मां को मरहम लगाने के लिए दौलतमंदों पर एक टैक्स लगे

11 दिसंबर 2011
संपादकीय
मां को मरहम लगाने के लिए दौलतमंदों पर एक टैक्स लगे
डरबन में अभी-अभी निपटा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन बहुत सी तकनीकी बातों के साथ, दुनिया के देशों और उनके समूहों के बीच के जटिल समझौतों को लेकर खबरों में है। हम खुद भी इस तमाम जटिलता को पूरी तरह नहीं समझते इसलिए अपने अज्ञान को पाठकों के सिर पर थोपना ठीक नहीं होगा। इसलिए हम इस सम्मेलन से परे आज कुछ ऐसी सरल बातें यहां करना चाहते हैं जो हमारे सरीखे गैरविशेषज्ञों को आसानी से समझ में आए। हर बरस दुनिया में ऐसे सम्मेलन हो रहे हैं जिनमें विकसित और विकासशील देश अपने-अपने समूहों के फायदों को लेकर आमने-सामने रहते हैं, और दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह देश अमरीका तमाम समझौतों को, सहमतियों को उसी तरह खारिज करते रहता है जिस तरह वह इराक पर हमले के वक्त संयुक्त राष्ट्रसंघ को खारिज करके अपने पिट्टू देशों का गिरोह बनाकर दसियों हजार मौतों को जायज ठहराने तक पहुंचा।
आज दुनिया में पर्यावरण को लेकर जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह यह कि कुछ देश बहुत अधिक खपत करते हैं और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादते हैं। इसे कार्बन की शक्ल में नापा जाता है और यही पैमाना दुनिया भर में इस्तेमाल होता है। विकसित देश अपनी अधिक खपत के बाद भी धरती को उनके हाथों पहुंचने वाले नुकसान की भरपाई में हाथ बंटाना नहीं चाहते। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि मानो भारत जैसे देश के भीतर आर्थिक असमानता बहुत बढ़ चुकी है और अमीर लोग धरती के इस्तेमाल को लेकर कोई ऐसा ज्यादा टैक्स देना नहीं चाहते जिससे कि कम खपत करने वाली गरीब आबादी को कुछ मुआवजा मिल सके या जिससे धरती की मरम्मत की जा सके। दौलतमंद ताकतवर भी होता है और यह बात जिस तरह देशों पर लागू होती है, उसी तरह एक देश के भीतर समाज के अलग-अलग आयवर्गों पर भी लागू होती है। सैद्धांतिक रूप से हमारा मानना यह है कि देश के भीतर सामानों, ऊर्जा, प्राकृतिक साधनों के इस्तेमाल और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादने का हिसाब लगाकर इस्तेमाल करने वाले तबके पर एक कार्बन टैक्स लगाना चाहिए। और इसका इस्तेमाल या तो गरीबों के लिए सीधे-सीधे हो, जो कि कम से कम सामानों और साधनों पर जिंदा रहते हैं, या फिर धरती की ऐसी मरहम-पट्टी हो सके जो कि संपन्न तबके के हाथों पैदा हुए जख्मों से उसे राहत दे सके। मिसाल के लिए हर एयरकंडीशनर के पीछे एक पेड़ लगाने का टैक्स अलग से लिया जाना चाहिए और उस एसी की खपत के मुताबिक उस पेड़ के रखरखाव का खर्च भी लिया जाना चाहिए। बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर टैक्स लगाकर उससे बारिश के पानी को बचाने और उससे धरती को रीचार्ज करने का काम करना चाहिए। कुल मिलाकर सोच यह है कि जिस बात से, जिस खपत से धरती का जितना नुकसान होता है, उसकी उतनी भरपाई आनन-फानन कर दी जानी चाहिए। इससे अगर महंगाई बढ़ती है तो उसका बोझ सीधे उस तबके पर पड़ेगा जो सबसे अधिक खर्च करने वाला संपन्न तबका है। धरती और उस पर बसे गरीब लोगों के साथ इंसाफ का यही एक तरीका हो सकता है।
