09 दिसंबर 2011
संपादकीय
नेता और मीडिया, कड़वाहट के आगे-पीछे की जरूरत
पिछले कुछ महीनों से दिल्ली की हवा में घुली हुई कड़वाहट छत्तीसगढ़ तक पहुंची है और मध्यप्रदेश में कुछ खदानों के आबंटन को लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ ऐसे बयान आए, और ऐसी खबरें आईं कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों को ये खदानें दिलवाई हैं। एक-दो टीवी चैनलों और एक-दो अखबारों ने इन आरोपों को बड़ी प्रमुखता से दिखाया और छापा। इसके बाद डॉ. रमन सिंह ने मीडिया से रूबरू बात करते हुए, आजतक के शायद अपने सबसे अधिक तीखे तेवरों के साथ कहा कि वे ऐसे आरोप लगाने वाले नेताओं और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित करने वाले मीडिया को छोड़ेंगे नहीं और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे। हम अभी उनके शब्दों पर नहीं जा रहे, लेकिन उनके खिलाफ एक बड़ी बात कही, दिखाई और छापी गई, और उन्होंने इस पर तीखे तेवर दिखाए।
राजनीति में जो लोग सक्रिय हैं उन पर बहुत किस्म के आरोप लगते हैं और वे मीडिया की अपनी समझ या पसंद-नापसंद के हिसाब से कम या अधिक छपते या दिखते हैं। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि आरोप लगाने वाले नेता और उसे जनता तक पहुंचाने वाले मीडिया दोनों को ईमानदार और गंभीर रहना चाहिए। कुछ दिन पहले जब टाईम्स नाऊ नाम के एक प्रमुख अंगे्रजी समाचार चैनल पर अदालत ने एक भूतपूर्व जज की मानहानि करने का सौ करोड़ रूपए का जुर्माना सुनाया था तब भी हमने यह बात कही थी कि दुर्भावना के साथ अगर मीडिया ऐसा काम करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई ठीक है। टाईम्स नाऊ के उस मामले में किसी दुर्भावना के बजाय एक मामूली चूक थी कि सावंत नाम के एक जज के बजाय सावंत नाम के दूसरे जज की तस्वीर दिखा दी गई थी। न उस वक्त न आज हम किसी एक मामले को लेकर यह बात कर रहे। लेकिन यह हकीकत है कि लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन को अगर देखें तो नेताओं के पास एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाने के लिए सच या झूठ, कई किस्म की बातें रहती हैं और उनका इस्तेमाल कभी सच को सामने लाने के लिए होता है तो कभी एक झूठ को स्थापित करने के लिए। हमारा यह मानना है कि सच से परे की बातें न नेताओं को करनी चाहिए और न ही मीडिया को बिना यह तौले हुए कि सच क्या है और झूठ क्या, प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना चाहिए।
डॉ. रमन सिंह पर आरोप लगाने वाले नेताओं ने अपनी सोच से अपना काम किया है, मीडिया ने अपनी कानूनी जिम्मेदारियां समझते हुए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी की होगी और डॉ. रमन सिंह ने अपने परिवार, अपने पद और अपनी पार्टी की प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए ऐसी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी होगी। इस सारे सिलसिले के सच या झूठ के सामने आने का हम इंतजार करेंगे, लेकिन उसके पहले जो बात फिक्र की है, वह यह कि छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश, यहां के बहुत से असल मुद्दे ऐसे रह गए हैं जो कि दिल्ली, भोपाल या रायपुर में केंद्रित राजनीति के चलते सामने नहीं आ रहे। ऐसे में आरोपों के बजाय अगर सुबूतों की बुनियाद पर कोई बात हो तो फिर आज तो देश भर में जगह-जगह अदालतें, लोकायुक्त और दूसरी संवैधानिक संस्थाएं कड़ी कार्रवाई करने के अंदाज में दिख रही हैं। ऐसे में सार्वजनिक जीवन और मीडिया के बीच आरोप अगर कम लगें और सुबूतों के साथ बात अधिक हो तो वह सबके भले की बात होगी। कांगे्रस पार्टी में ही कुछ दूसरे नेता ऐसे हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के खिलाफ, या यहां के उद्योगों के खिलाफ सुबूतों के साथ ऐसे आरोप लगाए हैं जिनको लेकर भाजपा सरकार खासी परेशानी में फंस सकती है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के एक कांगे्रस विधायक मोहम्मद अकबर ने, टाईम्स ऑफ इंडिया द्वारा सबसे पहले उठाई गई एक रिपोर्ट के आगे की जानकारी सुबूतों के साथ मीडिया के सामने रखी। हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति में लोगों को बिना सुबूतों के एक-दूसरे के खिलाफ महज बयानबाजी नहीं करनी चाहिए और मीडिया को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि लगाए जा रहे आरोप क्या सुबूतों पर टिके हुए हैं? मीडिया के सभी जिम्मेदार लोग इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे कि कानून की नजर में झूठे आरोपों को या खुद की बनाई हुई झूठी खबरों को लेकर पेपर और टीवी अदालत में यह साबित करने के लिए जिम्मेदार रहते हैं कि उनकी बातें सच थीं। इसके पहले कि डॉ. रमन सिंह या किसी और पार्टी का कोई और नेता, या कोई उद्योगपति कानूनी कार्रवाई करे, मीडिया को खुद भी एक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। यह तो वक्त-वक्त की बात है कि आज छत्तीसगढ़ में कांगे्रस विपक्ष में है और भाजपा सत्तारूढ़। पहले भी हालत इसकी ठीक उल्टी रह चुकी है और आगे भी हो सकता है कि कभी भाजपा विपक्ष में आए। उस दिन के लिए भी हमारी यही सलाह है कि सरहद के किसी भी तरफ कोई पार्टी रहे, मीडिया की अपनी पसंद या नापसंद कोई भी रहे, तथ्यों और सच का सम्मान सभी को करना चाहिए क्योंकि आम लोगों का खासा वक्त ऐसी खबरों को पढऩे या देखने में जाता है जो या तो झूठी रहती हैं, या सच रहने पर भी आज की सामाजिक जरूरत के पैमाने पर बहुत ही कम महत्व की रहती हैं।
हम समाज के असल मुद्दों को लेकर एक बेहतर मीडिया के हिमायती हैं और सत्ता या विपक्ष के नेताओं से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे जनता की असली जरूरतों को लेकर काम करें, और अगर किसी के भी पास जनता को लूटने के कोई सुबूत हैं, तो लुटेरों के खिलाफ उन्हें सुबूतों के साथ ही सामने आना चाहिए। वे मीडिया में सामने आएं या अदालत और लोकायुक्त में जाएं, वे बिना सुबूतों के जनता का वक्त बर्बाद न करें।
संपादकीय
नेता और मीडिया, कड़वाहट के आगे-पीछे की जरूरत
पिछले कुछ महीनों से दिल्ली की हवा में घुली हुई कड़वाहट छत्तीसगढ़ तक पहुंची है और मध्यप्रदेश में कुछ खदानों के आबंटन को लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ ऐसे बयान आए, और ऐसी खबरें आईं कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों को ये खदानें दिलवाई हैं। एक-दो टीवी चैनलों और एक-दो अखबारों ने इन आरोपों को बड़ी प्रमुखता से दिखाया और छापा। इसके बाद डॉ. रमन सिंह ने मीडिया से रूबरू बात करते हुए, आजतक के शायद अपने सबसे अधिक तीखे तेवरों के साथ कहा कि वे ऐसे आरोप लगाने वाले नेताओं और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित करने वाले मीडिया को छोड़ेंगे नहीं और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे। हम अभी उनके शब्दों पर नहीं जा रहे, लेकिन उनके खिलाफ एक बड़ी बात कही, दिखाई और छापी गई, और उन्होंने इस पर तीखे तेवर दिखाए।
राजनीति में जो लोग सक्रिय हैं उन पर बहुत किस्म के आरोप लगते हैं और वे मीडिया की अपनी समझ या पसंद-नापसंद के हिसाब से कम या अधिक छपते या दिखते हैं। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि आरोप लगाने वाले नेता और उसे जनता तक पहुंचाने वाले मीडिया दोनों को ईमानदार और गंभीर रहना चाहिए। कुछ दिन पहले जब टाईम्स नाऊ नाम के एक प्रमुख अंगे्रजी समाचार चैनल पर अदालत ने एक भूतपूर्व जज की मानहानि करने का सौ करोड़ रूपए का जुर्माना सुनाया था तब भी हमने यह बात कही थी कि दुर्भावना के साथ अगर मीडिया ऐसा काम करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई ठीक है। टाईम्स नाऊ के उस मामले में किसी दुर्भावना के बजाय एक मामूली चूक थी कि सावंत नाम के एक जज के बजाय सावंत नाम के दूसरे जज की तस्वीर दिखा दी गई थी। न उस वक्त न आज हम किसी एक मामले को लेकर यह बात कर रहे। लेकिन यह हकीकत है कि लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन को अगर देखें तो नेताओं के पास एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाने के लिए सच या झूठ, कई किस्म की बातें रहती हैं और उनका इस्तेमाल कभी सच को सामने लाने के लिए होता है तो कभी एक झूठ को स्थापित करने के लिए। हमारा यह मानना है कि सच से परे की बातें न नेताओं को करनी चाहिए और न ही मीडिया को बिना यह तौले हुए कि सच क्या है और झूठ क्या, प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना चाहिए।
