छोटी सी बात

11 सितंबर 2011
एक परिवार को एक फिल्म की चार टिकटों का तोहफा मिला। एक लिफाफे में शुभकामनाओं सहित लिखा हुआ तोहफा एक दोस्त की ओर से लिखा हुआ आया। परिवार खुशी-खुशी फिल्म देखने चले गया। लौटकर आया तो देखा घर को चोर खाली कर गए थे।
मुफ्त का हर माल फायदे का नहीं होता। कल्पना करें कि प्रसाद के नाम पर कोई घर पर नशा मिला प्रसाद दे जाए तो क्या होगा? अनजानों से तोहफे कभी न लें।

जिस समाज में दिमाग का महत्व होता है वह...

हैदराबाद की खबर है कि क्रिकेट खिलाड़ी अजहर के क्रिकेट खिलाड़ी बेटे अयाज एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह जख्मी होकर अस्पताल में हैं और शायद उनके बचने की उम्मीद कम है। पहली खबर बताती है कि यह कमउम्र नौजवान बहुत रफ्तार से मोटरसाइकिल चला रहा था। ऐसे कुछ दूसरे चर्चित मामलों को देखें तो कई बरस पहले गजल गायक जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का नौजवान बेटा मुंबई में एक सड़क हादसे में मारा गया था और उसके बाद कुछ बरस तक सदमे में रही मां ने गाना बंद ही कर दिया था। हम अपने आसपास सड़कों पर रोज मौत देखते हैं और यह भी देखते हैं कि परिवार के लोग और सरकार, इनमें से कोई भी इन मौतों को घटाने के लिए वे कोशिशें नहीं कर रहे जो कि उनकी अलग-अलग और सामूहिक जिम्मेदारी भी है और जो बहुत आसान भी है। लोग वोट डालने का हक पा जाते हैं, शादी मर्जी से करने का कानूनी हक पा जाते हैं, लेकिन हेलमेट लगाकर मोटरसाइकिल चलाने की जिम्मेदारी वे नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि ऐसे हर हादसे के बाद पुलिस और अस्पताल से लेकर रोते-बिलखते परिवार तक बहुत से लोगों पर एक गैरजरूरी बोझ पड़ता है और बहुत से परिवारों में अकेला कमाऊ सदस्य चले जाने से उस पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है।
यह अखबार तो अपनी तरफ से हेलमेट के लिए एक अभियान चलाते आया है और खुद के बनाए इश्तहारों से लेकर इस संपादकीय कॉलम में हम हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अपनी बात दुहराते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह याद है कि शायद एक बरस पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हेलमेट अनिवार्य करने के बारे में अपनी सरकार का फैसला घोषित किया था। उस वक्त यह बात हुई थी कि कुछ महीनों में जनता में इस बारे में जागरूकता लाई जाए, लोग हेलमेट खरीद लें, और फिर इसे अनिवार्य कर दिया जाए। उसके भी पहले जब प्रदेश कांगे्रस के तत्कालीन अध्यक्ष चरणदास महंत ने हेलमेट के समर्थन में एक बयान जारी किया था तो रायपुर शहर कांगे्रस ने पोस्टर लगाए थे-हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...
दरअसल सिर और दिमाग की परवाह उसी को हो सकती है, या उसे होनी ही चाहिए जिसके पास दिमाग हो। एक फूहड़ लुभावने अंदाज में हेलमेट का विरोध करने यहां के उन कांगे्रसियों ने अपने पेशे जैसा बना लिया था जिनमें से हर किसी के पास बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं और जिनमें से अधिकांश दौलतमंद लोग दुपहियों पर चलते नहीं हैं। जिन गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने कुचले सिर के साथ कफन-दफन की नौबत तक पहुंचते हैं, वैसी कोई मुसीबत राजनीतिक में सक्रिय हो चुके मुहल्लों के नेताओं को भी नहीं होती इसलिए उन्हें हेलमेट का विरोध करके कमसमझ जनता को बेवकूफ बनाने में मजा आता है। विरोध का ऐसा हाल कुछ अखबारों में भी देखने मिलता है और जब-जब कोई सरकार हेलमेट को कड़ाई से लागू करने की कोशिश करती है ये अखबार पूरी गैरजिम्मेदारी से जनता को यह समझाने में लग जाते हैं कि इस गैरजरूरी बोझ की कोई जरूरत नहीं है।
लेकिन यह बात हमारी समझ से परे है कि एक जनकल्याणकारी सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए कुछ कड़े फैसले क्यों नहीं ले पाती? खासकर तब जब कड़े चक्कों, पत्थरों और फुटपाथों से सिर कुचल जाते हैं और परिवार टूट जाते हैं। ऐसे में भी अगर सरकार इस साधारण सी कड़ाई को बरतने में डरती है तो फिर वह लोगों में खुद में रहने लायक जिम्मेदारी को कभी पैदा नहीं कर सकती। समाज की तरफ से कोई ऐसी पहल दिखाई नहीं पड़ती जो कि सरकार की पहल से परे लोगों में जागरूकता पैदा करे। और कुछ महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट से एक आदेश आया था कि दुपहिया बनाने वाली सभी कंपनियां इन गाडिय़ों के साथ हेलमेट अनिवार्य रूप से दे। उस आदेश का क्या हुआ है यह भी अभी साफ पता नहीं है।
यहां हमें आज जिस बात से चर्चा शुरू की है उसका एक मकसद यह है कि क्या ऐसे कुछ नामीगिरामी लोग अपने बच्चों की जान चली जाने के बाद, बची जिंदगी ऐसे एक अभियान में झोंक नहीं सकते? जो फिल्मी सितारे या खिलाड़ी बहुत मशहूर हैं, जिनके चाहने वाले करोड़ों में हैं, वे इस तरह के अभियान क्यों नहीं छेड़ सकते? क्यों अदालतें इस पर कड़ाई नहीं बरत सकतीं। और सबसे बड़ी बात कि छत्तीसगढ़ की सरकार जो कि ऐसे मुनादी कर चुकी है, वह इतना क्यों डरती है कि उसके वोट खराब होंगे? दिल्ली में दस-बीस बरस से तो हेलमेट अनिवार्य होने की याद हमें है ही, वहां पर तो पीछे बैठे लोगों को भी हेलमेट लगाना होता है। लेकिन वहां कोई सत्तारूढ़ पार्टी इस वजह से चुनाव हार गई हो ऐसा तो किसी ने कभी कहा भी नहीं है। इसे कड़ाई से लागू करने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वह इसमें जितनी देर करेगी, उतनी ही वह सड़क-हादसा-मौतों की जिम्मेदारी भी रहेगी। जिस समाज में दिमाग का महत्व होता है वह दिमाग वाले सिर को संभालकर भी रखता है।

