संपादकीय
3 जनवरी 2018

महाराष्ट्र में दो दिनों से एक बिल्कुल ही गैरजरूरी सामाजिक-जातिवादी तनाव खड़ा किया गया है। वहां दलित समुदाय पिछले दो सौ बरस से एक विजय स्तंभ पर इकट्ठा होते आया है जो कि अंग्रेज फौज की पेशवा फौज पर जीत की याद में बनाया गया था। वहां दलितों की एक महार रेजीमेंट अंग्रेज फौज में थी, और उसकी जीत की खुशी में अब तक महाराष्ट्र का दलित समाज सालाना जलसा करता है। जैसा कि कल महाराष्ट्र के एक सबसे बड़े नेता शरद पवार ने कहा, इन दो सौ बरसों में अब तक कभी भी महाराष्ट्र में इसे लेकर दलितों का विरोध नहीं हुआ था, लेकिन कल इस जलसे के वक्त गैरदलित, शायद ऊंची कही जाने वाली जातियों ने इसका विरोध किया और सड़कों पर हिंसक टकराव शुरू हुआ जो कि आज भी जारी है।
जिन लोगों को आज अंग्रेजों की जीत का जलसा बुरा लग रहा है, उन्हें दो सौ बरस पहले की वह सामाजिक हकीकत समझना जरूरी है जिसके चलते पेशवाओं के पुणे में सुबह और शाम के वक्त दलितों को शहर में घुसने पर मनाही थी क्योंकि उगते या डूबते सूरज से छाया इतनी लंबी बनती है कि दलित की छाया ऊंची कही जाने वाली किसी जाति पर भी पड़ सकती है। ऐसी बहुत सी रोक उस वक्त इस शोषित और दलित समाज पर लागू थीं। इनमें से एक यह भी थी कि दलित को अपने पीछे एक झाड़ू टांगकर चलना होता था, ताकि उसके पांव के निशान सड़क पर से मिटते चलें। देश में जगह-जगह दलितों के साथ ऐसा भेदभाव आज भी जारी है, लेकिन दो सौ बरस पहले जब दलितों को अंग्रेजों के घर में भीतर तक आने-जाने की बराबरी मिली, अंग्रेजों को उनके हाथ का पानी पीने से परहेज नहीं रहा, तो उन दलितों को उन अंग्रेजों ने एक सामाजिक इंसाफ की संभावना दिखी।
जिन लोगों को आज अंग्रेजी राज की कोई भी याद तकलीफ दे रही है, हिन्दुस्तान का इतिहास गवाह है कि ऐसे बहुत से बड़े-बड़े हिन्दू नेता और वीर थे जो कि अंग्रेज साहब से लिखित माफी मांगकर, उस सरकार का काम करने का वायदा करके जेल से छूटकर आए थे। ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं थी जिन्हें अंग्रेज सरकार इस देश के स्वतंत्रता सेनानियों के मुकाबले बेहतर लगती थी, और ऐसा लगने वालों में बड़ी संख्या अपने आपको ऊंची जात कहने वालों की थी। ऐसे में आज इतिहास के एक पन्ने को लेकर दलितों की सामाजिक गरिमा के खिलाफ हिंसक हमला करना इस देश को तोडऩे का एक काम है, और बैठे-ठाले महाराष्ट्र को एक सामाजिक तनाव और हिंसा में झोंक दिया जा रहा है। पहली खबरें बताती हैं कि इस दलित जलसे का विरोध भगवा झंडाधारी उन हिन्दू संगठनों ने किया था जो कि दलित विरोधी हैं। और पिछले कुछ ताजा बरसों को देखें तो देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों के खिलाफ ऐसी और भी हिंसा हुई है जिसे लेकर देश के बाकी हिस्से के बाकी दलित भी बहुत ही विचलित हैं।
भारत में अपने आपको हिन्दू समाज का ठेकेदार साबित करने पर उतारू लोग वे हैं जो कि अपनी आबादी की गिनती गिनने के लिए तो दलितों और आदिवासियों को हिन्दू में गिनते हैं, लेकिन फिर हिन्दू बिरादरी के भीतर दलितों को गैरइंसान मानते हुए उन्हें अपने जूतों तले कुचलना चाहते हैं, जो कि आदिवासियों को अपनी धर्मकथाओं में बंदरों का दर्जा देते हैं। ऐसे हिन्दू संगठनों को यह समझना होगा कि वे एक व्यापक हिन्दू समाज को तोडऩे के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं क्योंकि अपनी गिनती बढ़ाने के लिए सवर्ण कहे जाने वाले हिन्दुओं को तो दलित-आदिवासी की जरूरत है, दलितों को और आदिवासियों को न तो हिन्दू धर्म की जरूरत है, और न ही उनके रीति-रिवाजों की। महाराष्ट्र जैसे जागरूक प्रदेश में दलित वैसे भी बड़ी संख्या में बौद्ध हो चुके हैं, और हिन्दू धर्म का तिरस्कार कर चुके हैं। पूरे देश में जगह-जगह आदिवासियों ने भी ईसाई बनकर हिन्दू धर्म के भीतर अपने लिए हिकारत का जवाब दिया है। दक्षिण में कुछ जगहों पर दलितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम भी अपनाया है।
आज अगर हिन्दू धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियां अपने सहयोगी दलों को झंडे-डंडे लेकर इस तरह की हिंसा से नहीं रोकती हैं, तो आने वाले बरसों में उनकी हिन्दू राजनीति में लोगों की गिनती घटते चले जाना तय है। फिलहाल महाराष्ट्र में इस निहायत गैरजरूरी हिंसा से एक सामाजिक मुद्दा उभरकर सामने आया है कि एक वक्त ऐसा था जब इस देश में दलितों को पेशवाओं के मुकाबले अंग्रेज बेहतर लगे थे, क्योंकि वे उन्हें इंसान तो मानते थे। (Daily Chhattisgarh)
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