8 सितंबर 2011
कल दिल्ली में बम फटने के बाद दर्जन भर के करीब लाशें बिखरी थीं और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में पहुंचाए गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट के गेट पर बहुत भरे हुए इलाके में पुलिस की जांच चल ही रही थी कि नेताओं का अस्पताल जाना और मौके पर पहुंचना शुरू हो गया। भाजपा की तरफ से गडकरी और कांगे्रस की तरफ से राहुल। जैसा कि टीवी खबरों में देखने मिला, इनके लिए इनके दर्जे की चौकसी का इंतजाम किया गया। और जो नहीं दिखा वह भी जाहिर है कि सैकड़ों लोग इस इंतजाम में लगे होंगे। कल रात ही बांग्लादेश दौरे से लौटकर प्रधानमंत्री भी अस्पताल गए और उसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री भी विस्फोट की जगह पर पहुंचे। और जब यह हो रहा था तभी खबरें आ रही थीं कि घायलों के घरवालों को भी उनके पास पहुंचने नहीं दिया जा रहा है, वे बावलों की तरह रोते-बिलखते अपने लोगों का हाल जानने के लिए अस्पतालों के बाहर धक्के खा रहे हैं।
इस हाल को देखकर हमें राखी के दिन जेल का हाल याद पड़ता है जहां हमारे शहर में कुछ बरस पहले तक एक संगठन की महिलाएं अपने ऊंचे दर्जे के राजनीतिक संबंधों के चलते वहां पहुंचकर कैदियों को राखी बांधती थीं और उन कैदियों की सगी बहनें सुबह से शुरू हुए इंतजार के बाद इन सफेदपोश शहरी बहनों का नाटक पूरा होने का इंतजार करते रोती रहती थीं। एक दूसरी घटना जो सबको याद ही होगी वह मुंबई हमले के बाद की है जब महाराष्ट्र के उस वक्त के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख अपने फिल्म अभिनेता बेटे और एक अतिसक्रिय फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा को लेकर होटल ताज में बिखरे लहू पर चलने के लिए वहां पहुंचे थे।
किसी कुदरती कहर के वक्त या किसी हमले और हादसे के बाद, जब सरकार और समाज का एक-एक पल लोगों की जिंदगी बचाने के लिए मायने रखता है, जब न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देशों में बचाव की तैयारी कम पडऩे लगती है, तब नेताओं का कैमरों के बीच गिद्धों की तरह लाशों पर मंडराना भयानक लगता है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम का तो जिम्मा ऐसे हादसों के पहले से लेकर उनके बाद तक बनता है, इसलिए उनका वहां जाना एक बार बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन गडकरी और राहुल के आंसू तो कुछ दिन उनके रूमालों में बसर कर सकते थे। प्रतीक के रूप में हादसों वाले ऐसे हर शहर को वहां पहुंचने वाले गैरजरूरी नेताओं को रूमाल देने चाहिए कि वे किसी तरह बाहर ही अपने आंसू पोंछ लें, और पुलिस से लेकर डॉक्टरों तक सबको अपना काम करने दें, लोगों को जिंदा रहने दें। हो सकता है कि कुछ कमअक्ल लोग इस बात को एक सार्वजनिक मुद्दा बनाएं कि हादसे के इतने वक्त बाद तक नेता देखने भी नहीं पहुंचे, इसलिए समझदार सरकारों को पहले ही अपनी ऐसी नीति की घोषणा कर देनी चाहिए कि जब तक बचाव का काम पूरा नहीं हो जाएगा, जब तक नेताओं के दौरों से बाधा पडऩे का खतरा बने रहेगा, तब तक वे वहां नहीं जाएंगे और बचाव में लगे लोगों को उनका काम करने देंगे। जनता की तरफ से इन नेताओं को यह भरोसा दे देना चाहिए कि उनका बयान, उनका एसएमएस, उनका ट्वीट भी उनकी हमदर्दी मान लिए जाएंगे और वे अपने-आपको खून से सनी जगहों से दूर रखें। कल जब राहुल गांधी दोपहर को ही राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंच गए तो वहां मौजूद नाराज भीड़ और घायलों के रिश्तेदारों ने उसके खिलाफ नारे लगाए और उन्हें वापिस जाने को कहा।