छोटी सी बात


10 सितंबर
अगर आप पूरे वक्त कड़वी और जली-कटी बातें ही कहने के आदी हैं, तो याद रखें कि रोजाना कोई कुनैन का नाश्ता नहीं करता। अपनी बातों के साथ आप अकेले रह जाएंगे।

राष्ट्रीय एकता परिषद का बहिष्कार गलत


10 सितंबर
प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में केन्द्र सरकार से नाराज चल रहे चार मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे और खुद यूपीए में भागीदार तृणमूल कांग्रेस की ममता बैनर्जी भी बंगाल की तरफ से नहीं आईं। वे भी बांग्लादेश के साथ भारत की चल रही बातचीत को लेकर कुछ नाराज बताई जा रही हैं और वे मनमोहन सिंह के साथ ढाका भी नहीं गई थीं। हम राष्ट्रीय एकता परिषद जैसे महत्वपूर्ण मौके पर मुख्यमंत्रियों का वहां न जाना अटपटा पाते हैं। अलग-अलग पार्टियों की इन दिनों देश में चर्चा में चल रहे साम्प्रदायिकता विरोधी विधेयक पर अलग-अलग सोचना है लेकिन इस बारे में बात तो वहां जाकर ही हो सकती है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक वहां पर इस प्रस्तावित विधेयक का कड़ा विरोध किया और इसे देश के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया। साम्प्रदायिकता में बुरी तरह झुलसे हुए गुजरात के मुख्यमंत्री इस मौके पर आते तो वे कुछ अधिक बोल सकते थे क्योंकि वे साम्प्रदायिकता के लिए देश में सबसे बड़े गुनहगार माने जाते हैं और अनगिनत अदालतों में अनगिनत मामलों में उनकी सरकार के अनगिनत लोग कटघरों में खड़े हैं। लेकिन यह बात अपने आप में एक वजह हो सकती है कि वे यहां क्यों नहीं आए। रूबरू उनसे बहुत से सवाल हुए होते और वे एकतरफा बयानों से अपनी बात कहने के आदी हैं, मीडिया के घेरे में आने से वे आमतौर पर बचते हैं और दिल्ली न आने के पीछे शायद यह भी एक कारण रहता है।
हम बहिष्कार और बहिर्गमन को ठीक नहीं मानते। खासकर ऐसी जगहों पर जहां पर कि लोग अपने पद की वजह से बुलाए जाते हैं और जहां पर मौजूद सारे के सारे लोग अपने-अपने पद पर रहने की वजह से मौजूद रहते हैं। इस बैठक और योजना आयोग की उस बैठक में एक फर्क है जिसका कि डॉ. रमन सिंह पिछले कई महीनों से व्यक्तिगत रूप से बहिष्कार करते आए हैं और उनकी सरकार के कुछ दूसरे लोग इस बैठक में जाते रहे हैं। योजना आयोग की एक कमेटी में छत्तीसगढ़ में राजद्रोह की सजा पाने के बाद अपील के दौरान जमानत पर रिहा हुए डॉ. बिनायक सेन को रखने के खिलाफ रमन सिंह ने योजना आयोग के बहिष्कार का ऐलान किया था और हम उस बहिष्कार से सहमत भी थे क्योंकि देश की संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ एक राज्य के अपराधी को अगर केन्द्र सरकार ऐसी किसी जगह कमेटी में रखती है जहां पर कि उसके साथ बैठना राज्य के मुख्यमंत्री की मजबूरी बना दी जाए तो केन्द्र का विरोध करते हुए