साइबर-सेंधमारी से दुनिया को ब्लैकमेल करना इतना आसान?

18 दिसंबर 2014
संपादकीय
अमरीका की एक बड़ी फिल्म कंपनी सोनी के कम्प्यूटरों पर साइबर-सेंधमारों का हमला हुआ और उन्होंने वहां से फिल्में चुरा लीं, लोगों की चि_ियां चुरा लीं, और सोनी को धमकी दी कि उसने अगर अपनी एक फिल्म जारी की, तो ठीक नहीं होगा। द इंटरव्यू नाम की इस फिल्म में उत्तर कोरिया के तानाशाह-शासक की हत्या की कहानी है, और इन हैकरों के बारे में माना जा रहा है कि उनके पीछे उत्तर कोरिया की सरकार है, जिसका कि अमरीकी सरकार से लंबे समय से टकराव चले आ रहा है। यह फिल्म आने वाली क्रिसमस पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन सेंधमारों ने यह धमकी भी दी है कि इस फिल्म को देखने जाने वाले लोग 11 सितंबर के न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के हमलों को भी याद रखें। इसे देखते हुए पहले तो कुछ सिनेमाघरों ने फिल्म का प्रदर्शन रद्द कर दिया था, लेकिन अब खुद सोनी ने इसकी रिलीज रोक दी है। इसे अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी साइबर-धमकी माना जा रहा है, और कुछ विश्लेषकों का यह कहना है कि आज अगर मनोरंजन-कारोबार की एक काल्पनिक कहानी पर खफा होकर अमरीका की एक सबसे बड़ी कंपनी पर ऐसा हमला हो सकता है तो कल के दिन किसी समाचार टीवी या अखबार में छपी बातों से असहमत होकर उन पर भी ऐसे हमले हो सकते हैं।
अमरीकी सरकार ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया है क्योंकि यह एक दुश्मन देश, उत्तरी कोरिया, से जुड़ा हुआ मामला तो है ही, अमरीकी कारोबार की दुनिया पर भी यह दबाव का सबसे बड़ा हमला है। और जो कंपनी कम्प्यूटरों के ही कारोबार में है, उसके नेटवर्क पर इतनी बड़ी साइबर-सेंध लगाना, और उसकी आपसी चि_ियों को उजागर करके एक सार्वजनिक शर्मिंदगी पैदा करना, एक नए किस्म का आधुनिक हमला है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि उत्तर कोरिया जैसा एक देश साइबर-हमले की अपनी ताकत से किस तरह किसी को झुका सकता है। उसके पास के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नौबत तो अभी नहीं आई है, लेकिन उसके साइबर-हथियार जरूर अपनी ताकत दिखा गए हैं।
जो लोग अमरीकी फिल्में देखते हैं, उनको यह मालूम है कि किस तरह कहानियों में साइबर-हमले दिखाकर पूरी अमरीका के ट्रैफिक को, बैंकों और जिंदगी के बाकी तमाम मामलों को सेंधमार कब्जे में कर सकते हैं, और किसी देश की व्यवस्था को कैसे पल भर में चौपट कर सकते हैं। हमारे पाठकों को यह याद होगा कि बरसों पहले हमने भारत को साइबर-सुरक्षा को लेकर आगाह किया था कि अगर भारत के बैंकों पर, ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन पर, हवाई उड़ानों पर साइबर-हमले होते हैं, तो भारत उस तबाही से कैसे उबरेगा? आज अमरीका की सोनी कंपनी इस बात पर मजबूर हो गई है कि उसके कर्मचारी कागज और कलम लेकर बरसों पहले के अंदाज में काम कर रहे हैं, क्योंकि इस साइबर-सेंधमारी के हफ्ते भर बाद भी सोनी अपने कम्प्यूटरों को हमलों से बचा नहीं पाया है। कम्प्यूटरों के मामले में दुनिया के सबसे सुरक्षित देश की एक सबसे बड़ी कंपनी आज जिस तरह बेबस हो गई है, उससे यह बात साफ है कि गोला-बारूद से लेकर परमाणु हथियारों तक की जरूरत आने वाले दिनों में हो सकता है न पड़े, और हमलावर घर बैठे सेंधमारी करके किसी देश को पल भर में तबाह कर दें।
आने वाले दिन भारत के लिए ऐसी कोई तबाही ला सकते हैं, और वैसे हमलों से बचने के लिए इस देश को तैयार रहना चाहिए। आज जिंदगी की छोटी से छोटी जरूरतें जिस तरह कम्प्यूटरों और इंटरनेट की मोहताज होते जा रही हैं, उनको देखते हुए सरहद की लड़ाई अब पुराने फैशन की साबित होगी, और बिना बंदूक थामे लोग किसी देश की जिंदगी को मुर्दा कर देने की ताकत रखेंगे। भारत सरकार के बार-बार कहने के बाद भी इस देश के मंत्री, अफसर, और यहां के सांसद भी अपने ई-मेल खाते ऐसे सर्वरों पर रखे हुए हैं, जो कि दूसरे देश में हैं। भारत सरकार और भारत की संसद से, यहां की अदालत से, यहां की राज्य सरकारों से जुड़े हुए कामकाज भारत सरकार की ई-मेल सुविधाओं पर न रखने से तस्वीर कुछ ऐसी बनती हैं कि भारत की गोपनीयता अमरीका के फुटपाथों पर रखी हुई है। ऐसा भी नहीं कि भारत सरकार के अपने कम्प्यूटर विदेशी सेंधमारी से बचे हुए होंगे, लेकिन फिर भी वे देश के भीतर तो हैं।
उत्तर कोरिया सरकार की तरफ से, या उसकी हिमायत में सोनी पर हुआ यह हमला लोकतंत्र, सरकार, कारोबार, विदेशी संबंध, और कम्प्यूटरों के नाजुक होने के कई सवाल खड़े करता है, और लोगों को अपने-अपने घर बचाने की सोचना चाहिए। और इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि आज जिनके हाथ में साइबर-ताकत है, ऐसे लोग क्या दुनिया को अपनी शर्तों पर इस तरह झुकाते रहेंगे? कल के दिन और कौन-कौन से कारोबार, कौन-कौन सी सरकारें इस तरह की ब्लैकमेलिंग का शिकार रहेंगे?

