आत्मग्लानि और अपराधबोध से मुक्ति कोई हिन्दुस्तानियों से सीखे

संपादकीय
4 जुलाई 2018


विश्वकप फुटबॉल में जापान की टीम बेल्जियम से हारी, तो दोनों ही टीमों के चेहरे देखने लायक थे, और इन दोनों को साथ-साथ देखें तो कहीं खुशी, कहीं गम की एक तस्वीर दिख रही थी। जापानी प्रशंसक धाड़ मार-मारकर रो रहे थे, और जाहिर है कि जीतने वाली टीम के बेल्जियम के प्रशंसक वहां की परंपरागत पोशाकों में खुशियां मना रहे थे। लेकिन यह बात तो इस जगह लिखने लायक है नहीं, लिखने लायक इसके बाद की बात है। आज जो तस्वीरें सामने आई हैं वे बताती हैं कि किस तरह जापान की टीम ने अपने ड्रेसिंग रूम को झाड़-पोंछकर साफ-सुथरा किया, और फिर वहां पर धन्यवाद की एक तख्ती लगाकर टीम वहां से गई। दूसरी तरफ मैच हार जाने के बाद भी जापान के प्रशंसकों ने अपने देश की प्रथा के मुताबिक स्टेडियम की दर्शकदीर्घा का सारा कचरा साफ किया, कचरे के बैग घूरों के हवाले किए, और फिर वहां से गए। यह उस वक्त किया जब ये प्रशंसक रोते भी जा रहे थे। दूसरी तरफ हारकर दक्षिण कोरिया पहुंची टीम पर वहां के नागरिकों ने अंडे फेंके, और वे तस्वीरें भी सामने आई हैं। एक दूसरी थाईलैंड की है जहां पर दर्जन भर फुटबॉल खिलाड़ी बच्चे एक ऐसी गुफा में फंस गए हैं जो कि पानी में डूब चुकी है, और वे गुफा के भीतर एक करिश्मे की तरह जिंदा बचे हुए मिले हैं, और अब वहां बचाव दल ने ऑक्सीजन पहुंचा दी है, खाना पहुंचा दिया है, लेकिन आने वाले एक से लेकर चार महीने तक का वक्त इन बच्चों को गुफा में ही रहना पड़ेगा क्योंकि तब तक रास्ते का पानी कम नहीं होना है, और वहां से उसे पार करके निकलना मुमकिन नहीं है। लेकिन इसी खबर में एक हिस्सा आया है कि दो डॉक्टरों ने खुद होकर गोताखोरों के साथ उस गुफा में जाकर चार महीने तक बच्चों के साथ रहना तय किया है ताकि उनकी सेहत ठीक रहे। 
भलमनसाहत की ऐसी कहानियां चारों तरफ से आती हैं, और ऐसे में जब भलमनसाहत के ठीक खिलाफ कुछ होते दिखता है, तो लगता है कि क्या सचमुच ऐसे दो अलग-अलग किस्मों के लोग एक ही धरती के बाशिंदे हैं? यह भी लगता है कि किसी भी पीढ़ी के लोगों को जिंदगी तो बस एक ही मिलती है, और वह जिंदगी अगर जापान की तरह के जिम्मेदार लोगों जैसी साफ-सुथरी हो तो भी वह एक ही जिंदगी रहेगी, और अगर वह हिन्दुस्तान के लोगों सरीखी गंदी जिंदगी रहेगी, तो भी एक पूरी जिंदगी उस गंदगी के बीच ही गुजारनी है। एक तरफ ऐसे वालंटियर हैं जो कि गुफा में फंसे