भारत में आबादी की औसत खपत को अगर देखें तो तीन चौथाई सबसे गरीब आबादी शौचालय के अपने चौबीस घंटों के इस्तेमाल में शायद प्रति व्यक्ति दो लीटर पानी भी बर्बाद नहीं करती। दूसरी तरफ संपन्न तबका ऐसा है जो हर बार पांच से दस लीटर पानी फ्लश करता है और चौबीस घंटें में शायद एक-एक व्यक्ति पचीस-पचास लीटर पानी पखाने और पेशाबघर में बहा देते हैं। यह बेइंसाफी सीधे-सीधे गिननी चाहिए और इसका हिसाब चुकता करवाना चाहिए। हम इस तरह की बात एक दूसरे मामले में पहले कर चुके हैं, जब हमने लिखा था कि गाय को कटने से बचाने के लिए उसका दूध पीने वाले, उसे मां की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग हर लीटर दूध पर अगर एक रूपए अलग से देते जाएंगे तो बुढ़ापे में उसे घूरे पर भूखे मरने के लिए नहीं छोडऩा पड़ेगा और न ही कसाईघर में कटने को भेजना पड़ेगा। हम यहां पर गाय का महत्व किसी धार्मिक आधार पर नहीं मानते बल्कि इंसानियत कही जाने वाली एक खूबी के आधार पर मानते हैं, कि जिसने मां की तरह दूध पिलाया है, उसे दूसरे जानवरों से कुछ अलग मानकर उसका एहसान चुकता करना चाहिए जैसा कि मां के दूध के कर्ज को चुकाने की बात कही जाती है।
हम धरती को भी एक मां की तरह मानकर, उससे कुछ पाने, कुछ छीन लेने, उसे कुछ जख्म देने के एवज में मरहम का टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं और इसका रास्ता निकालना चाहिए।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
10 दिसंबर
बीमा, बचत, कर्ज की किस्तों, क्रेडिट कार्ड के बकाया के भुगतान जैसी बातों को समय रहते निपटाने की याद रखें। यह भी याद रखें कि याद कुछ भी नहीं रहता, इसलिए हर बात डायरी में, कैलेण्डर पर या फोन-कम्प्यूटर पर अलार्म लगाकर रखें।

विपक्ष का यह पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज विरोध

10 दिसंबर
संपादकीय
विपक्ष का यह पूरी तरह और  बुरी तरह नाजायज विरोध
केन्द्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने आज बहुत सी जानकारियों के साथ सरकार की तरफ से यह दावा किया कि 2जी घोटाले से उस वक्त के वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का कोई लेना-देना नहीं था। इसके साथ-साथ सरकार की यह भी राय है कि जिस मामले में अदालत में सुनवाई चल रही है उस मामले में सरकार या संसद के भीतर अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है। संसद में भाजपा इस बात पर अड़ी हुई है कि चिदम्बरम से इस्तीफा लिया जाए और ऐसा न होने तक वह चिदम्बरम को वर्तमान गृहमंत्री के रूप में सुनने के लिए तैयार नहीं है। यह एक बड़ी अजीब सी बात है कि कांग्रेस के घोर विरोधी और भाजपा के करीबी डॉ. सुब्रमणियम स्वामी अदालत में चिदम्बरम को घेरने में लगे हुए हैं, और वहां पर आज तक उनको मिली सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उनकी शिकायत के संबंध में अदालत ने दो अफसरों को गवाही के लिए बुलाने की अपील मान ली है, यह भी इस शर्त के साथ कि डॉ. स्वामी इसके पहले खुद गवाही दें। ऐसे में चिदम्बरम को हटाने की मांग किसी एक पार्टी की हसरत और जिद तो हो सकती है, उसका तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार क्या है?
आज ही एक वरिष्ठ पत्रकार, इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता ने अपने अखबार में लिखा है कि देश किस तरह से एक हताशा में डूब रहा है और किस तरह देश में उद्योग-व्यापार का आज का हौसला आज तक का सबसे अधिक पस्त हौसला है। उन्होंने लिखा है कि मुम्बई में सड़कों के किनारे होर्डिंग खाली दिखने लगे हैं क्योंकि देश का माहौल आज राजनीतिक हितों को ऊपर रखते हुए देश की आर्थिक प्रगति को नीचे दबाने का चल रहा है। उन्होंने इस माहौल के लिए अकेले यूपीए सरकार को जिम्मेदार मानने से इंकार किया है और भाजपा की उसके रूख के लिए आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा अब