2 जुलाई 2018

दिल्ली के एक मकान से कल जिस तरह ग्यारह टंगी हुई लाशें मिली हैं, और पहली नजर में, पहली जानकारी से ऐसा लग रहा है कि परिवार के लोग किसी आध्यात्म, टोना-टोटका, या जादू-मंत्र के चक्कर में पड़े हुए थे, और परिवार के लोग धर्म और धार्मिक अनुष्ठानों में गहरे डूबे हुए थे, और कई अजीब तरह के अनुष्ठान भी परिवार में होते रहते थे, परिवार तंत्र-साधना पर यकीन करता था। अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि इन सब लोगों ने बिल्कुल एक ही तरह आंख-मुंह पर सब पर टेप बांधकर एक साथ खुदकुशी की, या फिर कुछ लोगों ने पहले दूसरों को फंदों पर टांगा, और आखिर में खुद भी आत्महत्या कर ली। ये तमाम बातें आज-कल में जांच में सामने आएंगी, लेकिन परिवार बहुत बुरी तरह पूजा-पाठ, धर्म-आध्यात्म में डूबा हुआ था। परिवार का एक सदस्य पांच बरस से मौन व्रत पर था। यह दुनिया का शायद अकेला ऐसा मामला है जिसमें किसी एक परिवार के सारे के सारे लोगों ने इस तरह से हत्या-आत्महत्या की है। परिवार में मिले हुए हाथ के लिखे रजिस्टर बताते हैं कि यह परिवार मोक्ष की चाह में ऐसी हरकत कर सकता है जिसमें यह भी लिखा हुआ है कि वे लोग परमात्मा में लीन हो रहे हैं, और आंख-कान बंद कर रहे हैं ताकि बुरी बातें न सुनें, न देखें। परिवार ने ठीक इस लिखे मुताबिक आंख और कान रूई रखकर टेप लगाकर बंद कर रखे थे, और मोक्ष प्राप्ति के अपने तरीके से उन्होंने हत्या-आत्महत्या की है।
अब इससे अलग कुछ और वारदातों को देखें तो कल ही महाराष्ट्र के धुले में भीड़ ने बच्चा चोर होने के शक में पांच लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह भरे बाजार में खुलेआम हुआ है, और लोगों ने मर जाने तक इन लोगों को पीटा। इसके पहले हर हफ्ते कहीं न कहीं किसी बेकसूर को लोग बच्चा चोर समझकर, या गाय तस्कर समझकर, या गोमांस बेचने वाला समझकर मार रहे हैं। यह खुलकर हो रहा है, रौशनी में हो रहा है, और पूरी भीड़ मिलकर इसे कर रही है। इस सिलसिले में त्रिपुरा के एक मंत्री का बयान गौर करने लायक है जिसमें उसने वहां पर बच्चे की एक लाश मिलने पर यह सार्वजनिक बयान दिया कि लाश में से किडनी गायब है। बाद में पोस्टमार्टम हुआ तो उसमें शरीर के भीतर किडनियां बराबर पाई गईं। लेकिन एक मंत्री के इस सार्वजनिक बयान से हुआ यह कि लोगों के मन में यह शक बैठ गया कि बच्चों की चोरी करके उनके अंग निकाले जा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि ऐसे शक के चलते त्रिपुरा में फेरी लगा रहे उत्तरप्रदेश के एक आदमी को लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला।
तेलंगाना और आंध्र में इसी तरह बच्चा चोरी के शक में भीड़ द्वारा हिंसा की जांच में यह बात सामने आई कि पाकिस्तान में बने हुए किसी एक वीडियो को फैलाकर भारत में ऐसी दहशत फैलाई गई कि बच्चाचोर गिरोह घूम रहे हैं।
ऐसे बहुत से दूसरे मामलों को देखें तो यह साफ है कि देश के लोग अब महज गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाकर संतुष्ट नहीं हैं। किसी अफवाह के चलते वे जब तक लोगों को पीट-पीटकर मार न डालें, उनकी भीड़ का कलेजा ठंडा नहीं पड़ता है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, इसलिए कि यह भीड़ की उस मानसिकता को बताता है जिसे रातोंरात न सरकार बदल सकती, न ही अदालतें उस पर काबू पा सकतीं, और न ही समाज में अक्ल की बात करने वाले, अंधविश्वास-विरोधी लोग इस तस्वीर को तेजी से बदल सकते। हालत यह है कि तर्क और समझ की बात करने वाले पंसारे को महाराष्ट्र में मारा जाता है, और गौरी लंकेश को कर्नाटक में। और तर्क यह दिया जाता है कि ये लोग हिन्दू धर्म का विरोध कर रहे थे, और इनको मारना धर्म के हित में किया गया समझकर इनकी हत्या की गई।