ऐसी बैठक का बहिष्कार करना ही ठीक है। लेकिन राष्ट्रीय एकता परिषद एक अलग किस्म की कमेटी है जिसमें जाना देश के हर मुख्यमंत्री के लिए एक जिम्मेदारी रहती है और होना भी चाहिए। आज देश में जितने किस्म के मुद्दे तनाव और खतरा पैदा कर रहे हैं उनके चलते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के बीच अगर बातचीत का यह रिश्ता, विचार-विमर्श का यह मंच अगर बहिष्कार का शिकार होता है तो यह बात भी देश के संघीय ढांचे के खिलाफ है।
अभी-अभी हमने लोकसभा और राज्यसभा का इतना लंबा बहिष्कार देखा है कि लगातार घटती चली जा रही संसदीय बैठकों को भी विपक्ष ने हल्ले-गुल्ले और बहिष्कार में खत्म कर दिया। यह नौबत सरकार के लिए मजे की हो सकती है कि उसके सबसे कटु आलोचक कभी इस तर्क को लेकर तो कभी उस तर्क को लेकर सदन को न चलने दें। लेकिन पांच बरस तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ढोने के लिए मजबूर देश की जनता संसद के ऐसे बहिष्कार को कब तक झेले? और फिर यह संसद देश की तमाम विधानसभाओं और म्युनिसिपल से लेकर पंचायतों तक के लिए मार्गदर्शक की तरह मानी जाती है और बहिष्कार-बहिर्गमन इस देश की संसदीय संस्कृति बन चुके हैं। संसद में रियायती खाना खाने से लेकर, सांसदों को मिली गई सुविधाओं के आंकड़े, कुछ सच और कुछ झूठे, ई-मेल के मार्फत पूरे देश में और दुनियाभर में बसे हुए भारतीय मूल के लोगों के बीच लगातार फेरा लगाते रहते हैं। हम सांसदों को इन आंकड़ों के बावजूद महंगा नहीं मानते और उनकी तनख्वाह और अधिक बढ़ाने की सिफारिश समय-समय करते हैं। लेकिन महंगे लोग भी अगर काम न करें तो उन्हें नौकरी से निकालकर नए लोगों को रखा जा सकता है। एक सांसद तो पांच बरस के ठेके के मजदूर (या राजा?) की तरह रखा जाता है उसे कोई कैसे हटाए? लेकिन जब संसद और विधानसभाओं से परे कोई मुख्यमंत्री ऐसी जरूरी बैठक में न जाए तो वह ठीक बात नहीं है। मायावती के खुद के जो तौर-तरीके हैं वे पूरी तरह अलोकतांत्रिक हैं, ऐसे में इस बैठक का बहिष्कार करके वे कहीं पर भी कुछ साबित नहीं कर सकतीं और वे अपने राज्य का नुकसान भी कर रही हैं, जनता के बीच अपनी तस्वीर को और बिगाड़ रही हैं। यही हाल अदालत के कटघरे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ले जाकर खड़ी की गई तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का है। और यूपीए की भागीदार रहने के बाद भी अगर ममता इस बैठक में नहीं आती हैं तो वे अपने गैरजरूरी और सनकी तेवरों को ही दिखा रही हैं, जिससे उनकी कोई इज्जत नहीं बढ़ती। आज देश आतंकवाद से लेकर साम्प्रदायिकता तक, बहुत से मुद्दों से जूझ रहा है और इन पर किसी राज्य की, किसी पार्टी की केन्द्र सरकार से पूरी तरह असहमति भी हो सकती है, लेकिन उस असहमति को बातचीत से ही निपटाना चाहिए।

