दीवारों पर लिक्खा है, 5 दिसंबर

राज्यपाल-राष्ट्रपति का क्षमादान का अधिकार पूरी तरह अलोकतांत्रिक

संपादकीय
5 दिसंबर 2018


सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक के एक फैसले को पलटा है जिसमें उन्होंने उत्तरप्रदेश के एक ऐसे हत्यारे की सजा को माफ कर दिया था जिसने चार राजनीतिक हत्याएं की थी, और अभी वह सात साल ही सजा काट पाया था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के इस क्षमादान को पूरी तरह असंवैधानिक मानते हुए, हैरानी और अफसोस जाहिर करते हुए इस फैसले को खारिज किया, और यह कहा कि वह इसके बारे में कुछ अधिक कहना नहीं चाहता। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बहुत कुछ कह दिया है कि राज्यपाल का यह फैसला या तो कुछ कहने के लायक नहीं है, या फिर कुछ ऐसा कहने के लायक है जो कि सुप्रीम कोर्ट ने राजभवन की इज्जत को ध्यान में रखते हुए छोड़ दिया है। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम राज्यपाल और राष्ट्रपति के किसी भी मुजरिम को क्षमादान देने के ऐसे अधिकार के खिलाफ पहले भी लिखते आए हैं। लोकतंत्र में किसी के विवेक पर किसी जिंदगी और मौत को नहीं छोड़ा जा सकता। कई ऐसे मौके रहते हैं जब राष्ट्रपति के पास ऐसे मामले पहुंचते हैं जिनसे देश की राजनीति या साम्प्रदायिकता बहुत बुरी तरह जुड़ी रहती हैं। और ऐसे में केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के ऊपर एक बहुत बड़ा दबाव भी रहता है कि जनभावनाओं को देखते हुए वे क्या फैसला लें। ऐसे में इतिहास गवाह है कि बहुत से फैसले क्षेत्रीयता, जातीयता, या राजनीतिक प्राथमिकता के आधार पर लिए गए। लोकतंत्र इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी व्यक्ति को तथाकथित ईश्वर जैसा दर्जा दे दिया जाए, और वह जिसकी चाहे उसकी जिंदगी बचा सके। लोकतंत्र और विवेकाधिकार साथ-साथ नहीं चल सकते। 
जब इस देश में जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ऐसे जानलेवा मामलों की सुनवाई कई-कई दशक तक चलती है, और अधिकतर मामलों में चौथाई सदी निकल जाती है, तब कहीं किसी दुर्लभ मामले में फांसी की नौबत आती है। जब देश के आधा दर्जन छोटे-बड़े जज बारी-बारी से ऐसे किसी मामले में फैसला ले चुके रहते हैं, तो केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के हवाले ऐसा कोई फैसला कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही संस्थाएं वोटों पर जिंदा हैं, और वोटों की अपनी मजबूरियां होती हैं। चूंकि जज चुनकर नहीं आते हैं, इसलिए वे अधिक निष्पक्ष और ईमानदार फैसला ले सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तरप्रदेश के राज्यपाल का यह फैसला इस शक्ल में आया कि उसे बड़ी कड़ी जुबान का इस्तेमाल करना पड़ा। इस फैसले को लेकर ही देश की न्याय व्यवस्था में ऐसे फेरबदल के लिए एक जनमत बनाने की जरूरत है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ही देश का आखिरी फैसला लेने वाली संस्था हो। जब कोई मामला कानूनी-अदालती कार्रवाई से गुजरकर धीमी रफ्तार से किसी तर्कसंगत-न्यायसंगत नतीजे तक पहुंचता है, तब राजभवन में बैठे हुए लोगों और राष्ट्रपति भवन में बैठे हुए किसी व्यक्ति को उस नतीजे को पलटने की इजाजत बिल्कुल भी नहीं देनी चाहिए। देश के कई राजभवनों में इतिहास ने भ्रष्ट लोगों को देखा हुआ है। ऐसे में किसी दिन यह भी हो सकता है कि राजभवन को रिश्वत देकर कोई मुजरिम जिंदगी खरीद ले। कानून के तहत चलने वाले मुकदमों में अदालत से परे किसी फैसले के लिए लोकतंत्र में कोई गुंजाइश नहीं है।  

(Daily Chhattisgarh)

योगीराज का यह बदहाल बहुत हैरान नहीं करता है

संपादकीय
4 दिसंबर 2018


उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में कल जिस तरह एक गाय मारने का आरोप लगाती हुई भीड़ ने जिस तरह वहां तैनात एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी, उस पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को तो कोई फिक्र नहीं होगी, लेकिन बाकी देश को यह सोचना चाहिए कि गाय के नाम पर हिंसा और गुंडागर्दी करके गर्व महसूस करने वाले लोगों ने देश को आज यह किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि एक धर्मालु-हिंदू पुलिस इंस्पेक्टर ड्यूटी करते हुए धर्मांध और हिंसक हिंदू भीड़ के हाथों मारा जाता है, और यह सब कुछ गाय के नाम पर होता है। उत्तरप्रदेश सरकार की बढ़ाई गई, सरकार की फैलाई गई साम्प्रदायिकता के उकसावे में सुलग रहा है, जल रहा है, और किसी भी दिन बड़े विस्फोट का शिकार हो सकता है। जिस तरह घोर साम्प्रदायिक हिंदू संगठनों के पदाधिकारियों ने कल की इस हत्या की अगुवाई की है, उन सबके नाम पुलिस की रिपोर्ट में सामने आ गए हैं, और वे सब योगीराज में लगातार सक्रिय और सत्ता के संरक्षण में आगे बढ़ रहे संगठनों के लोग हैं।
भीड़ जब हत्यारी हो जाती है, तो उसके पीछे या तो उस देश-प्रदेश की सरकार का परले दर्जे का निकम्मापन होता है या बहुत से मामलों में यह सरकार का दिया हुआ बढ़ावा होता है। उत्तरप्रदेश में ये दोनों ही बातें दिख रही हैं। एक तरफ तो योगी आदित्यनाथ चुनाव में कम से कम चार प्रदेशों में अब तक भड़काऊ और जलाऊ भाषण देते हुए घूम रहे हैं, और दूसरी तरफ खुद उनके प्रदेश में कानून की हालत जल रही है। जिस तरह उत्तरप्रदेश का भौतिक भगवाकरण सरकारी खर्च पर किया गया है, जिस तरह उस प्रदेश को एक हिंदू राज बनाया गया है, उसे देखते हुए अब महज सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद हो सकती है कि वह देश के इस सबसे बड़े प्रदेश में लोकतंत्र वापिस स्थापित करे। कहने के लिए सुप्रीम कोर्ट पिछले महीनों में भीड़ हत्याओं को लेकर सरकारों को काफी फटकार लगा चुका है, लेकिन यह भीड़ हत्या को और चार कदम आगे बढ़ चुकी है जिसमें ड्यूटी कर रहा अच्छी साख वाला एक जिम्मेदार पुलिस इंस्पेक्टर मारा गया, और उसकी हत्या का वीडियो बनाकर हत्यारे फख्र हासिल कर रहे हैं। यह बात भी सामने आई है कि यह इंस्पेक्टर पहले एक दूसरी भीड़ हत्या की जांच कर रहा था, और ईमानदारी से कर रहा था, इसलिए उसे वहां से हटाया गया, और आज इस इंस्पेक्टर की बहन ने यह आरोप लगाया है कि उसके भाई की हत्या में पुलिस वाले भी शामिल हैं।
उत्तर भारत में ही बगल के बिहार में अनाथाश्रमों की बच्चियों से संगठित और लंबे समय से चल रहे, सत्तारूढ़ मेहरबानी वाले लोगों द्वारा बलात्कार पर सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार, उसके अफसरों, और उसकी पुलिस को इतना फटकार चुका है कि इसके बाद राज्य सरकार को बर्खास्त करना ही बाकी रह जाता है। और हफ्ते भर के भीतर पड़ोस के उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक अराजकता इस कदर हावी हो गई है कि हिंदू गुंडों ने हिंदू इंस्पेक्टर की ही हत्या कर दी। सुनने वालों को इस बात में साम्प्रदायिकता नजर नहीं आएगी, लेकिन यह पूरा मुद्दा किसी गाय को मारने के आरोप में एक साम्प्रदायिक तनाव खड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं था। जिस राज्य का मुख्यमंत्री अपने राज्य में साम्प्रदायिकता के बीज बोने के लिए सरकारी खर्च करने के बाद दूसरे राज्यों में घूम-घूमकर नफरत फैला रहा है, उस राज्य का यह हाल बहुत हैरान नहीं करता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 दिसंबर

