दीवारों पर लिक्खा है, 5 जनवरी

महाराष्ट्र में हक के लिए लड़ते दलितों से उठ रहे और बहुत से जलते मुद्दे

संपादकीय
5 जनवरी 2018


महाराष्ट्र में दलितों और गैरदलितों के बीच का टकराव सड़कों पर जारी है, और दलित तबके की बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनके पास खोने को अधिक कुछ नहीं है, और ऐसे ही लोग सड़कों पर संघर्ष कर पाते हैं। उनके एक ऐतिहासिक सालाना जलसे का विरोध करने वाले सवर्ण हिन्दुओं ने अभी सोशल मीडिया पर सवर्ण-दलित संघर्ष और उसके ऐतिहासिक कारणों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ऐसी सारी समकालीन बहस लोगों के राजनीतिक-शिक्षण का एक बड़ा तरीका भी रहती है, और इसलिए बिना हिंसा इंटरनेट पर चल रहा यह संघर्ष उन लोगों को भारत के वंचित तबके के ऐतिहासिक कारणों की जानकारी भी दे रहा है।
लोगों को एक सवर्ण-ब्राम्हणवादी व्यवस्था के बारे में यह याद करने, और याद दिलाने का मौका भी मिल रहा है कि हिन्दू धर्म के भीतर गिने जाने वाले दलित और आदिवासी किस तरह हिन्दू समाज व्यवस्था से धीरे-धीरे बाहर कर दिए गए, या बाहर हो गए। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह याद दिलाया है कि मुस्लिमों में एक धार्मिक दान के रास्ते समाज के गरीब लोगों की मदद करने की परंपरा है। ईसाईयों में भी चर्च का पैसा दूर-दूर तक जाता है, और गरीबों की मदद करता है। लेकिन हिन्दू धर्म का पैसा शंकराचार्यों के डेरों पर, और बड़े-बड़े मशहूर मंदिरों के खजानों में कैद रहता है। वह ट्रस्टियों के हाथ लुटता है, गबन में खत्म होता है, लेकिन वह अपने समाज के गिने जाने वाले सबसे गरीब दलितों और आदिवासियों के काम नहीं आता। अभी लोगों ने यह भी याद दिलाया है कि ईसाईयों पर यह तोहमत लगती है कि उन्होंने हिन्दुस्तान आकर कुछ चावल देकर, कुछ दवाएं देकर गरीब आदिवासियों का धर्मांतरण कर दिया। यह वही दौर था जब भारत के सवर्ण हिन्दू मंदिर और मठ दौलत से लबालब थे, लेकिन इस देश में होती भुखमरी को मिटाने में उनका कोई हाथ नहीं था। मठ-मंदिरों का पैसा न अस्पतालों में काम आता, और न ही दलित-आदिवासियों की किसी और जरूरत में। अब लोगों ने यह सवाल उठाया है कि अगर मंदिरों की खरबों की दौलत अपने ही समाज के दलितों को भूख से बचाने में काम नहीं आई, तो ऐसे धर्म को दूसरे धर्म को क्यों कोसना चाहिए कि उन्होंने गरीब दलित-आदिवासियों को पढ़ाई देकर, इलाज देकर, रोजगार देकर, और शायद खाना देकर अपने धर्म में मिला लिया?
