बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकार का सिलसिला सोनिया खत्म करें


संपादकीय
6 सितंबर 2012
कोयला घोटाला उजागर होना अभी जारी ही है, लेकिन देश की धरती को खून निकाल देने तक दुह लेने के जो जुर्म सत्ता से जुड़े लोगों के सामने आ रहे हैं, वे भयानक हैं। और यह सत्ता राजनीति, बड़े कारोबार और कारखानेदारों के एक ऐसे बरमूडा त्रिकोण को सामने रख रहे हैं जिनमें लोकतंत्र और जनहित के सारे जहाज डूबते दिख रहे हैं, डूब चुके हैं। टेलीफोन घोटाले से लेकर कोयला घोटाले तक, जितने बड़े घोटाले ऐसे हैं जिनमें जालसाजी से, धोखाधड़ी से, सरकारी नीतियों को बदलकर हजारों-लाखों करोड़ लूटने का काम किया गया है, उन तमाम आबंटनों को तुरंत खत्म करना चाहिए। कुदरत ने इस धरती को इतने किस्म के खजाने इसलिए नहीं दिए हैं कि गिने-चुने लोग लोकतांत्रिक सत्ता पर काबिज होकर इसे खा जाएं। आज इस कोयले का धुआं इस कदर गहरा फैल चुका है, और यह आसमान तक जाकर टूजी के स्पेक्ट्रम के गले मिल रहा है, जिस तरह कोई एक लुटा हुआ, किसी दूसरे लुटे हुए से हमदर्दी दिखाए। और धरती के नीचे के कोयले से लेकर आसमान में तैरती तरंगों तक के बीच के हिन्दुस्तानी इंसान यह पूरा नजारा देखते हुए हक्का-बक्का हैं कि वे क्या करें? कहां जाएं? 
हम दिल्ली में संसद के चलने के हिमायती हैं, लेकिन जिस तरह की जानकारी रोज निकलकर सामने आ रही है उससे जाहिर है कि इस संसद में बैठे लोग जो कि दिल्ली की सत्ता पर भी काबिज हैं, या कि जिनकी पार्टियां कुछ राज्यों में काबिज हैं, उन सबने एक-दूसरे से हाथ मिलाकर एक इतना बड़ा बरमूडा त्रिकोण बना दिया है कि उसके बीच पूरा देश ही डूब जाए। भ्रष्टाचार के अंतरिक्ष छूते आंकड़ों को देखें तो लगता है कि सरहद पार के दुश्मन देश में फौज पर भारत का उतना खर्च नहीं करवा पाते, जितना कि देश के भीतर के लोग लूट लेते हैं। जब सत्ता पर बैठे लोग पूरी साजिश के साथ लूट के माल में भागीदार होते हैं, तो हमारा यह मानना है कि वे देशद्रोह कर रहे हैं। सत्ता के बाहर के लोग तो खुद होकर सत्ता के हिस्से के फैसले नहीं ले पाते, सरकारी फाइलों पर खुद दस्तखत नहीं कर पाते। इसलिए वे तो साजिश के भागीदार हो सकते हैं, वे पहले दर्जे के मुजरिम नहीं हो सकते। पहले दर्जे के मुजरिम तो सत्ता पर काबिज लोग ही हो सकते हैं। और जब हम कुदरत की दौलत की इस पैमाने की लूटपाट देखते हैं, और साथ में देश के कुपोषण को देखते हैं, तो यह जुर्म देश के साथ गद्दारी से कम का नहीं लगता। इसलिए हमारा मानना है कि सत्ता पर जो जितने ऊपर बैठा है, उसके लिए सजा उतनी ही अधिक होनी चाहिए, और इनकी ताकत और पहुंच को देखते हुए इनके लिए जमानत की रियायत खत्म कर देनी चाहिए। जो लोग एक लोकतांत्रिक सत्ता के मुखिया रहकर गब्बर सिंह की तरह के डकैत सरदार भी हो जाते हैं, और पुलिस से सलामी भी पाते हैं, उनकी जमानत ठीक नहीं है। ये बाहर आकर अपने खिलाफ पूरे मामले को खत्म करने की ताकत रखते हैं, और देश की न्याय प्रक्रिया को इस हमले से बचाना भी चाहिए। 
जहां तक यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का सवाल है, तो इसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के बारे में हमें कुछ बातें लगती है। एक तरफ तो यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी निजी स्तर पर अपने बेटे के साथ बेदाग बनी हुई है, लेकिन जिस सरकार की मुखिया होने के नाते विदेशी सर्वे उन्हें दुनिया के सौ सबसे ताकतवर इंसानों में गिनते हैं, उस सरकार के किसी कामकाज के लिए वे कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं है, न ही उनका बेटा राहुल गांधी कागज पर किसी गलत काम के लिए जिम्मेदार है। अब जो सर्वे सोनिया गांधी को इस देश की सबसे ताकतवर नेता बताते हैं, वह ताकत इसी सरकार की मुखिया होने की है, जो आधी कटघरे में खड़ी है, और आधी जेल जाने को तैयार खड़ी है। तो ऐसे हक और ऐसी अगुवाई जवाबदेही से आजाद कैसे रखे जा सकते हैं?  भारतीय लोकतंत्र का यह तकाजा है कि जो सत्ता की ताकत को सम्हाले, काबू में रखे, वह कानून के प्रति जवाबदेह भी रहे। अब ऐसा लगता है कि यूपीए नाम की कार की पिछली सीट पर बैठकर सोनिया-राहुल जिस तरह से ड्राइविंग कर रहे हैं, वह नैतिक रूप से और लोकतांत्रिक रूप से सही नहीं है। इनको एक सीधे-सादे माने जाने वाले ड्राइवर को रखकर अपनी मर्जी से ड्राइविंग करवाने का काम बंद करना चाहिए। पैसे वाले लोग अपनी गाड़ी के लिए ड्राइवर रखते हैं, अपनी मर्जी से गाड़ी चलवाते हैं और सड़क पर कोई हादसा हो जाने पर उसे जेल भेजने के लिए तैयार भी रखते हैं। पूंजीवादी समाज में गरीब या मातहत नौकर के शोषण का यह आम तरीका है, लेकिन दुनिया के इस सबसे विशाल लोकतंत्र के सरकारी मुखिया को इस तरह से इस्तेमाल करना, बहुत ही अलोकतांत्रिक बात है, और इतिहास इसे अच्छी तरह दर्ज भी कर रहा है। 

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