हुए बच्चों को बचाने के लिए अपनी डॉक्टरी छोड़कर चार महीने के लिए अपनी खुद की जिंदगी जोखिम में डालकर एक गुफा में जा रहे हैं, दूसरी तरफ हफ्ते भर के भीतर मंदसौर में बच्ची से बलात्कार के बाद उसी मध्यप्रदेश के सतना में बच्ची से बलात्कार कर रहे हैं, जम्मू में बलात्कारियों को बचाने के लिए देश का झंडा लेकर जुलूस निकाल रहे हैं। आखिर किसी देश की पहचान उसके लोगों से परे क्या हो सकती है? जहां देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज को यह कहना पड़ता है कि गाय को बचाने के पाखंड में भीड़ इंसानों को मार डाले, यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, वहां सवाल यह उठता है कि देश में मौजूदा कानून तोडऩे के लिए गौ-गुंडों की भीड़ अधिक बड़ी मुजरिम है, या कि इस भीड़ को अनदेखा करने के लिए मौजूदा कानून का इस्तेमाल न करने वाली सरकार अधिक बड़ी मुजरिम हैं।
अपने आप पर आत्ममुग्ध, और एक नाजायज आत्मगौरव का शिकार यह देश अपने खुद के कुकर्मों को अनदेखा करने का आदी भी हो गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वह देश और दुनिया के इतिहास में अपने को नापसंद चीजों को अनदेखा करने का आदी हो गया है। जो देश अपने कुकर्मों पर आत्मग्लानि और अपराधबोध के बोझ से पूरी तरह मुक्त हो चुका है, उस देश को रोजाना नए-नए कुकर्मों और अपराधों से बचा पाना मुमकिन भी नहीं है। इस देश में जितनी बच्चियां हैं, जुर्म की उतनी ही संभावनाएं अभी बाकी हैं। और अब तो अपराधबोधमुक्त यह देश धर्म और जाति के आधार पर बच्चियों से बलात्कार को जायज भी ठहराने लगा है, और अगर यह बलात्कार किसी एक खास धर्म के बलात्कारी द्वारा किसी दूसरे धर्म की बच्ची के साथ किया गया है, तो वह तिरंगे झंडे से सम्मान के लायक राष्ट्रप्रेम का काम भी गिना जा रहा है। 
ऐसी दुनिया में जापान के लोगों को दूसरे देश में मैच हार जाने के बाद भी कचरा साफ करते देखना इतना अजीब लगता है कि क्या ये जापानी भी इसी धरती के रहने वाले हैं? क्यों ये लोग कचरा छोड़कर जाने के अपराधबोध और आत्मग्लानि से आजाद नहीं हो पा रहे हैं जब हिन्दुस्तानी मर्द किसी बच्ची की देह में अपना कचरा छोड़कर जाते-जाते लोहे की छड़ और लकड़ी भी ठूंसकर बिना किसी अपराधबोध के जा सकते हैं, और समर्थक पा सकते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 जुलाई

साथ रहते गैरशादीशुदा जोड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल एक अच्छा कदम ...

