संपादकीय
3 दिसंबर 2018

देश की राजधानी दिल्ली के सबसे व्यस्त और सबसे पुराने बाजार, चांदनी चौक, के इलाके में मेवे की एक दुकान के नीचे तहखाने में ऐसे बहुत से लॉकर पकड़ाए हैं जिनमें 25 करोड़ रूपए की नगदी बरामद हुई है। दूसरी तरफ कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस एक ऐसे नौजवान शादीशुदा जोड़े को पकड़ा है जिसने अपने घर में दो हजार रूपए वाले नोट, पांच करोड़ दाम के छाप रखे थे। पुलिस ने गिरफ्तारी की, और नोट जब्त कर लिया। एक अलग खबर यह कहती है कि अभी-अभी रिटायर हुए देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे ओ.पी. रावत ने कहा कि नोटबंदी का इन चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल का कोई असर नहीं पड़ा, और बड़ी तादाद में कालाधन जब्त हुआ है। कुछ अलग-अलग खबरें यह कहती हैं कि नक्सलियों के कामकाज पर नोटबंदी का कोई असर नहीं हुआ, और उन्होंने अपना हर नोट बदलवा भी लिया, और खर्च करना भी जारी रखा। छत्तीसगढ़ में अभी निपटे विधानसभा चुनाव मतदान को लेकर कुछ लोगों का यह अंदाज है कि शहरी बाजार वाली कुछ सीटों पर व्यापारियों ने थोक में कांग्रेस को वोट दिया क्योंकि वे नोटबंदी और जीएसटी दोनों के जख्मों से अब तक उबर नहीं पाए थे। देश की एक बड़ी सक्रिय महिला पत्रकार ने मध्यप्रदेश के बाद तेलंगाना, और फिर राजस्थान की चुनावी रिपोर्टिंग करते हुए ट्वीट किया है कि हर जगह उसे सिर्फ एक मुद्दा सिर चढ़कर बोलते मिला, नोटबंदी, नोटबंदी, और नोटबंदी। एक आखिरी जिक्र देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे हुए अरविंद सुब्रमण्यम का अपनी ताजा किताब में लिखा हुआ है जिसमें उन्होंने नोटबंदी को एक बहुत ही क्रूर आर्थिक झटका कहा, और यह भी साफ किया कि वे मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार तो थे, लेकिन नोटबंदी के बारे में उनसे सलाह नहीं ली गई थी।
इन बातों की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि देश को चलाने वाली सरकार से अगर सचमुच ही इतनी बड़ी गलती हुई है, या उसने सचमुच ही इतना गलत काम किया है, तो उसे इसका अहसास कराना जरूरी है। देश के महज 31 फीसदी वोटरों ने मोदी सरकार बनाई थी, लेकिन जब सरकार बन जाती है तो वह बाकी 69 फीसदी वोटरों की भी सरकार रहती है, और वोटरों के पास सरकार को वापिस बुलाने का कोई हक भारतीय संविधान से मिला हुआ नहीं है। इसलिए सरकार के अच्छे और बुरे कामों को लेकर जनमत सामने आते रहना चाहिए, यह मीडिया के मार्फत भी होता है, सड़कों पर भी होता है, सोशल मीडिया पर भी होता है, और प्रदेशों के चुनावों में जनता की नाराजगी की शक्ल में भी दिखता है। जितने किस्म की बातें नोटबंदी की हिमायत करते हुए की गई थीं, उनमें से एक भी बात पिछले दो महीने से कई राज्यों में चल रहे चुनाव अभियान के दौरान न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद ही गिना पाए, और न ही उनकी पार्टी गिना पाई। जिस ऐतिहासिक फैसले को देश से कालाधन मिटाने वाला कहा गया था, उस फैसले का जिक्र तक करने की हिम्मत आज न केन्द्र की सत्ता में है, और न ही सत्तारूढ़ पार्टी में। इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार, और खासकर उसके प्रधानमंत्री, अगर अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार से भी चर्चा किए बिना, अपने मंत्रिमंडल से भी चर्चा किए बिना देश का यह सबसे बड़ा आर्थिक फैसला ले लेते हैं, तो उससे किस कदर तबाही हो सकती है, हुई है। और तो और जिन नए नोटों को नकल-प्रूफ कहा गया था, उनकी नकल गली-गली हो रही है, और आए दिन नकली नोट पकड़ा रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि कोई प्रधानमंत्री या कोई पार्टी चाहे कितना ही बड़ा बहुमत लेकर सत्ता पर न आ जाएं, उन्हें फैसले लेते हुए लोकतांत्रिक तरीकों का सम्मान करना चाहिए, ऐसा करना खुद उनके भले का होता है, देश के भले का तो होता ही है। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी की शहादत के बाद जब संसद में कांग्रेस पार्टी ऐतिहासिक बाहुबल के साथ बैठी थी, तब उसने सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ पाने वाली शाहबानो का गला घोंटने के लिए इसी बाहुबल का इस्तेमाल किया था, और दुनिया का इतिहास कांग्रेस को उस दकियानूसी फैसले के लिए कभी माफ नहीं करेगा। शायद नोटबंदी को भी दुनिया का इतिहास इसी तरह याद रखेगा। लोकतंत्र में लोकतंत्र का सम्मान जरूरी होता है। (Daily Chhattisgarh)
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