लोकतंत्र में लोकतंत्र का सम्मान जरूरी होता है

संपादकीय
3 दिसंबर 2018


देश की राजधानी दिल्ली के सबसे व्यस्त और सबसे पुराने बाजार, चांदनी चौक, के इलाके में मेवे की एक दुकान के नीचे तहखाने में ऐसे बहुत से लॉकर पकड़ाए हैं जिनमें 25 करोड़ रूपए की नगदी बरामद हुई है। दूसरी तरफ कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस एक ऐसे नौजवान शादीशुदा जोड़े को पकड़ा है जिसने अपने घर में दो हजार रूपए वाले नोट, पांच करोड़ दाम के छाप रखे थे। पुलिस ने गिरफ्तारी की, और नोट जब्त कर लिया। एक अलग खबर यह कहती है कि अभी-अभी रिटायर हुए देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे ओ.पी. रावत ने कहा कि नोटबंदी का इन चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल का कोई असर नहीं पड़ा, और बड़ी तादाद में कालाधन जब्त हुआ है। कुछ अलग-अलग खबरें यह कहती हैं कि नक्सलियों के कामकाज पर नोटबंदी का कोई असर नहीं हुआ, और उन्होंने अपना हर नोट बदलवा भी लिया, और खर्च करना भी जारी रखा। छत्तीसगढ़ में अभी निपटे विधानसभा चुनाव मतदान को लेकर कुछ लोगों का यह अंदाज है कि शहरी बाजार वाली कुछ सीटों पर व्यापारियों ने थोक में कांग्रेस को वोट दिया क्योंकि वे नोटबंदी और जीएसटी दोनों के जख्मों से अब तक उबर नहीं पाए थे। देश की एक बड़ी सक्रिय महिला पत्रकार ने मध्यप्रदेश के बाद तेलंगाना, और फिर राजस्थान की चुनावी रिपोर्टिंग करते हुए ट्वीट किया है कि हर जगह उसे सिर्फ एक मुद्दा सिर चढ़कर बोलते मिला, नोटबंदी, नोटबंदी, और नोटबंदी। एक आखिरी जिक्र देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे हुए अरविंद सुब्रमण्यम का अपनी ताजा किताब में लिखा हुआ है जिसमें उन्होंने नोटबंदी को एक बहुत ही क्रूर आर्थिक झटका कहा, और यह भी साफ किया कि वे मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार तो थे, लेकिन नोटबंदी के बारे में उनसे सलाह नहीं ली गई थी। 
इन बातों की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि देश को चलाने वाली सरकार से अगर सचमुच ही इतनी बड़ी गलती हुई है, या उसने सचमुच ही इतना गलत काम किया है, तो उसे इसका अहसास कराना जरूरी है। देश के महज 31 फीसदी वोटरों ने मोदी सरकार बनाई थी, लेकिन जब सरकार बन जाती है तो वह बाकी 69 फीसदी वोटरों की भी सरकार रहती है, और वोटरों के पास सरकार को वापिस बुलाने का कोई हक भारतीय संविधान से मिला हुआ नहीं है। इसलिए सरकार के अच्छे और बुरे कामों को लेकर जनमत सामने आते रहना चाहिए, यह मीडिया के मार्फत भी होता है, सड़कों पर भी होता है, सोशल मीडिया पर भी होता है, और प्रदेशों के चुनावों में जनता की नाराजगी की शक्ल में भी दिखता है। जितने किस्म की बातें नोटबंदी की हिमायत करते हुए की गई थीं, उनमें से एक भी बात पिछले दो महीने से कई राज्यों में चल रहे चुनाव अभियान के दौरान न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद ही गिना पाए, और न ही उनकी पार्टी गिना पाई। जिस ऐतिहासिक फैसले को देश से कालाधन मिटाने वाला कहा गया था, उस फैसले का जिक्र तक करने की हिम्मत आज न केन्द्र की सत्ता में है, और न ही सत्तारूढ़ पार्टी में। इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार, और खासकर उसके प्रधानमंत्री, अगर अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार से भी चर्चा किए बिना, अपने मंत्रिमंडल से भी चर्चा किए बिना देश का यह सबसे बड़ा आर्थिक फैसला ले लेते हैं, तो उससे किस कदर तबाही हो सकती है, हुई है। और तो और जिन नए नोटों को नकल-प्रूफ कहा गया था, उनकी नकल गली-गली हो रही है, और आए दिन नकली नोट पकड़ा रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि कोई प्रधानमंत्री या कोई पार्टी चाहे कितना ही बड़ा बहुमत लेकर सत्ता पर न आ जाएं, उन्हें फैसले लेते हुए लोकतांत्रिक तरीकों का सम्मान करना चाहिए, ऐसा करना खुद उनके भले का होता है, देश के भले का तो होता ही है। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी की शहादत के बाद जब संसद में कांग्रेस पार्टी ऐतिहासिक बाहुबल के साथ बैठी थी, तब उसने सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ पाने वाली शाहबानो का गला घोंटने के लिए इसी बाहुबल का इस्तेमाल किया था, और दुनिया का इतिहास कांग्रेस को उस दकियानूसी फैसले के लिए कभी माफ नहीं करेगा। शायद नोटबंदी को भी दुनिया का इतिहास इसी तरह याद रखेगा। लोकतंत्र में लोकतंत्र का सम्मान जरूरी होता है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 दिसंबर

अपनी जान देने के बजाय अब वाजिब दाम लेने जुटे किसान..

संपादकीय
2 दिसंबर 2018


देश भर के किसान संगठन जिस तरह से कल दिल्ली पहुंचे हैं, उससे सरकार कहती चाहे जो रहे, दिल तो उसका दहल ही गया होगा। देश की सबसे बड़ी आबादी अगर किसी एक रोजगार से जुड़ी हुई है, तो वह खेती है, और खेती से जुड़े हुए दूसरे ग्रामीण रोजगार हैं। इन सबकी हालत आज बहुत ही खराब है, और इस बुरी नौबत के भीतर भी अच्छी नौबत यह है कि किसान अपने गले में फंदा डालने के बजाय जिम्मेदार गलों को ढूंढते हुए फंदा लेकर दिल्ली पहुंच गए हैं। जिस तरह देश के हर प्रदेश के किसान और खेतिहर मजदूर अपने खर्च पर इस रैली में शामिल हुए हैं, उससे न महज दिल्ली की सड़कें लाल हुई हैं, बल्कि देश के इस सबसे बड़े तबके की लाल आंखें भी दिख रही हैं। वामपंथी संगठनों की अगुवाई में हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस सहित बहुत सी विपक्षी पार्टियां शामिल हुई हैं, और इसे हाल ही में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान के चुनावों में कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल किसान कर्जमाफी के साथ जोड़कर देखना चाहिए कि कर्ज से लदे किसान की अनदेखी अब और नहीं चल सकती। कोई एक पार्टी न देखे, तो दूसरी पार्टी, और दूसरी पार्टी न देखे तो तीसरी पार्टी, कोई न कोई पार्टी कर्जमाफी करके रहेगी, अगर उसे सत्ता में आना होगा। जिस देश में बड़े-बड़े अरबपति संगठित रूप से बैंकों के लाखों-करोड़ लूट रहे हैं, उस देश में घाटे की खेती करके फंदे पर किसान का लटकना अब बंद होने का वक्त आ गया है। 
देश में स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना है, उसका वायदा करने के बाद भी मोदी सरकार उससे मुकर गई है,और भाजपा का यह अघोषित कहना है कि इन सिफारिशों को लागू करना मुमकिन नहीं है। उसके कुछ सबसे बड़े नेताओं ने अनौपचारिक चर्चा में यह कहा है कि इन सिफारिशों का मतलब देश का दीवालिया हो जाना होगा। यह देश खरबपति डकैतों और जालसाजों की बैंक-लूट से दीवालिया नहीं हो रहा, लेकिन देश की इतनी बड़ी आबादी के जिंदा रहने से दीवालिया हो जाएगा? देश में किसानों का यह बदला हुआ रूख बहुत अच्छा है कि वे जान नहीं देंगे, वाजिब दाम जरूर लेंगे। किसानों की यह एकजुटता ही देश की सरकारों को उनका हक देने के लिए बेबस कर सकती है। यह बात अच्छी हुई कि दिल्ली में कल किसान प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल या गठजोड़ के झंडे तले नहीं हुआ, और सभी किस्म के संगठन उसमें शामिल हुए। 
हाल ही के बरसों में मोदी सरकार ने गांव में इस्तेमाल होने वाले जानवरों को लेकर जिस तरह की नीतियां बनाई है, जैसे कानून बनाए हैं, वे किसान की कमर तोडऩे वाले हैं। वे अपने बूढ़े जानवरों को बेच नहीं सकते क्योंकि वह जुर्म हो गया है, और उनको खिलाने के लिए उनके पास इसलिए नहीं है क्योंकि खुद के खाने के लिए भी नहीं है। यह सरकार गांवों में ग्रामीण, कुटीर और हाथ के उद्योग जिंदा रखने के लिए कुछ भी नहीं कर पाई है क्योंकि आर्थिक उदारीकरण इंसान के बजाय मशीनों को जिंदा रखने पर अधिक भरोसा रखता है, और पूरे देश के आंकड़ों को इस बात की परवाह नहीं होती कि वे घर-घर के मजदूरों से जुटकर बने हैं कि अकेले अडानियों और अंबानियों से। किसान को हक देना कुछ उसी किस्म की हकीकत है जैसी कि छत्तीसगढ़ में गरीबी की रेखा के नीचे वालों को एक रूपए किलो में चावल देना, या तेंदूपत्ता का मालिकाना हक देना बन चुका है। यह बात बहुत अच्छी है कि देश-प्रदेश की सरकारें किसानों के ऐसे दबाव में रहें क्योंकि लागत से कम में बेचते हुए किसान कब तक जिंदा रहेंगे? सरकारों को किसानों की जिंदगी से अधिक लेना-देना इसलिए नहीं रहता कि जरूरत पडऩे पर दूसरे देशों से अनाज, शक्कर और प्याज आयात करने में सत्ता पर बैठे लोगों को मोटी कमाई होती है। लेकिन देश का किसान भूखा मरे और आयात करते हुए नेता-अफसर-कारोबारी कमाएं ऐसा नहीं चलना चाहिए। दिल्ली का यह प्रदर्शन अगर सरकार का दिल नहीं दहला पाए, तो दिक्कत सरकार के दिल में नहीं है, सरकार के दिमाग में है जो कि खतरे को देख-समझ नहीं पा रही है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 दिसंबर

