संपादकीय
2 दिसंबर 2018

देश भर के किसान संगठन जिस तरह से कल दिल्ली पहुंचे हैं, उससे सरकार कहती चाहे जो रहे, दिल तो उसका दहल ही गया होगा। देश की सबसे बड़ी आबादी अगर किसी एक रोजगार से जुड़ी हुई है, तो वह खेती है, और खेती से जुड़े हुए दूसरे ग्रामीण रोजगार हैं। इन सबकी हालत आज बहुत ही खराब है, और इस बुरी नौबत के भीतर भी अच्छी नौबत यह है कि किसान अपने गले में फंदा डालने के बजाय जिम्मेदार गलों को ढूंढते हुए फंदा लेकर दिल्ली पहुंच गए हैं। जिस तरह देश के हर प्रदेश के किसान और खेतिहर मजदूर अपने खर्च पर इस रैली में शामिल हुए हैं, उससे न महज दिल्ली की सड़कें लाल हुई हैं, बल्कि देश के इस सबसे बड़े तबके की लाल आंखें भी दिख रही हैं। वामपंथी संगठनों की अगुवाई में हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस सहित बहुत सी विपक्षी पार्टियां शामिल हुई हैं, और इसे हाल ही में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान के चुनावों में कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल किसान कर्जमाफी के साथ जोड़कर देखना चाहिए कि कर्ज से लदे किसान की अनदेखी अब और नहीं चल सकती। कोई एक पार्टी न देखे, तो दूसरी पार्टी, और दूसरी पार्टी न देखे तो तीसरी पार्टी, कोई न कोई पार्टी कर्जमाफी करके रहेगी, अगर उसे सत्ता में आना होगा। जिस देश में बड़े-बड़े अरबपति संगठित रूप से बैंकों के लाखों-करोड़ लूट रहे हैं, उस देश में घाटे की खेती करके फंदे पर किसान का लटकना अब बंद होने का वक्त आ गया है।
देश में स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना है, उसका वायदा करने के बाद भी मोदी सरकार उससे मुकर गई है,और भाजपा का यह अघोषित कहना है कि इन सिफारिशों को लागू करना मुमकिन नहीं है। उसके कुछ सबसे बड़े नेताओं ने अनौपचारिक चर्चा में यह कहा है कि इन सिफारिशों का मतलब देश का दीवालिया हो जाना होगा। यह देश खरबपति डकैतों और जालसाजों की बैंक-लूट से दीवालिया नहीं हो रहा, लेकिन देश की इतनी बड़ी आबादी के जिंदा रहने से दीवालिया हो जाएगा? देश में किसानों का यह बदला हुआ रूख बहुत अच्छा है कि वे जान नहीं देंगे, वाजिब दाम जरूर लेंगे। किसानों की यह एकजुटता ही देश की सरकारों को उनका हक देने के लिए बेबस कर सकती है। यह बात अच्छी हुई कि दिल्ली में कल किसान प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल या गठजोड़ के झंडे तले नहीं हुआ, और सभी किस्म के संगठन उसमें शामिल हुए।
हाल ही के बरसों में मोदी सरकार ने गांव में इस्तेमाल होने वाले जानवरों को लेकर जिस तरह की नीतियां बनाई है, जैसे कानून बनाए हैं, वे किसान की कमर तोडऩे वाले हैं। वे अपने बूढ़े जानवरों को बेच नहीं सकते क्योंकि वह जुर्म हो गया है, और उनको खिलाने के लिए उनके पास इसलिए नहीं है क्योंकि खुद के खाने के लिए भी नहीं है। यह सरकार गांवों में ग्रामीण, कुटीर और हाथ के उद्योग जिंदा रखने के लिए कुछ भी नहीं कर पाई है क्योंकि आर्थिक उदारीकरण इंसान के बजाय मशीनों को जिंदा रखने पर अधिक भरोसा रखता है, और पूरे देश के आंकड़ों को इस बात की परवाह नहीं होती कि वे घर-घर के मजदूरों से जुटकर बने हैं कि अकेले अडानियों और अंबानियों से। किसान को हक देना कुछ उसी किस्म की हकीकत है जैसी कि छत्तीसगढ़ में गरीबी की रेखा के नीचे वालों को एक रूपए किलो में चावल देना, या तेंदूपत्ता का मालिकाना हक देना बन चुका है। यह बात बहुत अच्छी है कि देश-प्रदेश की सरकारें किसानों के ऐसे दबाव में रहें क्योंकि लागत से कम में बेचते हुए किसान कब तक जिंदा रहेंगे? सरकारों को किसानों की जिंदगी से अधिक लेना-देना इसलिए नहीं रहता कि जरूरत पडऩे पर दूसरे देशों से अनाज, शक्कर और प्याज आयात करने में सत्ता पर बैठे लोगों को मोटी कमाई होती है। लेकिन देश का किसान भूखा मरे और आयात करते हुए नेता-अफसर-कारोबारी कमाएं ऐसा नहीं चलना चाहिए। दिल्ली का यह प्रदर्शन अगर सरकार का दिल नहीं दहला पाए, तो दिक्कत सरकार के दिल में नहीं है, सरकार के दिमाग में है जो कि खतरे को देख-समझ नहीं पा रही है। (Daily Chhattisgarh)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें