9 सितंबर 2011
एक तरफ दिल्ली और पाकिस्तान में आतंकी हमले चल रहे हैं और दूसरी तरफ अमरीका में 11 सितंबर की बरसी पर फिर आतंकी हमलों का खतरा सिर पर सवार है। वहां ऐसी खबर है कि न्यूयॉर्क में फिर हमला हो सकता है, इससे बचने के लिए सरकार ने तो तैयारी की ही है, लेकिन वहां के मेयर ने जनता से कहा है कि वह अपनी आंखें खुली रखें और जो देखे उसे बोलने के लिए मुंह भी तैयार रखे। यह एक बात बहुत अहमियत इसलिए रखती है कि दुनिया का यह सबसे विकसित या चौकस देश भी अपने तमाम कैमरों और निगरानी की दूसरी तरकीबों के बावजूद जनता के साथ के बिना आतंकी हमलों को रोकने की हालत में नहीं है। लेकिन अगर दिल्ली में हाल देखें तो ऐसा लगता है कि इस ताजा हमले के वक्त जनता केंद्र और दिल्ली सरकार के खिलाफ एक किस्म से बागी है।
दरअसल अभी-अभी अन्ना हजारे के अनशन से इन दोनों सरकारों की तस्वीर पर जैसी कालिख पुती है, उसकी सबसे बड़ी गवाह दिल्ली ही है। ऐसे में वहां के लोगों की नाराजगी सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर कांगे्रस के मंत्रियों, नेताओं और प्रवक्ताओं की बददिमागी, बदजुबानी और बदसलूकी तक तमाम बातों से है। सोनिया गांधी के यहां मौजूद रहते शायद इतनी बद बातें कांगे्रस और यूपीए की तरफ से न हुई होतीं क्योंकि वे लगभग हमेशा ही एक शिष्टाचार के मुताबिक चलते दिखती हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने इस बार के अपने सात बरस के राज में सबसे अधिक बद बातें करके दिखाई हैं। अब सवाल यह है कि जब जनता को सरकार या सरकारों से नफरत हो, जब पुलिस पर उसका भरोसा न हो तो वह क्यों आतंक का कोई शक होने पर पुलिस को फोन करेगी? और यह बात सिर्फ दिल्ली पर लागू नहीं होती है, यह तो वहां से बहुत दूर और बहुत अलग किस्म के आतंक से घिरे हुए, बहुत अलग किस्म के बस्तर पर भी लागू होती है जहां पर सरकार को नक्सलियों के खिलाफ जनता से उतनी जानकारी नहीं मिलती है जितनी कि नक्सल मोर्चे पर जरूरी हो सकती है। जब बस्तर से लेकर सरगुजा तक पुलिस बेकसूरों की हत्या, बलात्कार और प्रताडऩा में लगी हो तो उसकी मदद करने आदिवासी जनता आगे क्यों आएगी? यही वजह है कि बस्तर में नक्सलियों को कुछ या अधिक हमदर्द तो मिले हुए हैं ही।
जनता से देश की सरकार को मदद रातों-रात नहीं मिल सकती और राजा और प्रजा के रिश्ते टुकड़ों में नहीं सुधर सकते। जब लोगों को यह लगेगा कि सरकार चला रहे लोग जनता के लिए तकलीफें उठा रहे हैं तो लोग भी खतरे उठाकर सरकार को चौकन्ना करने का काम करेंगे। आज सत्ता और जनता के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं बच गया है। भारतीय लोकतंत्र में यह एक बहुत ही तकलीफदेह, शर्मनाक और खतरनाक नौबत है। यह वही देश है जहां पर जब एक वक्त जवाहर लाल नेहरू जैसा भरोसेमंद प्रधानमंत्री था तो उनके एक बार कहने पर जंग के दौरान महिलाएं अपने गहने उतारकर दे देती थीं। लेकिन वह दौर ऐसे नेताओं का भी था जिन्होंने अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद देश के लिए दान की थी। आज तो जिन नेताओं के बारे में जनता को भरोसा है और मीडिया का अंदाज है कि जिनके पास हजारों करोड़ रुपए है, वे अगर अपनी दौलत को एक दर्जन करोड़ ही बताते हैं, जो सरकार रात-दिन देश को लूटने के लिए कटघरे में खड़ी है उस सरकार के राज में जनता के मन में भी देश के लिए जिम्मेदारी की भावना कुछ कम होना जायज है, और खासकर जहां खतरा उठाकर आतंकियों की खबर पुलिस को देने की बात हो, तो वहां पर पुलिस का जनता से रिश्ता और बर्ताव भी मायने रखता है।
