसे किसी मुखौटे की कोई जरूरत नहीं है। दूसरी बात यह कि अपनी पूरी सरकार को भ्रष्ट साबित हो जाने देने के बाद अब कांग्रेस पार्टी यह भी साबित कर रही है कि उसके पास एक भी काबिल और ईमानदार नेता प्रधानमंत्री बनाने के लायक नहीं है। देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी इस कदर दीवालिया हो गई है!
000

नाग और सांप से माफी सहित...


4 सितंबर 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज कांगे्रस पार्टी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का घर घेर रही है। जैसी कि पुलिस से उम्मीद की जाती है, उसने शहर भर में जगह-जगह के रास्ते बंद करके कांगे्रसियों को रोकने का इंतजाम कर लिया है। उधर दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी संसद को चलने नहीं दे रही है, और खबरें हैं कि खुद एनडीए के भीतर, भाजपा के भीतर, संघ परिवार के भीतर संसद के पूरे सत्र को तबाह करने के खिलाफ एक नाराजगी है, मतभेद है। इसके पहले कहीं मुंबई में तो कहीं दिल्ली में अन्ना-बाबा-केजरीवाल से लेकर राज ठाकरे तक तरह-तरह के प्रदर्शन कर रहे हैं। 
संसद और सड़क के बीच का फासला उसी तरह गायब हो गया है जिस तरह शहर में बारिश की बाढ़ आ जाने पर सड़क और नाली के बीच फर्क नहीं रह जाता, और एक ही गंदा पानी चारों तरफ लबालब भर जाता है। आज देश में राजनीति, सरकार, सार्वजनिक जीवन, संसद-विधानसभा और सड़कों के बीच का फासला खत्म कर दिया गया है। इससे नुकसान सिर्फ उस जनता का हो रहा है जिसके पैसों पर संसद पलती है, सरकारें जिसके पैसों से तनख्वाह पाती है, सड़कें जिसके लिए हैं, और रहनी चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में और एक देश के रूप में भारत में आगे बढऩे की जो संभावनाएं हैं, जो जरूरतें हैं, उन सबको कुचलते हुए राजनीति और आंदोलन अपनी दूकान सजाकर बैठ गए हैं। क्या किसी देश और उसकी आबादी की जिंदगी रात-दिन इन्हीं बातों को सुनने को बेबस बना दी जानी चाहिए? क्या चुनाव को बरसों जब बाकी हों, तब से इस किस्म की राजनीतिक आग सुलगा देनी चाहिए जिसके धुएं में बाकी कुछ दिखना ही कम हो जाए? एक देश की जिंदगी और जनता की जिंदगी में और इतनी बातें अहमियत रखती हैं कि जिसका हिसाब नहीं, लेकिन उन सबको पूरी तरह अनदेखा करते हुए, उनके महत्व को खारिज करते हुए हर कोई अपनी-अपनी जिद पर अड़ा दिख रहा है। अन्ना-बाबा अपने अंदाज के लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही लाना चाहते हैं, और सामाजिक आंदोलन के नाम पर चुनावी राजनीति पर ढांकी हुई खाल भी अब उतर गई है। किसी भी दिन अपनी मर्जी से किसी पुरानी मांग पर नया आंदोलन शुरू करके लोगों की जिंदगी को उसमें फंसा देना कहां का लोकतंत्र है? और फिर लोगों को नीति-सिद्धांत इस कदर फर्जी हो गए हैं कि जिस भाजपा ने संसद के पूरे सत्र को बंदूक की नोंक पर खत्म कर दिया हो, उसे सीएजी की ठीक वैसी ही रिपोर्ट पर न गुजरात में भरोसा है और न ही छत्तीसगढ़ में। अरूण जेटली कल यह कहते सुनाई देते हैं कि गुजरात में सीएजी की रिपोर्ट तो अभी विधानसभा की लोक लेखा समिति के पास जाएगी, और उसके पहले कुछ कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन जब यही तर्क दिल्ली में कांगे्रस पार्टी देती है, तो भाजपा न संसद में उसे सुनना चाहती और न संसद के बाहर। उसे सीएजी दिल्ली में हरिश्चंद्र लगता है और अपने राज्यों में खलनायक। भाजपा को कर्नाटक में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कोई भरोसा नहीं है।
