महाराष्ट्र में हक के लिए लड़ते दलितों से उठ रहे और बहुत से जलते मुद्दे

संपादकीय
5 जनवरी 2018


महाराष्ट्र में दलितों और गैरदलितों के बीच का टकराव सड़कों पर जारी है, और दलित तबके की बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनके पास खोने को अधिक कुछ नहीं है, और ऐसे ही लोग सड़कों पर संघर्ष कर पाते हैं। उनके एक ऐतिहासिक सालाना जलसे का विरोध करने वाले सवर्ण हिन्दुओं ने अभी सोशल मीडिया पर सवर्ण-दलित संघर्ष और उसके ऐतिहासिक कारणों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ऐसी सारी समकालीन बहस लोगों के राजनीतिक-शिक्षण का एक बड़ा तरीका भी रहती है, और इसलिए बिना हिंसा इंटरनेट पर चल रहा यह संघर्ष उन लोगों को भारत के वंचित तबके के ऐतिहासिक कारणों की जानकारी भी दे रहा है।
लोगों को एक सवर्ण-ब्राम्हणवादी व्यवस्था के बारे में यह याद करने, और याद दिलाने का मौका भी मिल रहा है कि हिन्दू धर्म के भीतर गिने जाने वाले दलित और आदिवासी किस तरह हिन्दू समाज व्यवस्था से धीरे-धीरे बाहर कर दिए गए, या बाहर हो गए। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह याद दिलाया है कि मुस्लिमों में एक धार्मिक दान के रास्ते समाज के गरीब लोगों की मदद करने की परंपरा है। ईसाईयों में भी चर्च का पैसा दूर-दूर तक जाता है, और गरीबों की मदद करता है। लेकिन हिन्दू धर्म का पैसा शंकराचार्यों के डेरों पर, और बड़े-बड़े मशहूर मंदिरों के खजानों में कैद रहता है। वह ट्रस्टियों के हाथ लुटता है, गबन में खत्म होता है, लेकिन वह अपने समाज के गिने जाने वाले सबसे गरीब दलितों और आदिवासियों के काम नहीं आता। अभी लोगों ने यह भी याद दिलाया है कि ईसाईयों पर यह तोहमत लगती है कि उन्होंने हिन्दुस्तान आकर कुछ चावल देकर, कुछ दवाएं देकर गरीब आदिवासियों का धर्मांतरण कर दिया। यह वही दौर था जब भारत के सवर्ण हिन्दू मंदिर और मठ दौलत से लबालब थे, लेकिन इस देश में होती भुखमरी को मिटाने में उनका कोई हाथ नहीं था। मठ-मंदिरों का पैसा न अस्पतालों में काम आता, और न ही दलित-आदिवासियों की किसी और जरूरत में। अब लोगों ने यह सवाल उठाया है कि अगर मंदिरों की खरबों की दौलत अपने ही समाज के दलितों को भूख से बचाने में काम नहीं आई, तो ऐसे धर्म को दूसरे धर्म को क्यों कोसना चाहिए कि उन्होंने गरीब दलित-आदिवासियों को पढ़ाई देकर, इलाज देकर, रोजगार देकर, और शायद खाना देकर अपने धर्म में मिला लिया?
दलितों और सवर्णों के इस संघर्ष में देश के लोगों का बड़ा अच्छा सामाजिक शिक्षण हो रहा है। हिन्दू समाज के भीतर दलितों का जो शोषण हजारों बरस से चले आ रहा है, मनुवादी व्यवस्था में, वेद और पुराण में, मठों और मंदिरों में दलितों की जगह कहीं नहीं रखी गई, और अब उनके चर्च या मस्जिद जाने पर, बौद्ध मठ पहुंच जाने पर एक मलाल किया जा रहा है। यह मलाल ऐसे समाज के किसी काम का नहीं है जो शूद्रों को समाज के बदन में पैरों की जगह पर रखता है, शायद पैरों के भी तले। और जिन पैरों पर बाकी बदन का बोझ पड़ता है, उन्हीं पैरों को सबसे घटिया मानने की समाज व्यवस्था को इन पैरों के किसी चर्च या मस्जिद या बुद्ध प्रतिमा तक चले जाने पर क्यों रोना चाहिए? और आज हिन्दू समाज के जिस सवर्ण हिस्से को दलितों से शिकायत है, आदिवासियों से शिकायत है, दूसरे धर्मों के लोगों से शिकायत है, उन्हें न अपनी ऐतिहासिक हैवानियत से शिकायत है, न उन्हें अपनी आज की हिंसा से शिकायत है, और न उन्हें कल भी जारी रहने वाली हिकारत से कोई शिकायत है।
भारत में दलित चेतना, आदिवासी चेतना के मुकाबले जल्दी आई, अधिक संगठित रही, उसके तेवर अधिक लड़ाकू रहे, और उसने एक दूसरे धर्म में जाने का हौसला दिखाया। इसलिए महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में दलित उन सवर्ण हिन्दुओं को सड़कों पर भी जमकर टक्कर देने की हालत में रहते हैं जिनकी सोच अब भी दलितों को कुचलने की है। अंग्रेजों के वक्त दलितों ने अंग्रेजी सेना का हिस्सा रहते हुए उस पेशवाई राज को शिकस्त दी थी जो उन्हें महज कुचलते ही आया था। अंग्रेजों के आने के सदियों पहले से चला आ रहा यह शोषण अंग्रेजी राज से वफादारी से परे की बात था। उस शोषण के खिलाफ जीत का जश्न मनाने से आज दो सौ बरस बाद जाकर जब दलितों को रोका जा रहा है, तो दलित तमाम सामाजिक बेइंसाफी के मुद्दे भी उठा रहे हैं। कुछ सड़कों पर, कुछ पटरियों पर, कुछ समय के लिए आवाजाही का नुकसान होगा, लेकिन इसी बहाने देश में एक सामाजिक चेतना का मौका भी आया है। दूसरी बात यह कि अभी तक देश के दलित, या अल्पसंख्यक लोगों के आंदोलनों से देश के आदिवासी उस संगठित तरीके से जुट नहीं पाए हैं, मिल नहीं पाए हैं। आज दलितों को फिर से कुचलने पर आमादा लोग इस एक खतरे की आशंका को अनदेखा कर रहे हैं कि कल के दिन आदिवासी भी अगर ऐसी सवर्ण-हिन्दू मानसिकता के खिलाफ उठ खड़े होंगे, तो क्या होगा?
अगर हम उस बात पर लौटें जिससे कि आज की चर्चा शुरू की थी, तो हिन्दू मठ-मंदिरों की अथाह दौलत उन सबसे गरीब दलित-आदिवासियों के किस काम आ रही है, जिनकी गिनती हिन्दू समाज की गिनती बढ़ाने के लिए हिन्दुओं में की जाती है, और गिनती के बाद उनको लात मारी जाती है, उनकी बहन-बेटियों को सवर्णों की संपत्ति मान लिया जाता है। आने वाला वक्त एक अधिक बड़े सामाजिक टकराव का होगा, अगर सवर्ण तबका, उसके सामाजिक संगठन, उसके राजनीतिक आका, अपनी सदियों पुरानी सामंती सोच से बाहर नहीं निकल पाएंगे। हम किसी हिंसा को टालने की हर कोशिश की वकालत करते हैं, और साथ-साथ भारत की सामाजिक चेतना के जागने की उम्मीद भी करते हैं।  (Daily Chhattisgarh)

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