यहां पर एक और घटना का जिक्र मुनासिब होगा। इसी बरस जुलाई के महीने में कालका मेल एक्सीडेंट के बाद कानपुर के अस्पताल में भर्ती घायलों को देखने के लिए राहुल गांधी वहां पहुंचे। मायावती की पुलिस ने सुरक्षा इंतजाम करते हुए अस्पताल के गेट पर ही बाकी सभी को रोक दिया और वहां पर लाया गया एक बुरी तरह से जख्मी पुलिस वाला अस्पताल के भीतर घुसने के इंतजार में बाहर ही मर गया। उसे इलाज की जगह अस्पताल के बाहर पैंतालीस मिनट का इंतजार ही नसीब हुआ और लगभग राहुल की उम्र, चालीस बरस का यह सिपाही चल बसा। कानपुर में ही इसके एक बरस पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे के वक्त सड़कों का टै्रफिक बंद कर दिया गया था और दस बरस का एक बच्चा खेलते हुए सिर की चोट से गंभीर था और रास्ते बंद होने से वह अस्पताल के पहले ही रोक दिया गया और वहीं मर गया।
यह पूरा सिलसिला बहुत ही भयानक है और बिना ऐसे हादसों के भी किसी बड़े मंत्री-संतरी के अस्पताल जाने पर या सड़कों से आने-जाने पर आम जनता कहे जाने वाले तबके की जिंदगी मानो निलंबित कर दी जाती है। भारत में मीडिया का हाल यह है कि अगर नेता अस्पतालों के बिस्तरों के बगल जाकर फोटो न खिंचवाएं तो उनसे सौ तरह के सवाल किए जाते हैं कि वे अब तक वहां गए क्यों नहीं? हमारा यह मानना है कि किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगानी चाहिए ताकि लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले घडिय़ाली आंसुओं को अस्पतालों या तबाही के मंजर तक पहुंचने से रोका जा सके। नेताओं की मर्जी से चलने वाली सरकारों से तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती इसलिए अदालती दखल ही काम आ सकती है। मई के महीने में हमने पश्चिम बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी की खबर छापी थी और उस पर इसी जगह तारीफ भी लिखी थी कि उन्होंने कोलकाता की पुलिस को यह आदेश दिया है कि वे उनके आने-जाने के वक्त टै्रफिक न रोके। वे एक साधारण सैंट्रो कार में चलती हैं और चौराहों पर लालबत्ती होने पर वे बराबर रूकते चलती हैं। यही वजह है कि अपने साधारण और इंसानी तौर-तरीकों की वजह से वे अकेले अपने दम पर चौथाई सदी से अधिक से बंगाल पर काबिज वामपंथियों को उखाड़कर फेंक पाईं।
चलते-चलते एक यह खबर आई है कि कर्नाटक में भयानक भ्रष्टाचार के लिए लोकायुक्त अदालत के कटघरे में खड़े हुए पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने पेशी से इस तर्क पर छुटकारा मांगा है कि उनकी जेड दर्जे की सुरक्षा के चलते उनके अदालत आने-जाने से रास्ते के लोगों को दिक्कत होती है। भारत के नेता भी जेल और अदालत से बचने के लिए ऐसे-ऐसे तर्क ढूंढ निकालते हैं मानो वे इंसानों से परे किसी दूसरी दुनिया से यहां लोगों को बेवकूफ बनाकर, उन्हें लूटते हुए उन पर राज करने के लिए भेजे गए हैं।
भारत में मीडिया को यह समझना चाहिए कि नेताओं से घायलों तक न जाने के बारे में पूछने से वे अपना चेहरा बचाने के लिए वहां आनन-फानन पहुंचते हैं और घायलों की मौत का सामान करते हैं। सवाल तो ये पूछे जाने चाहिए कि क्या घायलों की जिंदगी बचाने में उनकी वहां कोई जरूरत थी? वे ऐसे मौकों पर डॉक्टरों को और पुलिस को अपना काम क्यों नहीं करने देते? ऐसे दौरों के खिलाफ हम तुरंत एक जनहित याचिका की सिफारिश करते हैं। दिल्ली की कुछ बरस पहले की एक घटना लोगों को शायद याद हो जिसमें किसी बड़े मंत्री या प्रधानमंत्री के काफिले के लिए सड़क को बंद कर दिया गया था और उसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज की कार भी फंस गई थी, इस जज ने देर से अदालत पहुंचते ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की अपनी अदालत में पेशी लगाई थी। लेकिन खुद न फंसें, अपना कोई ऐसे में न मरे, तब भी अदालत को खुद होकर घडिय़ाली आंसुओं पर कानूनी रोक लगानी चाहिए। कानून बनाने वाले लोग तो कैमरों की मौजूदगी से अपने-आपको दूर नहीं रख पाते, इसलिए कोई कानूनी कार्रवाई ही घायलों की जिंदगी बचा पाएगी।
कल दिल्ली में बम फटने के बाद दर्जन भर के करीब लाशें बिखरी थीं और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में पहुंचाए गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट के गेट पर बहुत भरे हुए इलाके में पुलिस की जांच चल ही रही थी कि नेताओं का अस्पताल जाना और मौके पर पहुंचना शुरू हो गया। भाजपा की तरफ से गडकरी और कांगे्रस की तरफ से राहुल। जैसा कि टीवी खबरों में देखने मिला, इनके लिए इनके दर्जे की चौकसी का इंतजाम किया गया। और जो नहीं दिखा वह भी जाहिर है कि सैकड़ों लोग इस इंतजाम में लगे होंगे। कल रात ही बांग्लादेश दौरे से लौटकर प्रधानमंत्री भी अस्पताल गए और उसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री भी विस्फोट की जगह पर पहुंचे। और जब यह हो रहा था तभी खबरें आ रही थीं कि घायलों के घरवालों को भी उनके पास पहुंचने नहीं दिया जा रहा है, वे बावलों की तरह रोते-बिलखते अपने लोगों का हाल जानने के लिए अस्पतालों के बाहर धक्के खा रहे हैं।
इस हाल को देखकर हमें राखी के दिन जेल का हाल याद पड़ता है जहां हमारे शहर में कुछ बरस पहले तक एक संगठन की महिलाएं अपने ऊंचे दर्जे के राजनीतिक संबंधों के चलते वहां पहुंचकर कैदियों को राखी बांधती थीं और उन कैदियों की सगी बहनें सुबह से शुरू हुए इंतजार के बाद इन सफेदपोश शहरी बहनों का नाटक पूरा होने का इंतजार करते रोती रहती थीं। एक दूसरी घटना जो सबको याद ही होगी वह मुंबई हमले के बाद की है जब महाराष्ट्र के उस वक्त के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख अपने फिल्म अभिनेता बेटे और एक अतिसक्रिय फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा को लेकर होटल ताज में बिखरे लहू पर चलने के लिए वहां पहुंचे थे।
किसी कुदरती कहर के वक्त या किसी हमले और हादसे के बाद, जब सरकार और समाज का एक-एक पल लोगों की जिंदगी बचाने के लिए मायने रखता है, जब न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देशों में बचाव की तैयारी कम पडऩे लगती है, तब नेताओं का कैमरों के बीच गिद्धों की तरह लाशों पर मंडराना भयानक लगता है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम का तो जिम्मा ऐसे हादसों के पहले से लेकर उनके बाद तक बनता है, इसलिए उनका वहां जाना एक बार बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन गडकरी और राहुल के आंसू तो कुछ दिन उनके रूमालों में बसर कर सकते थे। प्रतीक के रूप में हादसों वाले ऐसे हर शहर को वहां पहुंचने वाले गैरजरूरी नेताओं को रूमाल देने चाहिए कि वे किसी तरह बाहर ही अपने आंसू पोंछ लें, और पुलिस से लेकर डॉक्टरों तक सबको अपना काम करने दें, लोगों को जिंदा रहने दें। हो सकता है कि कुछ कमअक्ल लोग इस बात को एक सार्वजनिक मुद्दा बनाएं कि हादसे के इतने वक्त बाद तक नेता देखने भी नहीं पहुंचे, इसलिए समझदार सरकारों को पहले ही अपनी ऐसी नीति की घोषणा कर देनी चाहिए कि जब तक बचाव का काम पूरा नहीं हो जाएगा, जब तक नेताओं के दौरों से बाधा पडऩे का खतरा बने रहेगा, तब तक वे वहां नहीं जाएंगे और बचाव में लगे लोगों को उनका काम करने देंगे। जनता की तरफ से इन नेताओं को यह भरोसा दे देना चाहिए कि उनका बयान, उनका एसएमएस, उनका ट्वीट भी उनकी हमदर्दी मान लिए जाएंगे और वे अपने-आपको खून से सनी जगहों से दूर रखें। कल जब राहुल गांधी दोपहर को ही राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंच गए तो वहां मौजूद नाराज भीड़ और घायलों के रिश्तेदारों ने उसके खिलाफ नारे लगाए और उन्हें वापिस जाने को कहा।