अब सवाल यह है कि निर्वाचित लोग संसद और विधानसभाओं में अपना काम न करें, देश के लिए बहुत जरूरी दर्जन भर कानून संसद के भीतर भूखे-प्यासे बैठे भाजपा की राह तक रहे हैं, और बाहर सौ करोड़ जनता उन कानूनों के कायदे का इंतजार कर रही है, लेकिन भाजपा पूरे सत्र को खत्म कर चुकी है। दूसरी तरफ अन्ना-बाबा-केजरीवाल फुटपाथ पर कानून बनाने पर आमादा हैं। राज्यों और केंद्र में कांगे्रस और भारतीय जनता पार्टी की नीयत में कहीं ईमानदारी नहीं रह गई है, और सत्ता पर बैठे हुए लोग पारदर्शिता के बजाय इस अंदाज में झांसा देते दिख रहे हैं जिस तरह की कोई पेशेवर फर्जी गवाह अदालत में झूठी गवाही देते हुए अपने तर्क गढ़ता है।
यह पूरा सिलसिला देश में इतनी गंदगी फैला चुका है, और इतना अविश्वास पैदा कर चुका है कि लोग अब यह सोचने लगे हैं कि सारी सरकारों को खारिज करके एक बार फिर से चुनाव करवा लिया जाना चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि देश के दोनों बड़े गठबंधनों में परले दर्जे के भ्रष्ट, साम्प्रदायिक और दगाबाज दल भरे हुए हैं। तो जनता के सामने चुनाव में विकल्प क्या रहेगा? पहले पार्टियों की टिकटें खरीदी जाएंगी, फिर मतदाता के वोट खरीदे जाएंगे, फिर कम पडऩे पर सांसद या विधायक खरीदे जाएंगे, सरकार बनने पर मंत्रालय खरीदे जाएंगे, तो ऐसे चुनाव के आखिर में जाकर भी जनता के हाथ आखिर क्या आएगा? क्या यह लोकतंत्र के लिए इतनी निराशा का दौर नहीं है कि नागनाथ और सांपनाथ के बीच चुनना उसकी बेबसी है? और यहां पर हम नाग और सांप से माफी भी चाहते हैं कि वे तो कोई चोरी करते नहीं हैं।

ठाकरों पर सरकारी चुप्पी इतिहास में दर्ज हो रही है


संपादकीय
3 सितंब र2012
बिहार में जाकर वहां की पुलिस को खबर किए बिना कुछ लोगों को गिरफ्तार करके लाने वाली महाराष्ट्र पुलिस को जब बिहार ने चेतावनी दी, तो इसके जवाब में मुंबई के राज ठाकरे ने बिहार विरोधी बयानबाजी फिर शुरू कर दी। उत्तर भारत के लोगों के खिलाफ महाराष्ट्र की इस राजधानी में आतंक वाला दबदबा रखने वाले ठाकरे परिवार का ऐसा रूख जमाने से चलते आ रहा है। और मुंबई महाराष्ट्र के लोगों की साबित करके उस पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह हरकत देश को तोडऩे की हद तक पहले भी कई बार जा चुकी है। इस बार भी महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकपा गठबंधन सरकार राज ठाकरे पर किसी कार्रवाई से बच रही है, और वीडियो रिकॉर्डिंग पर कानूनी विचार-विमर्श की बात कह रही है। इस बारे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का रूख बहुत साफ है और ऐसे हिम्मत वाला है, जैसी हिम्मत केन्द्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को इन ठाकरों के खिलाफ दिखानी चाहिए थी। लेकिन जैसा कि तकरीबन दीवारों पर लिक्खा दिखता है, महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा के कद को छोटा करने के लिए उस लकीर के अलग हुए राज ठाकरे नाम के टुकड़े को कांग्रेस-राकपा सरकार आगे बढ़ाते चलती है। लेकिन