एक ऐसी पार्टी की तरह बर्ताव कर रही है जिसे अब यह भरोसा हो गया है कि वह कभी सत्ता में नहीं लौटेगी। इससे परे भाजपा कैसे बार-बार सरकारी फैसलों पर संसदीय बोर्ड की मांग कर सकती है? जो लोग अंग्रेजी  पढ़ सकते हैं और जिनके पास यह अखबार या इंटरनेट है उन्हें शेखर गुप्ता के तर्क पढऩे चाहिए क्योंकि यह अखबार पुराने समय से कांग्रेस विरोधी या सरकार विरोधी माना जाता रहा है और आज अगर वह भाजपा से इस तरह निराश है तो भाजपा को भी अपने तौर-तरीकों के बारे में सोचना चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को यह मालूम ही है कि हम लगातार इस बात को उठा रहे हैं कि संसद का काम संसद को करने देना चाहिए, न कि अन्ना-बाबा की भीड़ को। हम यह भी लगातार लिखते हैं कि सरकार के एफडीआई जैसे फैसलों पर अगर संसद में सीधे मतदान की मांग विपक्ष करता है तो वह गलत है, हालांकि एफडीआई को लेकर हमारे तर्क अलग हैं। इसी तरह हम चिदम्बरम या किसी और मंत्री के मुद्दे को लेकर संसद के बहिष्कार के खिलाफ हैं। भाजपा हो या वामपंथी पार्टियां, उन्हें ठीक से समझ लेना चाहिए कि देश का माहौल आज काम न करने वाले नेताओं के खिलाफ हो गया है, और काम करते हुए भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं के खिलाफ तो है ही। आज देश में बहुत अविश्वास का माहौल बना दिया गया है क्योंकि एक तरफ विपक्ष किसी भी बहाने को उठाकर सरकार और संसद दोनों को ठप्प कर देना चाहता है और ऐसा करते हुए वह अदालत की प्रक्रिया का इंतजार भी छोड़ चुका है। जब देश की बड़ी विपक्षी पार्टियां न संसद का सम्मान करें, न सरकार को उसके अधिकार के तहत काम करने दें, और न अदालत का इंतजार करें। और विपक्ष के भीतर भाजपा जैसी पार्टियां जब यूपीए विरोध और कांग्रेस पर हमले के लिए अन्ना हजारे की ऐसी जिद को, ऐसी तानाशाही को आगे बढ़ाएं जिससे कि संसद का पूरा काम जंतर-मंतर और रामलीला मैदान के हुक्म से करना तय हो, तो हमारे हिसाब से यह बहुत गैरजिम्मेदारी की बात है। अदालतों से लेकर सीएजी की रिपोर्ट तक कांग्रेस और यूपीए सरकार जिस कदर कालिख से लग चुकी थी, उससे वह जनता की नजरों में खुद ही गिर गई थी। उसमें बिना कोई नई बात जोड़े, बिना किसी नए अपराध के सुबूत सामने लाए, बिना अदालती आदेश करवाए, जिस तरह आज विपक्ष देश को ठप्प करके एक किस्म का मजा ले रहा है, उसे जनता अच्छा नहीं मान रही। हमारा यह मानना है कि जनता के बीच आज विपक्ष का विरोध काउंटर प्रोडक्टिव (प्रतिउत्पादक) हो गया है और यह विपक्ष के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। इसी विपक्ष को आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी और उनके परिवार, कांग्रेस के नेताओं और अफसरों के पीछे इसी तरह से लगना याद रखना चाहिए जिसका नतीजा यह हुआ था कि इंदिरा को खारिज कर देने वाली जनता ने ढाई बरस के भीतर ही उसे फिर सिर पर बिठा लिया था। एक नाजायज विरोध कभी जनता को नहीं जीत सकता, और आज का, अभी जारी यह विरोध, बाजार-कारोबार, अर्थव्यवस्था, संसद इन सबको नुकसान पहुंचाता हुआ यह विरोध जनता इसलिए पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज मान रही है क्योंकि यह अदालत का इंतजार किए बिना किया जा रहा विरोध है।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
9 दिसंबर
शादी या किसी और मौके की दावत में जाने पर कुछ खाने के पहले एक बार यह सोचें कि मेजबान ने या उनकी तरफ से इंतजाम कर रहे किसी और ने आपसे खाने का आग्रह किया है या फिर आप खुद होकर खाना शुरू कर रहे हैं? बिना किसी के अनुरोध के ऐसा खाना आपको सुहाता है?

