हैदराबाद की खबर है कि क्रिकेट खिलाड़ी अजहर के क्रिकेट खिलाड़ी बेटे अयाज एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह जख्मी होकर अस्पताल में हैं और शायद उनके बचने की उम्मीद कम है। पहली खबर बताती है कि यह कमउम्र नौजवान बहुत रफ्तार से मोटरसाइकिल चला रहा था। ऐसे कुछ दूसरे चर्चित मामलों को देखें तो कई बरस पहले गजल गायक जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का नौजवान बेटा मुंबई में एक सड़क हादसे में मारा गया था और उसके बाद कुछ बरस तक सदमे में रही मां ने गाना बंद ही कर दिया था। हम अपने आसपास सड़कों पर रोज मौत देखते हैं और यह भी देखते हैं कि परिवार के लोग और सरकार, इनमें से कोई भी इन मौतों को घटाने के लिए वे कोशिशें नहीं कर रहे जो कि उनकी अलग-अलग और सामूहिक जिम्मेदारी भी है और जो बहुत आसान भी है। लोग वोट डालने का हक पा जाते हैं, शादी मर्जी से करने का कानूनी हक पा जाते हैं, लेकिन हेलमेट लगाकर मोटरसाइकिल चलाने की जिम्मेदारी वे नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि ऐसे हर हादसे के बाद पुलिस और अस्पताल से लेकर रोते-बिलखते परिवार तक बहुत से लोगों पर एक गैरजरूरी बोझ पड़ता है और बहुत से परिवारों में अकेला कमाऊ सदस्य चले जाने से उस पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है।
यह अखबार तो अपनी तरफ से हेलमेट के लिए एक अभियान चलाते आया है और खुद के बनाए इश्तहारों से लेकर इस संपादकीय कॉलम में हम हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अपनी बात दुहराते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह याद है कि शायद एक बरस पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हेलमेट अनिवार्य करने के बारे में अपनी सरकार का फैसला घोषित किया था। उस वक्त यह बात हुई थी कि कुछ महीनों में जनता में इस बारे में जागरूकता लाई जाए, लोग हेलमेट खरीद लें, और फिर इसे अनिवार्य कर दिया जाए। उसके भी पहले जब प्रदेश कांगे्रस के तत्कालीन अध्यक्ष चरणदास महंत ने हेलमेट के समर्थन में एक बयान जारी किया था तो रायपुर शहर कांगे्रस ने पोस्टर लगाए थे-हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...
दरअसल सिर और दिमाग की परवाह उसी को हो सकती है, या उसे होनी ही चाहिए जिसके पास दिमाग हो। एक फूहड़ लुभावने अंदाज में हेलमेट का विरोध करने यहां के उन कांगे्रसियों ने अपने पेशे जैसा बना लिया था जिनमें से हर किसी के पास बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं और जिनमें से अधिकांश दौलतमंद लोग दुपहियों पर चलते नहीं हैं। जिन गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने कुचले सिर के साथ कफन-दफन की नौबत तक पहुंचते हैं, वैसी कोई मुसीबत राजनीतिक में सक्रिय हो चुके मुहल्लों के नेताओं को भी नहीं होती इसलिए उन्हें हेलमेट का विरोध करके कमसमझ जनता को बेवकूफ बनाने में मजा आता है। विरोध का ऐसा हाल कुछ अखबारों में भी देखने मिलता है और जब-जब कोई सरकार हेलमेट को कड़ाई से लागू करने की कोशिश करती है ये अखबार पूरी गैरजिम्मेदारी से जनता को यह समझाने में लग जाते हैं कि इस गैरजरूरी बोझ की कोई जरूरत नहीं है।
लेकिन यह बात हमारी समझ से परे है कि एक जनकल्याणकारी सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए कुछ कड़े फैसले क्यों नहीं ले पाती? खासकर तब जब कड़े चक्कों, पत्थरों और फुटपाथों से सिर कुचल जाते हैं और परिवार टूट जाते हैं। ऐसे में भी अगर सरकार इस साधारण सी कड़ाई को बरतने में डरती है तो फिर वह लोगों में खुद में रहने लायक जिम्मेदारी को कभी पैदा नहीं कर सकती। समाज की तरफ से कोई ऐसी पहल दिखाई नहीं पड़ती जो कि सरकार की पहल से परे लोगों में जागरूकता पैदा करे। और कुछ महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट से एक आदेश आया था कि दुपहिया बनाने वाली सभी कंपनियां इन गाडिय़ों के साथ हेलमेट अनिवार्य रूप से दे। उस आदेश का क्या हुआ है यह भी अभी साफ पता नहीं है।