छोटी सी बात


9 सितंबर 11
कुछ लोग घर में इतने किस्म के मीठे-नमकीन, वेराइटी के नाम पर इक_ा रखते हैं कि वे बासी होने लगते हैं, सील जाते हैं और उनमें फफूंद तक लगने लगता है। कम सामान रखें और ताजा खाएं।

खाली चबूतरे वाले देश में हमले रुकें, तो कैसे रुकें?

9 सितंबर 2011
एक तरफ दिल्ली और पाकिस्तान में आतंकी हमले चल रहे हैं और दूसरी तरफ अमरीका में 11 सितंबर की बरसी पर फिर आतंकी हमलों का खतरा सिर पर सवार है। वहां ऐसी खबर है कि न्यूयॉर्क में फिर हमला हो सकता है, इससे बचने के लिए सरकार ने तो तैयारी की ही है, लेकिन वहां के मेयर ने जनता से कहा है कि वह अपनी आंखें खुली रखें और जो देखे उसे बोलने के लिए मुंह भी तैयार रखे। यह एक बात बहुत अहमियत इसलिए रखती है कि दुनिया का यह सबसे विकसित या चौकस देश भी अपने तमाम कैमरों और निगरानी की दूसरी तरकीबों के बावजूद जनता के साथ के बिना आतंकी हमलों को रोकने की हालत में नहीं है। लेकिन अगर दिल्ली में हाल देखें तो ऐसा लगता है कि इस ताजा हमले के वक्त जनता केंद्र और दिल्ली सरकार के खिलाफ एक किस्म से बागी है।
दरअसल अभी-अभी अन्ना हजारे के अनशन से इन दोनों सरकारों की तस्वीर पर जैसी कालिख पुती है, उसकी सबसे बड़ी गवाह दिल्ली ही है। ऐसे में वहां के लोगों की नाराजगी सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर कांगे्रस के मंत्रियों, नेताओं और प्रवक्ताओं की बददिमागी, बदजुबानी और बदसलूकी तक तमाम बातों से है। सोनिया गांधी के यहां मौजूद रहते शायद इतनी बद बातें कांगे्रस और यूपीए की तरफ से न हुई होतीं क्योंकि वे लगभग हमेशा ही एक शिष्टाचार के मुताबिक चलते दिखती हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने इस बार के अपने सात बरस के राज में सबसे अधिक बद बातें करके दिखाई हैं। अब सवाल यह है कि जब जनता को सरकार या सरकारों से नफरत हो, जब पुलिस पर उसका भरोसा न हो तो वह क्यों आतंक का कोई शक होने पर पुलिस को फोन करेगी? और यह बात सिर्फ दिल्ली पर लागू नहीं होती है, यह तो वहां से बहुत दूर और बहुत अलग किस्म के आतंक से घिरे हुए, बहुत अलग किस्म के बस्तर पर भी लागू होती है जहां पर सरकार को नक्सलियों के खिलाफ जनता से उतनी जानकारी नहीं मिलती है जितनी कि नक्सल मोर्चे पर जरूरी हो सकती है। जब बस्तर से लेकर सरगुजा तक पुलिस बेकसूरों की हत्या, बलात्कार और प्रताडऩा में लगी हो तो उसकी मदद करने आदिवासी जनता आगे क्यों आएगी? यही वजह है कि बस्तर में नक्सलियों को कुछ या अधिक हमदर्द तो मिले हुए हैं ही।
जनता से देश की सरकार को मदद रातों-रात नहीं मिल सकती और राजा और प्रजा के रिश्ते टुकड़ों में नहीं सुधर सकते। जब लोगों को यह लगेगा कि सरकार चला रहे लोग जनता के लिए तकलीफें उठा रहे हैं तो लोग भी खतरे उठाकर सरकार को चौकन्ना करने का काम करेंगे। आज सत्ता और जनता के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं बच गया है। भारतीय लोकतंत्र में यह एक बहुत ही तकलीफदेह, शर्मनाक और खतरनाक नौबत है। यह वही देश है जहां पर जब एक वक्त जवाहर लाल नेहरू जैसा भरोसेमंद प्रधानमंत्री था तो उनके एक बार कहने पर जंग के दौरान महिलाएं अपने गहने उतारकर दे देती थीं। लेकिन वह दौर ऐसे नेताओं का भी था जिन्होंने अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद देश के लिए दान की थी। आज तो जिन नेताओं के बारे में जनता को भरोसा है और मीडिया का अंदाज है कि जिनके पास हजारों करोड़ रुपए है, वे अगर अपनी दौलत को एक दर्जन करोड़ ही बताते हैं, जो सरकार रात-दिन देश को लूटने के लिए कटघरे में खड़ी है उस सरकार के राज में जनता के मन में भी देश के लिए जिम्मेदारी की भावना कुछ कम होना जायज है, और खासकर जहां खतरा उठाकर आतंकियों की खबर पुलिस को देने की बात हो, तो वहां पर पुलिस का जनता से रिश्ता और बर्ताव भी मायने रखता है।
अमरीका के मुकाबले सरकार का जनता से रिश्ता भारत में अधिक खराब है और भारत के मुकाबले पाकिस्तान में और भी अधिक खराब है। इसीलिए पाकिस्तान में आतंक की वारदातें बढ़ती चल रही हैं और जनता और सरकार एक किस्म से आमने-सामने हैं। भारत के बारे में हम न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्यों की सरकारों के भी चेताना चाहेंगे कि अगर जनता के बीच विश्वसनीयता, उसका समर्थन पाने के लिए अगर वे लगातार ठोस कोशिशें नहीं करेंगे और महज लूटपाट में लगी रहेंगी तो यह देश और गहरे खतरे में जाता रहेगा। वर्दियां और औजार कितने ही बढ़ जाएं, कैमरे कितने ही लग जाएं, उससे हमले नहीं थमेंगे। इस देश में सत्ता की प्रतिमा चूर-चूर हो चुकी है और उसका चबूतरा खाली पड़ा हुआ है। ऐसे में देश के कुछ नेता अपनी निजी ईमानदारी को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते खड़े हैं, लेकिन उनके गिरोह के लोग अगर बेईमान हैं तो उनको कभी चबूतरा नसीब नहीं हो सकता, और देश को जनता का वैसा साथ नहीं मिल सकता जैसा कि हमले रोकने के लिए जरूरी है।
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छोटी सी बात


8 सितंबर
दांतों की सफाई का इसलिए भी ख्याल रखें कि खराब दांत दिल की गंभीर बीमारी के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं।
 