दलितों और सवर्णों के इस संघर्ष में देश के लोगों का बड़ा अच्छा सामाजिक शिक्षण हो रहा है। हिन्दू समाज के भीतर दलितों का जो शोषण हजारों बरस से चले आ रहा है, मनुवादी व्यवस्था में, वेद और पुराण में, मठों और मंदिरों में दलितों की जगह कहीं नहीं रखी गई, और अब उनके चर्च या मस्जिद जाने पर, बौद्ध मठ पहुंच जाने पर एक मलाल किया जा रहा है। यह मलाल ऐसे समाज के किसी काम का नहीं है जो शूद्रों को समाज के बदन में पैरों की जगह पर रखता है, शायद पैरों के भी तले। और जिन पैरों पर बाकी बदन का बोझ पड़ता है, उन्हीं पैरों को सबसे घटिया मानने की समाज व्यवस्था को इन पैरों के किसी चर्च या मस्जिद या बुद्ध प्रतिमा तक चले जाने पर क्यों रोना चाहिए? और आज हिन्दू समाज के जिस सवर्ण हिस्से को दलितों से शिकायत है, आदिवासियों से शिकायत है, दूसरे धर्मों के लोगों से शिकायत है, उन्हें न अपनी ऐतिहासिक हैवानियत से शिकायत है, न उन्हें अपनी आज की हिंसा से शिकायत है, और न उन्हें कल भी जारी रहने वाली हिकारत से कोई शिकायत है।
भारत में दलित चेतना, आदिवासी चेतना के मुकाबले जल्दी आई, अधिक संगठित रही, उसके तेवर अधिक लड़ाकू रहे, और उसने एक दूसरे धर्म में जाने का हौसला दिखाया। इसलिए महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में दलित उन सवर्ण हिन्दुओं को सड़कों पर भी जमकर टक्कर देने की हालत में रहते हैं जिनकी सोच अब भी दलितों को कुचलने की है। अंग्रेजों के वक्त दलितों ने अंग्रेजी सेना का हिस्सा रहते हुए उस पेशवाई राज को शिकस्त दी थी जो उन्हें महज कुचलते ही आया था। अंग्रेजों के आने के सदियों पहले से चला आ रहा यह शोषण अंग्रेजी राज से वफादारी से परे की बात था। उस शोषण के खिलाफ जीत का जश्न मनाने से आज दो सौ बरस बाद जाकर जब दलितों को रोका जा रहा है, तो दलित तमाम सामाजिक बेइंसाफी के मुद्दे भी उठा रहे हैं। कुछ सड़कों पर, कुछ पटरियों पर, कुछ समय के लिए आवाजाही का नुकसान होगा, लेकिन इसी बहाने देश में एक सामाजिक चेतना का मौका भी आया है। दूसरी बात यह कि अभी तक देश के दलित, या अल्पसंख्यक लोगों के आंदोलनों से देश के आदिवासी उस संगठित तरीके से जुट नहीं पाए हैं, मिल नहीं पाए हैं। आज दलितों को फिर से कुचलने पर आमादा लोग इस एक खतरे की आशंका को अनदेखा कर रहे हैं कि कल के दिन आदिवासी भी अगर ऐसी सवर्ण-हिन्दू मानसिकता के खिलाफ उठ खड़े होंगे, तो क्या होगा?
अगर हम उस बात पर लौटें जिससे कि आज की चर्चा शुरू की थी, तो हिन्दू मठ-मंदिरों की अथाह दौलत उन सबसे गरीब दलित-आदिवासियों के किस काम आ रही है, जिनकी गिनती हिन्दू समाज की गिनती बढ़ाने के लिए हिन्दुओं में की जाती है, और गिनती के बाद उनको लात मारी जाती है, उनकी बहन-बेटियों को सवर्णों की संपत्ति मान लिया जाता है। आने वाला वक्त एक अधिक बड़े सामाजिक टकराव का होगा, अगर सवर्ण तबका, उसके सामाजिक संगठन, उसके राजनीतिक आका, अपनी सदियों पुरानी सामंती सोच से बाहर नहीं निकल पाएंगे। हम किसी हिंसा को टालने की हर कोशिश की वकालत करते हैं, और साथ-साथ भारत की सामाजिक चेतना के जागने की उम्मीद भी करते हैं।  (Daily Chhattisgarh)

