संपादकीय
2 जनवरी 2018

परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कई बार बड़ी कड़ी या खरी-खरी बात कहना मुमकिन नहीं होता है, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अलग किस्म के मुखिया हैं, और वे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के अंदाज में भी बहुत सी बातें कहते हैं। कल उन्होंने पाकिस्तान के बारे में यह ट्वीट किया कि इस देश को लगातार बेहिसाब अमरीकी मदद बेवकूफी का काम था क्योंकि यह लगातार आतंकियों की पनाहगार बना हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने आज एक बड़ी मदद को रोक भी दिया है। पाकिस्तान ने इस पर एतराज जताते हुए कहा है कि उसने अलकायदा जैसे आतंकी संगठन को खत्म करने में इतने बरस लगातार अमरीका की मदद की, खुफिया जानकारी मुहैया कराई, अपने देश में फौजी अड्डों का इस्तेमाल करने दिया, और इसके एवज में पाकिस्तान को अमरीका से महज तोहमत और शक हासिल हुए हैं। भारत में भाजपा के कुछ नेताओं ने तुरंत ही इसे मोदी की कूटनीतिक जीत करार देते हुए खुशी मनाई है।
ट्रंप के काम करने का अपना एक अलग और अपारंपरिक अंदाज है, जो कि पाकिस्तान के खिलाफ इस बार तो कारगर होते दिख रहा है। पाकिस्तान की जमीन से जिस अंदाज में भारत पर आतंकी हमले होते रहे हैं, उससे न सिर्फ अमरीका, बल्कि बहुत से और पश्चिमी देश भी फिक्रमंद रहे हैं। जिस तरह से मुंबई पर हमला हुआ था, वह शायद न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर ओसामा-बिन-लादेन के विमानों के हमले के बाद का सबसे बड़ा हमला था, और उसकी जड़़ें पाकिस्तान तक पकड़ा भी गई थीं। अमरीका की अपनी मजबूरी है कि उसे पाकिस्तान को अपना एक फौजी अड्डा बनाकर चलना पड़ता है क्योंकि उसके बगल में अफगानिस्तान में वह जिन ताकतों से लड़ाई लड़ रहा है, उसके लिए पाकिस्तान की जमीन और उसकी हिस्सेदारी जरूरी है। फिर यह पाकिस्तान ही है जो कि अपनी जमीन पर अपनी मर्जी के बिना, अपनी मर्जी के खिलाफ अमरीकी हमलों को बर्दाश्त करता है। पाकिस्तान को अमरीका का सहयोग इस बर्दाश्त की कीमत भी है। फिर इसके दो पहलू और हैं, एक तो यह कि हिन्द महासागर के इस क्षेत्र में अमरीका को अपने लिए अगर एक फौजी अड्डा चाहिए, तो वह पाकिस्तान के अलावा और किसी देश में हासिल नहीं हो सकता। वह चीन के खिलाफ भी उसकी सरहद से लगे किसी देश में ऐसी जगह चाहता है, और उसका भुगतान भी अमरीकी मदद की शक्ल में होता है।
लेकिन पाकिस्तान में एक के बाद दूसरी भ्रष्ट सरकारें वहां की आमतौर पर भ्रष्ट और बेकाबू साबित होती हुई फौज मिलकर अमरीकी मदद का बेजा इस्तेमाल करते आई हैं, और ऐसे में अमरीका का यह फौजी-पूंजीनिवेश उसे गटर में जाते दिख रहा है, तो इसमें बड़ी हैरानी नहीं है। पाकिस्तान के साथ दिक्कत यह है कि वह एक मजबूत लोकतंत्र बनकर उभर नहीं पाया, और वह अपने नेताओं की बेईमानी का शिकार रहा, बार-बार की फौजी तानाशाही को झेलता रहा, अपने मुल्क के एक देश को बांग्लादेश की शक्ल में खोते हुए देखते रहा, और कट्टरपंथी-आतंकियों से वह उबर नहीं पाया। ऐसे में अमरीका से मिली मदद का इस्तेमाल वह अपनी फौजी तैयारियों में तो करते रहा, लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना वह कभी सीख नहीं पाया, और अमरीकी मदद का उसके लिए इस्तेमाल नहीं कर पाया। ऐसे में आज अमरीका उसे अगर एक बड़ा झटका दे रहा है, तो नौबत ऐसी है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अभी इमरजेंसी मीटिंग ले रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अमरीका को पाकिस्तान में फौजी-पूंजीनिवेश बंद करना चाहिए, और आतंक से रिश्ता तोडऩे को एक अनिवार्य शर्त रखना चाहिए। ट्रंप की बाकी अनगिनत बातों से हम असहमत रहते हैं, लेकिन जिस देश को आज दुनिया में आतंक का केन्द्र माना जा रहा है, वहां पर अमरीकी जनता के पैसे को इस तरह से बहाकर अमरीका दुनिया पर आतंक का खतरा बढ़ा ही रहा था। ऐसे में ट्रंप का यह फैसला एक अच्छा फैसला है। (Daily Chhattisgarh)
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहुत सी बाते बिना कहे की जाती है और खासकर जब बाते परराष्ट्र से सम्बन्धित हो. ऐसी बाते जब समाज माध्यमों से सामने आती है तो दोनों पक्षों को अपनी अपनी भूमिकाये कठोर करनी पड़ती है. ऐसा करना काफी मुश्किल होता है क्योकि ऐसे समय जनता के मन पर निर्णय का एक प्रतिमान तैयार होता है जिसके फलस्वररूप सामुदायिक समाज की प्रतिक्रिया तैयार होती है और आगे के सभी निर्णय उस प्रतिक्रियाकमक दबाव के तहत लेने पड़ते है. शायद इसीलिए कूटनीति में बड़बोलेपन को एक दोष के रूप में देखा जाता है. आज जब हमारे यहाँ इसे एक कूटनीतिक विजय के रूप में देखा जा रहा है तब इस विधान की समीक्षा आवश्यक हो जाती है.