वोटों के बंटवारे या ध्रुवीकरण की यह राजनीति चाहे वह अयोध्या में हो, चाहे गुजरात में हो, और चाहे वह मुंबई में हो, एक तो यह गलत है, और दूसरी बात यह कि जब यह देश को तोडऩे की हद तक चली जाती है, तो यह पूरी तरह से केन्द्र सरकार के दखल का मामला बन जाता है। महाराष्ट्र के इस ताजा मामले में पूरी तरह से कांग्रेस पार्टी अकेले इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि वह देश और इस प्रदेश दोनों पर सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया है। 
आज मुंबई में अपनी मांद में बैठकर राज ठाकरे जो बोल रहे हैं, उस पर बिहार में अगर कोई जुर्म दर्ज हो, और बिहार की पुलिस मुंबई जाकर वहां की पुलिस को बताए बिना अगर ठाकरे को गिरफ्तार करके बिहार ले आती है, तो उस पर शिवसेना या राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का क्या कहना होगा? बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, ये तीनों ही अपनी राजनीतिक जीवन की शुरूआत से सिर्फ मुंबई के भीतर बयानबाजी, आतंक और हिंसा की राजनीति करते आए हैं, और मुंबई के बाहर निकलते ही इनका असर घटने लगता है, और पूरे महाराष्ट्र में तो इन्होंने कभी पैर भी दिया हो, तो वह दुर्लभ ही मौका होगा। यह पूरा परिवार कभी मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने में लगे रहता है, कभी पाकिस्तानी खिलाडिय़ों और कलाकारों के खिलाफ, और हमेशा ही महाराष्ट्र के बाहर से आए हुए लोगों के खिलाफ। जिस तरह किसी जानवर पर बैठे हुए परजीवी पंछी जानवर के बदन पर से कुछ-कुछ चुगकर खाकर अपना पेट भरते हैं, उसी तरह ठाकरे परिवार के ये तीनों लोग नफरतजीवी लोग हैं। लेकिन सवाल यह है कि देश को आजादी दिलाने का दंभ भरने वाली कांग्रेस पार्टी एक क्षेत्रीय राजनीति में वोटों के बंटवारे का फायदा लेने के लिए एक ऐसी नफरत को बढ़ावा दे रही है जिसे शुरू से ही सलाखों के पीछे डालने की जरूरत है। समय रहते कांग्रेस सरकारों ने न तो पंजाब में भिंडरावाले पर काबू किया, और न ही महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के कुनबे पर। दूसरी भी ऐसी कई और मिसालें हैं जिनमें कांग्रेस ने कुछ उसी तरह की गैरजिम्मेदारी की, जिस तरह की गैरजिम्मेदारी भाजपा ने कई मौकों पर, कई जगहों पर हिन्दू भावनाओं को उकसाने और एकजुट करने के लिए की। हम सीपीएम की इस मांग से सहमत हैं कि राज ठाकरे के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अगर कोई मुंबई में गुंडागर्दी करवाने की ताकत रखता है तो उसके खिलाफ कानूनों का इस्तेमाल न किया जाए, तो फिर ऐसी सरकारों का क्या मतलब है? इस पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना ठीक है कि राज ठाकरे देश के संविधान को भी चुनौती दे रहे हैं और ऐसे लोगों के खिलाफ सख्ती से निपटने के लिए वे प्रधानमंत्री को चि_ी लिखने जा रहे हैं। लेकिन ऐसी नौबत में  जिस पार्टी की सरकारों को कार्रवाई करनी चाहिए, उस कांग्रेस के प्रवक्ता का कहना है कि मीडिया चूंकि भड़काऊ बातों को कवरेज देता है इसलिए लोग भड़काऊ बातें करते हैं। यह बहुत ही शर्मनाक बयान है क्योंकि अगर बयान देने वाला, और उसे छापने या दिखाने वाले गैरजिम्मेदारी कर रहे हैं तो क्या सरकारें गैलरी में बैठकर मैच देखती रहेंगी? 