कुंभ की वजह से शादियों पर रोक का आदेश असंवैधानिक

संपादकीय
1 दिसंबर 2018


उत्तरप्रदेश सरकार का एक आदेश खबरों में आया है जिसमें इलाहाबाद कुंभ के दौरान स्नान की प्रमुख तारीखों पर शहर में कोई भी शादी न करने को कहा गया है। तीन महीनों तक चलने वाले कुंभ में ऐसे कई दिन हैं, और सरकार का यह हुक्म ऐसे वक्त आया है जब लोग विवाह स्थलों और होटलों सहित तमाम कामों के लिए एडवांस देकर शादी की तैयारी में लगे हैं। ऐसा भी नहीं कि कुंभ आज पहली बार हो रहा है, यह सदियों से होते आया है, और पौन सदी हो रही है जब उत्तरप्रदेश की सरकार कुंभ का इंतजाम करते आई है। अब हिन्दू धर्म को महत्व देने के लिए योगी सरकार का यह उत्साह सरकार की कानूनी सीमा से आगे बढ़कर काम कर रहा है, और हमारा ख्याल है कि यह अदालत में खड़े नहीं हो पाएगा। अब दिक्कत यह है कि सरकार से बुराई और टकराव मोल लेकर कितने मां-बाप शादी की तैयारी के बीच कोर्ट-कचहरी के धक्के खा सकते हैं? और फिर आज हिन्दू धर्म की तथाकथित रक्षा, भारतीय संस्कृति को बढ़ावा, और उत्तरप्रदेश के भगवाकरण का जो दौर चल रहा है, उसके बीच यह खतरा भी है कि इन तारीखों पर शादी के हक को लेकर जो लोग अदालत तक जाएंगे, उनके शादी समारोह पर झंडे-डंडे लेकर लोग टूट भी पड़ सकते हैं। 
तीर्थ के नाम पर, या धार्मिक नगरी के नाम पर कई तरह के दुराग्रह भारत में काम करते हैं। किसी शहर में मांस-मदिरा बंद करने की मांग होती है क्योंकि वह तीर्थस्थान है, या वहां पर कोई बड़ा मंदिर है, तो किसी शहर में सिगरेट-तम्बाखू बंद किया गया है। और साल में कई दिन ऐसे रहते हैं जब मुर्गी-मांस की दुकानें बंद कर दी जाती हैं क्योंकि उन दिनों में कोई ईश्वर या कोई महान व्यक्ति पैदा हुए थे। गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर मांस-मदिरा के धंधे बंद रहते हैं, जबकि गांधी के अपने आश्रम में जब उनके मांसाहारी मेहमान आकर रूकते थे, तो आश्रम के नियमों को तोड़कर भी उनके लिए मांस पकाया जाता था। आज गांधी के नाम पर तमाम किस्म की हिंसा होती है, या ज्यादती-जबर्दस्ती होती है जिन्हें कि गांधी ही कभी पसंद नहीं करते। 