संपादकीय
3 जुलाई 2018


सुप्रीम कोर्ट अभी एक दिलचस्प मामले की सुनवाई कर रहा है कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के बीच अधिकारों को कोई कानूनी दर्जा दिया जा सकता है? अभी मामले की सुनवाई चल रही है, और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर उसकी राय भी मांगी है। इसके साथ-साथ एक प्रमुख वकील अभिषेक मनुसिंघवी को अदालत ने इस मामले में अपनी मदद करने के लिए न्याय-मित्र नियुक्त किया है। यह मामला एक ऐसी महिला की याचिका से शुरू हुआ है, जिसमें उसका आरोप है कि एक व्यक्ति ने उसकी बेटी के साथ 6 साल के लिव-इन रिश्ते के बाद शादी के बाद शादी से इंकार कर दिया। इस मामले में इस आदमी पर बलात्कार का आरोप भी लगाया गया है। अदालत अब इस मामले को लेकर यह समझना चाहती है कि क्या ऐसे रिश्तों में शामिल महिला या लड़की के अधिकार उसी तरह स्पष्ट किए जा सकते हैं जिस तरह किसी शादी के बाद पत्नी के अधिकारों को लेकर कानून बने हुए हैं। 
यह बड़ी दिलचस्प नौबत है कि समाज की एक ऐसी हकीकत को लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है, और कानूनी स्थिति स्पष्ट करना चाह रहा है, जिसे सरकार और संसद अनदेखा करते हैं। समाज में ऐसे रिश्ते वाले दसियों लाख लोग हैं, लेकिन न कोई इन्हें औपचारिक रूप से मानना चाहते और न ही इन्हें लेकर कोई कानून बनाना चाहते। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इस मायने में भी अच्छी है कि समाज की हकीकत को अनदेखा करना ठीक नहीं है, और सरकार या संसद, समाज या अदालत, इन सबको सच्चाई का सामना करना आना चाहिए। आज साथ रहने वाले जोड़ों को लेकर किसी तरह का कानून न होने से उसमें शामिल महिला, या कि  हम तो यह भी कहना चाहेंगे कि दोनों में से कमजोर भागीदार, को किसी तरह की सुरक्षा नहीं मिल पाती है। ऐसे में एक स्पष्ट कानून लोगों की मदद करेगा और विवाद को टालेगा। ऐसे मामले में सहायता की हकदार हमेशा ही महिला को मानना ठीक नहीं होगा, और अगर ऐसे जोड़ों में महिला आर्थिक रूप से अधिक सक्षम और सम्पन्न हो, तो वैसे में पुरूष-जोड़ीदार के भी हित सुरक्षित होने चाहिए। 
आज हालत यह है कि बिना शादी साथ रहने वाले जोड़ों के बीच विवाद होने पर बलात्कार की शिकायत सामने आती है, जो कि हर बार बलात्कार नहीं रहती। ऐसे में यह कानून बनना चाहिए कि बरसों तक साथ रहने के बाद अगर कोई भागीदार शादी के लिए राजी न हो, तो उसे बलात्कार की तोहमत न झेलनी पड़े। हम इंसानी मिजाज के बारे में सोचे तो यह बात साफ है कि बहुत बरस साथ में रहने के बाद भी लोगों का एक-दूसरे के बारे में इरादा और फैसला बदल सकता है, और उन्हें यह भी लग सकता है कि उनकी शादी ठीक नहीं होगी, कामयाब नहीं होगा। ऐसे में एक अनचाहे रिश्ते में जिंदगीभर के लिए उलझने से बेहतर यही होगा कि बिना किसी कानूनी तोहमत के लोगों को एक-दूसरे से अलग होने का कानूनी हक मिले। ऐसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट जब इस मामले को सुन रहा है, और सरकार से भी उसका रूख पूछा गया है तो यह बात किसी किनारे पहुंचेगी। 
