07 दिसंबर 2011
संपादकीय
विपक्ष कम से कम अब तो जिम्मेदारी दिखाए
दसवें दिन संसद चली, लेकिन अब तक यह साफ नहीं है कि महीनों से खबरों में तैर रहा लोकपाल बिल संसद के इस सत्र में कहां तक पहुंचेगा और संसदीय लोकतंत्र की समझ से पूरी तरह नावाकिफ अन्ना हजारे का अंट-शंट कहां तक पहुंचेगा। लेकिन चूंकि इस मामले पर आने वाले दिनों में, इस सत्र में या अगले सत्र में बहस होनी तय है, इसलिए हम इस मामले पर अब जनता के बीच भी चर्चा चाहते हैं। संसद की स्थाई समिति में शायद प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने या न रखने की बात संसद की बहस पर छोड़ दी है, लेकिन हमारा यह मानना है कि देश का कोई भी ऐसा बड़ा पद जिस पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं, उसे लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की कोई जरूरत नहीं है। आज तो ऐसा लग रहा है कि लोकपाल की चर्चा पूरी तरह यूपीए सरकार पर घेरा डालने के इरादे से हो रही है, लेकिन जब कोई कानून बनता है तो उसमें व्यक्तियों को ध्यान में रखने के बजाय व्यवस्था को ध्यान में रखने की जरूरत होती है, और एक व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद कुछ दूसरे प्रधानमंत्रियों के मुकाबले लोकपाल के शिकंजे में फंसने का कम ही खतरा रखते हैं। बहुत खुलकर बात की जाए तो पूरी दिल्ली इस बात को जानती है कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनकी दत्तक पुत्री वाले दामाद का दिल्ली में क्या काम रहता था और प्रधानमंत्री निवास से लगे बंगले में बसाए गए इस परिवार को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों गलत होता? इसलिए एक प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हो या उसका परिवार घोषित रूप से बेईमान हो, हर पद को लोकपाल के दायरे में लाने की जरूरत है। लेकिन हम लोकतंत्र की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इस बात से सहमत हैं कि अदालतों के लिए अगर कोई अलग संस्था बनती है तो उसमें कोई हर्ज इसलिए नहीं है कि सरकार और अदालत की भूमिका, उनके अधिकार और उनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं और हो सकता है कि एक अलग संस्था न्यायपालिका पर बेहतर निगरानी रख सके, अधिक असरदार कार्रवाई कर सके। इसी तरह हम इस बात से भी सहमत हैं कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के अलग-अलग वर्गों पर कार्रवाई के लिए सीधे-सीधे देश के लोकपाल को ही जिम्मा देने के बजाय राज्यों की ऐसी संस्था को वे अधिकार दिए जाएं, क्योंकि अगर सारा बोझ लोकपाल नाम की राष्ट्रीय संस्था पर डाल दिया जाएगा तो मुकदमों की भीड़ में छोटे चेहरे अधिक भर जाएंगे और बड़े मगरमच्छ फिर बच निकलेंगे। इसलिए एक संस्था को असरदार बनाने के लिए यह भी जरूरी होता है कि उसके दायरे को एक सीमा पर जाकर रोक दिया जाए, और वहां से आगे के लिए किसी दूसरी संस्था को जिम्मा दिया जाए।
हम आज फिर इस देश के अमनचैन पर मंडरा रहे अन्नावाद के खतरे के बारे में बात करना चाहते हैं। जब संसद में लोकपाल का मसौदा आने जा रहा है, भारतीय लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी संस्था इस पर चर्चा करने जा रही है तो जंतर-मंतर पर बैठकर कोई मंतर पढऩे या रामलीला मैदान पर बैठकर लीला दिखाने का अलोकतांत्रिक काम किसी समर्थन के लायक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र अपनी कमजोरियों के बावजूद, खामियों के बावजूद आज भी दुनिया के सबसे महान एक-दो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है और इसके भीतर, इसमें, अपनी खामियों से निपटने की पूरी ताकत है। यह किसी अन्ना-बाबा जैसी बैसाखियों का मोहताज लोकतंत्र नहीं है और इसके भीतर लुभावनी चुनावी मतलबपरस्ती के चलते अलोकतांत्रिक अन्ना-बाबावाद को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। हम लोकतंत्र के दायरे से परे एक तरफ नक्सल हिंसा और दूसरी तरफ उस अन्नावादी हिंसा का भी विरोध करते हैं जिसको उन्होंने शरद पवार पर हमला करने के लिए जायज और अहिंसक ठहराया है। किसी से असहमत होने पर उस पर इस तरह का हमला जायज ठहराने वाला इंसान लोकतंत्र में कोई जगह नहीं रखता। यह तो लोकतंत्र ही है जो ऐसी बातें कहने वाले और नासमझ लोगों को आगे भी ऐसा करने के लिए उकसाने और भड़काने वाले अन्ना-हजारे जैसे लोगों को साधारण नागरिक अधिकारों से लाख गुना अधिक अधिकार देता है। आज हम सभी सांसदों और नागरिकों से यह अपील करना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं को बाबरी मस्जिद की तरह ढहा देने की अन्ना-बाबा जैसों की कोशिशों को चुनावी फायदे के नजरिए से बढ़ावा नहीं देना चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए। आज देश में सबसे बड़ा जिम्मा संसद के उस विपक्ष पर है जिसने पिछले पखवाड़े में लगातार बहुत ही गैरजिम्मेदारी से काम किया है, उसे कम से कम आने वाले दिनों में संसद की महत्ता कायम रखने का काम करना चाहिए।
संपादकीय