दुनिया में पूरी हिफाजत तो कोई ताकत नहीं दे सकती

17 दिसंबर 2014
संपादकीय
पाकिस्तान में कल स्कूली हमले में इस्लामी होने का दावा करने वाले आतंकियों ने डेढ़ सौ लोगों को मार डाला, जिसमें अधिकतर बच्चे हैं, और इस हमले ने पूरी दुनिया को हक्का-बक्का कर दिया है। सदमे में डूबे हुए लोगों को आज सुबह से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यह बताने में लगा है कि भारत के स्कूल कितने असुरक्षित हैं। कई स्कूलों में जाकर कैमरे बतला रहे हैं कि किस तरह वहां कोई भी जा सकते हैं। इंटरनेट पर कई पत्रकार यह लिख रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकी हमलों को रोक क्यों नहीं पा रहा है।
अब सोचने और समझने की बात यह है कि क्या हर हमला रोकने लायक होता है? न सिर्फ पाकिस्तान या हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक चौकस और तैयार देशों में भी स्कूल-कॉलेज पर हमले होते हैं, और अमरीका जैसे सबसे अधिक तैयार देश में तो बिना किसी मजहबी आतंक वाले हमले भी हर बरस दर्जन भर तो हो ही जाते हैं, और कोई एक अकेला बंदूकबाज ही जाकर बहुत से बच्चों को मार डालता है। इसलिए इस दुनिया में कोई अगर यह सोचे कि पुलिस और फौज की बंदूकों से हर जगह पर महफूज किया जा सकता है, तो वह निहायत ही नासमझी की बात होगी। दुनिया का बड़े से बड़ा इंतजाम भी हर स्कूल और हर कॉलेज को आत्मघाती हमलों से नहीं बचा सकता। जब कोई आतंकी या किसी दूसरी किस्म का हमलावर यह तय कर ले कि उसे अपने-आपको उड़ाकर भी दूसरों को मारना है, तो भीड़ भरी जगहों पर कहीं पर भी लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता है। जब हम अपनी साधारण समझ-बूझ से ऐसे हमलों की गुंजाइश के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि दुनिया की आबादी के अधिकतर लोग आज इसीलिए जिंदा हैं, कि किसी ने उनको मारना अब तक तय नहीं किया है। अगर सरकारी इंतजाम से किसी के जिंदा रहने की बात करें, तो हिंदुस्तान जैसे सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश में दो-चार करोड़ से अधिक लोगों को बचा पाना मुमकिन नहीं होगा। 
इसलिए आज न सिर्फ पाकिस्तान या भारत, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को यह सोचना होगा कि किस तरह इंसान और इंसान के बीच गैरबराबरी खत्म की जाए, किसी गरीब के हक छीनना कैसे खत्म किया जाए, किसी जाति या धर्म, किसी नस्ल या नागरिकता के लोगों को मारना किस तरह रोका जाए, ताकि बदले में जवाबी हमले में दूसरे लोग न मारे जाएं। कुल मिलाकर बात यह है कि जब तक दुनिया में आर्थिक और सामाजिक, धार्मिक और नस्लवादी भेदभाव खत्म नहीं होंगे, जब तक सामाजिक न्याय का सम्मान नहीं होगा, तब तक आतंक और हिंसा को खत्म करना मुमकिन भी नहीं होगा। और कल भी हमने इसी जगह भारत के उन लोगों को सावधान किया था जो कि आज यहां धार्मिक और सामाजिक उन्माद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि लोकतंत्र से ऊपर जाकर इस देश में कुछ तबकों के धार्मिक अधिकार खत्म करने की बात कर रहे हैं, कुछ लोग जो कि लोकतंत्र को खत्म करके एक धार्मिक-राज लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनको यह समझ लेना चाहिए कि जब हिंसा और बेइंसाफी बढ़ते हैं, तो फिर बेकाबू मौतें भी होती हैं। और अगर हिंदुस्तान या किसी दूसरे देश को जिंदा रहना है तो उन्हें सामाजिक न्याय की तरफ बढऩा होगा। धर्म से परे भी समाज में आर्थिक न्याय जहां-जहां नहीं हुआ, भारत ऐसे तमाम इलाकों में आज नक्सल हिंसा से जूझ रहा है। इन इलाकों में सरकार के भ्रष्ट लोगों में गरीब आदिवासियों का जितना हक खाया होगा, आज सरकार नक्सल मोर्चे पर उससे हजार गुना गंवा रही है। हमारा हमेशा से यह मानना है कि सामाजिक न्याय देना, आतंक से जूझने के मुकाबले सस्ता पड़ता है, आसान रहता है, और जिंदगियां भी इसी तरह से बच सकती हैं। आज भारत में जिस तरह से एक सामाजिक अन्याय का माहौल खड़ा किया जा रहा है, उस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपने सांसदों को महज सुझाव देना काफी नहीं है। देश में एक न्यायपूर्ण वातावरण लाने की जरूरत है वरना सरहद पार एक मिसाल सामने है कि लोकतंत्र कमजोर और खत्म होने पर क्या हाल करता है।