तीन तलाक कानून जरूरी, लेकिन हड़बड़ी गैरजरूरी

संपादकीय
4 जनवरी 2018


तीन तलाक पर संसद में गर्मी बनी हुई है, और केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के कुछ साथी दल भी इस कानून को तुरंत बनाने से असहमत हैं। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले कई दूसरे राज्य भी इस कानून में प्रस्तावित सजा को लेकर असहमत हैं, और इस पर सीधे मतदान के बजाय अधिक चर्चा की मांग कर रहे हैं। हमने दो-तीन दिन पहले ही इसी जगह इस कानून का समर्थन किया था कि मुस्लिम महिलाओं को बेहतर जायज हक दिलवाने के लिए यह एक अच्छा कदम है, और ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए। लेकिन उसका यह मतलब नहीं था कि इस कानून को रातों-रात बनाया जाए, या कि इस पर पर्याप्त चर्चा न की जाए। जब कभी ऐसे व्यापक महत्व का कानून बनता है, तो उस पर संसद में एक लंबी चर्चा होनी चाहिए, या कि कम से कम संसद की एक समिति उस पर अधिक खुलासे से बात करके अपनी रिपोर्ट पूरी संसद के सामने रखे, तभी उस पर कानून बनाने मतदान होना चाहिए। जब ऐसा नहीं होता है तो क्या होता है यह हमने जीएसटी के मामले में देखा है कि बहुमत से उसे लागू तो कर दिया गया, लेकिन उसके बाद से अब तक आधे बरस में ही शायद हजार फेरबदल उसमें हो गए हों। इसलिए तीन तलाक जैसे एक सामाजिक मामले में कानून की जरूरत तो है, लेकिन हड़बड़ी की जरूरत बिल्कुल नहीं है।
हमने पहले सूचना तकनीक कानून को लेकर भी यह बात लिखी थी कि संसद हंगामे में डूबी थी, और आईटी एक्ट बन गया था। सांसदों ने उसकी बारीकियों को देखा भी नहीं था, और बाद में सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर उसकी कई धाराओं को गलत करार देना पड़ा था। एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर किसी भी कानून को रातों-रात बनाने का काम समझदारी नहीं है। मुस्लिम महिला के अधिकार के लिए ऐसा करना ठीक है, लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि कई दशक से संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण की बात ही चल रही है, और उसका कानून नहीं बनाया जा रहा। संसद के भीतर और बाहर बयानबाजी के वक्त देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियां इसकी हिमायती बनकर दिखाती हैं, लेकिन जब संसद के भीतर मतदान से इसे कानून बनाने की बात आती है, तो दोनों ही पार्टियां अपने सहयोगी दलों की असहमति की आड़ लेकर इससे कतराती हैं।
मुस्लिम महिला को तीन तलाक की बेरहमी से बचाने के लिए खुलकर चर्चा होनी चाहिए। भारत के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि जब संविधान सभा की बैठकें होती थीं, तो नेहरू और अंबेडकर जैसे लोग वहां बहस करते थे, और पूरी देश से आए हुए अलग-अलग इलाकों और तबकों के लोग अपनी सोच दर्ज कराते थे। आज भी संविधान सभा की बहस की किताबों को देखें तो लगता है कि देश का संविधान बनाने में कितनी मेहनत की गई थी। आज अगर उसमें कोई फेरबदल होना है, उसमें कोई बात जोड़ी जानी है, तो उसके लिए संसदीय बाहुबल को काफी नहीं मान लेना चाहिए। उसके लिए खुले दिल से चर्चा करनी चाहिए, सभी पक्षों को अपनी बात दर्ज कराने देना चाहिए क्योंकि ऐसे बड़े कानून बनना भी इतिहास का एक हिस्सा होते हैं, और इतिहास को गढऩा बहुत हड़बड़ी का काम नहीं होना चाहिए, नहीं हो सकता। हमें उम्मीद है कि संसद में सरकार चाहे विपक्षी ताकत के आगे झुककर ही इस विधेयक पर अधिक लंबी चर्चा के लिए तैयार होगी, और ऐसी सरकारी बेबसी ही भारतीय लोकतंत्र की खूबी भी है। यह कानून बने, लेकिन खूब ठोक-बजाकर बने, ऐसा न हो जाए कि तलाक देने वाले को ऐसी कैद हो जाए कि तलाक पाने वाली महिला भूखों मर जाए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 जनवरी