यहां हमें आज जिस बात से चर्चा शुरू की है उसका एक मकसद यह है कि क्या ऐसे कुछ नामीगिरामी लोग अपने बच्चों की जान चली जाने के बाद, बची जिंदगी ऐसे एक अभियान में झोंक नहीं सकते? जो फिल्मी सितारे या खिलाड़ी बहुत मशहूर हैं, जिनके चाहने वाले करोड़ों में हैं, वे इस तरह के अभियान क्यों नहीं छेड़ सकते? क्यों अदालतें इस पर कड़ाई नहीं बरत सकतीं। और सबसे बड़ी बात कि छत्तीसगढ़ की सरकार जो कि ऐसे मुनादी कर चुकी है, वह इतना क्यों डरती है कि उसके वोट खराब होंगे? दिल्ली में दस-बीस बरस से तो हेलमेट अनिवार्य होने की याद हमें है ही, वहां पर तो पीछे बैठे लोगों को भी हेलमेट लगाना होता है। लेकिन वहां कोई सत्तारूढ़ पार्टी इस वजह से चुनाव हार गई हो ऐसा तो किसी ने कभी कहा भी नहीं है। इसे कड़ाई से लागू करने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वह इसमें जितनी देर करेगी, उतनी ही वह सड़क-हादसा-मौतों की जिम्मेदारी भी रहेगी। जिस समाज में दिमाग का महत्व होता है वह दिमाग वाले सिर को संभालकर भी रखता है।
यह अखबार तो अपनी तरफ से हेलमेट के लिए एक अभियान चलाते आया है और खुद के बनाए इश्तहारों से लेकर इस संपादकीय कॉलम में हम हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अपनी बात दुहराते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह याद है कि शायद एक बरस पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हेलमेट अनिवार्य करने के बारे में अपनी सरकार का फैसला घोषित किया था। उस वक्त यह बात हुई थी कि कुछ महीनों में जनता में इस बारे में जागरूकता लाई जाए, लोग हेलमेट खरीद लें, और फिर इसे अनिवार्य कर दिया जाए। उसके भी पहले जब प्रदेश कांगे्रस के तत्कालीन अध्यक्ष चरणदास महंत ने हेलमेट के समर्थन में एक बयान जारी किया था तो रायपुर शहर कांगे्रस ने पोस्टर लगाए थे-हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...
दरअसल सिर और दिमाग की परवाह उसी को हो सकती है, या उसे होनी ही चाहिए जिसके पास दिमाग हो। एक फूहड़ लुभावने अंदाज में हेलमेट का विरोध करने यहां के उन कांगे्रसियों ने अपने पेशे जैसा बना लिया था जिनमें से हर किसी के पास बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं और जिनमें से अधिकांश दौलतमंद लोग दुपहियों पर चलते नहीं हैं। जिन गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने कुचले सिर के साथ कफन-दफन की नौबत तक पहुंचते हैं, वैसी कोई मुसीबत राजनीतिक में सक्रिय हो चुके मुहल्लों के नेताओं को भी नहीं होती इसलिए उन्हें हेलमेट का विरोध करके कमसमझ जनता को बेवकूफ बनाने में मजा आता है। विरोध का ऐसा हाल कुछ अखबारों में भी देखने मिलता है और जब-जब कोई सरकार हेलमेट को कड़ाई से लागू करने की कोशिश करती है ये अखबार पूरी गैरजिम्मेदारी से जनता को यह समझाने में लग जाते हैं कि इस गैरजरूरी बोझ की कोई जरूरत नहीं है।
लेकिन यह बात हमारी समझ से परे है कि एक जनकल्याणकारी सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए कुछ कड़े फैसले क्यों नहीं ले पाती? खासकर तब जब कड़े चक्कों, पत्थरों और फुटपाथों से सिर कुचल जाते हैं और परिवार टूट जाते हैं। ऐसे में भी अगर सरकार इस साधारण सी कड़ाई को बरतने में डरती है तो फिर वह लोगों में खुद में रहने लायक जिम्मेदारी को कभी पैदा नहीं कर सकती। समाज की तरफ से कोई ऐसी पहल दिखाई नहीं पड़ती जो कि सरकार की पहल से परे लोगों में जागरूकता पैदा करे। और कुछ महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट से एक आदेश आया था कि दुपहिया बनाने वाली सभी कंपनियां इन गाडिय़ों के साथ हेलमेट अनिवार्य रूप से दे। उस आदेश का क्या हुआ है यह भी अभी साफ पता नहीं है।
यहां हमें आज जिस बात से चर्चा शुरू की है उसका एक मकसद यह है कि क्या ऐसे कुछ नामीगिरामी लोग अपने बच्चों की जान चली जाने के बाद, बची जिंदगी ऐसे एक अभियान में झोंक नहीं सकते? जो फिल्मी सितारे या खिलाड़ी बहुत मशहूर हैं, जिनके चाहने वाले करोड़ों में हैं, वे इस तरह के अभियान क्यों नहीं छेड़ सकते? क्यों अदालतें इस पर कड़ाई नहीं बरत सकतीं। और सबसे बड़ी बात कि छत्तीसगढ़ की सरकार जो कि ऐसे मुनादी कर चुकी है, वह इतना क्यों डरती है कि उसके वोट खराब होंगे? दिल्ली में दस-बीस बरस से तो हेलमेट अनिवार्य होने की याद हमें है ही, वहां पर तो पीछे बैठे लोगों को भी हेलमेट लगाना होता है। लेकिन वहां कोई सत्तारूढ़ पार्टी इस वजह से चुनाव हार गई हो ऐसा तो किसी ने कभी कहा भी नहीं है। इसे कड़ाई से लागू करने की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वह इसमें जितनी देर करेगी, उतनी ही वह सड़क-हादसा-मौतों की जिम्मेदारी भी रहेगी। जिस समाज में दिमाग का महत्व होता है वह दिमाग वाले सिर को संभालकर भी रखता है।
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