आज देश बुरी तरह से झुलस रहा है। भ्रष्टाचार के मामलों में, देश और कई प्रदेशों में राजनीतिक अस्थिरता के मामले में, या जरूरत से ज्यादा स्थिरता के मामले में। अभी-अभी कर्नाटक से दसियों हजार उत्तर-पूर्वी भारतीयों को दहशत फैलाकर भगाया गया। और वह मामला अभी ठंडा हुआ नहीं है, अभी तक देश इस सदमे से उबरा नहीं है कि मोदी की मंत्री किस तरह मुसलमानों के कत्ल की सेंचुरी बनाकर अपनी शायद बची पूरी जिंदगी के लिए जेल भेजी गई है, और ऐसे में मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलाना शुरू किया जा रहा है। केन्द्र सरकार अगर यह सोचती है कि ऐसी बकवास बिना किसी कार्रवाई के धीरे-धीरे खुद अपना वजन खो बैठेगी तो यह निहायत गैरजिम्मेदारी से भरा हुआ राज-काज होगा। संविधान की शपथ लेने वाली सरकारों को देश को, दिलों को टुकड़े-टुकड़े होते देखते नहीं रहना चाहिए। यह काम सिखों को जिंदा जलाए जाते देखते हुए कांग्रेस की सरकारों ने किया था, बाबरी मस्जिद गिरते हुए देखते नरसिंह राव ने किया था, यही काम हजारों मुसलमानों की लाशों को गिरते देखते हुए अटल-अडवानी ने किया था, और यही काम अब देश के भीतर जगह-जगह नफरत और अलगाववाद को देखते हुए यूपीए सरकार कर रही है। इतिहास इन तमाम बातों को ठीक से दर्ज करता है। और इस पर अपनी सोच को हम भी आज यहां दर्ज कर रहे हैं। 

पाक में मजहब की साजिश से लेकर अमरीकी नीयत तक


2 सितंबर 2012
संपादकीय
पाकिस्तान में पिछले कुछ दिनों से एक बात को लेकर बड़ी बहस चल रही है। वहां की एक कमउम्र ईसाई बच्ची को धर्मगंं्रथ कुरान के अपमान के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। यह नाबालिग बच्ची एक मानसिक बीमारी भी भुगत रही है, और पाकिस्तान के इस ईशनिंदा कानून के खिलाफ वहां लंबे समय से एक आंदोलन चल रहा है कि इसे खत्म किया जाए। इस बच्ची के मामले को लेकर यह बात वहां एक बार फिर से जोर पकड़ रही है और यह कानून बहस में आ गया है। पाकिस्तान के इस कानून के मुताबिक जो कोई व्यक्ति इस्लाम के खिलाफ बुरा बोलता है, या हजरत मोहम्मद पैगम्बर के खिलाफ बोलता है, उसे मौत की सजा तक दी जा सकती है।
इस मामले के बहुत से पहलू हैं जिन पर सोचना चाहिए। इस बच्ची पर यह आरोप लगाकर उसे गिरफ्तार तो करवा दिया गया है, लेकिन कल ही पाकिस्तान की पुलिस ने वहां के एक मुल्ला को गिरफ्तार किया है जिस पर आरोप है कि उसने झूठे सुबूत गढ़कर इस बच्ची के खिलाफ यह मामला बनवाया। और खबरों में जो जानकारी आ रही है वह यह है कि मस्जिद में नमाज पढ़वाने के लिए बैठे हुए इस मुल्ला ने वहीं पर उससे की गई शिकायत के बाद खुद ही कुरान के पन्ने फाड़कर उस बच्ची के बैग में रखकर उसे फंसाने का काम किया। अब जब बहुत से चश्मदीद गवाह सामने आए हैं, तब पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया है। यह कानून बदले या न बदले, यह बच्ची छूटे या न छूटे, ये बातें खबरों में आती रहेंगी। फिलहाल हम यह बात करना चाहते हैं कि धर्म किस तरह की साजिशों वाला हो सकता है, और कितना कू्रर हो सकता है। 