दलितों को दो सौ बरस पहले पेशवाओं से बेहतर लगते अंग्रेज

संपादकीय
3 जनवरी 2018


महाराष्ट्र में दो दिनों से एक बिल्कुल ही गैरजरूरी सामाजिक-जातिवादी तनाव खड़ा किया गया है। वहां दलित समुदाय पिछले दो सौ बरस से एक विजय स्तंभ पर इकट्ठा होते आया है जो कि अंग्रेज फौज की पेशवा फौज पर जीत की याद में बनाया गया था। वहां दलितों की एक महार रेजीमेंट अंग्रेज फौज में थी, और उसकी जीत की खुशी में अब तक महाराष्ट्र का दलित समाज सालाना जलसा करता है। जैसा कि कल महाराष्ट्र के एक सबसे बड़े नेता शरद पवार ने कहा, इन दो सौ बरसों में अब तक कभी भी महाराष्ट्र में इसे लेकर दलितों का विरोध नहीं हुआ था, लेकिन कल इस जलसे के वक्त गैरदलित, शायद ऊंची कही जाने वाली जातियों ने इसका विरोध किया और सड़कों पर हिंसक टकराव शुरू हुआ जो कि आज भी जारी है।
जिन लोगों को आज अंग्रेजों की जीत का जलसा बुरा लग रहा है, उन्हें दो सौ बरस पहले की वह सामाजिक हकीकत समझना जरूरी है जिसके चलते पेशवाओं के पुणे में सुबह और शाम के वक्त दलितों को शहर में घुसने पर मनाही थी क्योंकि उगते या डूबते सूरज से छाया इतनी लंबी बनती है कि दलित की छाया ऊंची कही जाने वाली किसी जाति पर भी पड़ सकती है। ऐसी बहुत सी रोक उस वक्त इस शोषित और दलित समाज पर लागू थीं। इनमें से एक यह भी थी कि दलित को अपने पीछे एक झाड़ू टांगकर चलना होता था, ताकि उसके पांव के निशान सड़क पर से मिटते चलें। देश में जगह-जगह दलितों के साथ ऐसा भेदभाव आज भी जारी है, लेकिन दो सौ बरस पहले जब दलितों को अंग्रेजों के घर में भीतर तक आने-जाने की बराबरी मिली, अंग्रेजों को उनके हाथ का पानी पीने से परहेज नहीं रहा, तो उन दलितों को उन अंग्रेजों ने एक सामाजिक इंसाफ की संभावना दिखी।
जिन लोगों को आज अंग्रेजी राज की कोई भी याद तकलीफ दे रही है, हिन्दुस्तान का इतिहास गवाह है कि ऐसे बहुत से बड़े-बड़े हिन्दू नेता और वीर थे जो कि अंग्रेज साहब से लिखित माफी मांगकर, उस सरकार का काम करने का वायदा करके जेल से छूटकर आए थे। ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं थी जिन्हें अंग्रेज सरकार इस देश के स्वतंत्रता सेनानियों के मुकाबले बेहतर लगती थी, और ऐसा लगने वालों में बड़ी संख्या अपने आपको ऊंची जात कहने वालों की थी। ऐसे में आज इतिहास के एक पन्ने को लेकर दलितों की सामाजिक गरिमा के खिलाफ हिंसक हमला करना इस देश को तोडऩे का एक काम है, और बैठे-ठाले महाराष्ट्र को एक सामाजिक तनाव और हिंसा में झोंक दिया जा रहा है। पहली खबरें बताती हैं कि इस दलित जलसे का विरोध भगवा झंडाधारी उन हिन्दू संगठनों ने किया था जो कि दलित विरोधी हैं। और पिछले कुछ ताजा बरसों को देखें तो देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों के खिलाफ ऐसी और भी हिंसा हुई है जिसे लेकर देश के बाकी हिस्से के बाकी दलित भी बहुत ही विचलित हैं।
भारत में अपने आपको हिन्दू समाज का ठेकेदार साबित करने पर उतारू लोग वे हैं जो कि अपनी आबादी की गिनती गिनने के लिए तो दलितों और आदिवासियों को हिन्दू में गिनते हैं, लेकिन फिर हिन्दू बिरादरी के भीतर दलितों को गैरइंसान मानते हुए उन्हें अपने जूतों तले कुचलना चाहते हैं, जो कि आदिवासियों को अपनी धर्मकथाओं में बंदरों का दर्जा देते हैं। ऐसे हिन्दू संगठनों को यह समझना होगा कि वे एक व्यापक हिन्दू समाज को तोडऩे के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं क्योंकि अपनी गिनती बढ़ाने के लिए सवर्ण कहे जाने वाले हिन्दुओं को तो दलित-आदिवासी की जरूरत है, दलितों को और आदिवासियों को न तो हिन्दू धर्म की जरूरत है, और न ही उनके रीति-रिवाजों की। महाराष्ट्र जैसे जागरूक प्रदेश में दलित वैसे भी बड़ी संख्या में बौद्ध हो चुके हैं, और हिन्दू धर्म का तिरस्कार कर चुके हैं। पूरे देश में जगह-जगह आदिवासियों ने भी ईसाई बनकर हिन्दू धर्म के भीतर अपने लिए हिकारत का जवाब दिया है। दक्षिण में कुछ जगहों पर दलितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम भी अपनाया है।
आज अगर हिन्दू धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियां अपने सहयोगी दलों को झंडे-डंडे लेकर इस तरह की हिंसा से नहीं रोकती हैं, तो आने वाले बरसों में उनकी हिन्दू राजनीति में लोगों की गिनती घटते चले जाना तय है। फिलहाल महाराष्ट्र में इस निहायत गैरजरूरी हिंसा से एक सामाजिक मुद्दा उभरकर सामने आया है कि एक वक्त ऐसा था जब इस देश में दलितों को पेशवाओं के मुकाबले अंग्रेज बेहतर लगे थे, क्योंकि वे उन्हें इंसान तो मानते थे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 2 जनवरी