जवाब देंहटाएंऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब अमरीका ने पाकिस्तान की मदद रोकी हो. १९८५ में लॅरी प्रेस्लर ने अमरीकी सीनेट में इस सम्बन्ध में एक प्रस्ताव रखा था जिसकी वजह से पाकिस्तान को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. समय समय पर अनेक राष्ट्राध्यक्षो ने इसकी समीक्षा की और निर्णय लिए. फर्क सिर्फ इतना था की इन निर्णयों को इस तरह से समाज माध्यमों के तहत जारी नहीं किया गया.
गौर करने लायक बात है की इस विधान के पीछे ट्रम्प की मंशा पाकिस्तान का सच सामने लाने से ज्यादा इस बात पर है की किस तरह पूर्वी डेमोक्रेटिक सरकारों ने गलत फैसले लिए और देश का बंठाधार कर दिया. चुकी पाकिस्तान पर रोक लगी है अतः हमारा खुश होना स्वाभाविक है किन्तु ऐसा न हो की यह ख़ुशी एक दर्द का आगाज हो.
ट्रम्प के इस फैसले से पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथो की कठपुतली बनना तय है. इस एक बयान ने सामान्य पाकिस्तानी नागरिक के मन में अमरीकी विरोधी भावना भड़काने का काम किया है. पहले ही पाकिस्तानी राजनीति में अच्छे नेताओ का अभाव है .....तिस पर पाक प्रशासन पर आय एस आय की पकड़. ऐसे वक़्त ट्रम्प महाशय को उस देश के मध्यमार्गी जनता का हाथ किस तरह मजबूत किया जाय यह सोचना चाहिए था किन्तु उनके बड़बोलेपन ने इनको कटटरपंथ की तरफ धकेल दिया. जाहिर है की अब पाकिस्तान और उसके जैसी सोच वाले देशो में कटटरपंथ का बोलबाला बढ़ेगा और साथ ही साथ एक इस्लामिक कटटरपंथी देशो का गठबंधन भी बन सकता है. इसके पहले ही जेरुसलम मामले पर ट्रम्प के एक अविवेकी निर्णय ने इस्लामिक देशो का एक अप्रत्यक्ष्य गठबंधन खड़ा कर दिया है जिसका नेतृत्व तुर्की के प्रमुख एर्दोगान कर रहे है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की यह गठबंधन पाकिस्तान को अब हाथों हाथ ले लेगा और जनमत दबाव के तहत पाकिस्तान को भी इनके साथ मजबूरन जाना पडेगा. सिर्फ सऊदी राजपुत्र सलमान के भरोसे अमरीका यह सोच रहा है की शायद ऐसा कुछ नहीं होगा. माना की सऊदी राजपुत्र आज अमरीकी दबाव में है किन्तु उनपर भरोसा करना इतिहास की अनदेखी करना होगा.
खैर हमारे लिए यह ख़ुशी एक चेतावनी भी लेकर आयी है. जाहिर तौर पर पाकिस्तान अमरीका के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता क्योकि उसकी अपनी क्षमताये है. ऐसे में अपनी जनता का ध्यान खींचने के लिए उसकी कार्यवाहियों के निशाने पर हम ही होंगे. वैसे भी बलूचिस्तान मामले पर हमने अपनी जाहिर तौर पर रजामंदी प्रदर्शित कर ही दी है, ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान को अपनी कार्यवाही को उचित ठहराने का बहाना मिल जाएगा. ऐसे में ट्रम्प का यह विधान को हमारी कूटनीतिक विजय ठहराना हास्यास्पद होगा.
ट्रम्प के इस फैसले पर खुश हुआ जा सकता है किन्तु यदि यह फैसला कूटनीतिक रूप से लिया गया होता तो इसके अपेक्षित परिणाम ज्यादा होते. बरहाल चुकी पाकिस्तान की नाक कटी है तो हमारा खुश होना जायज है किन्तु इस ख़ुशी में आने वाले खतरों से बेखबर रहे तो यह ख़ुशी जानलेवा साबित हो सकती है.