नेता और मीडिया, कड़वाहट के आगे-पीछे की जरूरत

09 दिसंबर 2011
संपादकीय
नेता और मीडिया, कड़वाहट के आगे-पीछे की जरूरत
पिछले कुछ महीनों से दिल्ली की हवा में घुली हुई कड़वाहट छत्तीसगढ़ तक पहुंची है और मध्यप्रदेश में कुछ खदानों के आबंटन को लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ ऐसे बयान आए, और ऐसी खबरें आईं कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों को ये खदानें दिलवाई हैं। एक-दो टीवी चैनलों और एक-दो अखबारों ने इन आरोपों को बड़ी प्रमुखता से दिखाया और छापा। इसके बाद डॉ. रमन सिंह ने मीडिया से रूबरू बात करते हुए, आजतक के शायद अपने सबसे अधिक तीखे तेवरों के साथ कहा कि वे ऐसे आरोप लगाने वाले नेताओं और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित करने वाले मीडिया को छोड़ेंगे नहीं और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे। हम अभी उनके शब्दों पर नहीं जा रहे, लेकिन उनके खिलाफ एक बड़ी बात कही, दिखाई और छापी गई, और उन्होंने इस पर तीखे तेवर दिखाए।
राजनीति में जो लोग सक्रिय हैं उन पर बहुत किस्म के आरोप लगते हैं और वे मीडिया की अपनी समझ या पसंद-नापसंद के हिसाब से कम या अधिक छपते या दिखते हैं। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि आरोप लगाने वाले नेता और उसे जनता तक पहुंचाने वाले मीडिया दोनों को ईमानदार और गंभीर रहना चाहिए। कुछ दिन पहले जब टाईम्स नाऊ नाम के एक प्रमुख अंगे्रजी समाचार चैनल पर अदालत ने एक भूतपूर्व जज की मानहानि करने का सौ करोड़ रूपए का जुर्माना सुनाया था तब भी हमने यह बात कही थी कि दुर्भावना के साथ अगर मीडिया ऐसा काम करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई ठीक है। टाईम्स नाऊ के उस मामले में किसी दुर्भावना के बजाय एक मामूली चूक थी कि सावंत नाम के एक जज के बजाय सावंत नाम के दूसरे जज की तस्वीर दिखा दी गई थी। न उस वक्त न आज हम किसी एक मामले को लेकर यह बात कर रहे। लेकिन यह हकीकत है कि लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन को अगर देखें तो नेताओं के पास एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाने के लिए सच या झूठ, कई किस्म की बातें रहती हैं और उनका इस्तेमाल कभी सच को सामने लाने के लिए होता है तो कभी एक झूठ को स्थापित करने के लिए। हमारा यह मानना है कि सच से परे की बातें न नेताओं को करनी चाहिए और न ही मीडिया को बिना यह तौले हुए कि सच क्या है और झूठ क्या, प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना चाहिए।
डॉ. रमन सिंह पर आरोप लगाने वाले नेताओं ने अपनी सोच से अपना काम किया है, मीडिया ने अपनी कानूनी जिम्मेदारियां समझते हुए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी की होगी और डॉ. रमन सिंह ने अपने परिवार, अपने पद और अपनी पार्टी की प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए ऐसी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी होगी। इस सारे सिलसिले के सच या झूठ के सामने आने का हम इंतजार करेंगे, लेकिन उसके पहले जो बात फिक्र की है, वह यह कि छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश, यहां के बहुत से असल मुद्दे ऐसे रह गए हैं जो कि दिल्ली, भोपाल या रायपुर में केंद्रित राजनीति के चलते सामने नहीं आ रहे। ऐसे में आरोपों के बजाय अगर सुबूतों की बुनियाद पर कोई बात हो तो फिर आज तो देश भर में जगह-जगह अदालतें, लोकायुक्त और दूसरी संवैधानिक संस्थाएं कड़ी कार्रवाई करने के अंदाज में दिख रही हैं। ऐसे में सार्वजनिक जीवन और मीडिया के बीच आरोप अगर कम लगें और सुबूतों के साथ बात अधिक हो तो वह सबके भले की बात होगी। कांगे्रस पार्टी में ही कुछ दूसरे नेता ऐसे हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के खिलाफ, या यहां के उद्योगों के खिलाफ सुबूतों के साथ ऐसे आरोप लगाए हैं जिनको लेकर भाजपा सरकार खासी परेशानी में फंस सकती है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के