ट्रंप ने एक अच्छा फैसला भी लिया, पाक को मदद रोकी...

संपादकीय
2 जनवरी 2018


परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कई बार बड़ी कड़ी या खरी-खरी बात कहना मुमकिन नहीं होता है, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अलग किस्म के मुखिया हैं, और वे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के अंदाज में भी बहुत सी बातें कहते हैं। कल उन्होंने पाकिस्तान के बारे में यह ट्वीट किया कि इस देश को लगातार बेहिसाब अमरीकी मदद बेवकूफी का काम था क्योंकि यह लगातार आतंकियों की पनाहगार बना हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने आज एक बड़ी मदद को रोक भी दिया है। पाकिस्तान ने इस पर एतराज जताते हुए कहा है कि उसने अलकायदा जैसे आतंकी संगठन को खत्म करने में इतने बरस लगातार अमरीका की मदद की, खुफिया जानकारी मुहैया कराई, अपने देश में फौजी अड्डों का इस्तेमाल करने दिया, और इसके एवज में पाकिस्तान को अमरीका से महज तोहमत और शक हासिल हुए हैं। भारत में भाजपा के कुछ नेताओं ने तुरंत ही इसे मोदी की कूटनीतिक जीत करार देते हुए खुशी मनाई है।
ट्रंप के काम करने का अपना एक अलग और अपारंपरिक अंदाज है, जो कि पाकिस्तान के खिलाफ इस बार तो कारगर होते दिख रहा है। पाकिस्तान की जमीन से जिस अंदाज में भारत पर आतंकी हमले होते रहे हैं, उससे न सिर्फ अमरीका, बल्कि बहुत से और पश्चिमी देश भी फिक्रमंद रहे हैं। जिस तरह से मुंबई पर हमला हुआ था, वह शायद न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर ओसामा-बिन-लादेन के विमानों के हमले के बाद का सबसे बड़ा हमला था, और उसकी जड़़ें पाकिस्तान तक पकड़ा भी गई थीं। अमरीका की अपनी मजबूरी है कि उसे पाकिस्तान को अपना एक फौजी अड्डा बनाकर चलना पड़ता है क्योंकि उसके बगल में अफगानिस्तान में वह जिन ताकतों से लड़ाई लड़ रहा है, उसके लिए पाकिस्तान की जमीन और उसकी हिस्सेदारी जरूरी है। फिर यह पाकिस्तान ही है जो कि अपनी जमीन पर अपनी मर्जी के बिना, अपनी मर्जी के खिलाफ अमरीकी हमलों को बर्दाश्त करता है। पाकिस्तान को अमरीका का सहयोग इस बर्दाश्त की कीमत भी है। फिर इसके दो पहलू और हैं, एक तो यह कि हिन्द महासागर के इस क्षेत्र में अमरीका को अपने लिए अगर एक फौजी अड्डा चाहिए, तो वह पाकिस्तान के अलावा और किसी देश में हासिल नहीं हो सकता। वह चीन के खिलाफ भी उसकी सरहद से लगे किसी देश में ऐसी जगह चाहता है, और उसका भुगतान भी अमरीकी मदद की शक्ल में होता है।
लेकिन पाकिस्तान में एक के बाद दूसरी भ्रष्ट सरकारें वहां की आमतौर पर भ्रष्ट और बेकाबू साबित होती हुई फौज मिलकर अमरीकी मदद का बेजा इस्तेमाल करते आई हैं, और ऐसे में अमरीका का यह फौजी-पूंजीनिवेश उसे गटर में जाते दिख रहा है, तो इसमें बड़ी हैरानी नहीं है। पाकिस्तान के साथ दिक्कत यह है कि वह एक मजबूत लोकतंत्र बनकर उभर नहीं पाया, और वह अपने नेताओं की बेईमानी का शिकार रहा, बार-बार की फौजी तानाशाही को झेलता रहा, अपने मुल्क के एक देश को बांग्लादेश की शक्ल में खोते हुए देखते रहा, और कट्टरपंथी-आतंकियों से वह उबर नहीं पाया। ऐसे में अमरीका से मिली मदद का इस्तेमाल वह अपनी फौजी तैयारियों में तो करते रहा, लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना वह कभी सीख नहीं पाया, और अमरीकी मदद का उसके लिए इस्तेमाल नहीं कर पाया। ऐसे में आज अमरीका उसे अगर एक बड़ा झटका दे रहा है, तो नौबत ऐसी है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अभी इमरजेंसी मीटिंग ले रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अमरीका को पाकिस्तान में फौजी-पूंजीनिवेश बंद करना चाहिए, और आतंक से रिश्ता तोडऩे को एक अनिवार्य शर्त रखना चाहिए। ट्रंप की बाकी अनगिनत बातों से हम असहमत रहते हैं, लेकिन जिस देश को आज दुनिया में आतंक का केन्द्र माना जा रहा है, वहां पर अमरीकी जनता के पैसे को इस तरह से बहाकर अमरीका दुनिया पर आतंक का खतरा बढ़ा ही रहा था। ऐसे में ट्रंप का यह फैसला एक अच्छा फैसला है। (Daily Chhattisgarh)

बात महज उत्तर कोरिया के तानाशाह की नहीं है...