यहां पर एक और घटना का जिक्र मुनासिब होगा। इसी बरस जुलाई के महीने में कालका मेल एक्सीडेंट के बाद कानपुर के अस्पताल में भर्ती घायलों को देखने के लिए राहुल गांधी वहां पहुंचे। मायावती की पुलिस ने सुरक्षा इंतजाम करते हुए अस्पताल के गेट पर ही बाकी सभी को रोक दिया और वहां पर लाया गया एक बुरी तरह से जख्मी पुलिस वाला अस्पताल के भीतर घुसने के इंतजार में बाहर ही मर गया। उसे इलाज की जगह अस्पताल के बाहर पैंतालीस मिनट का इंतजार ही नसीब हुआ और लगभग राहुल की उम्र, चालीस बरस का यह सिपाही चल बसा। कानपुर में ही इसके एक बरस पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे के वक्त सड़कों का टै्रफिक बंद कर दिया गया था और दस बरस का एक बच्चा खेलते हुए सिर की चोट से गंभीर था और रास्ते बंद होने से वह अस्पताल के पहले ही रोक दिया गया और वहीं मर गया।
यह पूरा सिलसिला बहुत ही भयानक है और बिना ऐसे हादसों के भी किसी बड़े मंत्री-संतरी के अस्पताल जाने पर या सड़कों से आने-जाने पर आम जनता कहे जाने वाले तबके की जिंदगी मानो निलंबित कर दी जाती है। भारत में मीडिया का हाल यह है कि अगर नेता अस्पतालों के बिस्तरों के बगल जाकर फोटो न खिंचवाएं तो उनसे सौ तरह के सवाल किए जाते हैं कि वे अब तक वहां गए क्यों नहीं? हमारा यह मानना है कि किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगानी चाहिए ताकि लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले घडिय़ाली आंसुओं को अस्पतालों या तबाही के मंजर तक पहुंचने से रोका जा सके। नेताओं की मर्जी से चलने वाली सरकारों से तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती इसलिए अदालती दखल ही काम आ सकती है। मई के महीने में हमने पश्चिम बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी की खबर छापी थी और उस पर इसी जगह तारीफ भी लिखी थी कि उन्होंने कोलकाता की पुलिस को यह आदेश दिया है कि वे उनके आने-जाने के वक्त टै्रफिक न रोके। वे एक साधारण सैंट्रो कार में चलती हैं और चौराहों पर लालबत्ती होने पर वे बराबर रूकते चलती हैं। यही वजह है कि अपने साधारण और इंसानी तौर-तरीकों की वजह से वे अकेले अपने दम पर चौथाई सदी से अधिक से बंगाल पर काबिज वामपंथियों को उखाड़कर फेंक पाईं।
चलते-चलते एक यह खबर आई है कि कर्नाटक में भयानक भ्रष्टाचार के लिए लोकायुक्त अदालत के कटघरे में खड़े हुए पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने पेशी से इस तर्क पर छुटकारा मांगा है कि उनकी जेड दर्जे की सुरक्षा के चलते उनके अदालत आने-जाने से रास्ते के लोगों को दिक्कत होती है। भारत के नेता भी जेल और अदालत से बचने के लिए ऐसे-ऐसे तर्क ढूंढ निकालते हैं मानो वे इंसानों से परे किसी दूसरी दुनिया से यहां लोगों को बेवकूफ बनाकर, उन्हें लूटते हुए उन पर राज करने के लिए भेजे गए हैं।
भारत में मीडिया को यह समझना चाहिए कि नेताओं से घायलों तक न जाने के बारे में पूछने से वे अपना चेहरा बचाने के लिए वहां आनन-फानन पहुंचते हैं और घायलों की मौत का सामान करते हैं। सवाल तो ये पूछे जाने चाहिए कि क्या घायलों की जिंदगी बचाने में उनकी वहां कोई जरूरत थी? वे ऐसे मौकों पर डॉक्टरों को और पुलिस को अपना काम क्यों नहीं करने देते? ऐसे दौरों के खिलाफ हम तुरंत एक जनहित याचिका की सिफारिश करते हैं। दिल्ली की कुछ बरस पहले की एक घटना लोगों को शायद याद हो जिसमें किसी बड़े मंत्री या प्रधानमंत्री के काफिले के लिए सड़क को बंद कर दिया गया था और उसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज की कार भी फंस गई थी, इस जज ने देर से अदालत पहुंचते ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की अपनी अदालत में पेशी लगाई थी। लेकिन खुद न फंसें, अपना कोई ऐसे में न मरे, तब भी अदालत को खुद होकर घडिय़ाली आंसुओं पर कानूनी रोक लगानी चाहिए। कानून बनाने वाले लोग तो कैमरों की मौजूदगी से अपने-आपको दूर नहीं रख पाते, इसलिए कोई कानूनी कार्रवाई ही घायलों की जिंदगी बचा पाएगी।
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