एक कांगे्रस विधायक मोहम्मद अकबर ने, टाईम्स ऑफ इंडिया द्वारा सबसे पहले उठाई गई एक रिपोर्ट के आगे की जानकारी सुबूतों के साथ मीडिया के सामने रखी। हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति में लोगों को बिना सुबूतों के एक-दूसरे के खिलाफ महज बयानबाजी नहीं करनी चाहिए और मीडिया को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि लगाए जा रहे आरोप क्या सुबूतों पर टिके हुए हैं? मीडिया के सभी जिम्मेदार लोग इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे कि कानून की नजर में झूठे आरोपों को या खुद की बनाई हुई झूठी खबरों को लेकर पेपर और टीवी अदालत में यह साबित करने के लिए जिम्मेदार रहते हैं कि उनकी बातें सच थीं। इसके पहले कि डॉ. रमन सिंह या किसी और पार्टी का कोई और नेता, या कोई उद्योगपति कानूनी कार्रवाई करे, मीडिया को खुद भी एक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। यह तो वक्त-वक्त की बात है कि आज छत्तीसगढ़ में कांगे्रस विपक्ष में है और भाजपा सत्तारूढ़। पहले भी हालत इसकी ठीक उल्टी रह चुकी है और आगे भी हो सकता है कि कभी भाजपा विपक्ष में आए। उस दिन के लिए भी हमारी यही सलाह है कि सरहद के किसी भी तरफ कोई पार्टी रहे, मीडिया की अपनी पसंद या नापसंद कोई भी रहे, तथ्यों और सच का सम्मान सभी को करना चाहिए क्योंकि आम लोगों का खासा वक्त ऐसी खबरों को पढऩे या देखने में जाता है जो या तो झूठी रहती हैं, या सच रहने पर भी आज की सामाजिक जरूरत के पैमाने पर बहुत ही कम महत्व की रहती हैं।
हम समाज के असल मुद्दों को लेकर एक बेहतर मीडिया के हिमायती हैं और सत्ता या विपक्ष के नेताओं से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे जनता की असली जरूरतों को लेकर काम करें, और अगर किसी के भी पास जनता को लूटने के कोई सुबूत हैं, तो लुटेरों के खिलाफ उन्हें सुबूतों के साथ ही सामने आना चाहिए। वे मीडिया में सामने आएं या अदालत और लोकायुक्त में जाएं, वे बिना सुबूतों के जनता का वक्त बर्बाद न करें।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
8 दिसंबर
झूठ का साथ देने के पहले यह जरूर सोचें कि किसी दिन आपके खिलाफ भी झूठ की यूनियन बन गई तो आप पर क्या गुजरेगा।

तीन बरस में अमरीकी गवर्नर को 14 बरस कैद, भारत, कुछ सीखो

08 दिसंबर 2011
संपादकीय
तीन बरस में अमरीकी गवर्नर को 14 बरस कैद, भारत, कुछ सीखो
अमरीका के एक राज्य से ऐसी खबर आई है जिसे पढ़कर हिंदुस्तान के नेताओं के होश उड़ सकते हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां भ्रष्टाचार या दूसरे किसी किस्म के अपराध में फंसे हुए नेता अदालत में मामला चलते हुए पूरी जिंदगी संसद, विधानसभा या सरकार में बैठे हुए गुजार देते हैं। अभी दो दिन पहले ही बाबरी मस्जिद को ढहाने के बीस बरस पूरे हुए और उसके अपराधी समझे जा रहे सारे बड़े-बड़े नेता अब तक सत्ता या विपक्ष की सत्ता का मजा उठा रहे हैं। यही हाल तकरीब उतने ही बरस पहले के बिहार के चारा घोटाले का है जिसके जिम्मेदार समझे जा रहे तमाम लोग सत्ता का मजा ले रहे हैं। गुजरात में दंगों और हजारों हत्याओं के जिम्मेदार समझे जा रहे संदिग्ध  लोग सत्ता पर बने ही हुए हैं। ऐसे में अमरीका की यह खबर बताती है कि अभी तीन बरस पहले ओबामा के राष्ट्रपति बनने से जो एक सीट अमरीकी सीनेट में खाली हुई थी उसे उस सीट वाले राज्य में किसी और को बेच देने का मामला वहां के गर्वनर के खिलाफ सामने आया था। इस तीन बरस के भीतर इस गवर्नर को चौदह बरस की कैद बामुशक्कत सुना दी गई है। अब यह गवर्नर रोज आठ घंटे जेल में काम करके एक डॉलर रोज की मजदूरी पाएगा। नतीजा यह हुआ है कि इस मुकदमे के चलते और आगे के हिसाब से इस गवर्नर का मकान बिक गया है, और परिवार तबाही की हालत में भी आ गया है।
इलिनॉय राज्य के एक अन्य गवर्नर को भी भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सजा सुनाई गई थी। पिछले चार दशकों में इलिनॉय के जिन चार गवर्नरों को जेल की सजा सुनाई गई उनमें इस गवर्नर ब्लागोजेविच की सजा सबसे सख्त है। ब्लागोजेविच को 2002 में इलिनॉय का गवर्नर चुना गया था और 2009 में वे इस पद पर बने रहे। दिसंबर 2008 में भ्रष्टाचार के मामले में उनकी गिरफ्तारी के बाद राज्य की विधायिका ने उन्हें उनके पद से बर्खास्त कर दिया था।
आज इस देश में वे तमाम सांसद लोगों की नजरों में खटकते हैं जो रिश्वत लेते पकड़ाए, रिश्वत लेकर सवाल पूछते पकड़ाए, तरह-तरह के अपराधों में कटघरे में खड़े होने के बावजूद चुनाव लड़ रहे हैं। यह लोकतंत्र बाहुबलियों के तले उसी तरह दब गया है जिस तरह भारत की कुछेक धार्मिक और पौराणिक कहानियों में कोई अपने पांव तले, जांघ तले या दुम तले लोगों को दबाकर बैठ जाते हैं। यहां की अदालत इस हालत में रखी गई है कि वह जल्दी कोई फैसला कर न सके। इस बात को किस तरह का इंसाफ कहा जाएगा कि 1992 के अयोध्या कांड पर कोई फैसला अभी दूर-दूर तक नहीं है। यही हाल अगर बाबरी मस्जिद के गिराने वाले लोगों के झंडों पर लिखे गए राम के अपने वक्त हुआ होता, और सीता के अपहरण के बाद रावण के साथ इंसाफ का फैसला बीस बरस तक न हुआ होता तो क्या होता? आज तो मजिस्द गिराने के मामले का कोई ओर-छोर भी अदालत में नहीं दिख रहा।
अमरीका की न्याय व्यवस्था की यह रफ्तार हमारे बरसों से उठाए जाते कुछ मुद्दों को जायज ठहराती है। हम बार-बार लिखते आ रहे हैं कि इस देश में सत्ता, कुर्सी, दौलत या किसी और किस्म की स्थापित ताकत से लैस अपराधियों के मामलों की सुनवाई के लिए अलग से तेज रफ्तार अदालतें होनी चाहिए, ताकतवर अपराधियों के लिए कमजोर तबके के अपराधियों के मुकाबले कहीं अधिक सजा होनी चाहिए, और जब कोई ताकतवर किसी कमजोर पर अपराध करे तो उसके लिए और कई गुना कड़ी सजा होनी चाहिए। हमें इस बात पर तसल्ली है कि हमारे इस मुद्दे को उठाने के बरसों बाद ही सही, सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसी राय जाहिर की है और आज देश में ऐसा माहौल बना हुआ है कि ताकतवर लोगों के खिलाफ फास्टटै्रक अदालतें बनें।
ताकतवर और सत्ता पर बैठे हुए अपराधियों से लोकतंत्र को एक बड़ा खतरा यह भी रहता है कि वे उस ताकत से लगातार लोगों को लूटना जारी रखते हैं। जब कोई मंत्री शक के घेरे में आ जाने के बाद लंबे समय तक अपनी पार्टी द्वारा उस कुर्सी पर रखा जाता है तो फिर वह पार्टी जनता के हक लुटने का पूरा खतरा भी खड़ा करके रखती है। यह सिलसिला तुरंत थमना चाहिए। आज देश भर में जनता भ्रष्टाचार से थकी हुई है और न्याय व्यवस्था पर से उसका विश्वास बहुत हद तक उठ गया है। एक दिन ऐसा न आ जाए कि लोकतंत्र की मौजूदा हालत से निराश लोग शहरों में भी नक्सलियों जैसी हिंसा पर उतर जाएं।

छोटी सी बात

7 दिसंबर
छोटी सी बात
किसी दूसरे के मोबाइल फोन को देखने अपने हाथ में लें, तो भी उसकी कोई जानकारी न देखें। लोगों की निजी जिंदगी का सम्मान करें।

विपक्ष कम से कम अब तो जिम्मेदारी दिखाए

07 दिसंबर 2011
संपादकीय
विपक्ष कम से कम अब तो जिम्मेदारी दिखाए
दसवें दिन संसद चली, लेकिन अब तक यह साफ नहीं है कि महीनों से खबरों में तैर रहा लोकपाल बिल संसद के इस सत्र में कहां तक पहुंचेगा और संसदीय लोकतंत्र  की समझ से पूरी तरह नावाकिफ अन्ना हजारे का अंट-शंट कहां तक पहुंचेगा। लेकिन चूंकि इस मामले पर आने वाले दिनों में, इस सत्र में या अगले सत्र में बहस होनी तय है, इसलिए हम इस मामले पर अब जनता के बीच भी चर्चा चाहते हैं। संसद की स्थाई समिति में शायद प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने या न रखने की बात संसद की बहस पर छोड़ दी है, लेकिन हमारा यह मानना है कि देश का कोई भी ऐसा बड़ा पद जिस पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं, उसे लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की कोई जरूरत नहीं है। आज तो ऐसा लग रहा है कि लोकपाल की चर्चा पूरी तरह यूपीए सरकार पर घेरा डालने के इरादे से हो रही है, लेकिन जब कोई कानून बनता है तो उसमें व्यक्तियों को ध्यान में रखने के बजाय व्यवस्था को ध्यान में रखने की जरूरत होती है, और एक व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद कुछ दूसरे प्रधानमंत्रियों के मुकाबले लोकपाल के शिकंजे में फंसने का कम ही खतरा रखते हैं। बहुत खुलकर बात की जाए तो पूरी दिल्ली इस बात को जानती है कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनकी दत्तक पुत्री वाले दामाद का दिल्ली में क्या काम रहता था और प्रधानमंत्री निवास से लगे बंगले में बसाए गए इस परिवार को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों गलत होता? इसलिए एक प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हो या उसका परिवार घोषित रूप से बेईमान हो, हर पद को लोकपाल के दायरे में लाने की जरूरत है। लेकिन हम लोकतंत्र की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इस बात से सहमत हैं कि अदालतों के लिए अगर कोई अलग संस्था बनती है तो उसमें कोई हर्ज इसलिए नहीं है कि सरकार और अदालत की भूमिका, उनके अधिकार और उनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं और हो सकता है कि एक अलग संस्था न्यायपालिका पर बेहतर निगरानी रख सके, अधिक असरदार कार्रवाई कर सके। इसी तरह हम इस बात से भी सहमत हैं कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के अलग-अलग वर्गों पर कार्रवाई के लिए सीधे-सीधे देश के लोकपाल को ही जिम्मा देने के बजाय राज्यों की ऐसी संस्था को वे अधिकार दिए जाएं, क्योंकि अगर सारा बोझ लोकपाल नाम की राष्ट्रीय संस्था पर डाल दिया जाएगा तो मुकदमों की भीड़ में छोटे चेहरे अधिक भर जाएंगे और बड़े मगरमच्छ फिर बच निकलेंगे। इसलिए एक संस्था को असरदार बनाने के लिए यह भी जरूरी होता है कि उसके दायरे को एक सीमा पर जाकर रोक दिया जाए, और वहां से आगे के लिए किसी दूसरी संस्था को जिम्मा दिया जाए।
हम आज फिर इस देश के अमनचैन पर मंडरा रहे अन्नावाद के खतरे के बारे में बात करना चाहते हैं। जब संसद में लोकपाल का मसौदा आने जा रहा है, भारतीय लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी संस्था इस पर चर्चा करने जा रही है तो जंतर-मंतर पर बैठकर कोई मंतर पढऩे या रामलीला मैदान पर बैठकर लीला दिखाने का अलोकतांत्रिक काम किसी समर्थन के लायक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र अपनी कमजोरियों के बावजूद, खामियों के बावजूद आज भी दुनिया के सबसे महान एक-दो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है और इसके भीतर, इसमें, अपनी खामियों से निपटने की पूरी ताकत है। यह किसी अन्ना-बाबा जैसी बैसाखियों का मोहताज लोकतंत्र नहीं है और इसके भीतर लुभावनी चुनावी मतलबपरस्ती के चलते अलोकतांत्रिक अन्ना-बाबावाद को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। हम लोकतंत्र के दायरे से परे एक तरफ नक्सल हिंसा और दूसरी तरफ उस अन्नावादी हिंसा का भी विरोध करते हैं जिसको उन्होंने शरद पवार पर हमला करने के लिए जायज और अहिंसक ठहराया है। किसी से असहमत होने पर उस पर इस तरह का हमला जायज ठहराने वाला इंसान लोकतंत्र में कोई जगह नहीं रखता। यह तो लोकतंत्र ही है जो ऐसी बातें कहने वाले और नासमझ लोगों को आगे भी ऐसा करने के लिए उकसाने और भड़काने वाले अन्ना-हजारे जैसे लोगों को साधारण नागरिक अधिकारों से लाख गुना अधिक अधिकार देता है। आज हम सभी सांसदों और नागरिकों से यह अपील करना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं को बाबरी मस्जिद की तरह ढहा देने की अन्ना-बाबा जैसों की कोशिशों को  चुनावी फायदे के नजरिए से बढ़ावा नहीं देना चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए। आज देश में सबसे बड़ा जिम्मा संसद के उस विपक्ष पर है जिसने पिछले पखवाड़े में लगातार बहुत ही गैरजिम्मेदारी से काम किया है, उसे कम से कम आने वाले दिनों में संसद की महत्ता कायम रखने का काम करना चाहिए।

इंटरनेट पर किसी सरकारी काबू के लायक साख यूपीए की नहीं

संपादकीय
6 दिसंबर
इंटरनेट पर किसी सरकारी काबू के लायक साख यूपीए की नहीं
यूपीए सरकार के मंत्री एक के बाद एक ऐसी हरकतें किए चले जा रहे हैं जिनसे देश के बहुत बड़े-बड़े तबके उसे अपना दुश्मन मानने के लिए मजबूर हो रहे हैं। भारत में दसियों करोड़ लोग आज इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनके बारे में संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने यह कहा कि वे इन पर कोई आपत्तिजनक सामाग्री नहीं आने देंगे। अब सरकार की नजर में क्या आपत्तिजनक होगा और क्या नहीं यह एक विवाद का मुद्दा हमेशा ही बने रहेगा। कुछ लोग हिंसा को आपत्तिजनक मान सकते हैं, कुछ लोग नग्नता को, कुछ लोग अश्लीलता को, और कुछ लोग बाबा या अन्ना की खबरों को भी आपत्तिजनक मान सकते हैं। कुछ समय पहले जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था उस वक्त ऐसी चर्चा केन्द्र सरकार के स्तर पर शुरू हो गई थी कि टेलीविजन समाचार चैनलों पर ऐसी रोक लगने जा रही है जिसमें किसी एक समाचार को एक बुलेटिन में एक सीमा से अधिक समय तक नहीं दिखाया जा सकेगा। अभी भी टीवी चैनलों के लिए जो प्रस्तावित नियम सरकार ने सामने रखे हैं उनके मुताबिक हर बरस कोई भी सरकार हर चैनल को अगले बरस काम करने से रोक सकती है। इन प्रस्तावों में ऐसी-ऐसी गोलमोल बातों को शामिल किया गया है कि सरकार की मेहरबानी के बिना कोई चैनल जिंदा ही नहीं रह सके।
आज जब यह देश यूपीए सरकार के खिलाफ बगावती अंदाज में उबला हुआ है तब बैठे ठाले खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने का एक ऐसा फैसला लिया गया जिस पर कोई भी अमल राज्यों की मर्जी से ही होना था लेकिन माहौल ऐसा बना कि मानो केन्द्र सरकार वालमार्ट के हाथों बिक गई है। हम पिछले कुछ महीनों में कई बार यह लिखने को मजबूर हुए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार इस देश की सबसे अविश्वसनीय और बदनाम सरकार बन चुकी है। इसके खिलाफ आज कोई बच्चा भी यह कह दे कि यह चोर है तो लोग उसका भरोसा करने लगेंगे। ऐसे में इस सरकार को हर काम फूंक-फूंक कर करना चाहिए था लेकिन यह आत्मघाती अंदाज में फैसले ले रही है, बयान दे रही है और काम कर रही है। कपिल सिब्बल को ऐसा बयान देने के पहले कई बार सोचना था कि उनकी पार्टी का इस देश का सेंसरशिप का बड़ा कलंकित इतिहास रहा है। इमरजेंसी के दौर को देखने वाली पीढ़ी अभी जिंदा है और अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई है कि वह वोट डालने न जाती हो। दूसरी तरफ आज सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोजाना जाने वाले लोग अनगिनत हैं और ऐसी नौजवान पीढ़ी को नाराज करने का काम केन्द्र के इस दिग्गज वकील मंत्री ने इस अंदाज में किया है कि ऐसी किसी रोक से देश का कोई तबका बहुत खुश हो जाएगा।
आज का जमाना टेक्नालॉजी के खुले आसमान का है। दुनिया के जिन देशों में अपने अलोकतांत्रिक कानूनों के तहत इंटरनेट पर तरह-तरह की रोक लगाई गई, वहां के छोटे-छोटे बच्चों ने भी उसका तोड़ निकाल लिया और आज ईरान जैसे देश के दसियों लाख लोग फेसबुक या ट्विटर पर रोजाना दिखते हैं, जबकि इन पर उस देश में रोक लगी हुई है और वहां का कानून भी काफी कड़ा है। इसलिए भारत में केन्द्र सरकार जिस तरह की बात सोच रही है वह उसकी मौजूदा साख के चलते उस पर भारी पड़ रही है। इस एक बात से परे भी कांग्रेस और यूपीए को हम सुझाना चाहते हैं कि अपने सनसनीखेज और दुस्साहसी इरादों को वह अभी कुछ दिन ठंडा रखे। कांग्रेस के ही एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने इंटरनेट पर उनके खिलाफ लिखी गई बातों को लेकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की है और आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी शुरू हो गई है। देश के मौजूदा कानून ऐसी कार्रवाई के लिए काफी हैं, और सरकार की पहल पर फेसबुक ने अभी यह कहा भी है कि आपत्तिजनक बातें विरोध दर्ज होते ही हटा दी जाएंगी। इससे अधिक किसी सीधी सरकारी रोक की जरूरत नहीं है।