संपादकीय
1 जनवरी 2018


कई दशक पहले जब दुनिया में परमाणु हथियारों के खिलाफ एक आंदोलन चलता था, और बहुत से देश ऐसे निशस्त्रीकरण के खिलाफ उसमें शामिल थे, तो लोगों को इसका महत्व समझ नहीं आता था। आज जब उत्तर कोरिया का एक सनकी दिखता तानाशाह यह कहता है कि पूरे का पूरा अमरीका उसके परमाणु हथियारों की पहुंच के भीतर निशाने पर है, और परमाणु हमले की बटन उसकी मेज पर लगी हुई है, तो दुनिया एक अलग किस्म के खतरे के मुहाने पर खड़ी नजर आती है। अमरीका ने चारों तरफ से उत्तर कोरिया के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाकर देख लिया, संयुक्त राष्ट्र को उसके खिलाफ सहमत कराकर देख लिया, लेकिन न तो उत्तर कोरिया की बददिमागी पर कोई काबू पाया जा सका, और न ही उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम पर कोई रोक लग सकी। दूर तक मार करने वाली मिसाइलें भी साथ-साथ बनाकर उत्तर कोरिया दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे अलोकतांत्रिक परमाणु-देश बन गया है।
दुनिया में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का महज एक ही मामला इतिहास में दर्ज है, जापान में हिरोशिमा-नागासाकी पर अमरीका द्वारा गिराए गए बम का। उससे हुई तबाही ने दुनिया की चेतना को हिलाकर रख दिया था, और लोगों ने हथियार बनाने बंद तो नहीं किए थे, लेकिन वे यह जरूर समझ गए थे कि परमाणु हथियार अगर कोई तीसरा विश्व युद्ध शुरू करेंगे, तो हो सकता है कि वह दुनिया के खात्मे का दिन भी हो। और बात महज देशों के बीच परमाणु युद्धों की नहीं है, बात परमाणु हथियारों की है जिन्हें कोई आतंकी समूह, कोई कट्टरपंथी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। आज पाकिस्तान जिस तरह से फौजियों और कट्टरपंथियों के दबावतले दम तोड़ता लोकतंत्र दिख रहा है, ऐसे में यह जायज सवाल उठता है कि वहां के परमाणु हथियार ऐसे समूहों के काबू के बाहर कब तक रहेंगे? कल के दिन फौज से परे भी कोई आतंकी समूह अगर ऐसे हथियारों तक पहुंच जाएं, और उनका आत्मघाती इस्तेमाल करने पर उतारू हो जाएं, तो पाकिस्तान और भारत दोनों के बीच किस तरह का परमाणु तनाव हो सकता है?
उत्तरी कोरिया अमरीका को इतने तरह के हमले की धमकियां इतने बार दे चुका है, और वह एक सचमुच का खतरा न सिर्फ अमरीका पर, बल्कि जापान और पड़ोस के दक्षिण कोरिया पर भी दिखता है। ऐसे में  उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन जितने ही युद्धोन्मादी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी दिखते हैं, और उतने ही सनकी भी दिखते हैं। ऐसे में इन दो देशों के बीच परमाणु तनाव आसपास के और किन देशों को लपेट सकते हैं, इसका पूरा अंदाज लगाना न बहुत आसान है, और न ही बहुत मुश्किल भी। ऐसे में आज एक बार फिर परमाणु हथियारों के पूरी तरह खात्मे की बात सोचने और करने का वक्त आ गया है, और इन दो जंगखोर नेताओं से परे बाकी लोगों को यह देखना होगा कि कैसे अधिक से अधिक देशों को परमाणु हथियार खत्म करने पर सहमत किया जा सकता है। अगर ये हथियार खत्म नहीं होंगे तो एक दिन यह दुनिया ही खत्म हो जाएगी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 जनवरी