10 दिसंबर
संपादकीय
विपक्ष का यह पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज विरोध
केन्द्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने आज बहुत सी जानकारियों के साथ सरकार की तरफ से यह दावा किया कि 2जी घोटाले से उस वक्त के वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का कोई लेना-देना नहीं था। इसके साथ-साथ सरकार की यह भी राय है कि जिस मामले में अदालत में सुनवाई चल रही है उस मामले में सरकार या संसद के भीतर अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है। संसद में भाजपा इस बात पर अड़ी हुई है कि चिदम्बरम से इस्तीफा लिया जाए और ऐसा न होने तक वह चिदम्बरम को वर्तमान गृहमंत्री के रूप में सुनने के लिए तैयार नहीं है। यह एक बड़ी अजीब सी बात है कि कांग्रेस के घोर विरोधी और भाजपा के करीबी डॉ. सुब्रमणियम स्वामी अदालत में चिदम्बरम को घेरने में लगे हुए हैं, और वहां पर आज तक उनको मिली सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उनकी शिकायत के संबंध में अदालत ने दो अफसरों को गवाही के लिए बुलाने की अपील मान ली है, यह भी इस शर्त के साथ कि डॉ. स्वामी इसके पहले खुद गवाही दें। ऐसे में चिदम्बरम को हटाने की मांग किसी एक पार्टी की हसरत और जिद तो हो सकती है, उसका तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार क्या है?
आज ही एक वरिष्ठ पत्रकार, इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता ने अपने अखबार में लिखा है कि देश किस तरह से एक हताशा में डूब रहा है और किस तरह देश में उद्योग-व्यापार का आज का हौसला आज तक का सबसे अधिक पस्त हौसला है। उन्होंने लिखा है कि मुम्बई में सड़कों के किनारे होर्डिंग खाली दिखने लगे हैं क्योंकि देश का माहौल आज राजनीतिक हितों को ऊपर रखते हुए देश की आर्थिक प्रगति को नीचे दबाने का चल रहा है। उन्होंने इस माहौल के लिए अकेले यूपीए सरकार को जिम्मेदार मानने से इंकार किया है और भाजपा की उसके रूख के लिए आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा अब एक ऐसी पार्टी की तरह बर्ताव कर रही है जिसे अब यह भरोसा हो गया है कि वह कभी सत्ता में नहीं लौटेगी। इससे परे भाजपा कैसे बार-बार सरकारी फैसलों पर संसदीय बोर्ड की मांग कर सकती है? जो लोग अंग्रेजी पढ़ सकते हैं और जिनके पास यह अखबार या इंटरनेट है उन्हें शेखर गुप्ता के तर्क पढऩे चाहिए क्योंकि यह अखबार पुराने समय से कांग्रेस विरोधी या सरकार विरोधी माना जाता रहा है और आज अगर वह भाजपा से इस तरह निराश है तो भाजपा को भी अपने तौर-तरीकों के बारे में सोचना चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को यह मालूम ही है कि हम लगातार इस बात को उठा रहे हैं कि संसद का काम संसद को करने देना चाहिए, न कि अन्ना-बाबा की भीड़ को। हम यह भी लगातार लिखते हैं कि सरकार के एफडीआई जैसे फैसलों पर अगर संसद में सीधे मतदान की मांग विपक्ष करता है तो वह गलत है, हालांकि एफडीआई को लेकर हमारे तर्क अलग हैं। इसी तरह हम चिदम्बरम या किसी और मंत्री के मुद्दे को लेकर संसद के बहिष्कार के खिलाफ हैं। भाजपा हो या वामपंथी पार्टियां, उन्हें ठीक से समझ लेना चाहिए कि देश का माहौल आज काम न करने वाले नेताओं के खिलाफ हो गया है, और काम करते हुए भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं के खिलाफ तो है ही। आज देश में बहुत अविश्वास का माहौल बना दिया गया है क्योंकि एक तरफ विपक्ष किसी भी बहाने को उठाकर सरकार और संसद दोनों को ठप्प कर देना चाहता है और ऐसा करते हुए वह अदालत की प्रक्रिया का इंतजार भी छोड़ चुका है। जब देश की बड़ी विपक्षी पार्टियां न संसद का सम्मान करें, न सरकार को उसके अधिकार के तहत काम करने दें, और न अदालत का इंतजार करें। और विपक्ष के भीतर भाजपा जैसी पार्टियां जब यूपीए विरोध और कांग्रेस पर हमले के लिए अन्ना हजारे की ऐसी जिद को, ऐसी तानाशाही को आगे बढ़ाएं जिससे कि संसद का पूरा काम जंतर-मंतर और रामलीला मैदान के हुक्म से करना तय हो, तो हमारे हिसाब से यह बहुत गैरजिम्मेदारी की बात है। अदालतों से लेकर सीएजी की रिपोर्ट तक कांग्रेस और यूपीए सरकार जिस कदर कालिख से लग चुकी थी, उससे वह जनता की नजरों में खुद ही गिर गई थी। उसमें बिना कोई नई बात जोड़े, बिना किसी नए अपराध के सुबूत सामने लाए, बिना अदालती आदेश करवाए, जिस तरह आज विपक्ष देश को ठप्प करके एक किस्म का मजा ले रहा है, उसे जनता अच्छा नहीं मान रही। हमारा यह मानना है कि जनता के बीच आज विपक्ष का विरोध काउंटर प्रोडक्टिव (प्रतिउत्पादक) हो गया है और यह विपक्ष के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। इसी विपक्ष को आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी और उनके परिवार, कांग्रेस के नेताओं और अफसरों के पीछे इसी तरह से लगना याद रखना चाहिए जिसका नतीजा यह हुआ था कि इंदिरा को खारिज कर देने वाली जनता ने ढाई बरस के भीतर ही उसे फिर सिर पर बिठा लिया था। एक नाजायज विरोध कभी जनता को नहीं जीत सकता, और आज का, अभी जारी यह विरोध, बाजार-कारोबार, अर्थव्यवस्था, संसद इन सबको नुकसान पहुंचाता हुआ यह विरोध जनता इसलिए पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज मान रही है क्योंकि यह अदालत का इंतजार किए बिना किया जा रहा विरोध है।
संपादकीय
विपक्ष का यह पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज विरोध
केन्द्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने आज बहुत सी जानकारियों के साथ सरकार की तरफ से यह दावा किया कि 2जी घोटाले से उस वक्त के वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का कोई लेना-देना नहीं था। इसके साथ-साथ सरकार की यह भी राय है कि जिस मामले में अदालत में सुनवाई चल रही है उस मामले में सरकार या संसद के भीतर अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है। संसद में भाजपा इस बात पर अड़ी हुई है कि चिदम्बरम से इस्तीफा लिया जाए और ऐसा न होने तक वह चिदम्बरम को वर्तमान गृहमंत्री के रूप में सुनने के लिए तैयार नहीं है। यह एक बड़ी अजीब सी बात है कि कांग्रेस के घोर विरोधी और भाजपा के करीबी डॉ. सुब्रमणियम स्वामी अदालत में चिदम्बरम को घेरने में लगे हुए हैं, और वहां पर आज तक उनको मिली सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उनकी शिकायत के संबंध में अदालत ने दो अफसरों को गवाही के लिए बुलाने की अपील मान ली है, यह भी इस शर्त के साथ कि डॉ. स्वामी इसके पहले खुद गवाही दें। ऐसे में चिदम्बरम को हटाने की मांग किसी एक पार्टी की हसरत और जिद तो हो सकती है, उसका तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार क्या है?