विपक्ष कम से कम अब तो जिम्मेदारी दिखाए
दसवें दिन संसद चली, लेकिन अब तक यह साफ नहीं है कि महीनों से खबरों में तैर रहा लोकपाल बिल संसद के इस सत्र में कहां तक पहुंचेगा और संसदीय लोकतंत्र की समझ से पूरी तरह नावाकिफ अन्ना हजारे का अंट-शंट कहां तक पहुंचेगा। लेकिन चूंकि इस मामले पर आने वाले दिनों में, इस सत्र में या अगले सत्र में बहस होनी तय है, इसलिए हम इस मामले पर अब जनता के बीच भी चर्चा चाहते हैं। संसद की स्थाई समिति में शायद प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने या न रखने की बात संसद की बहस पर छोड़ दी है, लेकिन हमारा यह मानना है कि देश का कोई भी ऐसा बड़ा पद जिस पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं, उसे लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की कोई जरूरत नहीं है। आज तो ऐसा लग रहा है कि लोकपाल की चर्चा पूरी तरह यूपीए सरकार पर घेरा डालने के इरादे से हो रही है, लेकिन जब कोई कानून बनता है तो उसमें व्यक्तियों को ध्यान में रखने के बजाय व्यवस्था को ध्यान में रखने की जरूरत होती है, और एक व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद कुछ दूसरे प्रधानमंत्रियों के मुकाबले लोकपाल के शिकंजे में फंसने का कम ही खतरा रखते हैं। बहुत खुलकर बात की जाए तो पूरी दिल्ली इस बात को जानती है कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनकी दत्तक पुत्री वाले दामाद का दिल्ली में क्या काम रहता था और प्रधानमंत्री निवास से लगे बंगले में बसाए गए इस परिवार को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों गलत होता? इसलिए एक प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हो या उसका परिवार घोषित रूप से बेईमान हो, हर पद को लोकपाल के दायरे में लाने की जरूरत है। लेकिन हम लोकतंत्र की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इस बात से सहमत हैं कि अदालतों के लिए अगर कोई अलग संस्था बनती है तो उसमें कोई हर्ज इसलिए नहीं है कि सरकार और अदालत की भूमिका, उनके अधिकार और उनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं और हो सकता है कि एक अलग संस्था न्यायपालिका पर बेहतर निगरानी रख सके, अधिक असरदार कार्रवाई कर सके। इसी तरह हम इस बात से भी सहमत हैं कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के अलग-अलग वर्गों पर कार्रवाई के लिए सीधे-सीधे देश के लोकपाल को ही जिम्मा देने के बजाय राज्यों की ऐसी संस्था को वे अधिकार दिए जाएं, क्योंकि अगर सारा बोझ लोकपाल नाम की राष्ट्रीय संस्था पर डाल दिया जाएगा तो मुकदमों की भीड़ में छोटे चेहरे अधिक भर जाएंगे और बड़े मगरमच्छ फिर बच निकलेंगे। इसलिए एक संस्था को असरदार बनाने के लिए यह भी जरूरी होता है कि उसके दायरे को एक सीमा पर जाकर रोक दिया जाए, और वहां से आगे के लिए किसी दूसरी संस्था को जिम्मा दिया जाए।
हम आज फिर इस देश के अमनचैन पर मंडरा रहे अन्नावाद के खतरे के बारे में बात करना चाहते हैं। जब संसद में लोकपाल का मसौदा आने जा रहा है, भारतीय लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी संस्था इस पर चर्चा करने जा रही है तो जंतर-मंतर पर बैठकर कोई मंतर पढऩे या रामलीला मैदान पर बैठकर लीला दिखाने का अलोकतांत्रिक काम किसी समर्थन के लायक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र अपनी कमजोरियों के बावजूद, खामियों के बावजूद आज भी दुनिया के सबसे महान एक-दो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है और इसके भीतर, इसमें, अपनी खामियों से निपटने की पूरी ताकत है। यह किसी अन्ना-बाबा जैसी बैसाखियों का मोहताज लोकतंत्र नहीं है और इसके भीतर लुभावनी चुनावी मतलबपरस्ती के चलते अलोकतांत्रिक अन्ना-बाबावाद को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। हम लोकतंत्र के दायरे से परे एक तरफ नक्सल हिंसा और दूसरी तरफ उस अन्नावादी हिंसा का भी विरोध करते हैं जिसको उन्होंने शरद पवार पर हमला करने के लिए जायज और अहिंसक ठहराया है। किसी से असहमत होने पर उस पर इस तरह का हमला जायज ठहराने वाला इंसान लोकतंत्र में कोई जगह नहीं रखता। यह तो लोकतंत्र ही है जो ऐसी बातें कहने वाले और नासमझ लोगों को आगे भी ऐसा करने के लिए उकसाने और भड़काने वाले अन्ना-हजारे जैसे लोगों को साधारण नागरिक अधिकारों से लाख गुना अधिक अधिकार देता है। आज हम सभी सांसदों और नागरिकों से यह अपील करना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं को बाबरी मस्जिद की तरह ढहा देने की अन्ना-बाबा जैसों की कोशिशों को चुनावी फायदे के नजरिए से बढ़ावा नहीं देना चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए। आज देश में सबसे बड़ा जिम्मा संसद के उस विपक्ष पर है जिसने पिछले पखवाड़े में लगातार बहुत ही गैरजिम्मेदारी से काम किया है, उसे कम से कम आने वाले दिनों में संसद की महत्ता कायम रखने का काम करना चाहिए।
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