संपादकीय
17 दिसंबर 2018

कांग्रेस की तीन सरकारें आज राजस्थान, मध्यप्रदेश, और छत्तीसगढ़ में शपथ ले रही हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए यह बरसों बाद आया हुआ खुशी का एक मौका है जिसमें खत्म मान ली गई पार्टी ने एक शानदार तरीके से वापिसी की है, और इन तीन राज्यों में पार्टी आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी बेहतर तरीके से तैयार हो सकेगी। चूंकि इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों और दूसरे तबकों से इतने किस्म के वायदे किए हैं कि उनको पूरा करने के लिए हर जगह लंबा-चौड़ा खर्च लगेगा। और अगर इनके पूरे होने का आसार नहीं दिखेगा तो कुछ महीने बाद के लोकसभा चुनावों पर पार्टी की साख खराब होगी। इसलिए इस पार्टी को इन तीनों राज्यों में कुछ फैसले एक सरीखे लेने चाहिए जो कि नेहरू-गांधी युग की राजनीति की सादगी के मुताबिक भी होना चाहिए, और आत्महत्या करते हुए किसानों को बचाने वाले भी होने चाहिए।
हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि सत्ता ने पिछले बरसों में धीरे-धीरे अपने पर इतना अधिक खर्च करना शुरू कर दिया था, कि लगता ही नहीं था कि यह वह गरीब राज्य है जहां पर एक रूपए किलो चावल मिलने पर ही एक बड़ी आबादी दो वक्त खा पा रही थी। इसके अलावा नया रायपुर में सरकार ने मंत्री-मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक के बंगलों के लिए, विधानसभा के लिए, अफसरों के बंगलों के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए की ऐसी योजनाएं बना रखी थीं, जिनसे राज्य पर अंधाधुंध बोझ पडऩे वाला था, और उसके बाद बाकी जिंदगी इनके रखरखाव में करोड़ों रूपए महीने और लगने वाले थे। इस नये ढांचे के बिना भी राज्य सरकार में बैठे ताकतवर लोग अपने पर अंधाधुंध खर्च कर ही रहे थे। ऐसी खबर थी कि विधानसभा अध्यक्ष का बंगला, जिसमें वे रहते भी नहीं थे, उसमें 50 से अधिक एयरकंडीशनर लगाए गए थे। ऐसा हाल बाकी मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक सबके बंगलों का था, और ऐसा काम करवाने वाले अफसर अपने बंगलों पर खर्च कर रहे थे, वह तो स्वाभाविक ही था।
हमारा ख्याल है कि कांग्रेस की सरकार को पहले दिन से एक कड़ी किफायत से काम लेना चाहिए, और इस जिम्मेदारी को सत्ता सुख का न मानकर जनसेवा की चुनौती मानना चाहिए। हमने पिछले बरसों में कई बार इसी जगह तत्कालीन सरकारों को यह सलाह दी थी कि जिलाधीश या जिला कलेक्टर जैसे पदनाम बदलकर उसे जिला जनसेवक करना चाहिए, ताकि इन कुर्सियों के साथ जुड़ा हुआ सत्ता का अहंकार कम हो, और कुर्सी के नाम से ही लोगों के दिमाग में ऐसी कार्य संस्कृति बैठे कि वे कुछ कलेक्ट करने नहीं बैठे हैं, वे मठाधीश की तरह जिलाधीश नहीं हैं, बल्कि वे जिला जनसेवक हैं। सरकार की पूरी सोच जब तक ऐसी नहीं होगी, तब तक गरीब और आम जनता के छोटे-छोटे काम भी नहीं होंगे। किफायत के साथ-साथ सरकार को अपनी कार्य संस्कृति को सत्ता के बजाय सेवा से जोडऩा चाहिए, इससे भी सरकारी खर्च कम होगा, और सरकारी अमले, ढांचे की उत्पादकता बढ़ेगी।
नये मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को तुरंत ही राज्य सरकार की सारी खरीदी, सारे नए टेंडर, सारे नए खर्च स्थगित कर देना चाहिए क्योंकि पिछली सरकार के फैसलों के मुताबिक अब कोई काम करना नैतिक रूप से भी ठीक नहीं है, और यह नई सरकार के अधिकार का हनन भी होगा। शपथ ग्रहण के साथ ही मुख्यमंत्री को राज्य में तमाम नए खर्च रोक देने चाहिए, और नए मंत्रिमंडल को उन पर फिर से सोचना चाहिए। आज प्रदेश में हजारों करोड़ के काम मंजूर किए हुए हैं, और पुरानी मंजूरी के आधार पर आज कोई काम शुरू नहीं करना चाहिए। नए मंत्रियों और नए विधायकों की बहुत सी नई महत्वाकांक्षाएं भी होंगी, लेकिन कांग्रेस पार्टी को एक नीतिगत फैसला लेकर कड़ी किफायत बरतना चाहिए, इससे जनता के बीच उसकी साख भी अच्छी होगी। आने वाले दिनों में सरकार के कामकाज को लेकर, चुनावी घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर बहुत सी बातों पर और चर्चा का वक्त आएगा, लेकिन फिलहाल बिना देर किए कांग्रेस को और छत्तीसगढ़ सरकार को फिजूलखर्ची रोककर किफायत पर अमल करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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