आज देश के महिला संगठनों को, और अलग-अलग सामाजिक संगठनों को भी चाहिए कि वे केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना नजरिया रखें। यह मामला केवल अदालती आदेश पर खत्म नहीं होगा, इसके लिए एक कानून भी बनाना पड़ेगा और जैसा कि केंद्र सरकार किसी भी नए कानून को बनाने से पहले सार्वजनिक रूप से लोगों से राय मांगती है, जनता को आज भी सार्वजनिक रूप से इस मामले में अपनी राय रखनी चाहिए, ताकि सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी समाज का रूख पता चल सके। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जुलाई

वैज्ञानिक सोच और ऑक्सीजन के बीच एक बड़ा सीधा रिश्ता

2 जुलाई  2018

दिल्ली के एक मकान से कल जिस तरह ग्यारह टंगी हुई लाशें मिली हैं, और पहली नजर में, पहली जानकारी से ऐसा लग रहा है कि परिवार के लोग किसी आध्यात्म, टोना-टोटका, या जादू-मंत्र के चक्कर में पड़े हुए थे, और परिवार के लोग धर्म और धार्मिक अनुष्ठानों में गहरे डूबे हुए थे, और कई अजीब तरह के अनुष्ठान भी परिवार में होते रहते थे, परिवार तंत्र-साधना पर यकीन करता था। अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि इन सब लोगों ने बिल्कुल एक ही तरह आंख-मुंह पर सब पर टेप बांधकर  एक साथ खुदकुशी की, या फिर कुछ लोगों ने पहले दूसरों को फंदों पर टांगा, और आखिर में खुद भी आत्महत्या कर ली। ये तमाम बातें आज-कल में जांच में सामने आएंगी, लेकिन परिवार बहुत बुरी तरह पूजा-पाठ, धर्म-आध्यात्म में डूबा हुआ था। परिवार का एक सदस्य पांच बरस से मौन व्रत पर था। यह दुनिया का शायद अकेला ऐसा मामला है जिसमें किसी एक परिवार के सारे के सारे लोगों ने इस तरह से हत्या-आत्महत्या की है। परिवार में मिले हुए हाथ के लिखे रजिस्टर बताते हैं कि यह परिवार मोक्ष की चाह में ऐसी हरकत कर सकता है जिसमें यह भी लिखा हुआ है कि वे लोग परमात्मा में लीन हो रहे हैं, और आंख-कान बंद कर रहे हैं ताकि बुरी बातें न सुनें, न देखें। परिवार ने ठीक इस लिखे मुताबिक आंख और कान रूई रखकर टेप लगाकर बंद कर रखे थे, और मोक्ष प्राप्ति के अपने तरीके से उन्होंने हत्या-आत्महत्या की है।
अब इससे अलग कुछ और वारदातों को देखें तो कल ही महाराष्ट्र के धुले में भीड़ ने बच्चा चोर होने के शक में पांच लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह भरे बाजार में खुलेआम हुआ है, और लोगों ने मर जाने तक इन लोगों को पीटा। इसके पहले हर हफ्ते कहीं न कहीं किसी बेकसूर को लोग बच्चा चोर समझकर, या गाय तस्कर समझकर, या गोमांस बेचने वाला समझकर मार रहे हैं। यह खुलकर हो रहा है, रौशनी में हो रहा है, और पूरी भीड़ मिलकर इसे कर रही है। इस सिलसिले में त्रिपुरा के एक मंत्री का बयान गौर करने लायक है जिसमें उसने वहां पर बच्चे की एक लाश मिलने पर यह सार्वजनिक बयान दिया कि लाश में से किडनी गायब है। बाद में पोस्टमार्टम हुआ तो उसमें शरीर के भीतर किडनियां बराबर पाई गईं। लेकिन एक मंत्री के इस सार्वजनिक बयान से हुआ यह कि लोगों के मन में यह शक बैठ गया कि बच्चों की चोरी करके उनके अंग निकाले जा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि ऐसे शक के चलते त्रिपुरा में फेरी लगा रहे उत्तरप्रदेश के एक आदमी को लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला।
