संपादकीय
18 दिसंबर 2018

चुनावी लोकतंत्र और शासन-प्रशासन में खासा फर्क होता है। अगर चुनाव न होते, और पार्टियों को महज राज्यसभा या विधान परिषद के अंदाज में लोगों को चुनने का मौका रहता, तो पार्टियां ऐसे सांसद या विधायक मनोनीत करतीं जो कि अलग-अलग काबिलीयत के लोगों को छांटकर लिया जाता, और उन्हें उनकी खूबी के मंत्रालय देकर सरकार बेहतर तरीके से चलाई जाती। लेकिन इससे सरकार तो अच्छी चलती, लोकतंत्र बैठ जाता। इसलिए कि लोकतंत्र मनोनयन का नाम नहीं है, निर्वाचन का नाम है। जब आम जनता की पसंद से लोग चुने जाते हैं तो यह जरूरी नहीं होता कि वे खूबियों वाले हों। भारत का लोकतंत्र तो ऐसा कि जिसमें मुजरिम, सजायाफ्ता, दंगाई, और कई किस्म के बुरे लोग भी चुनकर आ जाते हैं। फिर पार्टियों के पास कम से कम राज्यसभा में ऐसी गुंजाइश रहती है कि वे अपने हारे हुए, पिटे हुए, दागी लोगों को वहां भेज सके, और जनता के चुने हुए सांसदों-विधायकों की ताकत का बेजा इस्तेमाल करके राज्यसभा सदस्य बना सके। देश के एक-दो राज्यों में भी विधान परिषद बनाकर ऐसी गुंजाइश रखी गई है कि सरकार मनचाहे मंत्री बना सके। लेकिन आज जिन तीन कांगे्रसी राज्यों में, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में मंत्रिमंडल के नाम तय करने की मशक्कत चल रही है, उन राज्यों में विधान परिषद नहीं है, और लोगों को जनता के बीच से चुनकर आने पर ही मंत्री बनने की संभावना है। इसका नफा और नुकसान दोनों ही है, कोई बहुत विशेषज्ञ भी अगर जीत की संभावना नहीं रखते तो उन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सकता, और अगर लोग जीतकर आ गए हैं, तो उनके बीच से ही कुछ लोगों के मंत्री बनने की संभावना बन जाती है, संभावना है।
ऐसे में नाम तय करने वाली पार्टी, मुख्यमंत्री, और बाकी नेताओं की दुविधा भी गजब की रहती है। हम छत्तीसगढ़ की बात करें, तो कुछ महीनों के भीतर ग्यारह लोकसभा सीटों पर चुनाव होना है, और कांगे्रस के पास तो आज महज एक ही सीट है। इसलिए इन तमाम सीटों पर पार्टी को मंत्रिमंडल के मुताबिक भी यह साबित करना होगा कि उन्होंने हर संसदीय सीट को महत्व दिया है। मुख्यमंत्री के अलावा मंत्रियों की कुर्सियां हैं बारह, और संसदीय सीटें हैं ग्यारह! इसके बाद देखें तो राज्य दक्षिण और उत्तर के दो अलग-अलग आदिवासी इलाकों में भी बंटा हुआ है, और इन दोनों में दो दर्जन से अधिक विधायक कांगे्रस के ही जीतकर आए हैं। आदिवासी तबके के मुताबिक, और बस्तर या सरगुजा के मुताबिक इनमें से कम से कम तीन मंत्री बनाने होंगे, और सरगुजा के एक गैरआदिवासी टीएस सिंहदेव तो मंत्री हैं ही। अब बाकी जातियों के हिसाब से देखें, तो अनुसूचित जाति के आधा दर्जन कांगे्रस विधायक हैं, और उनकी भी उम्मीदें जायज हैं। राज्य के अकेले मुस्लिम विधायक और पार्टी के बड़े, धाकड़ नेता मोहम्मद अकबर अपने तबके के अकेले हैं, और उनकी मंत्री की कुर्सी तो पक्की है। लेकिन छत्तीसगढ़ी ब्राम्हण और गैरछत्तीसगढ़ ब्राम्हण भी पर्याप्त संख्या में जीतकर आए हैं, उनकी पारिवारिक ताकत से लेकर उनकी वरिष्ठता, उनका तजुर्बा, इन सबको देखें तो काम आसान नहीं लगता है कि इनमें से किसे लिया जाए, और किसे छोड़ा जाए। इसके बाद ओबीसी की दो प्रमुख जातियां हैं, साहू और कुर्मी। इनमें से कितने लोगों को लिया जाएगा, यह खींचतान बड़ी जाहिर है। इन सबके बीच में बनिया, या मारवाड़ी तबका बाकी ही है, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय बाकी ही हैं।
पूरी तस्वीर को एक नजर में देखें तो लगता है कि किसी मंत्रालय को चलाने की खूबी एक आखिरी पैमाना रह जाएगा किसी को मंत्री बनाने के लिए। अलग-अलग किस्म के दबावों से घिरा हुआ यह चयन सरकार को ऐसे मंत्री देगा जो कि जनता का प्रतिनिधित्व तो रहेगा, लेकिन खूबियों पर आधारित नहीं रहेगा। इसके बाद ऐसी सरकार से जनता यह उम्मीद करेगी कि ये लोग बहुत अच्छा काम करें। और यह बात महज इस सरकार, या इस पार्टी के साथ नहीं है, यह बात देश और हर प्रदेश की हर सरकार के साथ है, पूरा भारतीय लोकतंत्र इसी हिसाब से बना हुआ है, और ऐसे में मंत्रियों का साथ देने के लिए देश में अधिकारियों का जो ढांचा खड़ा किया गया है, उससे जरूर विशेषज्ञता और खूबी की उम्मीद की जाती है। इन दोनों का मिलाजुला तजुर्बा एक-दूसरे को बहुत कुछ सिखाते चलता है, और लोकतंत्र संपन्न होते जाता है।
(Daily Chhattisgarh)
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