दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 दिसंबर : छत्तीसगढ़ सरकार में अब सलाहकारों की नई पीढ़ी
संपादकीय
21 दिसंबर 2018

छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल राज्य शासन के चार सलाहकार नियुक्त किए हैं। भूपेश बघेल के साथ लगातार कांग्रेस की चुनावी रणनीति में हिस्सेदार रहे, भूतपूर्व पत्रकार विनोद वर्मा को मुख्यमंत्री का राजनीतिक सलाहकार बनाया गया है। प्रदेश के एक नामी-गिरामी पत्रकार रहे रूचिर गर्ग को मीडिया सलाहकार, बिलासपुर के एक कृषि एवं संबंधित मामलों से लंबे समय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, और भूतपूर्व पत्रकार प्रदीप शर्मा को कृषि और ग्रामीण विकास सलाहकार बनाया गया है। कांकेर के एक पुराने कांग्रेस नेता और कांग्रेस विधायक दल से बरसों से जुड़े हुए राजेश तिवारी को संसदीय सलाहकार बनाया गया है। यह पूरी टीम एक नई पीढ़ी के आगमन की घोषणा है, लेकिन इसके साथ-साथ एक नई कार्य संस्कृति की घोषणा भी है।
अब तक आमतौर पर सलाहकार का जिम्मा ऐसे लोगों को दिया जाता था जो रिटायर होने के बाद या तो खुद काम तलाशते रहते थे, या फिर जिनकी खूबियों की वजह से सरकार जिन्हें रोज के सरकारी कामकाज से परे सलाह-मशविरे के लिए रखती थी। कई सरकारों में कुछ अघोषित गैरसरकारी सलाहकार भी रहते हैं, और कुछ सरकारों में नियमित अफसर भी अपने कामकाज को छोड़कर सलाहकार का काम करते हैं। इन सबका अलग-अलग नफा-नुकसान होता है, और जो अघोषित सलाहकार रहते हैं वे लोकतंत्र के लिए इस मायने में एक खतरा रहते हैं कि वे किसी बात के लिए जवाबदेह नहीं रहते। ऐसे सलाहकारों से बेहतर वे लोग रहते हैं जिनका नाम सरकारी तनख्वाह/भुगतान की लिस्ट में जुड़ा होता है, और जो घोषित रूप से जवाबदेह रहते हैं। अब भूपेश बघेल ने जो चार सलाहकार कल बनाए हैं, वे न केवल उनके सबसे भरोसेमंद लोगों में से हैं, बल्कि अपने-अपने दायरे में उनकी काबिलीयत लंबे समय में साबित भी हो चुकी है। और इन चारों के साथ एक बात एक सरीखी है कि वे अपने रिटायरमेंट की उम्र से बरसों दूर हैं, और वे किसी पुनर्वास के तहत अपने ढलते बरसों में यहां नहीं आए हैं। वे कामकाजी उम्र के हैं, नई पीढ़ी के हैं, नई टेक्नालॉजी से वाकिफ हैं, और जिनकी सरकार में संभावनाएं पहली बार देखी जा रही हैं। जो रिटायर्ड आला अफसर अपनी पूरी नौकरी में जिन कामों को नहीं कर पाते, कई बार उन्हीं कामों के लिए सलाहकार भी बन जाते हैं, लेकिन यहां पर मामला ठीक उल्टा है। और आज की दुनिया की नई जरूरतों के मुताबिक इस नई पीढ़ी को लाना एक साहसी फैसला है। आम लोगों की जुबान में कहें तो, कुछ लोगों को पुराने ढर्रे को देखने की आदत है, और उनको अब तक सलाहकार की कुर्सियों पर दिखने वाले डोकरों की जगह छोकरों को देखना अटपटा लग सकता है।
सरकारी नौकरी में पूरी जिंदगी लगा देने वाले लोगों के पास रोज के कामकाज के लिए एक बड़ा लंबा तजुर्बा तो रहता है, लेकिन सरकारी बक्से से बाहर की उनकी सोच रह जाती है, और नई सोच के साथ कुछ कर पाना उनके बस का अक्सर नहीं रह जाता। ऐसे में सरकार से बाहर के, छत्तीसगढ़ से पूरी तरह वाकिफ ऐसे नए और नौजवान लोगों को सलाहकार बनाकर भूपेश बघेल ने एक नई पीढ़ी का दाखिला कर दिया है। उनके पहले के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुकाबले वे खुद भी अगली पीढ़ी सरीखे हैं, और ऐसे में सरकार से परे के नौजवान सलाहकार बहुत सी जंग लगी बातों को ठीक करने में मददगार हो सकते हैं। उन्होंने यह भी अच्छा किया है कि अनौपचारिक और अघोषित सलाहकारों के बजाय घोषित और वेतन-भत्ता प्राप्त, ओहदा-दर्जा प्राप्त सलाहकार रखे हैं, और उन्हें हमारी शुभकामनाएं। (Daily Chhattisgarh)
किसान कर्जमाफी से जिन पेटों में बड़ा दर्द हो रहा है, वे देश के खाली पेटों का दर्द नहीं जानते..
