आत्मग्लानि और अपराधबोध से मुक्ति कोई हिन्दुस्तानियों से सीखे

संपादकीय
4 जुलाई 2018


विश्वकप फुटबॉल में जापान की टीम बेल्जियम से हारी, तो दोनों ही टीमों के चेहरे देखने लायक थे, और इन दोनों को साथ-साथ देखें तो कहीं खुशी, कहीं गम की एक तस्वीर दिख रही थी। जापानी प्रशंसक धाड़ मार-मारकर रो रहे थे, और जाहिर है कि जीतने वाली टीम के बेल्जियम के प्रशंसक वहां की परंपरागत पोशाकों में खुशियां मना रहे थे। लेकिन यह बात तो इस जगह लिखने लायक है नहीं, लिखने लायक इसके बाद की बात है। आज जो तस्वीरें सामने आई हैं वे बताती हैं कि किस तरह जापान की टीम ने अपने ड्रेसिंग रूम को झाड़-पोंछकर साफ-सुथरा किया, और फिर वहां पर धन्यवाद की एक तख्ती लगाकर टीम वहां से गई। दूसरी तरफ मैच हार जाने के बाद भी जापान के प्रशंसकों ने अपने देश की प्रथा के मुताबिक स्टेडियम की दर्शकदीर्घा का सारा कचरा साफ किया, कचरे के बैग घूरों के हवाले किए, और फिर वहां से गए। यह उस वक्त किया जब ये प्रशंसक रोते भी जा रहे थे। दूसरी तरफ हारकर दक्षिण कोरिया पहुंची टीम पर वहां के नागरिकों ने अंडे फेंके, और वे तस्वीरें भी सामने आई हैं। एक दूसरी थाईलैंड की है जहां पर दर्जन भर फुटबॉल खिलाड़ी बच्चे एक ऐसी गुफा में फंस गए हैं जो कि पानी में डूब चुकी है, और वे गुफा के भीतर एक करिश्मे की तरह जिंदा बचे हुए मिले हैं, और अब वहां बचाव दल ने ऑक्सीजन पहुंचा दी है, खाना पहुंचा दिया है, लेकिन आने वाले एक से लेकर चार महीने तक का वक्त इन बच्चों को गुफा में ही रहना पड़ेगा क्योंकि तब तक रास्ते का पानी कम नहीं होना है, और वहां से उसे पार करके निकलना मुमकिन नहीं है। लेकिन इसी खबर में एक हिस्सा आया है कि दो डॉक्टरों ने खुद होकर गोताखोरों के साथ उस गुफा में जाकर चार महीने तक बच्चों के साथ रहना तय किया है ताकि उनकी सेहत ठीक रहे। 
भलमनसाहत की ऐसी कहानियां चारों तरफ से आती हैं, और ऐसे में जब भलमनसाहत के ठीक खिलाफ कुछ होते दिखता है, तो लगता है कि क्या सचमुच ऐसे दो अलग-अलग किस्मों के लोग एक ही धरती के बाशिंदे हैं? यह भी लगता है कि किसी भी पीढ़ी के लोगों को जिंदगी तो बस एक ही मिलती है, और वह जिंदगी अगर जापान की तरह के जिम्मेदार लोगों जैसी साफ-सुथरी हो तो भी वह एक ही जिंदगी रहेगी, और अगर वह हिन्दुस्तान के लोगों सरीखी गंदी जिंदगी रहेगी, तो भी एक पूरी जिंदगी उस गंदगी के बीच ही गुजारनी है। एक तरफ ऐसे वालंटियर हैं जो कि गुफा में फंसे हुए बच्चों को बचाने के लिए अपनी डॉक्टरी छोड़कर चार महीने के लिए अपनी खुद की जिंदगी जोखिम में डालकर एक गुफा में जा रहे हैं, दूसरी तरफ हफ्ते भर के भीतर मंदसौर में बच्ची से बलात्कार के बाद उसी मध्यप्रदेश के सतना में बच्ची से बलात्कार कर रहे हैं, जम्मू में बलात्कारियों को बचाने के लिए देश का झंडा लेकर जुलूस निकाल रहे हैं। आखिर किसी देश की पहचान उसके लोगों से परे क्या हो सकती है? जहां देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज को यह कहना पड़ता है कि गाय को बचाने के पाखंड में भीड़ इंसानों को मार डाले, यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, वहां सवाल यह उठता है कि देश में मौजूदा कानून तोडऩे के लिए गौ-गुंडों की भीड़ अधिक बड़ी मुजरिम है, या कि इस भीड़ को अनदेखा करने के लिए मौजूदा कानून का इस्तेमाल न करने वाली सरकार अधिक बड़ी मुजरिम हैं।
अपने आप पर आत्ममुग्ध, और एक नाजायज आत्मगौरव का शिकार यह देश अपने खुद के कुकर्मों को अनदेखा करने का आदी भी हो गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वह देश और दुनिया के इतिहास में अपने को नापसंद चीजों को अनदेखा करने का आदी हो गया है। जो देश अपने कुकर्मों पर आत्मग्लानि और अपराधबोध के बोझ से पूरी तरह मुक्त हो चुका है, उस देश को रोजाना नए-नए कुकर्मों और अपराधों से बचा पाना मुमकिन भी नहीं है। इस देश में जितनी बच्चियां हैं, जुर्म की उतनी ही संभावनाएं अभी बाकी हैं। और अब तो अपराधबोधमुक्त यह देश धर्म और जाति के आधार पर बच्चियों से बलात्कार को जायज भी ठहराने लगा है, और अगर यह बलात्कार किसी एक खास धर्म के बलात्कारी द्वारा किसी दूसरे धर्म की बच्ची के साथ किया गया है, तो वह तिरंगे झंडे से सम्मान के लायक राष्ट्रप्रेम का काम भी गिना जा रहा है। 
ऐसी दुनिया में जापान के लोगों को दूसरे देश में मैच हार जाने के बाद भी कचरा साफ करते देखना इतना अजीब लगता है कि क्या ये जापानी भी इसी धरती के रहने वाले हैं? क्यों ये लोग कचरा छोड़कर जाने के अपराधबोध और आत्मग्लानि से आजाद नहीं हो पा रहे हैं जब हिन्दुस्तानी मर्द किसी बच्ची की देह में अपना कचरा छोड़कर जाते-जाते लोहे की छड़ और लकड़ी भी ठूंसकर बिना किसी अपराधबोध के जा सकते हैं, और समर्थक पा सकते हैं। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें