11 दिसंबर 2011
संपादकीय
मां को मरहम लगाने के लिए दौलतमंदों पर एक टैक्स लगे
डरबन में अभी-अभी निपटा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन बहुत सी तकनीकी बातों के साथ, दुनिया के देशों और उनके समूहों के बीच के जटिल समझौतों को लेकर खबरों में है। हम खुद भी इस तमाम जटिलता को पूरी तरह नहीं समझते इसलिए अपने अज्ञान को पाठकों के सिर पर थोपना ठीक नहीं होगा। इसलिए हम इस सम्मेलन से परे आज कुछ ऐसी सरल बातें यहां करना चाहते हैं जो हमारे सरीखे गैरविशेषज्ञों को आसानी से समझ में आए। हर बरस दुनिया में ऐसे सम्मेलन हो रहे हैं जिनमें विकसित और विकासशील देश अपने-अपने समूहों के फायदों को लेकर आमने-सामने रहते हैं, और दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह देश अमरीका तमाम समझौतों को, सहमतियों को उसी तरह खारिज करते रहता है जिस तरह वह इराक पर हमले के वक्त संयुक्त राष्ट्रसंघ को खारिज करके अपने पिट्टू देशों का गिरोह बनाकर दसियों हजार मौतों को जायज ठहराने तक पहुंचा।
आज दुनिया में पर्यावरण को लेकर जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह यह कि कुछ देश बहुत अधिक खपत करते हैं और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादते हैं। इसे कार्बन की शक्ल में नापा जाता है और यही पैमाना दुनिया भर में इस्तेमाल होता है। विकसित देश अपनी अधिक खपत के बाद भी धरती को उनके हाथों पहुंचने वाले नुकसान की भरपाई में हाथ बंटाना नहीं चाहते। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि मानो भारत जैसे देश के भीतर आर्थिक असमानता बहुत बढ़ चुकी है और अमीर लोग धरती के इस्तेमाल को लेकर कोई ऐसा ज्यादा टैक्स देना नहीं चाहते जिससे कि कम खपत करने वाली गरीब आबादी को कुछ मुआवजा मिल सके या जिससे धरती की मरम्मत की जा सके। दौलतमंद ताकतवर भी होता है और यह बात जिस तरह देशों पर लागू होती है, उसी तरह एक देश के भीतर समाज के अलग-अलग आयवर्गों पर भी लागू होती है। सैद्धांतिक रूप से हमारा मानना यह है कि देश के भीतर सामानों, ऊर्जा, प्राकृतिक साधनों के इस्तेमाल और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादने का हिसाब लगाकर इस्तेमाल करने वाले तबके पर एक कार्बन टैक्स लगाना चाहिए। और इसका इस्तेमाल या तो गरीबों के लिए सीधे-सीधे हो, जो कि कम से कम सामानों और साधनों पर जिंदा रहते हैं, या फिर धरती की ऐसी मरहम-पट्टी हो सके जो कि संपन्न तबके के हाथों पैदा हुए जख्मों से उसे राहत दे सके। मिसाल के लिए हर एयरकंडीशनर के पीछे एक पेड़ लगाने का टैक्स अलग से लिया जाना चाहिए और उस एसी की खपत के मुताबिक उस पेड़ के रखरखाव का खर्च भी लिया जाना चाहिए। बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर टैक्स लगाकर उससे बारिश के पानी को बचाने और उससे धरती को रीचार्ज करने का काम करना चाहिए। कुल मिलाकर सोच यह है कि जिस बात से, जिस खपत से धरती का जितना नुकसान होता है, उसकी उतनी भरपाई आनन-फानन कर दी जानी चाहिए। इससे अगर महंगाई बढ़ती है तो उसका बोझ सीधे उस तबके पर पड़ेगा जो सबसे अधिक खर्च करने वाला संपन्न तबका है। धरती और उस पर बसे गरीब लोगों के साथ इंसाफ का यही एक तरीका हो सकता है।
भारत में आबादी की औसत खपत को अगर देखें तो तीन चौथाई सबसे गरीब आबादी शौचालय के अपने चौबीस घंटों के इस्तेमाल में शायद प्रति व्यक्ति दो लीटर पानी भी बर्बाद नहीं करती। दूसरी तरफ संपन्न तबका ऐसा है जो हर बार पांच से दस लीटर पानी फ्लश करता है और चौबीस घंटें में शायद एक-एक व्यक्ति पचीस-पचास लीटर पानी पखाने और पेशाबघर में बहा देते हैं। यह बेइंसाफी सीधे-सीधे गिननी चाहिए और इसका हिसाब चुकता करवाना चाहिए। हम इस तरह की बात एक दूसरे मामले में पहले कर चुके हैं, जब हमने लिखा था कि गाय को कटने से बचाने के लिए उसका दूध पीने वाले, उसे मां की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग हर लीटर दूध पर अगर एक रूपए अलग से देते जाएंगे तो बुढ़ापे में उसे घूरे पर भूखे मरने के लिए नहीं छोडऩा पड़ेगा और न ही कसाईघर में कटने को भेजना पड़ेगा। हम यहां पर गाय का महत्व किसी धार्मिक आधार पर नहीं मानते बल्कि इंसानियत कही जाने वाली एक खूबी के आधार पर मानते हैं, कि जिसने मां की तरह दूध पिलाया है, उसे दूसरे जानवरों से कुछ अलग मानकर उसका एहसान चुकता करना चाहिए जैसा कि मां के दूध के कर्ज को चुकाने की बात कही जाती है।
हम धरती को भी एक मां की तरह मानकर, उससे कुछ पाने, कुछ छीन लेने, उसे कुछ जख्म देने के एवज में मरहम का टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं और इसका रास्ता निकालना चाहिए।