यह बात सिर्फ इस्लाम की नहीं है। बहुत से धर्मों के बारे में हम कई बार यहां पर लिख चुके हैं कि किस तरह अधिकतर धर्म महिलाओं के खिलाफ होते हैं, कमजोर लोगों के खिलाफ होते हैं, किस तरह धर्म को अपराधों से कोई परहेज नहीं होता, किस तरह धर्म में गरीब और अमीर के बीच फर्क किया जाता है और गरीब के शोषण के लायक माहौल बनाया जाता है। किस तरह नर्क और स्वर्ग, पाप और पुण्य, प्रायश्चित और बोझ से बरी हो जाने की अवैज्ञानिक बातें लोगों के जहन में बिठाई जाती हैं, यह बात माक्र्स से लेकर हम तक बहुत से लोगों में समय-समय पर लिखी हैं। हिंदुस्तान में ही देखें तो धर्म के नाम पर किए जाने वाले भेदभाव से जो हिंसा की जाती है, उसके जुनून में मोदी सरीखे लोग जनता के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को भी भूल जाते हैं। इसी तरह कहीं धर्म के नाम पर धमाके होते हैं, कहीं टे्रन जलाई जाती है, कहीं बलात्कार होते हैं और कहीं पर शंकराचार्य जैसे लोग हत्या के मामले में गिरफ्तार होते हैं। 
धर्म के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि उसे मानने वाले लोग अपनी इस आस्था को अंधविश्वास और जुनून की हद तक ले जाते हैं और उसे अपने देश के कानून से ऊपर ठहराते हैं। ईश्वर के नाम पर इतने किस्म की हिंसा लोग करते हैं, इतने किस्म के जुर्म लोग करते हैं और वह ईश्वर इन सबको देखते रहता है। इसलिए हमारे जैसे लोग ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं और साथ ही आस्थावान लोगों की हिंसा पर भी सवाल उठाते हैं कि धर्म क्या इन हिंसक लोगों के लिए सिर्फ कागज का एक ऐसा पुलिंदा है जो कि नफरत को बढ़ाने के लिए काम लाया जाता है, जुल्म के हथियार की तरह काम लाया जाता है? पाकिस्तान की यह ताजा घटना वहां के अल्पसंख्यकों के लिए तो दहशत की बात है ही क्योंकि वहां बसे हुए हिंदुओं के साथ भी आए दिन कई तरह की साम्प्रदायिक हिंसा और साम्प्रदायिक भेदभाव की बात आती ही रहती है। 
अब सवाल यह है कि पाकिस्तान फौजी मदद देने से लेकर वहां रात-दिन बमबारी करने वाली तथाकथित लोकतांत्रिक ताकतों को ऐसे धर्मांध भेदभाव के चलते हुए वहां पर मदद देना ठीक लगता है? हमारा ऐसा ख्याल है कि अमरीका जैसे देशों को अपने फौजी इरादों के चलते हुए यह ठीक लगता है कि पाकिस्तान एक कट्टरपंथी और धर्मांध जगह बनी रहे, जहां के धर्मांध आतंकियों पर हमला करने के नाम पर, हमला करने के लिए, अमरीकी गिरोह वहां रात-दिन हमले कर सके, और कुल मिलाकर उस देश को अपने कब्जे में रख सके। पश्चिमी ताकतों में कट्टरता को बढ़ाने के, आतंक के बढ़ाने के ऐसे काम पहले भी किए हैं और आज भी वे ऐसा कर रही हैं। यह पाकिस्तान और हिंदुस्तान जैसे देशों के अपने हित में हैं कि वे अपने माहौल को सुधारें और अमरीकी कब्जे से बचें।