तेलंगाना और आंध्र में इसी तरह बच्चा चोरी के शक में भीड़ द्वारा हिंसा की जांच में यह बात सामने आई कि पाकिस्तान में बने हुए किसी एक वीडियो को फैलाकर भारत में ऐसी दहशत फैलाई गई कि बच्चाचोर गिरोह घूम रहे हैं।
ऐसे बहुत से दूसरे मामलों को देखें तो यह साफ है कि देश के लोग अब महज गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाकर संतुष्ट नहीं हैं। किसी अफवाह के चलते वे जब तक लोगों को पीट-पीटकर मार न डालें, उनकी भीड़ का कलेजा ठंडा नहीं पड़ता है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, इसलिए कि यह भीड़ की उस मानसिकता को बताता है जिसे रातोंरात न सरकार बदल सकती, न ही अदालतें उस पर काबू पा सकतीं, और न ही समाज में अक्ल की बात करने वाले, अंधविश्वास-विरोधी लोग इस तस्वीर को तेजी से बदल सकते। हालत यह है कि तर्क और समझ की बात करने वाले पंसारे को महाराष्ट्र में मारा जाता है, और गौरी लंकेश को कर्नाटक में। और तर्क यह दिया जाता है कि ये लोग हिन्दू धर्म का विरोध कर रहे थे, और इनको मारना धर्म के हित में किया गया समझकर इनकी हत्या की गई।
धर्म के हित का काम समझकर ही कहीं तालिबान, तो कहीं आईएसआईएस के लोग अनगिनत कत्ल करते हैं, औरतों से बलात्कार करते हैं, उन्हें सेक्स-गुलाम बनाते हैं, और उनकी ज्यादतियों की फेहरिस्त रोजाना लंबी होती चलती है। इस हालत को देखें और इसकी वजहें सोचें तो एक दूसरी मिसाल पर गौर करना ठीक लगता है।
इन दिनों वॉट्सऐप पर एक वैज्ञानिक तथ्य भी घूम रहा है, और उस पर भरोसा करने के पहले जब उसकी जांच की गई, तो वह सौ फीसदी सच निकला। इसमें कहा गया है कि अगर दुनिया पांच सेकेंड के लिए ऑक्सीजन से परे हो जाए, या ऐसा कहें कि ऑक्सीजन इस दुनिया से हट जाए, तो क्या-क्या होगा? पहली बात तो यह होगी कि दिन में ही अंधेरा छा जाएगा क्योंकि सूरज की रौशनी धरती तक लाने में ऑक्सीजन का भी काम रहता है। दूसरी बात यह होगी कि पांवतले से धरती फटने लगेगी क्योंकि धरती में बहुत बड़ा हिस्सा ऑक्सीजन का है, और उसके हट जाने से हम धंसती जमीन में नीचे चले जाएंगे। जो लोग समंदर के किनारे रहेंगे, वे बहुत बुरी तरह सूरज की धूप से झुलस जाएंगे। लोगों के कान के पर्दे फट जाएंगे। समंदर और झील-तालाब सभी जगह से पानी भाप बनकर उडऩे लगेगा। दुनिया भर में इलेक्ट्रिक कारों को छोड़कर बाकी किसी भी किस्म के ईंधन से चलने वाली तमाम गाडिय़ां थम जाएंगी क्योंकि उनमें ईंधन को जलाने के लिए ऑक्सीजन लगता है, और उसके बिना इंजन नहीं चलते। एक साथ पड़े हुए धातु के टुकड़े जुड़ जाएंगे, और कांक्रीट के ढांचे चूर-चूर हो जाएंगे।
अब जिस ऑक्सीजन को इंसान रात-दिन अपनी सिगरेट से लेकर कारखानों की चिमनियों तक से खत्म कर रहे हैं, कचरा जलाने से लेकर पेड़ घटाने तक ऑक्सीजन को खत्म कर रहे हैं, उस ऑक्सीजन की यह अहमियत है कि पल भर के भीतर दुनिया थम जाएगी, और धराशायी हो जाएगी।
कुछ ऐसा ही हाल लोगों के बीच वैज्ञानिक सोच का है जिससे लोकतंत्र अपने आप जुड़ा हुआ है, और इंसाफ भी। जब लोगों में वैज्ञानिक सोच खत्म होती है, तो न उन्हें इंसानियत का ख्याल रहता, न कानून का, न ही समाज की सही मान्यताओं का। वैसे में लोग भीड़ बनकर एक-दूसरे को मारने लगते हैं, पूरी भीड़ एकजुट होकर किसी एक बेबस को मारने लग जाती है। किसी देश और समाज में वैज्ञानिक सोच की अहमियत कुछ वैसी ही है जैसी कि धरती पर, इस दुनिया में, ऑक्सीजन की है। आज जो लोग अपने तबके की हिंसा पर तालियां बजा रहे हैं, जिन्हें मारे जाते इंसान एक दुश्मन के कम होने सरीखे लग रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि इंसानियत की ऑक्सीजन का घटना किसी एक दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, ऑक्सीजन की यह कमी, इंसाफ की ऑक्सीजन की यह कमी आगे-पीछे उनके दायरे से भी ऑक्सीजन हटा ले जाएगी, और वे चूर-चूर हो जाएंगे।
कुदरत से बहुत सी चीजों को सीखा जा सकता है, उनमें से एक बात तो यह भी है कि दुनिया को चलाने के लिए किन-किन बातों की जरूरत ऑक्सीजन जितनी ही जरूरी है, हालांकि उनकी कमी से पांच सेकेंड में तो लोग नहीं मरेंगे, लेकिन लंबा भी नहीं जिएंगे। लोगों को याद रखना चाहिए कि सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, इन तमाम देशों के गृहयुद्ध और आतंक ने उन मुसलमानों को ही सबसे अधिक मारा है जिनको मारते हुए आतंकियों ने इस्लाम का तर्क दिया था। धार्मिक आतंक महज दूसरे धर्म के लोगों को नहीं मारता, अपने लोगों को भी मारता है। वैज्ञानिक सोच और न्याय की बात करने वाले पंसारे और गौरी लंकेश को मारने वाले किसी और धर्म के नहीं थे, इन्हीं दोनों के हिन्दू धर्म के लोग ही थे, और उन हत्यारों का यह तर्क था कि वे अपने धर्म के हित में लोगों को मार रहे हैं।
इसलिए वैज्ञानिक सोच और ऑक्सीजन, इन दोनों के बीच एक बड़ा सीधा रिश्ता है जिसे समझने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

सड़क हादसों को रोकने के लिए कड़ी-कड़वी कार्रवाई जरूरी

संपादकीय
2 जुलाई 2018


कल एक ही दिन बहुत से ऐसे सड़क हादसे हुए जिसमें से एक, उत्तराखंड की एक बस खाई में गिरी, और करीब पचास लोग मारे गए। छत्तीसगढ़ से लगे महाराष्ट्र में एक ही हादसे में पांच लोग जान खो बैठे। इसके अलावा छोटे-छोटे हादसे तो खबरों में इस तरह आते-जाते हैं कि जब तक कोई अधिक चर्चित मौत उसमें न हो, लोग शायद खबर की सुर्खी के नीचे का समाचार पढ़ते भी नहीं हैं। हिन्दुस्तानी लोग सड़क हादसों को लेकर ठीक उसी तरह संवेदनाशून्य हो गए हैं जिस तरह गंदगी को लेकर हो गए हैं। इस देश में लोग गंदगी, सड़क हादसे, भ्रष्टाचार, ऐसी कई चीजों को अपनी नियति मानकर चलते हैं, और उन्हें इनसे कोई खास शिकायत भी नहीं रहती। हादसों में होने वाली मौतों को कम करने की आधी-अधूरी कोशिशें ऐसी बेदिली से होती हैं कि उनका कोई असर होता नहीं है। 
देश के कुछ महानगरों को अगर छोड़ दें जहां कि बड़ी संख्या में पुलिस तैनात रहती है, और कैमरे भी लगे हुए हैं, तो देश के बाकी तमाम शहरों में सड़क हादसों को रोकने लायक कोई चौकसी नहीं होती। आम गाडिय़ों की बात तो छोड़ ही दें, स्कूल की बसें तक कहीं ड्राइवर नशे में चला रहे हैं, तो कहीं बिना ड्राइविंग लाईसेंस वाले कोई क्लीनर भी स्कूल बस चला लेते हैं। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक से अधिक बार देश में राज्य सरकारों के आरटीओ विभाग के भ्रष्टाचार के बारे में सार्वजनिक बयान दिया है, और यह भ्रष्टाचार ऐसे हादसों के पीछे की एक बड़ी वजह है। न तो गाडिय़ों पर कोई काबू है, न ही चलाने वालों पर। नतीजा यह होता है कि हादसों के बाद सत्ता के आंसू जारी होते हैं, और उसके अगले पल से ही वही ढर्रा चल निकलता है जो कि जगह-जगह जान लेता है। जब लोग खुद अपनी हिफाजत के लिए न जागरूक हैं, न चौकन्ने हैं, तो सरकार को ही यह कड़वा काम करना पड़ता है। 