संपादकीय
20 दिसंबर 2018

तीन राज्यों में कांग्रेस घोषणापत्र के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी को लेकर गैरकिसान-हिन्दुस्तान हिल सा गया है, खासकर संपन्न, शहरी, शिक्षित लोग। सोशल मीडिया देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों और मोदीप्रेमी स्तंभकारों के लिखे से भरा हुआ है कि राहुल गांधी देश का सबसे बड़ा आर्थिक राक्षस साबित हो रहा है। बात सही है कि जब सरकार को टैक्स का पैसा किसी एक तबके से मिलता है, और जब उससे किसी दूसरे तबके को राहत दी जाती है, तो टैक्स देने वाले को दर्द जायज है। लेकिन समझने की बात यह है कि क्या कारखानों और कारोबार को सरकार से किसी तरह की टैक्स रियायत नहीं मिलती? क्या उन्हें जमीन, पानी पर सरकार से रियायत नहीं मिलती? क्या उन्हें सड़कों से अपना माल लाने ले जाने की छूट नहीं मिलती? क्या उन्हें सरकार के तरह-तरह के अनुदान नहीं मिलते? क्या कारोबारी बैंकों का कर्ज नहीं डुबाते?
ऐसे अनगिनत सवालों को सुलझाने की कोशिश जब करें, तो पहली नजर में ही दिखता है कि देश में बड़े-बड़े, मंझले, और छोटे कारोबारियों के पास बैंकों का जितना कर्ज डूबा है, वह किसानी कर्ज की माफी के मुकाबले कई गुना अधिक है। दूसरी तरफ किसानी कर्ज में लोगों को एक लाख-दो लाख रूपए जैसी कर्जमाफी मिलती है, और कारखानेदारों को सौ-दो सौ करोड़ से लेकर दसियों हजार करोड़ तक डुबाकर भी न फांसी लगाने की नौबत मिलती, और न ही जेल जाने की। दीवालिया कारोबारी मजे से जी सकते हैं, और अपना छुपाया हुआ पूंजी निवेश देश-विदेश में खर्च कर सकते हैं। ऐसे में अनाज, फल-सब्जी, दूध पैदा करने वाले किसानों को जिंदा रहने के लिए अगर सरकारी अनुदान, सरकारी मदद मिलती है, तो उससे संपन्न लोगों के कलेजे इसलिए नहीं जलने चाहिए कि अगर इस देश में घाटे का धंधा हो चुकी किसानी को लोग छोड़ते चलेंगे, तो फिर देश के लिए अनाज, शक्कर, दाल और तेल आयात करना होगा, देश में उत्पादन और घट जाएगा, और आत्मनिर्भरता खत्म हो जाएगी, और आज जिस तरह बेकाबू दाम पर पेट्रोलियम खरीदा जा रहा है, उसी तरह के बेकाबू दाम पर खाना आयात होगा।
हिन्दुस्तान में उद्योग धंधे चलाकर कमाने वाले लोग इस बात को भूल जाते हैं कि देश की जमीन, उसके पानी, और उसकी हवा पर हर नागरिक का हक है, खदानों पर हर नागरिक का हक है, और सरकार जब गरीबों को कोई अनुदान देती है, रियायत देती है, या कर्जमाफी देती है, तो वह उसी हक का एक भुगतान होता है। इस देश में मदद पाने वाले किसान भीख नहीं पा रहे हैं, वे फसल के उस दाम को पा रहे हैं जिसे सरकारें वक्त पर नहीं देती हैं, और फिर कर्जमाफी की शक्ल में देने को तैयार होती हैं। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि कर्जमाफी स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन यह जिंदा रहने के लिए आग बुझाने जैसा एक इलाज है जिसमें बहुत किफायत नहीं बरती जा सकती। आग बुझाने के लिए कितनी दमकल गाडिय़ां लगती हैं, कितना पानी लगता है, इसकी कोई सीमा नहीं होती। आज हिन्दुस्तान के किसान की जिंदगी में ऐसी ही आग लगी हुई है क्योंकि सरकार ने उसके कारोबार को एक जायज बाजार देने में कामयाबी नहीं पाई है, और उसकी उपज रस्ते का माल सस्ते में के अंदाज में बिकने को मजबूर है। देश की ग्रामीण और खेतिहर अर्थव्यवस्था की आर्थिक स्वावलंबता बनाए रखने के लिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को तर्कसंगत और न्यायसंगत करना होगा, इसके लिए सरकार को किसानी के साथ-साथ दूसरे छोटे-छोटे उत्पादक कामों को बढ़ावा देना होगा, और उससे बने और उगे सामानों के लिए बाजार का ढांचा बनाना होगा। जिस तरह सरकारें विशेष आर्थिक जोन बनाती हैं, औद्योगिक परिक्षेत्र बनाती हैं, उसी तरह उन्हें किसानी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, डेयरी जैसे कामों के लिए भी ऐसा ढांचा बनाना पड़ेगा कि हर कुछ बरस बाद कर्जमाफी की नौबत न आए। लेकिन जब तक सरकारें ऐसा नहीं कर पाती हैं, किसानों को ऐसी मदद जायज है, और ऐसी कर्जमाफी देने वाले राहुल गांधी को राक्षस करार देने वालों को भारत की गरीब-अर्थव्यवस्था की कोई समझ नहीं है। जिनकी पूरी जिंदगी बड़े कारोबारियों के बीच गुजरी है, या शेयर मार्केट की कमाई के बीच गुजरी है, उन्हें देश की धड़कन चलाने के लिए अनाज उगाने वाले के दर्द की कोई समझ नहीं हो सकती। भारत को चलाने वाले लोगों के बीच भारत के पेट की एक बेहतर समझ होना जरूरी है, जो कि आज दिख नहीं रही है। इस देश में आज वित्तमंत्री की सारी काबिलीयत एक टैक्स वकील की है, जो कि खरबपतियों से नीचे किसी को बचाना नहीं जानता। ऐसे में जाहिर है कि कर्जमाफी उसे मंजूर नहीं हो सकती, और वह बाकी सरकार को भी इसके खिलाफ बनाए रख सकता है। (Daily Chhattisgarh)
सादगी, कटौती, किफायत की जरूरत, उपलब्ध रहने की भी
संपादकीय
19 दिसंबर 2018

छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस को निर्देश दिया है कि सड़क से उनके आते-जाते ट्रैफिक को अनावश्यक न रोका जाए, और किसी एम्बुलेंस को तो किसी भी हालत में नहीं रोका जाए। उन्होंने मुख्यमंत्री के काफिले की गाडिय़ों में कटौती के लिए भी कहा है। शासन के पहले दिन से ही कटौती, किफायत, और सादगी शुरू होना इसलिए ठीक है कि एक बार जब इनकी आदत हो जाती है, या अफसरों में ही मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए उन्हें अतिमहत्वपूर्ण साबित करने की होड़ लग जाती है, तो धीरे-धीरे मुख्यमंत्री के अलावा मंत्री भी इसके आदी होने लगते हैं, और उन्हें यह सब सुहाने भी लगता है। लेकिन यह सब कुछ उस जनता के पैसों पर होता है जो कि रियायती अनाज के बिना पेट नहीं भर सकती, और जो इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में रिश्वत देने की ताकत भी नहीं रखती। इसलिए मुख्यमंत्री को और भी मामलों में ऐसी सादगी शुरू करनी चाहिए जो उनके मंत्रियों तक पहुंचे। वरना इसी राजधानी में हमने ऐसे स्थानीय मंत्री का काफिला चलते देखा है जिसकी पूरी जिंदगी इसी शहर में गुजरी, लेकिन एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले जाते हुए भी सायरन बजाती गाडिय़ों का काफिला चलना जरूरी रहता था। यह पूरा तामझाम खत्म होना चाहिए।
