नाग और सांप से माफी सहित...


4 सितंबर 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज कांगे्रस पार्टी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का घर घेर रही है। जैसी कि पुलिस से उम्मीद की जाती है, उसने शहर भर में जगह-जगह के रास्ते बंद करके कांगे्रसियों को रोकने का इंतजाम कर लिया है। उधर दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी संसद को चलने नहीं दे रही है, और खबरें हैं कि खुद एनडीए के भीतर, भाजपा के भीतर, संघ परिवार के भीतर संसद के पूरे सत्र को तबाह करने के खिलाफ एक नाराजगी है, मतभेद है। इसके पहले कहीं मुंबई में तो कहीं दिल्ली में अन्ना-बाबा-केजरीवाल से लेकर राज ठाकरे तक तरह-तरह के प्रदर्शन कर रहे हैं। 
संसद और सड़क के बीच का फासला उसी तरह गायब हो गया है जिस तरह शहर में बारिश की बाढ़ आ जाने पर सड़क और नाली के बीच फर्क नहीं रह जाता, और एक ही गंदा पानी चारों तरफ लबालब भर जाता है। आज देश में राजनीति, सरकार, सार्वजनिक जीवन, संसद-विधानसभा और सड़कों के बीच का फासला खत्म कर दिया गया है। इससे नुकसान सिर्फ उस जनता का हो रहा है जिसके पैसों पर संसद पलती है, सरकारें जिसके पैसों से तनख्वाह पाती है, सड़कें जिसके लिए हैं, और रहनी चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में और एक देश के रूप में भारत में आगे बढऩे की जो संभावनाएं हैं, जो जरूरतें हैं, उन सबको कुचलते हुए राजनीति और आंदोलन अपनी दूकान सजाकर बैठ गए हैं। क्या किसी देश और उसकी आबादी की जिंदगी रात-दिन इन्हीं बातों को सुनने को बेबस बना दी जानी चाहिए? क्या चुनाव को बरसों जब बाकी हों, तब से इस किस्म की राजनीतिक आग सुलगा देनी चाहिए जिसके धुएं में बाकी कुछ दिखना ही कम हो जाए? एक देश की जिंदगी और जनता की जिंदगी में और इतनी बातें अहमियत रखती हैं कि जिसका हिसाब नहीं, लेकिन उन सबको पूरी तरह अनदेखा करते हुए, उनके महत्व को खारिज करते हुए हर कोई अपनी-अपनी जिद पर अड़ा दिख रहा है। अन्ना-बाबा अपने अंदाज के लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही लाना चाहते हैं, और सामाजिक आंदोलन के नाम पर चुनावी राजनीति पर ढांकी हुई खाल भी अब उतर गई है। किसी भी दिन अपनी मर्जी से किसी पुरानी मांग पर नया आंदोलन शुरू करके लोगों की जिंदगी को उसमें फंसा देना कहां का लोकतंत्र है? और फिर लोगों को नीति-सिद्धांत इस कदर फर्जी हो गए हैं कि जिस भाजपा ने संसद के पूरे सत्र को बंदूक की नोंक पर खत्म कर दिया हो, उसे सीएजी की ठीक वैसी ही रिपोर्ट पर न गुजरात में भरोसा है और न ही छत्तीसगढ़ में। अरूण जेटली कल यह कहते सुनाई देते हैं कि गुजरात में सीएजी की रिपोर्ट तो अभी विधानसभा की लोक लेखा समिति के पास जाएगी, और उसके पहले कुछ कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन जब यही तर्क दिल्ली में कांगे्रस पार्टी देती है, तो भाजपा न संसद में उसे सुनना चाहती और न संसद के बाहर। उसे सीएजी दिल्ली में हरिश्चंद्र लगता है और अपने राज्यों में खलनायक। भाजपा को कर्नाटक में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कोई भरोसा नहीं है।
अब सवाल यह है कि निर्वाचित लोग संसद और विधानसभाओं में अपना काम न करें, देश के लिए बहुत जरूरी दर्जन भर कानून संसद के भीतर भूखे-प्यासे बैठे भाजपा की राह तक रहे हैं, और बाहर सौ करोड़ जनता उन कानूनों के कायदे का इंतजार कर रही है, लेकिन भाजपा पूरे सत्र को खत्म कर चुकी है। दूसरी तरफ अन्ना-बाबा-केजरीवाल फुटपाथ पर कानून बनाने पर आमादा हैं। राज्यों और केंद्र में कांगे्रस और भारतीय जनता पार्टी की नीयत में कहीं ईमानदारी नहीं रह गई है, और सत्ता पर बैठे हुए लोग पारदर्शिता के बजाय इस अंदाज में झांसा देते दिख रहे हैं जिस तरह की कोई पेशेवर फर्जी गवाह अदालत में झूठी गवाही देते हुए अपने तर्क गढ़ता है।
यह पूरा सिलसिला देश में इतनी गंदगी फैला चुका है, और इतना अविश्वास पैदा कर चुका है कि लोग अब यह सोचने लगे हैं कि सारी सरकारों को खारिज करके एक बार फिर से चुनाव करवा लिया जाना चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि देश के दोनों बड़े गठबंधनों में परले दर्जे के भ्रष्ट, साम्प्रदायिक और दगाबाज दल भरे हुए हैं। तो जनता के सामने चुनाव में विकल्प क्या रहेगा? पहले पार्टियों की टिकटें खरीदी जाएंगी, फिर मतदाता के वोट खरीदे जाएंगे, फिर कम पडऩे पर सांसद या विधायक खरीदे जाएंगे, सरकार बनने पर मंत्रालय खरीदे जाएंगे, तो ऐसे चुनाव के आखिर में जाकर भी जनता के हाथ आखिर क्या आएगा? क्या यह लोकतंत्र के लिए इतनी निराशा का दौर नहीं है कि नागनाथ और सांपनाथ के बीच चुनना उसकी बेबसी है? और यहां पर हम नाग और सांप से माफी भी चाहते हैं कि वे तो कोई चोरी करते नहीं हैं।

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