आज ही एक वरिष्ठ पत्रकार, इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता ने अपने अखबार में लिखा है कि देश किस तरह से एक हताशा में डूब रहा है और किस तरह देश में उद्योग-व्यापार का आज का हौसला आज तक का सबसे अधिक पस्त हौसला है। उन्होंने लिखा है कि मुम्बई में सड़कों के किनारे होर्डिंग खाली दिखने लगे हैं क्योंकि देश का माहौल आज राजनीतिक हितों को ऊपर रखते हुए देश की आर्थिक प्रगति को नीचे दबाने का चल रहा है। उन्होंने इस माहौल के लिए अकेले यूपीए सरकार को जिम्मेदार मानने से इंकार किया है और भाजपा की उसके रूख के लिए आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा अब एक ऐसी पार्टी की तरह बर्ताव कर रही है जिसे अब यह भरोसा हो गया है कि वह कभी सत्ता में नहीं लौटेगी। इससे परे भाजपा कैसे बार-बार सरकारी फैसलों पर संसदीय बोर्ड की मांग कर सकती है? जो लोग अंग्रेजी पढ़ सकते हैं और जिनके पास यह अखबार या इंटरनेट है उन्हें शेखर गुप्ता के तर्क पढऩे चाहिए क्योंकि यह अखबार पुराने समय से कांग्रेस विरोधी या सरकार विरोधी माना जाता रहा है और आज अगर वह भाजपा से इस तरह निराश है तो भाजपा को भी अपने तौर-तरीकों के बारे में सोचना चाहिए।
हमारे नियमित पाठकों को यह मालूम ही है कि हम लगातार इस बात को उठा रहे हैं कि संसद का काम संसद को करने देना चाहिए, न कि अन्ना-बाबा की भीड़ को। हम यह भी लगातार लिखते हैं कि सरकार के एफडीआई जैसे फैसलों पर अगर संसद में सीधे मतदान की मांग विपक्ष करता है तो वह गलत है, हालांकि एफडीआई को लेकर हमारे तर्क अलग हैं। इसी तरह हम चिदम्बरम या किसी और मंत्री के मुद्दे को लेकर संसद के बहिष्कार के खिलाफ हैं। भाजपा हो या वामपंथी पार्टियां, उन्हें ठीक से समझ लेना चाहिए कि देश का माहौल आज काम न करने वाले नेताओं के खिलाफ हो गया है, और काम करते हुए भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं के खिलाफ तो है ही। आज देश में बहुत अविश्वास का माहौल बना दिया गया है क्योंकि एक तरफ विपक्ष किसी भी बहाने को उठाकर सरकार और संसद दोनों को ठप्प कर देना चाहता है और ऐसा करते हुए वह अदालत की प्रक्रिया का इंतजार भी छोड़ चुका है। जब देश की बड़ी विपक्षी पार्टियां न संसद का सम्मान करें, न सरकार को उसके अधिकार के तहत काम करने दें, और न अदालत का इंतजार करें। और विपक्ष के भीतर भाजपा जैसी पार्टियां जब यूपीए विरोध और कांग्रेस पर हमले के लिए अन्ना हजारे की ऐसी जिद को, ऐसी तानाशाही को आगे बढ़ाएं जिससे कि संसद का पूरा काम जंतर-मंतर और रामलीला मैदान के हुक्म से करना तय हो, तो हमारे हिसाब से यह बहुत गैरजिम्मेदारी की बात है। अदालतों से लेकर सीएजी की रिपोर्ट तक कांग्रेस और यूपीए सरकार जिस कदर कालिख से लग चुकी थी, उससे वह जनता की नजरों में खुद ही गिर गई थी। उसमें बिना कोई नई बात जोड़े, बिना किसी नए अपराध के सुबूत सामने लाए, बिना अदालती आदेश करवाए, जिस तरह आज विपक्ष देश को ठप्प करके एक किस्म का मजा ले रहा है, उसे जनता अच्छा नहीं मान रही। हमारा यह मानना है कि जनता के बीच आज विपक्ष का विरोध काउंटर प्रोडक्टिव (प्रतिउत्पादक) हो गया है और यह विपक्ष के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। इसी विपक्ष को आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी और उनके परिवार, कांग्रेस के नेताओं और अफसरों के पीछे इसी तरह से लगना याद रखना चाहिए जिसका नतीजा यह हुआ था कि इंदिरा को खारिज कर देने वाली जनता ने ढाई बरस के भीतर ही उसे फिर सिर पर बिठा लिया था। एक नाजायज विरोध कभी जनता को नहीं जीत सकता, और आज का, अभी जारी यह विरोध, बाजार-कारोबार, अर्थव्यवस्था, संसद इन सबको नुकसान पहुंचाता हुआ यह विरोध जनता इसलिए पूरी तरह और बुरी तरह नाजायज मान रही है क्योंकि यह अदालत का इंतजार किए बिना किया जा रहा विरोध है।
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