पाकिस्तान की स्कूल पर आतंकी हमले के सबक

16 दिसंबर 2014
संपादकीय
रोज इस वक्त किसी मुद्दे की तलाश रहती है कि किस पर अपनी बात लिखी जाए। लेकिन आज कुछ घंटे पहले ही पाकिस्तान से खबर आने लगी कि वहां पेशावर में एक स्कूल पर तालिबानी आतंकियों ने हमला कर दिया। शुरू में कुछ गोलीबारी की खबर रही, लेकिन फिर यह खबर आने लगी कि गोलियों से मौतों के बाद एक हमलावर ने आत्मघाती धमाका किया, और शायद डेढ़ दर्जन लोग मारे गए हैं। ऐसे आसार हैं कि मौतें बढ़ सकती हैं, और अभी की खबरों के मुताबिक मरने वाले अधिकतर बच्चे हैं।
कल ही ऑस्ट्रेलिया में इस्लाम के नाम पर दहशत फैलाने की एक हथियारबंद हरकत में मजहब से जुड़े रहे एक आतंकी ने दर्जनों लोगों को कब्जे में ले लिया था, और वहां पुलिस ने एक कमांडो कार्रवाई करके उसे मारा, और दो बंधक भी इस दौरान मारे गए। इस्लाम के नाम पर दुनिया के बहुत से देशों में आतंकी हमले हो रहे हैं, और ऐसा करने वाले लोग अलग-अलग देशों के मुस्लिम लोग हैं, जो कि इस्लाम की तरह-तरह की व्याख्या करते अपनी हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया भारत से कुछ दूर है, और पाकिस्तान एकदम लगा हुआ है, और भारत पर पाकिस्तानी मामलों का असर अधिक होता है। इसलिए पाकिस्तान में इतनी बड़ी आतंकी कार्रवाई को लेकर हिंदुस्तान के लिए भी एक बड़ी फिक्र पैदा होती है।
दरअसल अधिकतर धर्मों का हाल यह है कि उनके मन में इंसानियत के लिए, इंसाफ के लिए, या कि लोकतंत्र के लिए किसी किस्म की जगह नहीं है। यह हम हिंदुस्तान में भी मुस्लिमों के बीच, हिंदुओं के बीच, सिखों के बीच, हिंसा पर यकीन रखने वाले लोगों में देखते हैं। धर्म के नाम पर जब आतंकी हमले होते हैं, और लोगों को मारा जाता है, सार्वजनिक जीवन पर बलपूर्वक कब्जा किया जाता है, जबर्दस्ती की जाती है, तो सरकारों के लिए यह आसान भी नहीं होता कि ऐसे मामलों में कोई कड़ी कार्रवाई की जाए। किसी भी धर्म के भीतर के कुछ गिनेचुने लोगों की हिंसा ही सामने आती है, और उस धर्म के बाकी तमाम लोग चुपचाप तब तक घर बैठे रहते हैं, जब तक कि सरकार उस धर्म के आतंकियों और हिंसकों पर कार्रवाई न करे। और जब सरकार कार्रवाई करती है, तो अपने लोगों की हिंसा पर चुप रहकर तमाशा देखने वाले लोग भी उठकर धर्म के नाम पर एकजुट हो जाते हैं। जब स्वर्ण मंदिर में लगातार भिंडरावाले के हत्यारे आतंकी इक_ा हो रहे थे, वहां पर गोला-बारूद इक_ा हो रहा था, तब इस धर्म के अधिकतर लोग चुप रहे। लेकिन जब ऐसे आतंकियों को मारने के लिए फौजी कार्रवाई की गई, तो उसके जवाब में इस धर्म के कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही मार डाला। 
धर्म और लोकतंत्र का मिजाज बिल्कुल अलग-अलग होता है। जिस तरह इंसान के भीतर उसके दिल और दिमाग का तौर-तरीका अलग-अलग होता है, वैसा ही देश और समाज के भीतर भी होता है। लोग धर्म के मामले में तुरंत ही दिल और धार्मिक आस्था पर उतर आते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब लोकतंत्र की फिक्र करनी हो, तो दिमाग की जरूरत पड़ती है, जो कि धार्मिक और उन्मादी भीड़ के पास नहीं होता।
पाकिस्तान में आज जिस तरह का हमला हुआ है, वह बहुत तकलीफदेह है। लेकिन वहां की राजनीतिक ताकतों ने बीती आधी सदी में जिस तरह लोकतंत्र को कमजोर किया है, और जिस तरह फौजी तानाशाही या कि धर्मांधता को बढ़ाया है, जिस तरह धार्मिक आतंक को बढ़ाया है, यह उसी का नतीजा है कि आज वहां के हालात वहां की सरकार के काबू के बाहर हो गए हैं, और आज इतने बेकसूर और मासूम बच्चों की जिंदगी इस तरह से खत्म हुई है।
हम यह भी चाहते हैं कि पाकिस्तान से परे भी बाकी देश इस बात को समझ लें कि धर्मांधता, कट्टरता, साम्प्रदायिकता, को बढ़ावा देना इस कदर खतरनाक होता है कि एक दिन जाकर इस पर काबू करना भी नामुमकिन हो जाता है। खासकर आज पाकिस्तान के पड़ोस में बसे हुए हिंदुस्तान को यह बात समझना चाहिए जहां पर कि लगातार धर्मांधता को बढ़ाने की कोशिश हो रही है। तालिबानों को किसी भी धर्म में खड़ा करना आसान होता है, खत्म करना मुश्किल या नामुमकिन होता है। यह बात ओसामा बिन लादेन से लेकर भिंडरावाले तक जगह-जगह इतिहास में दर्ज है।

विधानसभाएं हों या संसद..., सदन को सड़क बनाना गलत

15 दिसंबर 14
संपादकीय
एक तरफ दिल्ली में संसद का सत्र चल रहा है, और उत्तरप्रदेश के धर्मांतरण से लेकर दिल्ली में एक साध्वी-मंत्री के बयानों तक, कई मुद्दों को लेकर काम ठप्प है, और विपक्ष पहले इन बातों पर चर्चा चाह रहा है। विपक्ष का एक हिस्सा, बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस वहां के घोटालों में अपने मंत्री और सांसदों की गिरफ्तारी के खिलाफ मोदी सरकार पर हमला बोलते काम रोक रही है। इधर छत्तीसगढ़ में नसबंदी मौतों से लेकर नक्सल मोर्चे पर मौतों तक बहुत से मुद्दे ऐसे हैं जिनको लेकर विधानसभा के आज से शुरू हुए सत्र में काम रूकना शुरू हो गया है, और इस छोटे से सत्र में कोई काम हो पाना मुश्किल दिख रहा है। देश में कुछ प्रदेशों में चल रहे विधानसभा चुनाव को लेकर जो आग हवा में बिखराई जा रही है, वह संसद को ठप्प करने के लिए काफी है, और उसी तरह छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने बहुत से ऐसी नौबतें विपक्ष को मुहैया कराई हैं, जिनको अगर विपक्ष न उठाए, तो वह गैरजिम्मेदार कहलाएगा। इसलिए आज विधानसभा सत्र शुरू होते ही विपक्ष का विरोध जायज था, लेकिन हम विधानसभा की कार्रवाई को बहिष्कार करने का पूरी तरह विरोध करते हैं, और उसी तरह संसद की कार्रवाई ठप्प करने का भी विरोध करते हैं। 
चाहे देश की कुछ विधानसभाओं के चुनाव हों, या फिर छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल के चुनाव हों, इन मुद्दों को अगर संसद और विधानसभा पर ऐसे हावी होने दिया जाता है कि उससे संसदीय काम ठप्प हो जाए, तो उससे राजनीतिक दल चुनावी फायदा पाने की कोशिश चाहे कर लें, उससे राज्य और देश का एक बहुत बड़ा नुकसान होता है। जितने संसदीय कार्य रहते हैं, उन विधेयकों पर, उन संशोधनों पर, उन प्रस्तावों पर चर्चा का वक्त हंगामे में खत्म हो जाता है, और जब नए कानून बनते हैं, या मौजूदा कानूनों में फेरबदल होता है, तो उन पर जो चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि सदन के समय का एक-एक पल का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि वह मौका रहता है जिसमें जनता के प्रतिनिधि के रूप में विपक्ष सरकार को घेर सकता है, और हर मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। जहां तक विरोध-प्रदर्शन की बात है, तो हम यह सुझाएंगे कि विपक्ष को सदन के समय को और बढ़वाने की कोशिश करनी चाहिए, रोज शाम देर तक सदन की कार्रवाई चलाने पर सरकार को मजबूर करना चाहिए, हर मुद्दे पर सवाल पूछने चाहिए, और घेरना चाहिए। ऐसा करके ही विपक्ष अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है और सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है। आज जिस तरह से संसद और विधानसभा में कार्रवाई ठप्प है, उससे सत्र के आखिर में जाकर सरकार के तमाम किस्म के प्रस्ताव, तमाम किस्म के संशोधन रफ्तार से आगे बढ़ा दिए जाएंगे, और बिना अक्ल के इस्तेमाल के नए कानून बन जाएंगे, कानून में फेरबदल हो जाएगा। 
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि सदन का उपयोग बहिष्कार और बहिर्गमन में बर्बाद करना सरकार के हाथ मजबूत करने जैसा है। इससे मीडिया में कुछ घंटों के लिए एक सुर्खी तो हासिल हो जाती है, लेकिन देश की जनता लुटी हुई सब देखते रह जाती है। सरकार को घेरने का यह तरीका संसदीय उत्पादकता को खत्म करने का है। हमारा मानना है कि सदन के समय का पल-पल इस्तेमाल करके, प्रदर्शन के लिए बाहर मौका ढूंढना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सब जगह गांधी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं, और वहां बैठकर अनशन और उपवास करके सांसद और विधायक मीडिया से सीधे बात भी कर सकते हैं, जो कि सदन के भीतर नहीं कर सकते। सांसदों और विधायकों के ऐसे ही रूख के चलते जनता के मन में इन निर्वाचित और मनोनीत प्रतिनिधियों के लिए इज्जत घटती चली गई है, और हिकारत बढ़ती चली गई है। प्रदर्शन के लिए सड़क का इस्तेमाल हो सकता है, आमसभाओं के मैदान का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन सदन को सड़क बना देना पूरी तरह नाजायज है, और दिल्ली से लेकर रायपुर तक जनता के बीच ऐसे रूख के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी होनी चाहिए। 

तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा

14 दिसंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज देश के नाम एक रेडियो संदेश में अपने मन की बातों की एक किस्त और कही। उन्होंने देश के नौजवानों में नशे के बढ़ते हुए खतरे के बारे में लोगों को आगाह किया, और इससे देश की हो रही तबाही के बारे में बड़े खुलासे से लोगों से अपने मन की बात कही। 
प्रधानमंत्री के मन की यह बात सही है और जरूरी है। देश पर नशे से एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लेकिन भारत जैसे बड़े देश के प्रधानमंत्री, और खासकर नरेन्द्र मोदी की तरह अधिक घंटों तक काम करने वाले प्रधानमंत्री के मन में हर कुछ हफ्तों में रेडियो पर कही जाने वाली बातों से परे भी कुछ बातों की उम्मीद लोग करते हैं। और जब मोदी ऐसे तमाम मुद्दों पर अनजान बने रहते हैं, चुप रहते हैं, तो लोगों को यह समझ आ जाता है कि इन बातों पर उनके मन में जो है, वह शायद कहने लायक नहीं है, इसलिए वे उन पर कह नहीं रहे हैं। 
पिछले कई दिनों से लगातार गैरहिन्दुओं को हरामजादा कहने वाली उनकी मंत्री को लेकर उन्होंने संसद में सरकार के बुरी तरह और पूरी तरह घिर जाने पर सफाई के अंदाज में तो कुछ कहा, लेकिन वह संसद के लिए कही गई बात थी। साध्वी-मंत्री के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग टीवी समाचार चैनलों पर हजार बार दिखा दिए जाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी उस पर कुछ नहीं कहा था। जिस तरह से उत्तरप्रदेश में हिन्दू संगठन हमलावर अंदाज में धर्मांतरण कर रहे हैं, उसे लेकर उनके मन की कोई बात सामने नहीं आई है। इधर छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी ऑपरेशन घर वापिसी के नाम पर अल्पसंख्यकों को ऑपरेशन से देश की मूल धारा से काटने का काम चल रहा है, और उस पर भी मोदी के मन की कोई बात सामने नहीं आई है। मनमोहन सिंह की तरह का कोई मौनी प्रधानमंत्री होता, तो उसकी चुप्पी भी नहीं खटकती। लेकिन रोज घंटों बोलने वाले प्रधानमंत्री के पास जब अपने साथियों, सहयोगियों और समविचारकों के साम्प्रदायिक और हिंसक कामों पर कहने के लिए कुछ नहीं रहता, तो देश के दूसरे आम या खास मुद्दों पर उनके कहे हुए का वजन घट जाता है। वे नशे से देश की नौजवान पीढ़ी को खतरा गिनाते हैं, और नशे की कमाई से आतंकियों के हाथ मजबूत होने का खतरा गिनाते हैं, तो देश के मन में यह एक सहज सवाल खड़ा होता है कि क्या यही देश में सबसे सुलगता हुआ खतरा है, या फिर देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तहस-नहस करने की साजिशें इससे अधिक बड़ा खतरा हैं? 
हमारे सामने नवंबर 2011 में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का कहा हुआ एक दमदार और आक्रामक भाषण है, जिसमें उन्होंने कहा था- जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसी मामले की कोई जानकारी ही नहीं है, तो वह किस मर्ज की दवा हैं? और ऐसे प्रधानमंत्री की रहबरी पर हमें मलाल है। उन्होंने कहा- मैंने लोकसभा में प्रधानमंत्री से एक शेर के जरिए सवाल किया था- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा, मुझे रहजनों (लुटेरों) से गिला नहीं, तेरी रहबरी (साथ) का सवाल है। 
दरअसल यह बयान तब सामने आया जब हम मोदी के मन की कई बार की बातों को रेडियो पर सुनने के बाद हमारे मन में उठी फिराक की लिखी इस लाईन को इंटरनेट पर ढूंढ रहे थे, कि-तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा। इसे ढूंढते-ढूंढते सुषमा स्वराज का यह बयान दिखा, और इस शेर की यह दूसरी लाईन दिखी जो कि आज मोदी पर भी लागू होती है। इधर-उधर की बहुत सारी बातें तो ठीक हैं, लेकिन आज देश का अमन-चैन जो लोग लूट रहे हैं, उनकी तरफ से मोदी की सार्वजनिक चुप्पी, और सार्वजनिक अनदेखी कुछ वैसी ही है जैसी मनमोहक-अनदेखी की सुषमा ने तीन बरस पहले संसद में खिंचाई की थी। 
प्रधानमंत्री को अपने पसंदीदा मुद्दों पर बोलने का तो पूरा हक है, उन्हें बोलना भी चाहिए, यह उनकी जिम्मेदारी भी है, लेकिन साथ-साथ उनकी यह भी जिम्मेदारी है कि वे दूसरे अधिक जलते-भभकते मुद्दों पर चुप्पी न रखें। नशा देश के लिए एक धीमा और लंबा खतरा है। लेकिन आज जो लोग देश को साम्प्रदायिकता में झोंककर नफरत से देश को बांटना चाह रहे हैं, उनके बारे में भी प्रधानमंत्री को बोलना चाहिए, उसके बिना उनके मन की मुकाबले में हल्की और कम अहमियत की बाकी बातों की विश्वसनीयता भी नहीं बनेगी। देश को आज जिस आग में झोंका जा रहा है, उसमें पेट्रोल छिड़कने से लेकर माचिस लगाने वाले लोगों तक, अपने ही साथियों के बारे में चुप रहने का अधिकार भारत के प्रधानमंत्री को नहीं दिया जा सकता। यही लोकसभा सुषमा स्वराज की प्रधानमंत्री पर कही गई बातों को दुबारा सुन सकती है, इस बार नरेन्द्र मोदी के लिए। 

