संपादकीय
6 दिसंबर
इंटरनेट पर किसी सरकारी काबू के लायक साख यूपीए की नहीं
यूपीए सरकार के मंत्री एक के बाद एक ऐसी हरकतें किए चले जा रहे हैं जिनसे देश के बहुत बड़े-बड़े तबके उसे अपना दुश्मन मानने के लिए मजबूर हो रहे हैं। भारत में दसियों करोड़ लोग आज इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनके बारे में संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने यह कहा कि वे इन पर कोई आपत्तिजनक सामाग्री नहीं आने देंगे। अब सरकार की नजर में क्या आपत्तिजनक होगा और क्या नहीं यह एक विवाद का मुद्दा हमेशा ही बने रहेगा। कुछ लोग हिंसा को आपत्तिजनक मान सकते हैं, कुछ लोग नग्नता को, कुछ लोग अश्लीलता को, और कुछ लोग बाबा या अन्ना की खबरों को भी आपत्तिजनक मान सकते हैं। कुछ समय पहले जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था उस वक्त ऐसी चर्चा केन्द्र सरकार के स्तर पर शुरू हो गई थी कि टेलीविजन समाचार चैनलों पर ऐसी रोक लगने जा रही है जिसमें किसी एक समाचार को एक बुलेटिन में एक सीमा से अधिक समय तक नहीं दिखाया जा सकेगा। अभी भी टीवी चैनलों के लिए जो प्रस्तावित नियम सरकार ने सामने रखे हैं उनके मुताबिक हर बरस कोई भी सरकार हर चैनल को अगले बरस काम करने से रोक सकती है। इन प्रस्तावों में ऐसी-ऐसी गोलमोल बातों को शामिल किया गया है कि सरकार की मेहरबानी के बिना कोई चैनल जिंदा ही नहीं रह सके।
आज जब यह देश यूपीए सरकार के खिलाफ बगावती अंदाज में उबला हुआ है तब बैठे ठाले खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने का एक ऐसा फैसला लिया गया जिस पर कोई भी अमल राज्यों की मर्जी से ही होना था लेकिन माहौल ऐसा बना कि मानो केन्द्र सरकार वालमार्ट के हाथों बिक गई है। हम पिछले कुछ महीनों में कई बार यह लिखने को मजबूर हुए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार इस देश की सबसे अविश्वसनीय और बदनाम सरकार बन चुकी है। इसके खिलाफ आज कोई बच्चा भी यह कह दे कि यह चोर है तो लोग उसका भरोसा करने लगेंगे। ऐसे में इस सरकार को हर काम फूंक-फूंक कर करना चाहिए था लेकिन यह आत्मघाती अंदाज में फैसले ले रही है, बयान दे रही है और काम कर रही है। कपिल सिब्बल को ऐसा बयान देने के पहले कई बार सोचना था कि उनकी पार्टी का इस देश का सेंसरशिप का बड़ा कलंकित इतिहास रहा है। इमरजेंसी के दौर को देखने वाली पीढ़ी अभी जिंदा है और अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई है कि वह वोट डालने न जाती हो। दूसरी तरफ आज सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोजाना जाने वाले लोग अनगिनत हैं और ऐसी नौजवान पीढ़ी को नाराज करने का काम केन्द्र के इस दिग्गज वकील मंत्री ने इस अंदाज में किया है कि ऐसी किसी रोक से देश का कोई तबका बहुत खुश हो जाएगा।
आज का जमाना टेक्नालॉजी के खुले आसमान का है। दुनिया के जिन देशों में अपने अलोकतांत्रिक कानूनों के तहत इंटरनेट पर तरह-तरह की रोक लगाई गई, वहां के छोटे-छोटे बच्चों ने भी उसका तोड़ निकाल लिया और आज ईरान जैसे देश के दसियों लाख लोग फेसबुक या ट्विटर पर रोजाना दिखते हैं, जबकि इन पर उस देश में रोक लगी हुई है और वहां का कानून भी काफी कड़ा है। इसलिए भारत में केन्द्र सरकार जिस तरह की बात सोच रही है वह उसकी मौजूदा साख के चलते उस पर भारी पड़ रही है। इस एक बात से परे भी कांग्रेस और यूपीए को हम सुझाना चाहते हैं कि अपने सनसनीखेज और दुस्साहसी इरादों को वह अभी कुछ दिन ठंडा रखे। कांग्रेस के ही एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने इंटरनेट पर उनके खिलाफ लिखी गई बातों को लेकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की है और आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी शुरू हो गई है। देश के मौजूदा कानून ऐसी कार्रवाई के लिए काफी हैं, और सरकार की पहल पर फेसबुक ने अभी यह कहा भी है कि आपत्तिजनक बातें विरोध दर्ज होते ही हटा दी जाएंगी। इससे अधिक किसी सीधी सरकारी रोक की जरूरत नहीं है।
6 दिसंबर