गिद्धों के पंख कतरने की जरूरत

8 सितंबर 2011
कल दिल्ली में बम फटने के बाद दर्जन भर के करीब लाशें बिखरी थीं और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में पहुंचाए गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट के गेट पर बहुत भरे हुए इलाके में पुलिस की जांच चल ही रही थी कि नेताओं का अस्पताल जाना और मौके पर पहुंचना शुरू हो गया। भाजपा की तरफ से गडकरी और कांगे्रस की तरफ से राहुल। जैसा कि टीवी खबरों में देखने मिला, इनके लिए इनके दर्जे की चौकसी का इंतजाम किया गया। और जो नहीं दिखा वह भी जाहिर है कि सैकड़ों लोग इस इंतजाम में लगे होंगे। कल रात ही बांग्लादेश दौरे से लौटकर प्रधानमंत्री भी अस्पताल गए और उसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री भी विस्फोट की जगह पर पहुंचे। और जब यह हो रहा था तभी खबरें आ रही थीं कि घायलों के घरवालों को भी उनके पास पहुंचने नहीं दिया जा रहा है, वे बावलों की तरह रोते-बिलखते अपने लोगों का हाल जानने के लिए अस्पतालों के बाहर धक्के खा रहे हैं।
इस हाल को देखकर हमें राखी के दिन जेल का हाल याद पड़ता है जहां हमारे शहर में कुछ बरस पहले तक एक संगठन की महिलाएं अपने ऊंचे दर्जे के राजनीतिक संबंधों के चलते वहां पहुंचकर कैदियों को राखी बांधती थीं और उन कैदियों की सगी बहनें सुबह से शुरू हुए इंतजार के बाद इन सफेदपोश शहरी बहनों का नाटक पूरा होने का इंतजार करते रोती रहती थीं। एक दूसरी घटना जो सबको याद ही होगी वह मुंबई हमले के बाद की है जब महाराष्ट्र के उस वक्त के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख अपने फिल्म अभिनेता बेटे और एक अतिसक्रिय फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा को लेकर होटल ताज में बिखरे लहू पर चलने के लिए वहां पहुंचे थे।
किसी कुदरती कहर के वक्त या किसी हमले और हादसे के बाद, जब सरकार और समाज का एक-एक पल लोगों की जिंदगी बचाने के लिए मायने रखता है, जब न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देशों में बचाव की तैयारी कम पडऩे लगती है, तब नेताओं का कैमरों के बीच गिद्धों की तरह लाशों पर मंडराना भयानक लगता है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम का तो जिम्मा ऐसे हादसों के पहले से लेकर उनके बाद तक बनता है, इसलिए उनका वहां जाना एक बार बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन गडकरी और राहुल के आंसू तो कुछ दिन उनके रूमालों में बसर कर सकते थे। प्रतीक के रूप में हादसों वाले ऐसे हर शहर को वहां पहुंचने वाले गैरजरूरी नेताओं को रूमाल देने चाहिए कि वे किसी तरह बाहर ही अपने आंसू पोंछ लें, और पुलिस से लेकर डॉक्टरों तक सबको अपना काम करने दें, लोगों को जिंदा रहने दें। हो सकता है कि कुछ कमअक्ल लोग इस बात को एक सार्वजनिक मुद्दा बनाएं कि हादसे के इतने वक्त बाद तक नेता देखने भी नहीं पहुंचे, इसलिए समझदार सरकारों को पहले ही अपनी ऐसी नीति की घोषणा कर देनी चाहिए कि जब तक बचाव का काम पूरा नहीं हो जाएगा, जब तक नेताओं के दौरों से बाधा पडऩे का खतरा बने रहेगा, तब तक वे वहां नहीं जाएंगे और बचाव में लगे लोगों को उनका काम करने देंगे। जनता की तरफ से इन नेताओं को यह भरोसा दे देना चाहिए कि उनका बयान, उनका एसएमएस, उनका ट्वीट भी उनकी हमदर्दी मान लिए जाएंगे और वे अपने-आपको खून से सनी जगहों से दूर रखें। कल जब राहुल गांधी दोपहर को ही राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंच गए तो वहां मौजूद नाराज भीड़ और घायलों के रिश्तेदारों ने उसके खिलाफ नारे लगाए और उन्हें वापिस जाने को कहा।