इसके अलावा सरकार में जो सामंती परंपराएं चली आ रही हैं, वे भी खत्म होनी चाहिए। दर्जन भर पुलिस वाले सजावटी-सलामी वर्दी में मुख्यमंत्री को सलामी देने के लिए तैनात रखे जाते हैं, और ऐसी सलामी भला किस काम की कि जिसके पुलिस वालों को बेहतर काम में लगाया जा सकता है। आज जेलों से अदालतों तक विचाराधीन कैदियों को ले जाने के लिए भी पुलिस नहीं मिलती है, और न ही इलाज के लिए ले जाने को। ऐसे में सलामी के लिए, बंगलों में फोन उठाने के लिए, फाटक खोलने और बंद करने के लिए जब पुलिस सिपाहियों का बेजा इस्तेमाल होता है, तो वह जनता की जेब पर बोझ होता है, और ऐसे कर्मचारी पुलिस की बुनियादी ड्यूटी भूल भी जाते हैं। इसलिए नई सरकार को शुरुआत से ही एक ऐसी कटौती शुरू करनी चाहिए जो कि लोकतांत्रिक भावना के साथ मेल भी खाए।
इसके अलावा राज्य सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि हफ्ते का कम से कम एक दिन ऐसा रहे जो कि दौरों और बैठकों से मुक्त रहे, और मंत्रालय से लेकर पटवारी तक हर कोई उस दिन अपने दफ्तर में रहकर लोगों को उपलब्ध रहें। आज बहुत से दफ्तरों में लोग धक्के खाते रहते हैं, और वहां पर कुर्सियों पर लोगों के बैठने का ठिकाना नहीं रहता है। इसलिए मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक अगर हफ्ते में किसी एक दिन अपने दफ्तर में लोगों से मिलने के लिए मौजूद रहें, तो वह आम लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत रहेगी। इससे छोटे-छोटे से सरकारी कामकाज टलना भी रूकेगा जिसके सबसे बुरे शिकार सबसे कमजोर लोग होते हैं। राजनीति या पैसों की ताकत वाले लोग तो किसी तरह अपना काम करवा लेते हैं, लेकिन कमजोर जनता जरा-जरा सी बातों के लिए धक्के खाते रहती है। इस सिलसिले को खत्म करना चाहिए, क्योंकि ऐसी कमजोर जनता संख्या में अधिक रहती है, और वही सरकार के खिलाफ अगले चुनाव के वक्त वोट भी देती है। हफ्ते में किसी तय दिन हर किसी की अपने दफ्तर में मौजूदगी से सरकार के प्रति लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा।
दो दिन पहले हमने इसी जगह सरकारी फिजूलखर्ची को रोकने के बारे में भी लिखा था, और राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री रामचंद्र सिंहदेव ने उसकी एक मिसाल भी कायम की थी। हालांकि फिजूलखर्ची के शौकीन लोग उन्हें चुनावी हार के लिए जिम्मेदार भी ठहराते थे, लेकिन वे सादगी से खुद भी जीते थे, और दूसरे मंत्रियों, अफसरों की फिजूलखर्ची पर कड़ाई से रोक भी लगाते थे। एक बार फिर छत्तीसगढ़ को वैसी कड़ाई की जरूरत है, और इसकी मिसाल मुख्यमंत्री को खुद ही कायम करनी पड़ेगी, तभी जाकर बाकी लोग उस पर चलेंगे। (Daily Chhattisgarh)
