7 सितंबर 2012
संपादकीय
कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज ने एक सुनवाई के दौरान कही अपनी बात से देश के महिला अधिकार पर एक नई बहस शुरू कर दी है। यह बहस कम है, और इस जज के खिलाफ लोगों की नाराजगी अधिक है। एक घरेलू मामले की सुनवाई के दौरान इस जज ने कहा जब तक कोई आदमी अपनी बीवी की ठीक-ठाक देखभाल करता है तो उसकी की गई घरेलू हिंसा और बीवी को पीटना सही है। एक केस के दौरान जस्टिस के. भक्तवत्सला यह टिप्पणी की। उक्त केस में एक महिला अपने पति से तलाक चाहती थी, जिसमें आधार दिया था कि उसका पति उसके साथ गाली-गलौच और मारपीट करता है। इससे पहले भी उक्त जज विवादित टिप्पणी कर चुके हैं। तलाक के एक केस की सुनवाई के दौरान उन्होंने एक महिला वकील से कहा था कि जिस वकील की शादी नहीं हुई हो, उसे तलाक वाले केसों में बहस करने के योग्य नहीं है।
भारत में जजों की इस किस्म की अमानवीय बातों का एक लंबा इतिहास रहा है। लोगों को याद होगा कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने मुकदमे के दौरान ही सतीप्रथा का समर्थन किया था। और बहुत सी बातें जो खबरों में नहीं आ पातीं, वे बताती हैं कि जजों के पूर्वाग्रह किस तरह से मजबूत होते हैं, और उनके चलते वे किस तरह से कुछ किस्म के मामलों की सुनवाई करने के लायक नहीं होते। इस पर चर्चा करते हुए हमें अमरीका में जजों की नियुक्ति का तरीका याद पड़ता है। बड़ी अदालत के किसी जज को कुर्सी पर आने के पहले संसद की कमेटी की खुली सुनवाई से गुजरना पड़ता है, और वह सुनवाई खासी लंबी होती है, जिसमें उस जज से हर किस्म के विवादास्पद और संवेदनशील मामलों पर उसके विचार पूछे जाते हैं, और उनको रिकॉर्ड में दर्ज भी किया जाता है। इस दौरान उस व्यक्ति की पहले कही हुई या सुनी हुई बातों को लेकर भी सवाल-जवाब होते हैं और एक किस्म से भावी जज को उधेड़ कर रख दिया जाता है।
भारत में किसी जज को उसकी विचारधारा को लेकर किसी सवाल-जवाब का सामना करना पड़ता हो, ऐसा कभी सुनने में नहीं आया। और किसी जज को उसकी विचारधारा के आधार पर कुछ किस्म के मामले सुनने के लायक न पाने की बात भी कभी सुनाई नहीं पड़ी है। हम यह भी मानते हैं कि कोई भी सोचने-विचारने वाले इंसान अपनी मान्यताओं, अपने विचारों और अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं रह सकते। लेकिन ऐसे में जब उनको अपनी विचारधारा से जुड़े हुए किसी मामले की सुनवाई करना हो, तो उन्हें अपने-आपको खुद ही अलग कर लेना चाहिए, या फिर न्याय-व्यवस्था में ऐसा इंतजाम रहना चाहिए कि उनको उस तरह के मामले दिए ही न जाएं। और फिर आज जिस मामले को लेकर, जिस जज की जिस टिप्पणी को लेकर यहां लिखने की नौबत आई है, वह तो देश में महिलाओं के बराबरी के दर्जे के खिलाफ है, महिलाओं की रक्षा के लिए बनाए गए कानून के खिलाफ है, और इंसानियत के भी खिलाफ है। इसलिए इसके बारे में तो कल से देश के बहुत से संगठनों द्वारा देश के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखी गई इस मांग को हम ठीक पाते हैं कि इस जज को महिलाओं पर ज्यादती से संबंधित मामले बिल्कुल नहीं देना चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि कुछ समय पहले जब राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष और आयोग के कुछ सदस्यों ने बहुत बेइंसाफी के बयान दिए थे, महिलाओं के हकों के खिलाफ बातें कही थीं, तब भी हमने उसका विरोध करते हुए इन लोगों को संवैधानिक कुर्सियों से हटाने की मांग की थी। अभी इस पर चर्चा करते हुए हमको यह भी लग रहा है कि देश की किसी भी संवैधानिक कुर्सी पर मनोनीत किए जाने वाले लोगों के विचारों की खुली सुनवाई होनी चाहिए, और यह सिर्फ सत्ता का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए कि वह जिसे चाहे उसे मनोनीत कर दे। यहां पर हमने पहले भी एक बात लिखी थी कि मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, सूचना आयोग, बाल कल्याण परिषद जैसे बहुत से संवैधानिक दफ्तर हैं, जिनके काम का मिजाज ही सरकार के कामकाज से टकराव का रहता है। ऐसी जगहों पर सत्ता जब अपने पसंदीदा लोगों को, अपनी पार्टी के लोगों को, अपनी पार्टी की विचारधारा के लोगों को मनोनीत करती है, तो सरकार के गलत कामों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की संभावना खत्म हो जाती है। हमने गुजरात दंगों की सुनवाई के दौरान यह देखा था कि किस तरह मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दंगाईयों और हत्यारों की विचारधारा वाले, उन्हीं के संगठनों वाले सरकारी वकील तैनात किए थे, और उन्होंने किस तरह हत्यारों को अदालत से छुड़वाने का काम किया था, और अपनी सरकारी जिम्मेदारी के ठीक खिलाफ काम किया था। कमोबेश ऐसा ही काम देश भर में सत्ता के मनोनीत संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे लोग करते हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट के इस मामले के बहाने आज इस चर्चा की भी जरूरत है कि जहां-जहां लोगों के निजी विचार उनके कामकाज, उनकी जिम्मेदारी पर असर डाल सकते हैं, वहां-वहां उन लोगों को कोई जिम्मेदारी देने के पहले उनकी सोच को तौल लेना चाहिए। इसके साथ ही बाद में ऐसी कोई विचारधारा सामने आने पर, जिम्मेदारी से टकराव के आधार पर उन्हें उस कुर्सी से हटा ही देना चाहिए। जो बात एक हाईकोर्ट जज ने कही है, वह इस देश में महिलाओं पर सदियों से चले आ रहे जुल्म को बढ़ाने वाली बात भी है। हमारे हिसाब से इस जज पर कार्रवाई भी करनी चाहिए, और उन्हें औरत-मर्द के संबंधों से जुड़े मामलों से हमेशा के लिए अलग कर देना चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री सहित सत्ता और विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा अमरीका की तरफ पैर करके सोने से भी बचता है। इसलिए संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के वहां के तरीके पर यहां भी अमल करना चाहिए। शौच साबित होने के पहले ही सोच को तौलने की व्यवस्था होनी चाहिए।