म्युनिसिपल-पंचायत चुनावों से ईमानदारी शुरू होने की संभावना

13 दिसंबर 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में आज म्युनिसिपल चुनावों के लिए कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों की फेहरिस्तें आनी शुरू हो गई हैं, और कल भाजपा की अमित शाह की सभा से उसका चुनाव प्रचार शुरू हो गया है, और अपनी परंपरा के मुताबिक कांग्रेस ने भी कल राजधानी के कांग्रेस भवन में आधी रात गुटबाजी की मारपीट और गाली-गलौच से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। कल ही एक खबर यह थी कि भाजपा की एक बैठक में इस बात पर फिक्र जाहिर की गई कि पिछले 11 बरस में भाजपा ने प्रदेश में हर चुनाव में जीत तो हासिल की है, लेकिन उसके वोटों का प्रतिशत गिरा है, और कांग्रेस से वोटों का उसका फासला पिछले विधानसभा चुनाव में कुल पौन फीसदी बच गया था। अब म्युनिसिपल के चुनाव वार्ड स्तर पर होते हैं, और वहां पर पांच-दस वोटों से भी जीत-हार दर्ज होती है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी में अगर समझदारी होगी, और वह इसका इस्तेमाल करने की हालत में होगी, तो विधानसभा का पौन फीसदी का फासला पलट भी सकता है। लेकिन जिस तरह कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया जिंदा रहती है, उसी तरह भाजपा भी कांग्रेस की घरेलू आग की उम्मीद में अपने ठंडे हाथ लिए बैठी है कि सेंकने का मौका आएगा ही आएगा। 
लेकिन आज म्युनिसिपल चुनावों पर लिखने का हमारा मकसद कांग्रेस पार्टी की फिक्र करना, या भाजपा को चौकन्ना करना नहीं है। हम आज से प्रदेश के हर शहरी मतदाता का सोचना शुरू करना चाहते हैं कि वे अपने वार्ड में किस तरह के जनप्रतिनिधि चाहते हैं। शहरी मतदाताओं को जो सबसे छोटे नेता चुनने होते हैं, वे पार्षद रहते हैं, और एक ही चुनाव में ऐसे मतदाताओं को महापौर या पालिका अध्यक्ष के लिए भी वोट डालना होता है। म्युनिसिपल के चुनाव अंग्रेजों के समय से लोग देखते आ रहे हैं, और लोगों ने अच्छे और बुरे, भ्रष्ट और ईमानदार, मेहनती और निकम्मे, सभी किस्म के पालिका अध्यक्ष, महापौर, या पार्षद देखे हुए हैं। हमारी सलाह महज इतनी है कि ऐसे लोगों को चुनें, जो कि भ्रष्ट न हों। जिन लोगों ने पिछले बरसों में अपने वार्ड में या अपने म्युनिसिपल में भ्रष्टाचार किया है, या भ्रष्टाचार को बचाया है, बढ़ावा दिया है, या किसी दूसरी सार्वजनिक संस्था या कुर्सी पर रहते हुए जिन लोगों ने भ्रष्टाचार किया है, उनको या उनके घरवालों के वोट न देकर शहरी मतदाता सार्वजनिक जीवन से, और स्थानीय शासन से गंदगी दूर कर सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि म्युनिसिपल चुनाव में ईमानदारी को ही अगर पहला और सबसे बड़ा पैमाना मान लिया जाए, तो भी शायद आने वाले पांच बरस लोग अपने शहर में बेहतर काम होते देख सकते हैं। 
और पार्टियां समझौते करते हुए ऐसे लोगों को भी उम्मीदवार बना देती हैं, जो कि पहले किसी कुर्सी पर रहते हुए भ्रष्टाचार के लिए जाने जाते हैं, ऐसे उम्मीदवारों को हराकर जनता को पार्टियों को भी सबक सिखाना चाहिए। शहरी स्थानीय संस्थाओं में भ्रष्टाचार का मतलब आने वाले पांच बरस तक मुहल्ले का घूरा बन जाना, नलों से गंदा पानी आना, सड़कों का अंधेरा रहना तो होगा ही, इसके अलावा म्युनिसिपल की संपत्ति जिन जमीनों और इमारतों की शक्ल में हैं, वहां पर भी नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर सब लूट खाएंगे। इसलिए इस चुनाव में लोगों को पहला पैमाना ईमानदारी को ही रखना चाहिए। कई भ्रष्ट लोग अधिक सक्रिय दिख सकते हैं, क्योंकि उनके पास सक्रियता का खर्च उठाने के लिए बेईमानी का पैसा रहता है। कई लोग इस बार की उम्मीदवारी से परे की किसी दूसरी कुर्सी से, किसी दूसरी निर्वाचित या मनोनीत जगह से भ्रष्टाचार करके इस बार के चुनाव में उतरे हुए हो सकते हैं, लेकिन जनता को ऐसे लोगों को ठिकाने लगाना चाहिए। 
ईमानदारी सीधे विधानसभा और संसद में संभव नहीं भी हो सकती, क्योंकि ऐसे चुनावों में कई बार सारे प्रमुख उम्मीदवार भ्रष्ट होते हैं। लेकिन वार्ड के चुनाव इतने छोटे होते हैं कि कोई शरीफ, कोई ईमानदार, कोई अच्छी साख वाले लोग भी बिना किसी पार्टी टिकट के, बिना अधिक खर्च किए एक गंभीर चुनौती बन सकते हैं। और हमारा मानना है कि भले लोगों को मुहल्लों के इन चुनावों में जरूर हिस्सा लेना चाहिए, उनके जीतने की संभावना भी उनकी साख की वजह से हो सकती है, या कम से कम वे दुष्ट और भ्रष्ट लोगों की अक्ल ठिकाने ला सकते हैं। लोकतंत्र में म्युनिसिपल और पंचायत के चुनाव सबसे छोटे होते हैं, और यहीं से ईमानदारी खड़ी होने की गुंजाइश रहती है। लोगों को अपने आसपास इस मुद्दे पर चर्चा करके अपने मोहल्ले के उम्मीदवारों में से सबसे बेहतर को छांटना चाहिए, और तुरंत यह कोशिश भी करनी चाहिए कि अपने वार्ड से किसी बहुत अच्छे और ईमानदार का हौसला बढ़ाकर इस चुनाव में खड़ा भी करवाना चाहिए।

हम तो बरसों से योग की वकालत करते आ रहे थे, चलो अब सही...

