संपादकीय
1 दिसंबर 2018

उत्तरप्रदेश सरकार का एक आदेश खबरों में आया है जिसमें इलाहाबाद कुंभ के दौरान स्नान की प्रमुख तारीखों पर शहर में कोई भी शादी न करने को कहा गया है। तीन महीनों तक चलने वाले कुंभ में ऐसे कई दिन हैं, और सरकार का यह हुक्म ऐसे वक्त आया है जब लोग विवाह स्थलों और होटलों सहित तमाम कामों के लिए एडवांस देकर शादी की तैयारी में लगे हैं। ऐसा भी नहीं कि कुंभ आज पहली बार हो रहा है, यह सदियों से होते आया है, और पौन सदी हो रही है जब उत्तरप्रदेश की सरकार कुंभ का इंतजाम करते आई है। अब हिन्दू धर्म को महत्व देने के लिए योगी सरकार का यह उत्साह सरकार की कानूनी सीमा से आगे बढ़कर काम कर रहा है, और हमारा ख्याल है कि यह अदालत में खड़े नहीं हो पाएगा। अब दिक्कत यह है कि सरकार से बुराई और टकराव मोल लेकर कितने मां-बाप शादी की तैयारी के बीच कोर्ट-कचहरी के धक्के खा सकते हैं? और फिर आज हिन्दू धर्म की तथाकथित रक्षा, भारतीय संस्कृति को बढ़ावा, और उत्तरप्रदेश के भगवाकरण का जो दौर चल रहा है, उसके बीच यह खतरा भी है कि इन तारीखों पर शादी के हक को लेकर जो लोग अदालत तक जाएंगे, उनके शादी समारोह पर झंडे-डंडे लेकर लोग टूट भी पड़ सकते हैं।
तीर्थ के नाम पर, या धार्मिक नगरी के नाम पर कई तरह के दुराग्रह भारत में काम करते हैं। किसी शहर में मांस-मदिरा बंद करने की मांग होती है क्योंकि वह तीर्थस्थान है, या वहां पर कोई बड़ा मंदिर है, तो किसी शहर में सिगरेट-तम्बाखू बंद किया गया है। और साल में कई दिन ऐसे रहते हैं जब मुर्गी-मांस की दुकानें बंद कर दी जाती हैं क्योंकि उन दिनों में कोई ईश्वर या कोई महान व्यक्ति पैदा हुए थे। गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर मांस-मदिरा के धंधे बंद रहते हैं, जबकि गांधी के अपने आश्रम में जब उनके मांसाहारी मेहमान आकर रूकते थे, तो आश्रम के नियमों को तोड़कर भी उनके लिए मांस पकाया जाता था। आज गांधी के नाम पर तमाम किस्म की हिंसा होती है, या ज्यादती-जबर्दस्ती होती है जिन्हें कि गांधी ही कभी पसंद नहीं करते।
आज दिक्कत यह है कि सरकारी अमला सत्तारूढ़ नेताओं की सनक को संविधान मान लेता है, और फिर उन नेताओं की चरणपादुका सिर पर रखकर दौडऩे भी लगता है। देश में जिस तरह सरकारी खर्च पर सत्ता के पसंदीदा धर्म को बढ़ावा देने का मुकाबला चल रहा है, उसमें हम मध्यप्रदेश में बड़े-बड़े आईएएस अफसरों को सिर पर चरणपादुका लेकर चलते देख चुके हैं। उत्तरप्रदेश कुछ और आगे है, और उसे एक हिन्दू राज के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकारी इमारतों, सरकारी भवनों का भगवाकरण जनता के पैसों की बर्बादी की कीमत पर किया गया है, और अदालतें भी यह सब देखकर चुप बैठी रहीं। लेकिन इसी उत्तरप्रदेश में मायावती ने अपने राज के चलते हुए हजार करोड़ की लागत से पत्थर की अपनी मूर्तियां, अपने राजनीतिक गुरू कांशीराम, और दलितों के मसीहा बाबा साहब अंबेडकर की मूर्तियां बनवाकर एक नए किस्म का धार्मिक साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश की थी, और आज जब कभी किसी और को धार्मिक फिजूलखर्ची से रोकने की नौबत आती है, तो लोग मायावती की मिसाल तुरंत सामने धर देते हैं।
हमारा ख्याल है कि धर्म और संविधान को लेकर पिछले महीनों में जो बातें सामने आई हैं, उनसे यह साफ हुआ है कि सरकार किसी एक खास धर्म के लिए इस किस्म का खर्च नहीं कर सकतीं। और चाहे वह बहुसंख्यकों का धर्म हो, चाहे अल्पसंख्यकों का, चाहे वह ब्राम्हणों के इष्टदेवता हों, चाहे दलितों के, किसी के लिए भी सरकारी खर्च नहीं किया जाना चाहिए। न तो हज के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए, और न ही मानसरोवर के लिए, न तो हिन्दू तीर्थयात्रा सरकारी खर्च पर होनी चाहिए, न ही किसी और धर्म की। कुंभ जैसे धार्मिक जलसे पर हमेशा से सभी पार्टियों की सरकारें जनसुविधाओं के लिए खर्च करती आई हैं, लेकिन इस धार्मिक खर्च को धर्मान्धता में बदल देना, लोगों के बुनियादी हकों को निलंबित कर देना ठीक नहीं है। उत्तरप्रदेश सरकार का शादियों पर रोक का आदेश पूरी तरह असंवैधानिक है, और इसे चुनौती देकर खारिज करवाना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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