भारतीय लोकतंत्र में मंत्रियों को चुनने की सीमाओं और संभावनाओं का गजब हाल
संपादकीय
18 दिसंबर 2018

चुनावी लोकतंत्र और शासन-प्रशासन में खासा फर्क होता है। अगर चुनाव न होते, और पार्टियों को महज राज्यसभा या विधान परिषद के अंदाज में लोगों को चुनने का मौका रहता, तो पार्टियां ऐसे सांसद या विधायक मनोनीत करतीं जो कि अलग-अलग काबिलीयत के लोगों को छांटकर लिया जाता, और उन्हें उनकी खूबी के मंत्रालय देकर सरकार बेहतर तरीके से चलाई जाती। लेकिन इससे सरकार तो अच्छी चलती, लोकतंत्र बैठ जाता। इसलिए कि लोकतंत्र मनोनयन का नाम नहीं है, निर्वाचन का नाम है। जब आम जनता की पसंद से लोग चुने जाते हैं तो यह जरूरी नहीं होता कि वे खूबियों वाले हों। भारत का लोकतंत्र तो ऐसा कि जिसमें मुजरिम, सजायाफ्ता, दंगाई, और कई किस्म के बुरे लोग भी चुनकर आ जाते हैं। फिर पार्टियों के पास कम से कम राज्यसभा में ऐसी गुंजाइश रहती है कि वे अपने हारे हुए, पिटे हुए, दागी लोगों को वहां भेज सके, और जनता के चुने हुए सांसदों-विधायकों की ताकत का बेजा इस्तेमाल करके राज्यसभा सदस्य बना सके। देश के एक-दो राज्यों में भी विधान परिषद बनाकर ऐसी गुंजाइश रखी गई है कि सरकार मनचाहे मंत्री बना सके। लेकिन आज जिन तीन कांगे्रसी राज्यों में, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में मंत्रिमंडल के नाम तय करने की मशक्कत चल रही है, उन राज्यों में विधान परिषद नहीं है, और लोगों को जनता के बीच से चुनकर आने पर ही मंत्री बनने की संभावना है। इसका नफा और नुकसान दोनों ही है, कोई बहुत विशेषज्ञ भी अगर जीत की संभावना नहीं रखते तो उन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सकता, और अगर लोग जीतकर आ गए हैं, तो उनके बीच से ही कुछ लोगों के मंत्री बनने की संभावना बन जाती है, संभावना है।
ऐसे में नाम तय करने वाली पार्टी, मुख्यमंत्री, और बाकी नेताओं की दुविधा भी गजब की रहती है। हम छत्तीसगढ़ की बात करें, तो कुछ महीनों के भीतर ग्यारह लोकसभा सीटों पर चुनाव होना है, और कांगे्रस के पास तो आज महज एक ही सीट है। इसलिए इन तमाम सीटों पर पार्टी को मंत्रिमंडल के मुताबिक भी यह साबित करना होगा कि उन्होंने हर संसदीय सीट को महत्व दिया है। मुख्यमंत्री के अलावा मंत्रियों की कुर्सियां हैं बारह, और संसदीय सीटें हैं ग्यारह! इसके बाद देखें तो राज्य दक्षिण और उत्तर के दो अलग-अलग आदिवासी इलाकों में भी बंटा हुआ है, और इन दोनों में दो दर्जन से अधिक विधायक कांगे्रस के ही जीतकर आए हैं। आदिवासी तबके के मुताबिक, और बस्तर या सरगुजा के मुताबिक इनमें से कम से कम तीन मंत्री बनाने होंगे, और सरगुजा के एक गैरआदिवासी टीएस सिंहदेव तो मंत्री हैं ही। अब बाकी जातियों के हिसाब से देखें, तो अनुसूचित जाति के आधा दर्जन कांगे्रस विधायक हैं, और उनकी भी उम्मीदें जायज हैं। राज्य के अकेले मुस्लिम विधायक और पार्टी के बड़े, धाकड़ नेता मोहम्मद अकबर अपने