धर्म के हित का काम समझकर ही कहीं तालिबान, तो कहीं आईएसआईएस के लोग अनगिनत कत्ल करते हैं, औरतों से बलात्कार करते हैं, उन्हें सेक्स-गुलाम बनाते हैं, और उनकी ज्यादतियों की फेहरिस्त रोजाना लंबी होती चलती है। इस हालत को देखें और इसकी वजहें सोचें तो एक दूसरी मिसाल पर गौर करना ठीक लगता है।
इन दिनों वॉट्सऐप पर एक वैज्ञानिक तथ्य भी घूम रहा है, और उस पर भरोसा करने के पहले जब उसकी जांच की गई, तो वह सौ फीसदी सच निकला। इसमें कहा गया है कि अगर दुनिया पांच सेकेंड के लिए ऑक्सीजन से परे हो जाए, या ऐसा कहें कि ऑक्सीजन इस दुनिया से हट जाए, तो क्या-क्या होगा? पहली बात तो यह होगी कि दिन में ही अंधेरा छा जाएगा क्योंकि सूरज की रौशनी धरती तक लाने में ऑक्सीजन का भी काम रहता है। दूसरी बात यह होगी कि पांवतले से धरती फटने लगेगी क्योंकि धरती में बहुत बड़ा हिस्सा ऑक्सीजन का है, और उसके हट जाने से हम धंसती जमीन में नीचे चले जाएंगे। जो लोग समंदर के किनारे रहेंगे, वे बहुत बुरी तरह सूरज की धूप से झुलस जाएंगे। लोगों के कान के पर्दे फट जाएंगे। समंदर और झील-तालाब सभी जगह से पानी भाप बनकर उडऩे लगेगा। दुनिया भर में इलेक्ट्रिक कारों को छोड़कर बाकी किसी भी किस्म के ईंधन से चलने वाली तमाम गाडिय़ां थम जाएंगी क्योंकि उनमें ईंधन को जलाने के लिए ऑक्सीजन लगता है, और उसके बिना इंजन नहीं चलते। एक साथ पड़े हुए धातु के टुकड़े जुड़ जाएंगे, और कांक्रीट के ढांचे चूर-चूर हो जाएंगे।
अब जिस ऑक्सीजन को इंसान रात-दिन अपनी सिगरेट से लेकर कारखानों की चिमनियों तक से खत्म कर रहे हैं, कचरा जलाने से लेकर पेड़ घटाने तक ऑक्सीजन को खत्म कर रहे हैं, उस ऑक्सीजन की यह अहमियत है कि पल भर के भीतर दुनिया थम जाएगी, और धराशायी हो जाएगी।
कुछ ऐसा ही हाल लोगों के बीच वैज्ञानिक सोच का है जिससे लोकतंत्र अपने आप जुड़ा हुआ है, और इंसाफ भी। जब लोगों में वैज्ञानिक सोच खत्म होती है, तो न उन्हें इंसानियत का ख्याल रहता, न कानून का, न ही समाज की सही मान्यताओं का। वैसे में लोग भीड़ बनकर एक-दूसरे को मारने लगते हैं, पूरी भीड़ एकजुट होकर किसी एक बेबस को मारने लग जाती है। किसी देश और समाज में वैज्ञानिक सोच की अहमियत कुछ वैसी ही है जैसी कि धरती पर, इस दुनिया में, ऑक्सीजन की है। आज जो लोग अपने तबके की हिंसा पर तालियां बजा रहे हैं, जिन्हें मारे जाते इंसान एक दुश्मन के कम होने सरीखे लग रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि इंसानियत की ऑक्सीजन का घटना किसी एक दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, ऑक्सीजन की यह कमी, इंसाफ की ऑक्सीजन की यह कमी आगे-पीछे उनके दायरे से भी ऑक्सीजन हटा ले जाएगी, और वे चूर-चूर हो जाएंगे।
कुदरत से बहुत सी चीजों को सीखा जा सकता है, उनमें से एक बात तो यह भी है कि दुनिया को चलाने के लिए किन-किन बातों की जरूरत ऑक्सीजन जितनी ही जरूरी है, हालांकि उनकी कमी से पांच सेकेंड में तो लोग नहीं मरेंगे, लेकिन लंबा भी नहीं जिएंगे। लोगों को याद रखना चाहिए कि सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, इन तमाम देशों के गृहयुद्ध और आतंक ने उन मुसलमानों को ही सबसे अधिक मारा है जिनको मारते हुए आतंकियों ने इस्लाम का तर्क दिया था। धार्मिक आतंक महज दूसरे धर्म के लोगों को नहीं मारता, अपने लोगों को भी मारता है। वैज्ञानिक सोच और न्याय की बात करने वाले पंसारे और गौरी लंकेश को मारने वाले किसी और धर्म के नहीं थे, इन्हीं दोनों के हिन्दू धर्म के लोग ही थे, और उन हत्यारों का यह तर्क था कि वे अपने धर्म के हित में लोगों को मार रहे हैं।
इसलिए वैज्ञानिक सोच और ऑक्सीजन, इन दोनों के बीच एक बड़ा सीधा रिश्ता है जिसे समझने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

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