यहां पर एक और घटना का जिक्र मुनासिब होगा। इसी बरस जुलाई के महीने में कालका मेल एक्सीडेंट के बाद कानपुर के अस्पताल में भर्ती घायलों को देखने के लिए राहुल गांधी वहां पहुंचे। मायावती की पुलिस ने सुरक्षा इंतजाम करते हुए अस्पताल के गेट पर ही बाकी सभी को रोक दिया और वहां पर लाया गया एक बुरी तरह से जख्मी पुलिस वाला अस्पताल के भीतर घुसने के इंतजार में बाहर ही मर गया। उसे इलाज की जगह अस्पताल के बाहर पैंतालीस मिनट का इंतजार ही नसीब हुआ और लगभग राहुल की उम्र, चालीस बरस का यह सिपाही चल बसा। कानपुर में ही इसके एक बरस पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे के वक्त सड़कों का टै्रफिक बंद कर दिया गया था और दस बरस का एक बच्चा खेलते हुए सिर की चोट से गंभीर था और रास्ते बंद होने से वह अस्पताल के पहले ही रोक दिया गया और वहीं मर गया।
यह पूरा सिलसिला बहुत ही भयानक है और बिना ऐसे हादसों के भी किसी बड़े मंत्री-संतरी के अस्पताल जाने पर या सड़कों से आने-जाने पर आम जनता कहे जाने वाले तबके की जिंदगी मानो निलंबित कर दी जाती है। भारत में मीडिया का हाल यह है कि अगर नेता अस्पतालों के बिस्तरों के बगल जाकर फोटो न खिंचवाएं तो उनसे सौ तरह के सवाल किए जाते हैं कि वे अब तक वहां गए क्यों नहीं? हमारा यह मानना है कि किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगानी चाहिए ताकि लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले घडिय़ाली आंसुओं को अस्पतालों या तबाही के मंजर तक पहुंचने से रोका जा सके। नेताओं की मर्जी से चलने वाली सरकारों से तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती इसलिए अदालती दखल ही काम आ सकती है। मई के महीने में हमने पश्चिम बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी की खबर छापी थी और उस पर इसी जगह तारीफ भी लिखी थी कि उन्होंने कोलकाता की पुलिस को यह आदेश दिया है कि वे उनके आने-जाने के वक्त टै्रफिक न रोके। वे एक साधारण सैंट्रो कार में चलती हैं और चौराहों पर लालबत्ती होने पर वे बराबर रूकते चलती हैं। यही वजह है कि अपने साधारण और इंसानी तौर-तरीकों की वजह से वे अकेले अपने दम पर चौथाई सदी से अधिक से बंगाल पर काबिज वामपंथियों को उखाड़कर फेंक पाईं।
चलते-चलते एक यह खबर आई है कि कर्नाटक में भयानक भ्रष्टाचार के लिए लोकायुक्त अदालत के कटघरे में खड़े हुए पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने पेशी से इस तर्क पर छुटकारा मांगा है कि उनकी जेड दर्जे की सुरक्षा के चलते उनके अदालत आने-जाने से रास्ते के लोगों को दिक्कत होती है। भारत के नेता भी जेल और अदालत से बचने के लिए ऐसे-ऐसे तर्क ढूंढ निकालते हैं मानो वे इंसानों से परे किसी दूसरी दुनिया से यहां लोगों को बेवकूफ बनाकर, उन्हें लूटते हुए उन पर राज करने के लिए भेजे गए हैं।
भारत में मीडिया को यह समझना चाहिए कि नेताओं से घायलों तक न जाने के बारे में पूछने से वे अपना चेहरा बचाने के लिए वहां आनन-फानन पहुंचते हैं और घायलों की मौत का सामान करते हैं। सवाल तो ये पूछे जाने चाहिए कि क्या घायलों की जिंदगी बचाने में उनकी वहां कोई जरूरत थी? वे ऐसे मौकों पर डॉक्टरों को और पुलिस को अपना काम क्यों नहीं करने देते? ऐसे दौरों के खिलाफ हम तुरंत एक जनहित याचिका की सिफारिश करते हैं। दिल्ली की कुछ बरस पहले की एक घटना लोगों को शायद याद हो जिसमें किसी बड़े मंत्री या प्रधानमंत्री के काफिले के लिए सड़क को बंद कर दिया गया था और उसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज की कार भी फंस गई थी, इस जज ने देर से अदालत पहुंचते ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की अपनी अदालत में पेशी लगाई थी। लेकिन खुद न फंसें, अपना कोई ऐसे में न मरे, तब भी अदालत को खुद होकर घडिय़ाली आंसुओं पर कानूनी रोक लगानी चाहिए। कानून बनाने वाले लोग तो कैमरों की मौजूदगी से अपने-आपको दूर नहीं रख पाते, इसलिए कोई कानूनी कार्रवाई ही घायलों की जिंदगी बचा पाएगी।

छोटी सी बात


7 सितंबर
जब नींद आ रही हो तो कभी कोई गाड़ी न चलाएं। ऐसे में हो सकता है कि कभी नींद से बाहर ही न आ पाएं।