आज दिक्कत यह है कि सरकारी अमला सत्तारूढ़ नेताओं की सनक को संविधान मान लेता है, और फिर उन नेताओं की चरणपादुका सिर पर रखकर दौडऩे भी लगता है। देश में जिस तरह सरकारी खर्च पर सत्ता के पसंदीदा धर्म को बढ़ावा देने का मुकाबला चल रहा है, उसमें हम मध्यप्रदेश में बड़े-बड़े आईएएस अफसरों को सिर पर चरणपादुका लेकर चलते देख चुके हैं। उत्तरप्रदेश कुछ और आगे है, और उसे एक हिन्दू राज के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकारी इमारतों, सरकारी भवनों का भगवाकरण जनता के पैसों की बर्बादी की कीमत पर किया गया है, और अदालतें भी यह सब देखकर चुप बैठी रहीं। लेकिन इसी उत्तरप्रदेश में मायावती ने अपने राज के चलते हुए हजार करोड़ की लागत से पत्थर की अपनी मूर्तियां, अपने राजनीतिक गुरू कांशीराम, और दलितों के मसीहा बाबा साहब अंबेडकर की मूर्तियां बनवाकर एक नए किस्म का धार्मिक साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश की थी, और आज जब कभी किसी और को धार्मिक फिजूलखर्ची से रोकने की नौबत आती है, तो लोग मायावती की मिसाल तुरंत सामने धर देते हैं। 
हमारा ख्याल है कि धर्म और संविधान को लेकर पिछले महीनों में जो बातें सामने आई हैं, उनसे यह साफ हुआ है कि सरकार किसी एक खास धर्म के लिए इस किस्म का खर्च नहीं कर सकतीं। और चाहे वह बहुसंख्यकों का धर्म हो, चाहे अल्पसंख्यकों का, चाहे वह ब्राम्हणों के इष्टदेवता हों, चाहे दलितों के, किसी के लिए भी सरकारी खर्च नहीं किया जाना चाहिए। न तो हज के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए, और न ही मानसरोवर के लिए, न तो हिन्दू तीर्थयात्रा सरकारी खर्च पर होनी चाहिए, न ही किसी और धर्म की। कुंभ जैसे धार्मिक जलसे पर हमेशा से सभी पार्टियों की सरकारें जनसुविधाओं के लिए खर्च करती आई हैं, लेकिन इस धार्मिक खर्च को धर्मान्धता में बदल देना, लोगों के बुनियादी हकों को निलंबित कर देना ठीक नहीं है। उत्तरप्रदेश सरकार का शादियों पर रोक का आदेश पूरी तरह असंवैधानिक है, और इसे चुनौती देकर खारिज करवाना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 दिसंबर