अमरीका के मुकाबले सरकार का जनता से रिश्ता भारत में अधिक खराब है और भारत के मुकाबले पाकिस्तान में और भी अधिक खराब है। इसीलिए पाकिस्तान में आतंक की वारदातें बढ़ती चल रही हैं और जनता और सरकार एक किस्म से आमने-सामने हैं। भारत के बारे में हम न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्यों की सरकारों के भी चेताना चाहेंगे कि अगर जनता के बीच विश्वसनीयता, उसका समर्थन पाने के लिए अगर वे लगातार ठोस कोशिशें नहीं करेंगे और महज लूटपाट में लगी रहेंगी तो यह देश और गहरे खतरे में जाता रहेगा। वर्दियां और औजार कितने ही बढ़ जाएं, कैमरे कितने ही लग जाएं, उससे हमले नहीं थमेंगे। इस देश में सत्ता की प्रतिमा चूर-चूर हो चुकी है और उसका चबूतरा खाली पड़ा हुआ है। ऐसे में देश के कुछ नेता अपनी निजी ईमानदारी को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते खड़े हैं, लेकिन उनके गिरोह के लोग अगर बेईमान हैं तो उनको कभी चबूतरा नसीब नहीं हो सकता, और देश को जनता का वैसा साथ नहीं मिल सकता जैसा कि हमले रोकने के लिए जरूरी है।
एक तरफ दिल्ली और पाकिस्तान में आतंकी हमले चल रहे हैं और दूसरी तरफ अमरीका में 11 सितंबर की बरसी पर फिर आतंकी हमलों का खतरा सिर पर सवार है। वहां ऐसी खबर है कि न्यूयॉर्क में फिर हमला हो सकता है, इससे बचने के लिए सरकार ने तो तैयारी की ही है, लेकिन वहां के मेयर ने जनता से कहा है कि वह अपनी आंखें खुली रखें और जो देखे उसे बोलने के लिए मुंह भी तैयार रखे। यह एक बात बहुत अहमियत इसलिए रखती है कि दुनिया का यह सबसे विकसित या चौकस देश भी अपने तमाम कैमरों और निगरानी की दूसरी तरकीबों के बावजूद जनता के साथ के बिना आतंकी हमलों को रोकने की हालत में नहीं है। लेकिन अगर दिल्ली में हाल देखें तो ऐसा लगता है कि इस ताजा हमले के वक्त जनता केंद्र और दिल्ली सरकार के खिलाफ एक किस्म से बागी है।
दरअसल अभी-अभी अन्ना हजारे के अनशन से इन दोनों सरकारों की तस्वीर पर जैसी कालिख पुती है, उसकी सबसे बड़ी गवाह दिल्ली ही है। ऐसे में वहां के लोगों की नाराजगी सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर कांगे्रस के मंत्रियों, नेताओं और प्रवक्ताओं की बददिमागी, बदजुबानी और बदसलूकी तक तमाम बातों से है। सोनिया गांधी के यहां मौजूद रहते शायद इतनी बद बातें कांगे्रस और यूपीए की तरफ से न हुई होतीं क्योंकि वे लगभग हमेशा ही एक शिष्टाचार के मुताबिक चलते दिखती हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने इस बार के अपने सात बरस के राज में सबसे अधिक बद बातें करके दिखाई हैं। अब सवाल यह है कि जब जनता को सरकार या सरकारों से नफरत हो, जब पुलिस पर उसका भरोसा न हो तो वह क्यों आतंक का कोई शक होने पर पुलिस को फोन करेगी? और यह बात सिर्फ दिल्ली पर लागू नहीं होती है, यह तो वहां से बहुत दूर और बहुत अलग किस्म के आतंक से घिरे हुए, बहुत अलग किस्म के बस्तर पर भी लागू होती है जहां पर सरकार को नक्सलियों के खिलाफ जनता से उतनी जानकारी नहीं मिलती है जितनी कि नक्सल मोर्चे पर जरूरी हो सकती है। जब बस्तर से लेकर सरगुजा तक पुलिस बेकसूरों की हत्या, बलात्कार और प्रताडऩा में लगी हो तो उसकी मदद करने आदिवासी जनता आगे क्यों आएगी? यही वजह है कि बस्तर में नक्सलियों को कुछ या अधिक हमदर्द तो मिले हुए हैं ही।
जनता से देश की सरकार को मदद रातों-रात नहीं मिल सकती और राजा और प्रजा के रिश्ते टुकड़ों में नहीं सुधर सकते। जब लोगों को यह लगेगा कि सरकार चला रहे लोग जनता के लिए तकलीफें उठा रहे हैं तो लोग भी खतरे उठाकर सरकार को चौकन्ना करने का काम करेंगे। आज सत्ता और जनता के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं बच गया है। भारतीय लोकतंत्र में यह एक बहुत ही तकलीफदेह, शर्मनाक और खतरनाक नौबत है। यह वही देश है जहां पर जब एक वक्त जवाहर लाल नेहरू जैसा भरोसेमंद प्रधानमंत्री था तो उनके एक बार कहने पर जंग के दौरान महिलाएं अपने गहने उतारकर दे देती थीं। लेकिन वह दौर ऐसे नेताओं का भी था जिन्होंने अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद देश के लिए दान की थी। आज तो जिन नेताओं के बारे में जनता को भरोसा है और मीडिया का अंदाज है कि जिनके पास हजारों करोड़ रुपए है, वे अगर अपनी दौलत को एक दर्जन करोड़ ही बताते हैं, जो सरकार रात-दिन देश को लूटने के लिए कटघरे में खड़ी है उस सरकार के राज में जनता के मन में भी देश के लिए जिम्मेदारी की भावना कुछ कम होना जायज है, और खासकर जहां खतरा उठाकर आतंकियों की खबर पुलिस को देने की बात हो, तो वहां पर पुलिस का जनता से रिश्ता और बर्ताव भी मायने रखता है।
अमरीका के मुकाबले सरकार का जनता से रिश्ता भारत में अधिक खराब है और भारत के मुकाबले पाकिस्तान में और भी अधिक खराब है। इसीलिए पाकिस्तान में आतंक की वारदातें बढ़ती चल रही हैं और जनता और सरकार एक किस्म से आमने-सामने हैं। भारत के बारे में हम न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्यों की सरकारों के भी चेताना चाहेंगे कि अगर जनता के बीच विश्वसनीयता, उसका समर्थन पाने के लिए अगर वे लगातार ठोस कोशिशें नहीं करेंगे और महज लूटपाट में लगी रहेंगी तो यह देश और गहरे खतरे में जाता रहेगा। वर्दियां और औजार कितने ही बढ़ जाएं, कैमरे कितने ही लग जाएं, उससे हमले नहीं थमेंगे। इस देश में सत्ता की प्रतिमा चूर-चूर हो चुकी है और उसका चबूतरा खाली पड़ा हुआ है। ऐसे में देश के कुछ नेता अपनी निजी ईमानदारी को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते खड़े हैं, लेकिन उनके गिरोह के लोग अगर बेईमान हैं तो उनको कभी चबूतरा नसीब नहीं हो सकता, और देश को जनता का वैसा साथ नहीं मिल सकता जैसा कि हमले रोकने के लिए जरूरी है।
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