इंटरनेट पर किसी सरकारी काबू के लायक साख यूपीए की नहीं
यूपीए सरकार के मंत्री एक के बाद एक ऐसी हरकतें किए चले जा रहे हैं जिनसे देश के बहुत बड़े-बड़े तबके उसे अपना दुश्मन मानने के लिए मजबूर हो रहे हैं। भारत में दसियों करोड़ लोग आज इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनके बारे में संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने यह कहा कि वे इन पर कोई आपत्तिजनक सामाग्री नहीं आने देंगे। अब सरकार की नजर में क्या आपत्तिजनक होगा और क्या नहीं यह एक विवाद का मुद्दा हमेशा ही बने रहेगा। कुछ लोग हिंसा को आपत्तिजनक मान सकते हैं, कुछ लोग नग्नता को, कुछ लोग अश्लीलता को, और कुछ लोग बाबा या अन्ना की खबरों को भी आपत्तिजनक मान सकते हैं। कुछ समय पहले जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था उस वक्त ऐसी चर्चा केन्द्र सरकार के स्तर पर शुरू हो गई थी कि टेलीविजन समाचार चैनलों पर ऐसी रोक लगने जा रही है जिसमें किसी एक समाचार को एक बुलेटिन में एक सीमा से अधिक समय तक नहीं दिखाया जा सकेगा। अभी भी टीवी चैनलों के लिए जो प्रस्तावित नियम सरकार ने सामने रखे हैं उनके मुताबिक हर बरस कोई भी सरकार हर चैनल को अगले बरस काम करने से रोक सकती है। इन प्रस्तावों में ऐसी-ऐसी गोलमोल बातों को शामिल किया गया है कि सरकार की मेहरबानी के बिना कोई चैनल जिंदा ही नहीं रह सके।
आज जब यह देश यूपीए सरकार के खिलाफ बगावती अंदाज में उबला हुआ है तब बैठे ठाले खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने का एक ऐसा फैसला लिया गया जिस पर कोई भी अमल राज्यों की मर्जी से ही होना था लेकिन माहौल ऐसा बना कि मानो केन्द्र सरकार वालमार्ट के हाथों बिक गई है। हम पिछले कुछ महीनों में कई बार यह लिखने को मजबूर हुए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार इस देश की सबसे अविश्वसनीय और बदनाम सरकार बन चुकी है। इसके खिलाफ आज कोई बच्चा भी यह कह दे कि यह चोर है तो लोग उसका भरोसा करने लगेंगे। ऐसे में इस सरकार को हर काम फूंक-फूंक कर करना चाहिए था लेकिन यह आत्मघाती अंदाज में फैसले ले रही है, बयान दे रही है और काम कर रही है। कपिल सिब्बल को ऐसा बयान देने के पहले कई बार सोचना था कि उनकी पार्टी का इस देश का सेंसरशिप का बड़ा कलंकित इतिहास रहा है। इमरजेंसी के दौर को देखने वाली पीढ़ी अभी जिंदा है और अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई है कि वह वोट डालने न जाती हो। दूसरी तरफ आज सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोजाना जाने वाले लोग अनगिनत हैं और ऐसी नौजवान पीढ़ी को नाराज करने का काम केन्द्र के इस दिग्गज वकील मंत्री ने इस अंदाज में किया है कि ऐसी किसी रोक से देश का कोई तबका बहुत खुश हो जाएगा।
आज का जमाना टेक्नालॉजी के खुले आसमान का है। दुनिया के जिन देशों में अपने अलोकतांत्रिक कानूनों के तहत इंटरनेट पर तरह-तरह की रोक लगाई गई, वहां के छोटे-छोटे बच्चों ने भी उसका तोड़ निकाल लिया और आज ईरान जैसे देश के दसियों लाख लोग फेसबुक या ट्विटर पर रोजाना दिखते हैं, जबकि इन पर उस देश में रोक लगी हुई है और वहां का कानून भी काफी कड़ा है। इसलिए भारत में केन्द्र सरकार जिस तरह की बात सोच रही है वह उसकी मौजूदा साख के चलते उस पर भारी पड़ रही है। इस एक बात से परे भी कांग्रेस और यूपीए को हम सुझाना चाहते हैं कि अपने सनसनीखेज और दुस्साहसी इरादों को वह अभी कुछ दिन ठंडा रखे। कांग्रेस के ही एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने इंटरनेट पर उनके खिलाफ लिखी गई बातों को लेकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की है और आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी शुरू हो गई है। देश के मौजूदा कानून ऐसी कार्रवाई के लिए काफी हैं, और सरकार की पहल पर फेसबुक ने अभी यह कहा भी है कि आपत्तिजनक बातें विरोध दर्ज होते ही हटा दी जाएंगी। इससे अधिक किसी सीधी सरकारी रोक की जरूरत नहीं है।
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