संपादकीय
मां को मरहम लगाने के लिए दौलतमंदों पर एक टैक्स लगे
डरबन में अभी-अभी निपटा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन बहुत सी तकनीकी बातों के साथ, दुनिया के देशों और उनके समूहों के बीच के जटिल समझौतों को लेकर खबरों में है। हम खुद भी इस तमाम जटिलता को पूरी तरह नहीं समझते इसलिए अपने अज्ञान को पाठकों के सिर पर थोपना ठीक नहीं होगा। इसलिए हम इस सम्मेलन से परे आज कुछ ऐसी सरल बातें यहां करना चाहते हैं जो हमारे सरीखे गैरविशेषज्ञों को आसानी से समझ में आए। हर बरस दुनिया में ऐसे सम्मेलन हो रहे हैं जिनमें विकसित और विकासशील देश अपने-अपने समूहों के फायदों को लेकर आमने-सामने रहते हैं, और दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह देश अमरीका तमाम समझौतों को, सहमतियों को उसी तरह खारिज करते रहता है जिस तरह वह इराक पर हमले के वक्त संयुक्त राष्ट्रसंघ को खारिज करके अपने पिट्टू देशों का गिरोह बनाकर दसियों हजार मौतों को जायज ठहराने तक पहुंचा।
आज दुनिया में पर्यावरण को लेकर जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह यह कि कुछ देश बहुत अधिक खपत करते हैं और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादते हैं। इसे कार्बन की शक्ल में नापा जाता है और यही पैमाना दुनिया भर में इस्तेमाल होता है। विकसित देश अपनी अधिक खपत के बाद भी धरती को उनके हाथों पहुंचने वाले नुकसान की भरपाई में हाथ बंटाना नहीं चाहते। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि मानो भारत जैसे देश के भीतर आर्थिक असमानता बहुत बढ़ चुकी है और अमीर लोग धरती के इस्तेमाल को लेकर कोई ऐसा ज्यादा टैक्स देना नहीं चाहते जिससे कि कम खपत करने वाली गरीब आबादी को कुछ मुआवजा मिल सके या जिससे धरती की मरम्मत की जा सके। दौलतमंद ताकतवर भी होता है और यह बात जिस तरह देशों पर लागू होती है, उसी तरह एक देश के भीतर समाज के अलग-अलग आयवर्गों पर भी लागू होती है। सैद्धांतिक रूप से हमारा मानना यह है कि देश के भीतर सामानों, ऊर्जा, प्राकृतिक साधनों के इस्तेमाल और धरती पर प्रदूषण का बोझ लादने का हिसाब लगाकर इस्तेमाल करने वाले तबके पर एक कार्बन टैक्स लगाना चाहिए। और इसका इस्तेमाल या तो गरीबों के लिए सीधे-सीधे हो, जो कि कम से कम सामानों और साधनों पर जिंदा रहते हैं, या फिर धरती की ऐसी मरहम-पट्टी हो सके जो कि संपन्न तबके के हाथों पैदा हुए जख्मों से उसे राहत दे सके। मिसाल के लिए हर एयरकंडीशनर के पीछे एक पेड़ लगाने का टैक्स अलग से लिया जाना चाहिए और उस एसी की खपत के मुताबिक उस पेड़ के रखरखाव का खर्च भी लिया जाना चाहिए। बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर टैक्स लगाकर उससे बारिश के पानी को बचाने और उससे धरती को रीचार्ज करने का काम करना चाहिए। कुल मिलाकर सोच यह है कि जिस बात से, जिस खपत से धरती का जितना नुकसान होता है, उसकी उतनी भरपाई आनन-फानन कर दी जानी चाहिए। इससे अगर महंगाई बढ़ती है तो उसका बोझ सीधे उस तबके पर पड़ेगा जो सबसे अधिक खर्च करने वाला संपन्न तबका है। धरती और उस पर बसे गरीब लोगों के साथ इंसाफ का यही एक तरीका हो सकता है।
भारत में आबादी की औसत खपत को अगर देखें तो तीन चौथाई सबसे गरीब आबादी शौचालय के अपने चौबीस घंटों के इस्तेमाल में शायद प्रति व्यक्ति दो लीटर पानी भी बर्बाद नहीं करती। दूसरी तरफ संपन्न तबका ऐसा है जो हर बार पांच से दस लीटर पानी फ्लश करता है और चौबीस घंटें में शायद एक-एक व्यक्ति पचीस-पचास लीटर पानी पखाने और पेशाबघर में बहा देते हैं। यह बेइंसाफी सीधे-सीधे गिननी चाहिए और इसका हिसाब चुकता करवाना चाहिए। हम इस तरह की बात एक दूसरे मामले में पहले कर चुके हैं, जब हमने लिखा था कि गाय को कटने से बचाने के लिए उसका दूध पीने वाले, उसे मां की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग हर लीटर दूध पर अगर एक रूपए अलग से देते जाएंगे तो बुढ़ापे में उसे घूरे पर भूखे मरने के लिए नहीं छोडऩा पड़ेगा और न ही कसाईघर में कटने को भेजना पड़ेगा। हम यहां पर गाय का महत्व किसी धार्मिक आधार पर नहीं मानते बल्कि इंसानियत कही जाने वाली एक खूबी के आधार पर मानते हैं, कि जिसने मां की तरह दूध पिलाया है, उसे दूसरे जानवरों से कुछ अलग मानकर उसका एहसान चुकता करना चाहिए जैसा कि मां के दूध के कर्ज को चुकाने की बात कही जाती है।
हम धरती को भी एक मां की तरह मानकर, उससे कुछ पाने, कुछ छीन लेने, उसे कुछ जख्म देने के एवज में मरहम का टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं और इसका रास्ता निकालना चाहिए।