दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 दिसंबर : छत्तीसगढ़ सरकार में अब सलाहकारों की नई पीढ़ी

संपादकीय
21 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल राज्य शासन के चार सलाहकार नियुक्त किए हैं। भूपेश बघेल के साथ लगातार कांग्रेस की चुनावी रणनीति में हिस्सेदार रहे, भूतपूर्व पत्रकार विनोद वर्मा को मुख्यमंत्री का राजनीतिक सलाहकार बनाया गया है। प्रदेश के एक नामी-गिरामी पत्रकार रहे रूचिर गर्ग को मीडिया सलाहकार, बिलासपुर के एक कृषि एवं संबंधित मामलों से लंबे समय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, और भूतपूर्व पत्रकार प्रदीप शर्मा को कृषि और ग्रामीण विकास सलाहकार बनाया गया है। कांकेर के एक पुराने कांग्रेस नेता और कांग्रेस विधायक दल से बरसों से जुड़े हुए राजेश तिवारी को संसदीय सलाहकार बनाया गया है। यह पूरी टीम एक नई पीढ़ी के आगमन की घोषणा है, लेकिन इसके साथ-साथ एक नई कार्य संस्कृति की घोषणा भी है। 

अब तक आमतौर पर सलाहकार का जिम्मा ऐसे लोगों को दिया जाता था जो रिटायर होने के बाद या तो खुद काम तलाशते रहते थे, या फिर जिनकी खूबियों की वजह से सरकार जिन्हें रोज के सरकारी कामकाज से परे सलाह-मशविरे के लिए रखती थी। कई सरकारों में कुछ अघोषित गैरसरकारी सलाहकार भी रहते हैं, और कुछ सरकारों में नियमित अफसर भी अपने कामकाज को छोड़कर सलाहकार का काम करते हैं। इन सबका अलग-अलग नफा-नुकसान होता है, और जो अघोषित सलाहकार रहते हैं वे लोकतंत्र के लिए इस मायने में एक खतरा रहते हैं कि वे किसी बात के लिए जवाबदेह नहीं रहते। ऐसे सलाहकारों से बेहतर वे लोग रहते हैं जिनका नाम सरकारी तनख्वाह/भुगतान की लिस्ट में जुड़ा होता है, और जो घोषित रूप से जवाबदेह रहते हैं। अब भूपेश बघेल ने जो चार सलाहकार कल बनाए हैं, वे न केवल उनके सबसे भरोसेमंद लोगों में से हैं, बल्कि अपने-अपने दायरे में उनकी काबिलीयत लंबे समय में साबित भी हो चुकी है। और इन चारों के साथ एक बात एक सरीखी है कि वे अपने रिटायरमेंट की उम्र से बरसों दूर हैं, और वे किसी पुनर्वास के तहत अपने ढलते बरसों में यहां नहीं आए हैं। वे कामकाजी उम्र के हैं, नई पीढ़ी के हैं, नई टेक्नालॉजी से वाकिफ हैं, और जिनकी सरकार में संभावनाएं पहली बार देखी जा रही हैं। जो रिटायर्ड आला अफसर अपनी पूरी नौकरी में जिन कामों को नहीं कर पाते, कई बार उन्हीं कामों के लिए सलाहकार भी बन जाते हैं, लेकिन यहां पर मामला ठीक उल्टा है। और आज की दुनिया की नई जरूरतों के मुताबिक इस नई पीढ़ी को लाना एक साहसी फैसला है। आम लोगों की जुबान में कहें तो, कुछ लोगों को पुराने ढर्रे को देखने की आदत है, और उनको अब तक सलाहकार की कुर्सियों पर दिखने वाले डोकरों की जगह छोकरों को देखना अटपटा लग सकता है। 

सरकारी नौकरी में पूरी जिंदगी लगा देने वाले लोगों के पास रोज के कामकाज के लिए एक बड़ा लंबा तजुर्बा तो रहता है, लेकिन सरकारी बक्से से बाहर की उनकी सोच रह जाती है, और नई सोच के साथ कुछ कर पाना उनके बस का अक्सर नहीं रह जाता। ऐसे में सरकार से बाहर के, छत्तीसगढ़ से पूरी तरह वाकिफ ऐसे नए और नौजवान लोगों को सलाहकार बनाकर भूपेश बघेल ने एक नई पीढ़ी का दाखिला कर दिया है। उनके पहले के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुकाबले वे खुद भी अगली पीढ़ी सरीखे हैं, और ऐसे में सरकार से परे के नौजवान सलाहकार बहुत सी जंग लगी बातों को ठीक करने में मददगार हो सकते हैं। उन्होंने यह भी अच्छा किया है कि अनौपचारिक और अघोषित सलाहकारों के बजाय घोषित और वेतन-भत्ता प्राप्त, ओहदा-दर्जा प्राप्त सलाहकार रखे हैं, और उन्हें हमारी शुभकामनाएं। (Daily Chhattisgarh) 

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