छत्तीसगढ़ में हम लगातार देखते हैं कि हेलमेट के लिए भूले-भटके किसी शहर में कुछ हफ्तों के लिए पुलिस की कड़ी जांच होती है, और अचानक शहर के लोगों को यह लगने लगता है कि उनका सिर भी कीमती है, और उनका दिमाग भी कीमती है, इसलिए वे कुछ सौ रूपए का चालान पटाने के बजाय कुछ सौ रूपए का हेलमेट पहन लेते हैं। लेकिन जैसे ही पुलिस की कड़ाई खत्म होती है, लोगों को लगता है कि उनका सिर आजाद भारत में आजाद ही रहना चाहिए, और हेलमेट की सुरक्षा का कैदी नहीं रहना चाहिए। ऐसी ही जांच बड़ी गाडिय़ों की रफ्तार, उनमें सीटबेल्ट के इस्तेमाल, और गाड़ी चलाने वालों के नशे की हालत को लेकर है। न कोई जांच हो पाती है, और न ही कार्रवाई ऐसी होती है कि लोग इससे डरें। जो विकसित और समझदार देश हैं उनमें बिना लाईसेंस गाड़ी चलाने पर भारी जुर्माना और कैद भी होती है, और एक से अधिक बार ट्रैफिक-गलती करने पर लाईसेंस निलंबित भी हो जाता है, और लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है। जिस प्रदेश को अपनी सड़कों पर अराजकता को खत्म करना हो, उसे कुछ कड़ाई तो बरतनी ही होगी, जो कि जनता के भले के लिए होगी, और यह भी तय है कि वह शुरू में कोई लोकप्रिय कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन सरकारों को जनता के हित में कभी-कभी कड़ी और कड़वी कार्रवाई भी करनी पड़ती है जो कि आगे जाकर जनता की जिंदगी बचाने वाली साबित होती है। 
छत्तीसगढ़ में रोजाना इतने सड़क हादसे हो रहे हैं कि उनसे सबक लेकर सरकार को कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए और नियमों में जो सबसे कड़े प्रावधान है, उनके मुताबिक जुर्माना और सजा देना चाहिए, गाडिय़ां जब्त करनी चाहिए। एक गैरजिम्मेदार और लापरवाह की वजह से बाकी लोगों की जिंदगी खतरे में डालना सरकार की गैरजिम्मेदारी के सिवाय और कुछ नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 जुलाई

हिंदुस्तान को पाकिस्तान से कुछ सीखने की जरूरत

संपादकीय
1 जुलाई 2018


हिन्दुस्तान के एक बड़े तबके में पाकिस्तान को लेकर एक स्थायी नाराजगी बनी रहती है। बहुत से लोगों के जख्म विभाजन के वक्त के हैं जब दसियों लाख लोग बेदखल हुए थे, और लाखों लोग मारे गए थे। इसके बाद कई जंग और टकराव, भारत पर आतंकी हमले। इसलिए पाकिस्तान का नाम भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से को पड़ोसी देश के बजाय दुश्मन देश की याद दिलाता है। और भारत में राष्ट्रवाद की सोच का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से दुश्मनी की धारणा पर टिका हुआ है। ऐसे में कोई अगर हिंदुस्तान में यह कहे कि उसे पाकिस्तान से कुछ सीखने की जरूरत है, तो जाहिर है कि ऐसी नसीहत बहुत से लोगों को खफा भी करेगी। लेकिन आज की एक खबर ऐसा ही कुछ करने का मौका है। 