तबके के अकेले हैं, और उनकी मंत्री की कुर्सी तो पक्की है। लेकिन छत्तीसगढ़ी ब्राम्हण और गैरछत्तीसगढ़ ब्राम्हण भी पर्याप्त संख्या में जीतकर आए हैं, उनकी पारिवारिक ताकत से लेकर उनकी वरिष्ठता, उनका तजुर्बा, इन सबको देखें तो काम आसान नहीं लगता है कि इनमें से किसे लिया जाए, और किसे छोड़ा जाए। इसके बाद ओबीसी की दो प्रमुख जातियां हैं, साहू और कुर्मी। इनमें से कितने लोगों को लिया जाएगा, यह खींचतान बड़ी जाहिर है। इन सबके बीच में बनिया, या मारवाड़ी तबका बाकी ही है, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय बाकी ही हैं।
पूरी तस्वीर को एक नजर में देखें तो लगता है कि किसी मंत्रालय को चलाने की खूबी एक आखिरी पैमाना रह जाएगा किसी को मंत्री बनाने के लिए। अलग-अलग किस्म के दबावों से घिरा हुआ यह चयन सरकार को ऐसे मंत्री देगा जो कि जनता का प्रतिनिधित्व तो रहेगा, लेकिन खूबियों पर आधारित नहीं रहेगा। इसके बाद ऐसी सरकार से जनता यह उम्मीद करेगी कि ये लोग बहुत अच्छा काम करें। और यह बात महज इस सरकार, या इस पार्टी के साथ नहीं है, यह बात देश और हर प्रदेश की हर सरकार के साथ है, पूरा भारतीय लोकतंत्र इसी हिसाब से बना हुआ है, और ऐसे में मंत्रियों का साथ देने के लिए देश में अधिकारियों का जो ढांचा खड़ा किया गया है, उससे जरूर विशेषज्ञता और खूबी की उम्मीद की जाती है। इन दोनों का मिलाजुला तजुर्बा एक-दूसरे को बहुत कुछ सिखाते चलता है, और लोकतंत्र संपन्न होते जाता है।
(Daily Chhattisgarh)
कड़ी किफायत की जरूरत, पिछले फैसलों पर अमल के पहले पुनर्विचार की भी
संपादकीय
17 दिसंबर 2018

कांग्रेस की तीन सरकारें आज राजस्थान, मध्यप्रदेश, और छत्तीसगढ़ में शपथ ले रही हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए यह बरसों बाद आया हुआ खुशी का एक मौका है जिसमें खत्म मान ली गई पार्टी ने एक शानदार तरीके से वापिसी की है, और इन तीन राज्यों में पार्टी आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी बेहतर तरीके से तैयार हो सकेगी। चूंकि इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों और दूसरे तबकों से इतने किस्म के वायदे किए हैं कि उनको पूरा करने के लिए हर जगह लंबा-चौड़ा खर्च लगेगा। और अगर इनके पूरे होने का आसार नहीं दिखेगा तो कुछ महीने बाद के लोकसभा चुनावों पर पार्टी की साख खराब होगी। इसलिए इस पार्टी को इन तीनों राज्यों में कुछ फैसले एक सरीखे लेने चाहिए जो कि नेहरू-गांधी युग की राजनीति की सादगी के मुताबिक भी होना चाहिए, और आत्महत्या करते हुए किसानों को बचाने वाले भी होने चाहिए।
हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि सत्ता ने पिछले बरसों में धीरे-धीरे अपने पर इतना अधिक खर्च करना शुरू कर दिया था, कि लगता ही नहीं था कि यह वह गरीब राज्य है जहां पर एक रूपए किलो चावल मिलने पर ही एक बड़ी आबादी दो वक्त खा पा रही थी। इसके अलावा नया रायपुर में सरकार ने मंत्री-मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक के बंगलों के लिए, विधानसभा के लिए, अफसरों के बंगलों के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए की ऐसी योजनाएं बना रखी थीं, जिनसे राज्य पर अंधाधुंध बोझ पडऩे वाला था, और उसके बाद बाकी जिंदगी इनके रखरखाव में करोड़ों रूपए महीने और लगने वाले थे। इस नये ढांचे के बिना भी राज्य सरकार में बैठे ताकतवर लोग अपने पर अंधाधुंध खर्च कर ही रहे थे। ऐसी खबर थी कि विधानसभा अध्यक्ष का बंगला, जिसमें वे रहते भी नहीं थे, उसमें 50 से अधिक एयरकंडीशनर लगाए गए थे। ऐसा हाल बाकी मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक सबके बंगलों का था, और ऐसा काम करवाने वाले अफसर अपने बंगलों पर खर्च कर रहे थे, वह तो स्वाभाविक ही था।
हमारा ख्याल है कि कांग्रेस की सरकार को पहले दिन से एक कड़ी किफायत से काम लेना चाहिए, और इस जिम्मेदारी को सत्ता सुख का न मानकर जनसेवा की चुनौती मानना चाहिए। हमने पिछले बरसों में कई बार इसी जगह तत्कालीन सरकारों को यह सलाह दी थी कि जिलाधीश या जिला कलेक्टर जैसे पदनाम बदलकर उसे जिला जनसेवक करना चाहिए, ताकि इन कुर्सियों के साथ जुड़ा हुआ सत्ता का अहंकार कम हो, और कुर्सी के नाम से ही लोगों के दिमाग में ऐसी कार्य संस्कृति बैठे कि वे कुछ कलेक्ट करने नहीं बैठे हैं, वे मठाधीश की तरह जिलाधीश नहीं हैं, बल्कि वे जिला जनसेवक हैं। सरकार की पूरी सोच जब तक ऐसी नहीं होगी, तब तक गरीब और आम जनता के छोटे-छोटे काम भी नहीं होंगे। किफायत के साथ-साथ सरकार को अपनी कार्य संस्कृति को सत्ता के बजाय सेवा से जोडऩा चाहिए, इससे भी सरकारी खर्च कम होगा, और सरकारी अमले, ढांचे की उत्पादकता बढ़ेगी।
नये मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को तुरंत ही राज्य सरकार की सारी खरीदी, सारे नए टेंडर, सारे नए खर्च स्थगित कर देना चाहिए क्योंकि पिछली सरकार के फैसलों के मुताबिक अब कोई काम करना नैतिक रूप से भी ठीक नहीं है, और यह नई सरकार के अधिकार का हनन भी होगा। शपथ ग्रहण के साथ ही मुख्यमंत्री को राज्य में तमाम नए खर्च रोक देने चाहिए, और नए मंत्रिमंडल को उन पर फिर से सोचना चाहिए। आज प्रदेश में हजारों करोड़ के काम मंजूर किए हुए हैं, और पुरानी मंजूरी के आधार पर आज कोई काम शुरू नहीं करना चाहिए। नए मंत्रियों और नए विधायकों की बहुत सी नई महत्वाकांक्षाएं भी होंगी, लेकिन कांग्रेस पार्टी को एक नीतिगत फैसला लेकर कड़ी किफायत बरतना चाहिए, इससे जनता के बीच उसकी साख भी अच्छी होगी। आने वाले दिनों में सरकार के कामकाज को लेकर, चुनावी घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर बहुत सी बातों पर और चर्चा का वक्त आएगा, लेकिन फिलहाल बिना देर किए कांग्रेस को और छत्तीसगढ़ सरकार को फिजूलखर्ची रोककर किफायत पर अमल करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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