12 दिसंबर 2014
संपादकीय

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को पूरी दुनिया में विश्व योग दिवस मनाने की घोषणा की है। भारत हजारों बरस से योग का उपयोग करते आ रहा है, और भारतीय जीवन शैली में पूरे देश में योग प्रचलित भी है, हम अपने अखबार में कई बार इस बात को लिखते आए हैं कि योग और कसरत जैसी जीवन शैली से बीमारियों से बचा जा सकता है, सेहत को बेहतर रखा जा सकता है, और ऐसा होने पर सरकार का भी इलाज का खर्च घटेगा। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम विचारों की इसी कॉलम में पहले कई बार इस पर लिख चुके हैं और अभी हमारे सामने 31 मार्च 2012 का संपादकीय है जिसमें हमने लिखा था-'....हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है...Ó
एक और अलग दिन हमने लिखा था-'....आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें...Ó।
भारत में योग को एक स्वस्थ जीवन शैली के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन आज अगर कोई तबका योग को धर्म से जोडऩे लगेगा, उसमें धर्म के प्रतीकों का उपयोग करने लगेगा, तो उससे इस फायदेमंद प्राचीन शैली का नुकसान होगा, और लोगों को फायदा मिलने की संभावना भी घटेगी। योग को धर्म से अलग करके, विवाद और विवादास्पद लोगों से अलग करके हर स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाने की जरूरत है। हमने तो बरसों पहले छत्तीसगढ़ सरकार से हर जिले में ऐसे केन्द्र विकसित करने की मांग की थी, और उससे हो सकने वाले फायदों को गिनाया भी था। हो सकता है कि अब प्रधानमंत्री मोदी की पहल, और संयुक्त राष्ट्र संघ के इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद छत्तीसगढ़ सरकार भी जन स्वास्थ्य में ऐसा योगदान करने के बारे में सोचेगी। राज्य सरकार की नीति में स्कूल शिक्षकों को योग सिखाने की बात तो बरसों से की जा रही है, लेकिन उस पर कोई अमल हो नहीं रहा। और हम स्कूल-कॉलेज से परे भी सभी उम्र के लोगों के लिए मुफ्त योग शिक्षा इसलिए सुझा रहे हैं क्योंकि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे सेहत के खतरे बढ़ते जाते हैं। स्कूल और कॉलेज की उम्र में तो सेहत ऐसी रहती है कि किसी को योग नहीं सूझता। और जब उसकी जरूरत रहती है तो सीखने की उम्र ढलने लगती है। छत्तीसगढ़ को एक सेहतमंद राज्य बनने के लिए बड़े पैमाने पर यह पहल करनी चाहिए, और इसके लिए न तो बिजली लगनी है, न कोई उपकरण लगने हैं, और न ही अधिक खर्च होना है। ऐसा होने पर सरकार का इलाज पर से खर्च घटते भी चले जाएगा।  

देश में इतनी साम्प्रदायिक और धार्मिक आक्रामकता ठीक नहीं

11 दिसंबर 2014
संपादकीय
भाजपा के एक सांसद साक्षी महाराज पहले भी अपने विवादास्पद बयानों से खबरों में रहे हैं, और आज उन्होंने यह कहकर घटिया बयानों का एक नया पैमाना सामने रखा है कि नाथूराम गोडसे वैसा ही देशभक्त था, जैसेे कि महात्मा गांधी थे। जिस समय वे संसद के बाहर यह बयान दे रहे थे, उस समय संसद के भीतर उन्हीं जैसे एक दूसरे भाजपा सांसद विनय कटियार यह कह रहे थे कि उमर अब्दुल्ला के पुरखे भी तो हिन्दू थे। इन पंक्तियों को लिखे जाने तक साक्षी महाराज का बयान भी खबरों में है, और उनकी सफाई भी इस पर आना शुरू हो गई है। लेकिन हम इसे एक मिसाल के तौर पर ले रहे हैं, और इस एक बयान के सही या गलत होने तक हमारी बात सीमित नहीं है।
दरअसल उत्तरप्रदेश में धर्मांतरण के कुछ ताजा मामलों के सामने आने के बाद देश का माहौल एकदम ही धार्मिक और साम्प्रदायिक उत्तेजना की खबरों से भर गया है। कल तक कौन किस धर्म में थे, और आज उनको किस धर्म में लाने के लिए कौन-कौन से तरीके जायज हैं, कौन-कौन से खर्च जायज हैं, इन बातों में संसद भी डूब गई है, और बाहर भी इसकी सरगर्मी फैली हुई है। अभी कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर, झारखंड और नई दिल्ली के चुनाव चल रहे हैं, ऐसे में मोदी सरकार की एक मंत्री ने रामजादा और हरामजादा का बखेड़ा खड़ा किया, और अब चारों तरफ इस किस्म के बयान या ऐसी हरकतें बढ़ रही हैं। 
यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजी बयानों, और उनके निजी सार्वजनिक रूख के खिलाफ है। आज जब भारत के आगे बढऩे को लेकर मोदी सरकार और दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी बेहतर संभावनाओं की बात कर रहे हैं, तो धार्मिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर इतनी अधिक आक्रामकता का सैलाब ठीक नहीं है। आज पूरे देश में चुनाव नहीं हो रहे हैं, और ऐसे में किसी तरह के धार्मिक ध्रुवीकरण की जरूरत भी नहीं है। लेकिन अगर भाजपा अपने मंत्रियों, अपने सांसदों, और अपने नेताओं को ऐसे हमलावर तेवरों के साथ बयान देने से नहीं रोकेगी, तो इससे देश में जो एक अनावश्यक तनाव खड़ा होगा, वह देश की उत्पादकता, देश की आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा असर डाले बिना नहीं रहेगा। 
नरेन्द्र मोदी एक प्रधानमंत्री के रूप में, और भाजपा एक पार्टी के रूप में सीधे ऐसी आक्रामकता से निजी तौर पर तो बच रहे हैं, लेकिन उन्हीं के हिस्सेदार अपने निजी स्तर पर एक अभूतपूर्व आक्रामकता को दिखा रहे हैं, और यह बात देश की एकता के लिए तो घातक है ही, खुद नरेन्द्र मोदी की संभावनाओं के लिए घातक है। देश के आम चुनावों के मार्फत वे जब प्रधानमंत्री बन गए, और जब ऐसे ऐतिहासिक बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए, तो उनके सामने अपने आपके कद को और बड़ा साबित करने की एक बड़ी संभावना है, और उनके साथियों की ऐसी हरकतों से वे संभावनाएं घट रही हैं। आज भी देश में सोचने-विचारने वाला तबका यह सोच रहा है कि नरेन्द्र मोदी जिस दरियादिली की बातें अपने भाषणों में करते हैं, उससे ठीक उल्टा चलने वाले अपने साथियों को वे क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? संसद के भीतर उनको अपनी साध्वी-मंत्री के आपराधिक बयान पर अफसोस जाहिर करना पड़ा, और उसके बाद अब उनके दूसरे सांसद मानो उससे भी अधिक आक्रामक, और विविधता वाले बयान देकर अपनी हमलावर मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। 
हमारा यह मानना है कि भारत की जनता के बहुमत का मिजाज ऐसा हमलावर नहीं है, और न ही ऐसी आक्रामकता को बर्दाश्त करने का है। ऐसी बातों को बर्दाश्त करने या बढ़ावा देने वाली पार्टी का नुकसान होगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी चाहिए कि महात्मा गांधी से गोडसे की तुलना करने वाले इस बयान पर वे कार्रवाई करें, इसके पहले साध्वी-मंत्री का बयान भी पार्टी की तरफ से कार्रवाई के लायक था। देश भर में अगर एक तनाव खड़ा होगा, तो उससे देश के संघीय ढांचे पर भी जोर पड़ेगा, और मोदी सरकार की तमाम आर्थिक अटकलों को भी नुकसान पहुंचेगा। 

हादसों के बाद हड़बड़ाकर जागने के बजाय सरकारें

10 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में हुए बलात्कार के एक मामले के बाद यह मांग तेजी से उठी कि जिस अमरीकी इंटरनेट टैक्सी-बुकिंग कंपनी, उबर, के टैक्सी ड्राइवर ने यह बलात्कार किया उस कंपनी पर रोक लगा दी जाए। आन्ध्र सहित कुछ दूसरी जगहों से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि राज्य सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। इस पर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान दिया कि उबर कंपनी पर दिल्ली में पाबंदी लगा दी गई है। साथ ही केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को यह निर्देश जारी किया है कि उन सभी कैब सर्विसेज पर पाबंदी लगाए जिनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज हैं या जिनके पास लाइसेंस नहीं हैं। लेकिन दूसरी तरफ इसी सरकार के शहरी विकास और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि अगर रेलगाड़ी में बलात्कार होगा तो क्या रेलगाड़ी बंद कर दी जाएगी? हम नितिन गडकरी की बात से अधिक सहमत हैं, क्योंकि अपनी खुद की खामियों पर नजर डालने के बजाय दूसरों पर रोक लगाने का मिजाज सरकार में अधिक होता है। 
दरअसल चुनावों की दहशत में जीती हुई सरकारें किसी हादसे या मामले के बाद जिस तरह का बर्ताव आपाधापी में दिखाती हैं, उसके लिए अंग्रेजी में एक शब्द है, नी जर्क रिएक्शन। मतलब यह कि घुटने पर अचानक चोट लगी तो बदन ऐसा बर्ताव कर बैठा जिस पर कि उसका खुद का कोई काबू नहीं रह जाता। और यह बात महज सरकार तक सीमित नहीं है, पिछले दिनों मीडिया का बर्ताव भी लगातार इसी तरह का होते चल रहा है कि कोई मामला सामने आता है तो बिना उसकी जांच-पड़ताल किए, बिना खबरों के बुनियादी पैमानों पर उसे कसे हुए, सिर्फ कैमरे और माइक्रोफोन से एक ब्रेकिंग न्यूज बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टूट पड़ता है। खबर की पहली खबर मीडिया के घुटनों पर चोट की तरह पड़ती है, और फिर मीडिया का तन-मन मानो बेकाबू हो जाता है। अखबार चूंकि हर घंटे नहीं छपते, इसलिए उनके पास सम्हलने का थोड़ा वक्त होता है। 
रोहतक में कॉलेज छात्रा दो बहनों ने एक बस में एक लड़के को बुरी तरह पीटा, और उसका वीडियो हाथ लगते ही देश भर के टीवी चैनल उसे परोसने में जुट गए। मीडिया के जिन लोगों की पहुंच रोहतक तक थी, बस वालों तक थी, उन्होंने भी इसकी जांच-पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई। नतीजा यह हुआ कि दो दिन बाद जब एक दूसरा वीडियो सामने आया, और आधा दर्जन लोगों के बयान सामने आए कि ये बहनें आदतन मारपीट करने वाली हैं, कुछ लोगों की ऐसी शिकायतें भी आईं कि इन्होंने झूठी रिपोर्ट लिखाकर रकम वसूली की, तब जाकर मीडिया को समझ आया कि खबर की जांच-पड़ताल की बुनियादी शर्त को उसने अलग रख दिया था। और फिर मीडिया में इस मामले की पहली खबर के आने से मानो हरियाणा सरकार के पहली बार मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर के घुटनों पर चोट पड़ी, और उनके तन-मन में बिलबिलाते हुए यह घोषणा कर दी कि इन बहनों का राज्य सरकार सम्मान करेगी, बाद में इस घोषणा को स्थगित किया गया। 
हम फिर से दिल्ली की टैक्सी सेवाओं पर लौटें, तो बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है पूरे देश की है और सिर्फ टैक्सियों की नहीं है, स्कूल बसों की भी है, और लड़कियों, बच्चों और महिलाओं की तरह के जो नाजुक तबके हैं, उनके आसपास काम करने वाले और लोगों की भी है। आज एक अमरीकी कंपनी के मार्फत बुक की गई टैक्सी में बलात्कार होने से उस कंपनी को भारत में बंद कर देने की बात उठ रही है। लेकिन हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि एक फीसदी टैक्सियां भी टैक्सी रजिस्ट्रेशन वाली नहीं है, और जब वे टैक्सी के रूप में दर्ज ही नहीं हैं, तो उनके मालक-चालक के बारे में पुलिस क्या पता लगाएगी? शायद ही किसी स्कूल बस के ड्राइवर-कंडक्टर की पुलिस जांच होती होगी। और दिल्ली में तो इस टैक्सी ड्राइवर की पुलिस जांच में भी उसे साफ-सुथरे चाल-चलन का सर्टिफिकेट दिया गया था। सरकार को, और न सिर्फ केन्द्र सरकार या दिल्ली सरकार को, बल्कि छत्तीसगढ़ जैसी सरकारों को भी सुरक्षा के अपने ढांचे खड़े करने चाहिए, और उन पर कड़ाई से अमल करना चाहिए। आज न ढांचे हैं, न अमल है, और न कड़ाई है। इसी का नतीजा है कि चारों तरफ सरकारी ढांचा चरमरा रहा है, देश भर में जगह-जगह ऐसे जुर्म हो रहे हैं जिनको कि एक सुरक्षा-ढांचा रहने पर रोक लिया जाना चाहिए था। लेकिन बचाव के ढांचे पर मेहनत लगती है, जुर्म हो जाने के बाद उस पर कार्रवाई कम मेहनत की होती है। 
दिल्ली की घटना से सबक लेते हुए हर राज्य सरकार को यह चाहिए कि वह ऐसी हिफाजत के लिए हर सावधानी का इंतजाम करे, जिसके न होने से दिल्ली में यह जुर्म हो पाया। एक दूसरी बात यह भी है कि सरकार के ढांचे में अगर एक हिस्सा कमजोर रहता है, और वह जुर्म की इजाजत देता है, तो सरकार के ढांचे के दूसरे हिस्सों में भी  ऐसे मुजरिम हाथ-पैर फैलाते हैं। आज जो बलात्कार कर सकते हैं, वे कल लूट सकते हैं, और उसके बाद वे नशे की तस्करी कर सकते हैं। जुर्म से हिचक और झिझक जब एक बार कम हो जाती है, तो फिर वह इसी तरह की बातों को बढ़ावा देती है। इसलिए सरकार को हादसों के बाद हड़बडिय़ा-प्रतिक्रिया के बजाय एक जिम्मेदार ढांचे के रूप में अपने आपको सुधारना चाहिए। 

लाशों के बीच जनमुद्दों और साहित्य पर चर्चा हो या नहीं?