यह बात पाकिस्तान के एक घरेलू कानून से शुरू होकर, वहां धर्म के लोगों की बनाई गई साजिश से शुरू होकर अमरीकी नीयत तक पहुंची है, लेकिन इन दोनों के बीच साजिशों की एक बड़ी साफ-साफ जंजीर है जिसे समझना चाहिए।

1 सितंबर 2012


मोदी पर सोचने का मौका


1 सितंबर 2012
संपादकीय
कोई दस बरस पहले गुजरात में दंगों में मारे गए हजारों लोगों पर आने वाले अदालती फैसले दिल हिला देते हैं। इसलिए नहीं कि इनसे उन हत्याओं की याद ताजा हो जाती है, बल्कि इसलिए कि इनसे सत्ता की हिंसा के नए-नए पहलू अदालती फैसले के हिस्से की शक्ल में अधिक भरोसे के साथ सामने आते हैं। लोगों के बयान अलग हो सकते हैं, लेकिन अदालती फैसले तो सुबूतों और गवाहों की बुनियाद पर तब तक टिके रहते ही हैं जब तक ऊपर अदालत इस फैसले को पलट न दे। मोदी के समर्थकों को छोड़ दें, तो भला किसको इस बात में कोई शक रहा है कि गुजरात की सरकार इन दंगों के पीछे थी। जिस तरह से मोदी की मंत्री रही हुई, भाजपा की विधायक माया कोडवानी ने अपने विधानसभा क्षेत्र में इन तकरीबन सौ कत्लों की साजिश की अगुवाई की, और जिस तरह बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष बाबू बजरंगी के साथ मिलकर यह कत्लेआम करवाया, वह क्या किसी ऐसे चौकन्ने, चतुर और जाग रहे मुख्यमंत्री से अनदेखा था? आज ही हम किसी दूसरे पेज पर इसी बाबू बजरंगी का एक स्टिंग ऑपरेशन छाप रहे हैं जो बताता है कि नरेन्द्र मोदी का हाथ किस तरह से दंगाईयों के सिर पर था। 
देश के जो लोग राजनीति और इंसाफ की समझ कम रखते हैं, वे लोग गुजरात के दंगों के पीछे गोधरा में टे्रन में सवार हिंदू कारसेवकों को जलाकर मारने के बाद का इंसाफ इन दंगों को मानते हैं। ये दंगे अगर सिर्फ जवाबी दंगे होते और इनके पीछे सिर्फ दंगाई होते तो ये देश के दूसरे बहुत से हिस्सों में हुई हिंसा और प्रतिहिंसा की बात होती। लेकिन यहां पर राज की सत्ता की पूरी भागीदारी थी, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने की खुली छूट दी गई थी, पुलिस को हिंसा रोकने से रोका गया था, और जब मामले अदालतों में पहुंचे तो हत्यारों की विचारधारा के लोग, उनके संगठनों के साथी सरकारी वकील बनाए गए। और यह सब हमारा अपना कहना नहीं है, ये बातें गुजरात की अदालतों से उठकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं और ये सब देश की सबसे बड़ी अदालत की नाराजगी की वजह भी बनीं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा कोई मौका और नहीं था जब सत्ता में इतने बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा करवाई हो। ये तमाम बातें अब अदालती फैसलों का हिस्सा हैं, और इसीलिए इस देश को यह सोचना है कि जब निर्वाचित होकर आने की वैधानिकता से लैस