दुनिया की संसदों पर काम करने वाले एक संगठन इंटर पार्लियामेंट यूनियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से 199 देशों में पाकिस्तान 89वें नंबर पर है, और भारत उससे बहुत से नीचे 148वीं जगह पर। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में 20.6 फीसदी महिला सांसद हैं, और भारतीय लोकसभा में सिर्फ 11.8 फीसदी। वहां की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें रिजर्व हैं और पार्टियां पहले ही अपनी महिला उम्मीदवारों के नाम चुनाव आयोग को दे देती हैं जो उनकी बाकी जीती सीटों के अनुपात में चुन ली जाती हंै। वहां अब यह भी कर दिया गया है कि इन मनोनीत सीटों के अलावा भी पार्टियों को बाकी सीटों पर कम से कम पांच फीसदी महिलाओं को उम्मीदवार बनाा होगा। चुनाव आयोग ने यह भी किया है कि किसी इलाके में दस फीसदी से कम महिलाएं वोट डालती हैं तो वहां दुबारा मतदान होगा।
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं की मौजूदगी कानून के चलते और बढऩे जा रही है, लेकिन हिंदुस्तान में महिला आरक्षण विधेयक अब खबरों के भी बाहर हो गया है। अब इसे संसद में गुजरे भी दस बरस हो गए हैं। राज्यसभा ने इसे 2010 में पास कर दिया था लेकिन लोकसभा ने इस पर कभी वोट नहीं किया। जबकि इसी संसद ने देश की पंचायतों और म्युनिसिपलों के लिए महिला आरक्षण कानून 1993 में ही बना दिया। अब उसे पच्चीस बरस हो गए हैं। जिस देश की संसद जानती और मानती है कि देश के हर गांव में महिला पंच, दलित महिला पंच, आदिवासी महिला पंच ओबीसी महिला पंच मिल सकती है, उस संसद को विधानसभा सीट और लोकसभा सीट पर महिला प्रतिनिधि मिलने की उम्मीद नहीं है। यह संसद का एक मर्दाना पाखंड है। जिस संसद में इसी दौर में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बैनर्जी जैसी महिला मुखिया रही हों, उस संसद ने महिला आरक्षण की चर्चा ही छोड़ दी। आज अगर ये तीन महिलाएं एक साथ उठ खड़ी हों, तो बाकी पार्टियों को भी महिला आरक्षण, मजबूरी में ही सही, मानना पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत पाने के बाद भारत की महिला नेताओं के भीतर भी मर्दाना मिजाज कब्जा कर लेता है,और महिलाओं की चर्चा बंद हो जाती है।
इस देश ने समय-समय पर तरह-तरह के गैर राजनीतिक या बहुदलीय आंदोलन देखे हैं। आज जब अगला आम चुनाव एक बरस दूर है, तो ऐसे ही एक आंदोलन की जरूरत है जिसे 2018 का कोई जेपी, कोई अन्ना, कोई केजरीवाल, कोई भी शुरू करे। यह आंदोलन ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि मतदाता सिर्फ महिला उम्मीदवार को वोट करें। अगर किसी सीट पर दो महिलाएं हैं तो वे मर्जी से छांटें, अगर कोई अकेली महिला है, तो सिर्फ उसे वोट दें। एक बार अगर ऐसा आंदोलन जोर पकड़ लेगा तो अगले चुनाव के पहले महिला आरक्षण लागू हो चुका रहेगा। देश भर में लोग आज से सांसदों को घेरें, पार्टियों के नेताओं को घेरें और महिला आरक्षण पर सवाल पूछें, उन्हें मजबूर करें। पाकिस्तान से बहुत से लोगों को नफरत तो बहुत है लेकिन यह वक्त उससे कुछ सीखने का है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 जुलाई