विशेष संपादकीय
9 दिसंबर 2014
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ में सरकार इस बरस से पहली बार एक साहित्य महोत्सव शुरू कर रही है। देश में जगह-जगह साहित्या महोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ है, और उनमें से अधिकतर अंगे्रजी जुबान के अधिक हिस्से वाले होते हैं। उनमें से जयपुर का गैरसरकारी समारोह पिछले बरस आशीष नंदी जैसे विख्यात और सम्मानीय समाजशास्त्री के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर खबरों में आया था, और एक दूसरा गैरसरकारी तहलका साहित्य समारोह गोवा में इसके आयोजक, अखबारनवीस तरूण तेजपाल पर लगे बलात्कार के आरोपों की वजह से महीनों तक खबरों में रहा। और फिर मानो विवाद से प्रचार पाने के लिए, टाईम्स ऑफ इंडिया ने अपने साहित्य समारोह में तरूण तेजपाल को बोलने के लिए न्यौता भेजकर ढेर सा प्रचार मुफ्त में पा लिया। 
अब साहित्य, कला, और वैचारिक लेखन ऐसे तो होते नहीं कि उन्हें लेकर मतभेद न हों और विवाद न हों। देश के इतिहास लेखन से लेकर वर्तमान लेखन तक, भविष्य लेखन से लेकर रचनात्मक साहित्य तक देश में वामपंथी या समाजवादी सोच के लोगों की भरमार हमेशा से रही है। और आज देश में भाजपा और मोदी सरकार के आने के बाद से दक्षिणपंथी सोच के, हिंदूवादी लेखकों और इतिहासकारों का एक नया सैलाब ऊंचाई तक लहरा रहा है। ऐसे में एक साहित्य समारोह, और खासकर तब जबकि वह सरकार का आयोजित किया जा रहा हो, और खासकर तब जबकि वह भारत के मध्य हिस्से की सबसे बड़ी जुबान हिंदी में हो, तब उसे लेकर उत्सुकता तो रहनी ही है, और उसे लेकर विवाद के खतरे भी होने ही थे। लेकिन अगर विवाद महज विवाद के मकसद से न हो, तो वह बुरा भी नहीं होता, वह वाद को यह मौका भी देता है कि वह अपनी बात को दुहरा सके।
छत्तीसगढ़ में विपक्षी दल कांगे्रस पार्टी ने यह एक बहुत सही मुद्दा उठाया है कि जब प्रदेश में नसबंदी ऑपरेशनों में मौतें दर्जन से दर्जनों की तरफ बढ़ रही हैं, जब बस्तर के नक्सल मोर्चे पर दर्जन भर से अधिक शहादतें अभी-अभी हुई हैं, और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में हैं, तब देश भर से दर्जनों साहित्यकारों और दर्जनों लेखकों को बुलाकर रायपुर साहित्य महोत्सव किया जाना चाहिए, या नहीं? कांगे्रस ने विपक्ष की अपनी जिम्मेदारी के तहत दोनों मुद्दे ऐसे उठाए हैं जिन्हें लेकर छत्तीसगढ़ विचलित चल रहा है, और सरकार सवालों के घेरे में है। अब सवाल उठता है कि इस साहित्य समारोह का बहिष्कार का, जिसके लिए प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष ने प्रमुख साहित्यकारों से फोन पर यह अपील की है कि वे इस समारोह का बहिष्कार करें। 
हम कांगे्रस के उठाए मुद्दों से सहमत हैं, लेकिन हम बहिष्कार से सहमत नहीं हैं। पिछले बरसों में हमारे पाठकों को यह याद होगा कि किसी भी पार्टी की सरकार रहे हमने विधानसभा और संसद, दोनों के बहिष्कार के खिलाफ लगातार लिखा है। इस बात पर हमारा एक मजबूत भरोसा है कि लोकतंत्र के भीतर विचार-विमर्श के, बहस और वाद-विवाद के किसी भी मौके को खोना नहीं चाहिए। क्योंकि यह लोकतंत्र ही तो है जो कि लोगों को असहमति सामने रखने का मौका देता है। और कोई भी बहिष्कार ऐसे मौके को खोने से कम कुछ नहीं होता। जब भी विधानसभा या संसद में विपक्ष सवाल उठाने या बहस करने के बजाय मौके को खोता है, तो वह देश या प्रदेश की जनता के हक की अनदेखी भी करता है। 
हम साहित्य या विचार के किसी भी ऐसे आयोजन को लेकर यह मानते हैं कि यह विचारधाराओं और राजनीतिक दर्शन की विविधता के मौके लेकर आते हैं, और उनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हम कांगे्रस के विरोध की एक बात से और असहमत हैं कि यह एक जश्न है। वैचारिक आयोजन लाशों के बीच भी जश्न नहीं कहे जा सकते, बल्कि वे सामाजिक विसंगतियों और हथियारबंद हिंसा के खिलाफ एक राजनीतिक चेतना खड़ी करने का मौका हो सकते हैं। इस साहित्य समारोह के नामों पर एक नजर डालें, तो इसमें बहुत सी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग पहुंच रहे हैं, और यह सरकार भाजपा की होने के बावजूद गजानन माधव मुक्तिबोध को सबसे अधिक महत्व देते दिख रही है जो कि पूरी जिंदगी न सिर्फ वामपंथी रहे, बल्कि जिनका सारा लेखन भाजपा और संघ परिवार की विचारधारा से असहमति का रहा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले ग्यारह बरसों के अपने राज में जिस तरह मुक्तिबोध के सम्मान को सरकारी और सार्वजनिक स्तर पर बढ़ाया है, वैसा देश के किसी भी दूसरे राज्य में किसी वामपंथी लेखक के साथ शायद ही हुआ हो। और साहित्य समारोह का यह मौका छत्तीसगढ़ सरकार के कामकाज से लेकर देश की अलग-अलग विचारधाराओं से असहमति को भी सामने रखने का रहेगा, और लोगों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए। 
हम शास्त्रीय कलाओं और शास्त्रीय साहित्य को जनसरोकारों से बिल्कुल ही कटा हुआ, और आभिजात्य तबके के ही काम का मानते हैं। ऐसे में उससे परे अगर जनसाहित्य, जनमुद्दों, जनकला, और जनसरोकारों पर कोई चर्चा हो रही है, होने जा रही है, तो वह जनता के काम की भी रहेगी। जहां तक सरकारी फिजूलखर्ची का सवाल है, तो जनता की नजरों में आए बिना भी सरकार की फिजूलखर्ची रात-दिन जारी रहती है। और अगर ऐसे में बिना किसी सरकारी नियंत्रण के, महज एक सरकारी मंच पर देश भर के लोग जुटते हैं, और प्रदेश के लोगों को इसमें भागीदारी मिलती है, तो हम इसे एक बेहतर और सार्थक फिजूलखर्ची मान सकते हैं। कुल मिलाकर हम इस आयोजन के बहिष्कार के बजाय इस आयोजन में अपनी-अपनी विचारधारा के मुद्दे उठाने की सलाह देंगे। कांगे्रस भी ऐसे बहुत से लेखक और रचनाकार पा सकती है जो कि उसकी विचारधारा से सहमति रखने वाले हों। बहिष्कार न संसद का होना चाहिए, न विधानसभा का, न म्युनिसिपल कौंसिल का, और न ही साहित्य समारोह का। इस पर होने वाला खर्च सत्तारूढ़ भाजपा की जेब से नहीं जा रहा है, यह प्रदेश की जनता का पैसा है। और विपक्षी दल कांगे्रस को इस मौके को आयोजन के पहले, आयोजन के बाहर रहते हुए, इसे अपनी सोच से प्रभावित करने की तरकीबें सोचनी चाहिए।