1 सितंबर 2012
संपादकीय
कोई दस बरस पहले गुजरात में दंगों में मारे गए हजारों लोगों पर आने वाले अदालती फैसले दिल हिला देते हैं। इसलिए नहीं कि इनसे उन हत्याओं की याद ताजा हो जाती है, बल्कि इसलिए कि इनसे सत्ता की हिंसा के नए-नए पहलू अदालती फैसले के हिस्से की शक्ल में अधिक भरोसे के साथ सामने आते हैं। लोगों के बयान अलग हो सकते हैं, लेकिन अदालती फैसले तो सुबूतों और गवाहों की बुनियाद पर तब तक टिके रहते ही हैं जब तक ऊपर अदालत इस फैसले को पलट न दे। मोदी के समर्थकों को छोड़ दें, तो भला किसको इस बात में कोई शक रहा है कि गुजरात की सरकार इन दंगों के पीछे थी। जिस तरह से मोदी की मंत्री रही हुई, भाजपा की विधायक माया कोडवानी ने अपने विधानसभा क्षेत्र में इन तकरीबन सौ कत्लों की साजिश की अगुवाई की, और जिस तरह बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष बाबू बजरंगी के साथ मिलकर यह कत्लेआम करवाया, वह क्या किसी ऐसे चौकन्ने, चतुर और जाग रहे मुख्यमंत्री से अनदेखा था? आज ही हम किसी दूसरे पेज पर इसी बाबू बजरंगी का एक स्टिंग ऑपरेशन छाप रहे हैं जो बताता है कि नरेन्द्र मोदी का हाथ किस तरह से दंगाईयों के सिर पर था।
देश के जो लोग राजनीति और इंसाफ की समझ कम रखते हैं, वे लोग गुजरात के दंगों के पीछे गोधरा में टे्रन में सवार हिंदू कारसेवकों को जलाकर मारने के बाद का इंसाफ इन दंगों को मानते हैं। ये दंगे अगर सिर्फ जवाबी दंगे होते और इनके पीछे सिर्फ दंगाई होते तो ये देश के दूसरे बहुत से हिस्सों में हुई हिंसा और प्रतिहिंसा की बात होती। लेकिन यहां पर राज की सत्ता की पूरी भागीदारी थी, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने की खुली छूट दी गई थी, पुलिस को हिंसा रोकने से रोका गया था, और जब मामले अदालतों में पहुंचे तो हत्यारों की विचारधारा के लोग, उनके संगठनों के साथी सरकारी वकील बनाए गए। और यह सब हमारा अपना कहना नहीं है, ये बातें गुजरात की अदालतों से उठकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं और ये सब देश की सबसे बड़ी अदालत की नाराजगी की वजह भी बनीं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा कोई मौका और नहीं था जब सत्ता में इतने बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा करवाई हो। ये तमाम बातें अब अदालती फैसलों का हिस्सा हैं, और इसीलिए इस देश को यह सोचना है कि जब निर्वाचित होकर आने की वैधानिकता से लैस होकर कोई तानाशाह बनता है, तो वह कितना खतरनाक हो सकता है। उसके पास दिखाने के लिए सील लगे वोटों से सिले लबादे भी होते हैं, और उन लबादों के भीतर कत्लेआम के हथियार भी होते हैं। लेकिन दिखाने वाले दांतों की तरह ये वोट दिखाने के काम आते हैं, और जो कमसमझ आबादी है उसे लगता है कि आर्थिक विकास के आंकड़े जिंदगियों के आंकड़ों से कम मायने रखते हैं और जिस तरह बाजार में कम दाम के शेयर बेचकर उनसे छुटकारा पाया जा सकता है, उसी तरह समाज-व्यवस्था में कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लोगों की जिंदगियां खत्म करके बची जिंदगियों के आंकड़ों में पूंजीनिवेश किया जा सकता है।
अभी-अभी गुजरात के कुपोषण के आंकड़ों पर हमने लिखा है, और उसकी चर्चा आज यहां फिर से इसलिए जरूरी है कि जो लोग मोदी को अच्छा प्रशासक मानते हैं, और यह मानते हैं कि उन्होंने गुजरात को एक सुशासन दिया है वे जरा यह भी सोच लें कि पांच बरस की आबादी के नीचे के आधे बच्चे अगर कुपोषण के शिकार हैं, उनका कद नहीं बढ़ पा रहा है, उनका शरीर कमजोर है, तो फिर अच्छा शासन किस आयवर्ग तक पहुंचकर रूक गया है? बड़े कारोबारियों से राज्य की आय के आंकड़े तो बढ़ जाते हैं, वहां पर अमीर और गरीब के बीच का फासला इससे जरूरी नहीं है कि घट जाए। इसलिए जिस शहरी, हिंदू, सवर्ण, शिक्षित और संपन्न तबके को मोदी का राज पसंद आता है, उनको इस सवाल का जवाब भी ढूंढना चाहिए कि इतना संपन्न राज्य होने पर भी छोटे बच्चों की आधी से अधिक आबादी की यह बदहाली क्यों है? और बच्चों के कुपोषण के मामले में यह गुजरात ओडिशा, बिहार, उत्तरप्रदेश और असम जैसे राज्यों से भी पीछे क्यों है?
गुजरात के अदालती फैसले आज लोगों को लोकतंत्र में हत्यारे राज के बारे में सोचने का मौका भी देते हैं कि वे अपने को नापसंद तबके का क्या हाल कर सकते हैं, किस तरह उन्हें मिटा सकते हैं। आज अगर गुजरात में भाजपा की विधायक और मोदी की मंत्री को 28 बरस की कैद दी गई है, तो अपनी पार्टी के भीतर बेकाबू बने, हिंदू संगठनों के भीतर बेकाबू बने इस तानाशाह के बारे में इन संगठनों को भी सोचना चाहिए। दूसरी बात यह कि जिस तरह हर चमकदार चीज सोना नहीं होती, सुशासन दिखता हर शासन सुशासन नहीं होता। एक अंगूर और एक कद्दू को मिलाकर बनाई गई सब्जी जितनी मिलवा सब्जी हो सकती है, उतना ही मिलवा राज गुजरात का है, जहां पर इतनी बड़ी आबादी कुपोषण से अविकसित है, अल्पविकसित है। दूसरी तरफ बात-बात में नरेन्द्र मोदी गुजरात की पूरी आबादी का अपने-आपको मसीहा बताते हैं, वहां मुसलमानों की एक ऐसी बड़ी आबादी भी बसी हुई है जिसके कि इस राज में कोई मानव अधिकार नहीं रह गए हैं।
यह बात एनडीए के भीतर भी नीतीश कुमार उठाते आए हैं, और अदालती फैसलों-कुपोषण की खबरों के बीच बाकी देश को भी गुजरात और मोदी पर सोचना चाहिए।

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