होकर कोई तानाशाह बनता है, तो वह कितना खतरनाक हो सकता है। उसके पास दिखाने के लिए सील लगे वोटों से सिले लबादे भी होते हैं, और उन लबादों के भीतर कत्लेआम के हथियार भी होते हैं। लेकिन दिखाने वाले दांतों की तरह ये वोट दिखाने के काम आते हैं, और जो कमसमझ आबादी है उसे लगता है कि आर्थिक विकास के आंकड़े जिंदगियों के आंकड़ों से कम मायने रखते हैं और जिस तरह बाजार में कम दाम के शेयर बेचकर उनसे छुटकारा पाया जा सकता है, उसी तरह समाज-व्यवस्था में कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लोगों की जिंदगियां खत्म करके बची जिंदगियों के आंकड़ों में पूंजीनिवेश किया जा सकता है। 
अभी-अभी गुजरात के कुपोषण के आंकड़ों पर हमने लिखा है, और उसकी चर्चा आज यहां फिर से इसलिए जरूरी है कि जो लोग मोदी को अच्छा प्रशासक मानते हैं, और यह मानते हैं कि उन्होंने गुजरात को एक सुशासन दिया है वे जरा यह भी सोच लें कि पांच बरस की आबादी के नीचे के आधे बच्चे अगर कुपोषण के शिकार हैं, उनका कद नहीं बढ़ पा रहा है, उनका शरीर कमजोर है, तो फिर अच्छा शासन किस आयवर्ग तक पहुंचकर रूक गया है? बड़े कारोबारियों से राज्य की आय के आंकड़े तो बढ़ जाते हैं, वहां पर अमीर और गरीब के बीच का फासला इससे जरूरी नहीं है कि घट जाए। इसलिए जिस शहरी, हिंदू, सवर्ण, शिक्षित और संपन्न तबके को मोदी का राज पसंद आता है, उनको इस सवाल का जवाब भी ढूंढना चाहिए कि इतना संपन्न राज्य होने पर भी छोटे बच्चों की आधी से अधिक आबादी की यह बदहाली क्यों है? और बच्चों के कुपोषण के मामले में यह गुजरात ओडिशा, बिहार, उत्तरप्रदेश और असम जैसे राज्यों से भी पीछे क्यों है? 
गुजरात के अदालती फैसले आज लोगों को लोकतंत्र में हत्यारे राज के बारे में सोचने का मौका भी देते हैं कि वे अपने को नापसंद तबके का क्या हाल कर सकते हैं, किस तरह उन्हें मिटा सकते हैं। आज अगर गुजरात में भाजपा की विधायक और मोदी की मंत्री को 28 बरस की कैद दी गई है, तो अपनी पार्टी के भीतर बेकाबू बने, हिंदू संगठनों के भीतर बेकाबू बने इस तानाशाह के बारे में इन संगठनों को भी सोचना चाहिए। दूसरी बात यह कि जिस तरह हर चमकदार चीज सोना नहीं होती, सुशासन दिखता हर शासन सुशासन नहीं होता। एक अंगूर और एक कद्दू को मिलाकर बनाई गई सब्जी जितनी मिलवा सब्जी हो सकती है, उतना ही मिलवा राज गुजरात का है, जहां पर इतनी बड़ी आबादी कुपोषण से अविकसित है, अल्पविकसित है। दूसरी तरफ बात-बात में नरेन्द्र मोदी गुजरात की पूरी आबादी का अपने-आपको मसीहा बताते हैं, वहां मुसलमानों की एक ऐसी बड़ी आबादी भी बसी हुई है जिसके कि इस राज में कोई मानव अधिकार नहीं रह गए हैं।
यह बात एनडीए के भीतर भी नीतीश कुमार उठाते आए हैं, और अदालती फैसलों-कुपोषण की खबरों के बीच बाकी देश को भी गुजरात और मोदी पर सोचना चाहिए। 

31 aug 2012


31aug 2012