डॉ. रमन सिंह पर आरोप लगाने वाले नेताओं ने अपनी सोच से अपना काम किया है, मीडिया ने अपनी कानूनी जिम्मेदारियां समझते हुए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी की होगी और डॉ. रमन सिंह ने अपने परिवार, अपने पद और अपनी पार्टी की प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए ऐसी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी होगी। इस सारे सिलसिले के सच या झूठ के सामने आने का हम इंतजार करेंगे, लेकिन उसके पहले जो बात फिक्र की है, वह यह कि छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश, यहां के बहुत से असल मुद्दे ऐसे रह गए हैं जो कि दिल्ली, भोपाल या रायपुर में केंद्रित राजनीति के चलते सामने नहीं आ रहे। ऐसे में आरोपों के बजाय अगर सुबूतों की बुनियाद पर कोई बात हो तो फिर आज तो देश भर में जगह-जगह अदालतें, लोकायुक्त और दूसरी संवैधानिक संस्थाएं कड़ी कार्रवाई करने के अंदाज में दिख रही हैं। ऐसे में सार्वजनिक जीवन और मीडिया के बीच आरोप अगर कम लगें और सुबूतों के साथ बात अधिक हो तो वह सबके भले की बात होगी। कांगे्रस पार्टी में ही कुछ दूसरे नेता ऐसे हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के खिलाफ, या यहां के उद्योगों के खिलाफ सुबूतों के साथ ऐसे आरोप लगाए हैं जिनको लेकर भाजपा सरकार खासी परेशानी में फंस सकती है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के एक कांगे्रस विधायक मोहम्मद अकबर ने, टाईम्स ऑफ इंडिया द्वारा सबसे पहले उठाई गई एक रिपोर्ट के आगे की जानकारी सुबूतों के साथ मीडिया के सामने रखी। हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति में लोगों को बिना सुबूतों के एक-दूसरे के खिलाफ महज बयानबाजी नहीं करनी चाहिए और मीडिया को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि लगाए जा रहे आरोप क्या सुबूतों पर टिके हुए हैं? मीडिया के सभी जिम्मेदार लोग इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे कि कानून की नजर में झूठे आरोपों को या खुद की बनाई हुई झूठी खबरों को लेकर पेपर और टीवी अदालत में यह साबित करने के लिए जिम्मेदार रहते हैं कि उनकी बातें सच थीं। इसके पहले कि डॉ. रमन सिंह या किसी और पार्टी का कोई और नेता, या कोई उद्योगपति कानूनी कार्रवाई करे, मीडिया को खुद भी एक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। यह तो वक्त-वक्त की बात है कि आज छत्तीसगढ़ में कांगे्रस विपक्ष में है और भाजपा सत्तारूढ़। पहले भी हालत इसकी ठीक उल्टी रह चुकी है और आगे भी हो सकता है कि कभी भाजपा विपक्ष में आए। उस दिन के लिए भी हमारी यही सलाह है कि सरहद के किसी भी तरफ कोई पार्टी रहे, मीडिया की अपनी पसंद या नापसंद कोई भी रहे, तथ्यों और सच का सम्मान सभी को करना चाहिए क्योंकि आम लोगों का खासा वक्त ऐसी खबरों को पढऩे या देखने में जाता है जो या तो झूठी रहती हैं, या सच रहने पर भी आज की सामाजिक जरूरत के पैमाने पर बहुत ही कम महत्व की रहती हैं।
हम समाज के असल मुद्दों को लेकर एक बेहतर मीडिया के हिमायती हैं और सत्ता या विपक्ष के नेताओं से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे जनता की असली जरूरतों को लेकर काम करें, और अगर किसी के भी पास जनता को लूटने के कोई सुबूत हैं, तो लुटेरों के खिलाफ उन्हें सुबूतों के साथ ही सामने आना चाहिए। वे मीडिया में सामने आएं या अदालत और लोकायुक्त में जाएं, वे बिना सुबूतों के जनता का वक्त बर्बाद न करें।
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