संपादकीय
1 जुलाई 2018

हिन्दुस्तान के एक बड़े तबके में पाकिस्तान को लेकर एक स्थायी नाराजगी बनी रहती है। बहुत से लोगों के जख्म विभाजन के वक्त के हैं जब दसियों लाख लोग बेदखल हुए थे, और लाखों लोग मारे गए थे। इसके बाद कई जंग और टकराव, भारत पर आतंकी हमले। इसलिए पाकिस्तान का नाम भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से को पड़ोसी देश के बजाय दुश्मन देश की याद दिलाता है। और भारत में राष्ट्रवाद की सोच का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से दुश्मनी की धारणा पर टिका हुआ है। ऐसे में कोई अगर हिंदुस्तान में यह कहे कि उसे पाकिस्तान से कुछ सीखने की जरूरत है, तो जाहिर है कि ऐसी नसीहत बहुत से लोगों को खफा भी करेगी। लेकिन आज की एक खबर ऐसा ही कुछ करने का मौका है।
दुनिया की संसदों पर काम करने वाले एक संगठन इंटर पार्लियामेंट यूनियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से 199 देशों में पाकिस्तान 89वें नंबर पर है, और भारत उससे बहुत से नीचे 148वीं जगह पर। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में 20.6 फीसदी महिला सांसद हैं, और भारतीय लोकसभा में सिर्फ 11.8 फीसदी। वहां की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें रिजर्व हैं और पार्टियां पहले ही अपनी महिला उम्मीदवारों के नाम चुनाव आयोग को दे देती हैं जो उनकी बाकी जीती सीटों के अनुपात में चुन ली जाती हंै। वहां अब यह भी कर दिया गया है कि इन मनोनीत सीटों के अलावा भी पार्टियों को बाकी सीटों पर कम से कम पांच फीसदी महिलाओं को उम्मीदवार बनाा होगा। चुनाव आयोग ने यह भी किया है कि किसी इलाके में दस फीसदी से कम महिलाएं वोट डालती हैं तो वहां दुबारा मतदान होगा।
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं की मौजूदगी कानून के चलते और बढऩे जा रही है, लेकिन हिंदुस्तान में महिला आरक्षण विधेयक अब खबरों के भी बाहर हो गया है। अब इसे संसद में गुजरे भी दस बरस हो गए हैं। राज्यसभा ने इसे 2010 में पास कर दिया था लेकिन लोकसभा ने इस पर कभी वोट नहीं किया। जबकि इसी संसद ने देश की पंचायतों और म्युनिसिपलों के लिए महिला आरक्षण कानून 1993 में ही बना दिया। अब उसे पच्चीस बरस हो गए हैं। जिस देश की संसद जानती और मानती है कि देश के हर गांव में महिला पंच, दलित महिला पंच, आदिवासी महिला पंच ओबीसी महिला पंच मिल सकती है, उस संसद को विधानसभा सीट और लोकसभा सीट पर महिला प्रतिनिधि मिलने की उम्मीद नहीं है। यह संसद का एक मर्दाना पाखंड है। जिस संसद में इसी दौर में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बैनर्जी जैसी महिला मुखिया रही हों, उस संसद ने महिला आरक्षण की चर्चा ही छोड़ दी। आज अगर ये तीन महिलाएं एक साथ उठ खड़ी हों, तो बाकी पार्टियों को भी महिला आरक्षण, मजबूरी में ही सही, मानना पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत पाने के बाद भारत की महिला नेताओं के भीतर भी मर्दाना मिजाज कब्जा कर लेता है,और महिलाओं की चर्चा बंद हो जाती है।
इस देश ने समय-समय पर तरह-तरह के गैर राजनीतिक या बहुदलीय आंदोलन देखे हैं। आज जब अगला आम चुनाव एक बरस दूर है, तो ऐसे ही एक आंदोलन की जरूरत है जिसे 2018 का कोई जेपी, कोई अन्ना, कोई केजरीवाल, कोई भी शुरू करे। यह आंदोलन ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि मतदाता सिर्फ महिला उम्मीदवार को वोट करें। अगर किसी सीट पर दो महिलाएं हैं तो वे मर्जी से छांटें, अगर कोई अकेली महिला है, तो सिर्फ उसे वोट दें। एक बार अगर ऐसा आंदोलन जोर पकड़ लेगा तो अगले चुनाव के पहले महिला आरक्षण लागू हो चुका रहेगा। देश भर में लोग आज से सांसदों को घेरें, पार्टियों के नेताओं को घेरें और महिला आरक्षण पर सवाल पूछें, उन्हें मजबूर करें। पाकिस्तान से बहुत से लोगों को नफरत तो बहुत है लेकिन यह वक्त उससे कुछ सीखने का है। (Daily Chhattisgarh)
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