छोटी सी बात



10 जनवरी 2012
छोटी सी बात
अपनी आत्मा को मारकर गलत काम करने के पहले सोचें कि जिंदा रहना क्या इतना जरूरी है?


इस मलाई को हटाओ


10 जनवरी 2012
संपादकीय
देश के सबसे बड़े राज्य के चुनाव के बीच अब लोगों को इंतजार है कि राजनीतिक दल किस-किस तरह की घोषणाएं कर सकते हैं। यह तमिलनाडु तो है नहीं कि टीवी और लैपटॉप, मंगलसूत्र और चावल बांटकर वोटरों को रिझाया जा सके, यह तो उत्तरभारत का दिल है जिसे जातिवाद और आरक्षण से लुभाने का काम अनंतकाल से चले आ रहा है और जाने कब तक यह फार्मूला यहां असरदार बने रहेगा। ऐसी चर्चा है कि कांग्रेस दलितों के बीच दलित और अतिदलित जैसे फर्क को खड़ा करके इस आरक्षित समुदाय के भीतर भी वोटों के जातिगत संतुलन को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है। कहा जा रहा है कि जिस तरह बिहार में नीतिश कुमार ने ओबीसी को दो हिस्सों में बांटा था उसी तरह कांगे्रस यहां दलितों के साथ करना चाह रही है। कांगे्रस ने मुस्लिमों को ओबीसी में शामिल करने की बात सामने रखकर आरक्षण को सीधे-सीधे चुनावी गणित से जोडऩे का काम कुछ महीने पहले से शुरू कर ही दिया है, अब चुनावी वायदे ऐसी कुछ और बातें देख सकते हैं। मजे की बात यह है कि पूरे देश में आधी आबादी को फायदा दिला सकने वाले महिला आरक्षण की बात भी बंद हो गई है क्योंकि देश की महिलाएं मतदाताओं के किसी एक तबके में, किसी एक घेरे के भीतर खड़ी हुई नहीं हैं।
महिला आरक्षण की हिमायत ने कुछ नया कहने को नहीं है सिवाय इसके कि राजनीतिक दल संसद के भीतर और संसद के बाहर लगातार पूरी तरह बेईमान बने हुए हैं क्योंकि इन पार्टियों के भीतर फैसला लेने वाले लोग पुरूषप्रधान सोच के प्रतीक हैं, और ऐसे लोगों के कब्जे से सोनिया गांधी जैसे लोग भी बाहर नहीं आ पाते। लेकिन आज हम यहां पर महिला आरक्षण पर चर्चा के बजाय, मौजूदा आरक्षित तबकों की बात करना चाहते हैं जो कि कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा देने के नाम पर उन तबकों के ताकतवर लोगों के हाथों में उस फायदे को देने का काम कर रहे हैं। दलित, आदिवासी या ओबीसी, जिस भी जाति के आधार पर आरक्षण तय किया गया उसका मकसद था कि ये समाज देश के भीतर बहुत कमजोर हैं और इसलिए उन्हें बाकी लोगों की बराबरी तक लाने के लिए आरक्षण की जरूरत है। लेकिन इन तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने की आर्थिक और शैक्षणिक क्षमता उस मलाईदार तबके में ही लगभग सीमित रह गई है जो कि जाति से इन तबकों का होने के बाद भी ताकतवर हो चुका है और आगे बढ़ चुका है। जब तक किसी भी आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से हटाया नहीं जाएगा तब तक उन जातियों के सबसे कमजोर लोगों को आरक्षित वर्ग के भीतर ही सीमित सीटों पर अपने ही ताकतवर लोगों के बराबर तक मुकाबले में पहुंच पाना नसीब ही नहीं हो सकता। आरक्षित तबके के एक सांसद, विधायक, अफसर या करोड़पति के बच्चे किसी दाखिले के लिए या नौकरी के लिए जितनी तैयारी कर सकते हैं, उतनी तैयारी उनकी जातियों के बाकी 99 फीसदी बच्चे नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि कमजोर समुदायों के भीतर, जाति और रक्त के आधार पर, एक ऐसे ताकतवर तबके का एकाधिकार सा आरक्षित सीटों पर हो चला है जो कि एक दूसरे नजरिए से देखें तो सामान्य तबके के अधिकांश लोगों से भी बहुत अधिक ताकतवर हो चुका है।
ऐसे में संसद से लेकर अदालत तक और सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक जागरूकता का एक ऐसा आंदोलन छेडऩे की जरूरत है जो मलाईदार तबके को देश के किसी भी आरक्षण से बाहर करने के लिए हो। ऐसा कानून लिखकर तैयार करने वाले और ऐसा कानून बनाने वाले लोग चूंकि ऐसे ही मलाईदार तबकों के लोग हैं इसलिए ऐसी राय भी इनके वर्गहित के खिलाफ की है। लेकिन भारत के वामपंथी दलों को इस सामाजिक हकीकत को उठाने की जरूरत है और इसे एक बहुत बड़ा चुनावी राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत है क्योंकि राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना, वोटों पर असर का खतरा खड़े किए बिना इस देश में ऐसा कोई फैसला सत्ता पर बैठे लोग खुद होकर नहीं लेंगे। यहां पर हम अदालतों में आरक्षण पर बहस के दौरान इस बारे में कही गई बहुत सी बातों को लाना नहीं चाहते क्योंकि कानून की तकनीकी बारीकियों से परे व्यापक जनहित की और सबसे कमजोर तबके की मदद करने की एक सोच जरूरी है जो कि तकनीकी बातों की चर्चा में उलझकर रह जाएगी।

न सुनने लायक पर बोलने की जरूरत


09 जनवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के कुछ ऐसे पोस्टर सामने आए हैं जिनमें सैनिकों को सावधान किया गया है कि वे वेश्याओं से दूर रहें। इसके खतरों को बताते हुए सैनिकों को बताया गया था कि वेश्याएं सिफलिस और गनोरिया जैसी बीमारियां फैलाती हैं। उसी वक्त के कुछ दूसरे पोस्टरों में यह कहा गया कि वेश्यावृत्ति को कुचल डालो क्योंकि वेश्यावृत्ति से गुप्त रोग फैलते हैं। ऐसे बहुत से पोस्टर उस वक्त प्रचलन में थे और आज भी यही साधारण सोच है कि वेश्याएं बीमारी फैलाती हैं।
लेकिन यह सोचें कि वेश्याएं ये बीमारी लाती कहां से हैं, तो समझ आएगा कि अधिकतर तो एक महिला वेश्या के पास पुरूष ही जाते हैं, और इन दोनों में ही यौन रोग एक-दूसरे को देने की पूरी क्षमता है। आमतौर पर खरीदी गई देह की जुबान कमजोर या चुप ही होती है, और देहसंबंधों में लापरवाही का हक सा खरीददार मर्द को मिला हुआ होता है। करीब पौन सदी पहले के ये पोस्टर आज भी इस बीमारी का कोई इलाज या इस समस्या का कोई हल ढूंढने के बजाय इसी तरह पोस्टर बने हुए हैं। दुनिया की सभ्यता इस पौन सदी में भी यह नहीं समझ पाई है कि दुनिया के इस सबसे पुराने कारोबार कहे जाने वाले धंधे का क्या रास्ता निकाले?
भारत में आज कोई भी राजनीतिक दल और शायद कोई भी अदालत यह सोचने को भी तैयार नहीं है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा दिया जाए। आज अमूमन बेबसी में धंधे में उतरी एक महिला के पीछे खाकीधारी से लेकर खादीधारी तक कई किस्म के ताकतवर मर्द होते हैं, जो बिना वर्दी वाले गुंडों और संगठित अपराधियों के हाथों  एक औरत के बदन के बिकने का धंधा काबू करते हैं और उससे कमाई करते हैं। एक वेश्या को बीमारी फैलाने के लिए जवाबदेह ठहरा देना तो आसान है, लेकिन एक बच्ची को उठाकर या खरीदकर, इस धंधे तक चाकू की नोंक पर लाना, उसे बेचना, उसे खरीदना, उससे रात-दिन बलात्कार करना, यह तमाम काम महज मर्दों का होता है। और द्वितीय विश्वयुद्ध के पोस्टर जिस तरह से सिर्फ धंधे वाली औरतों को बीमारी फैलाने के लिए जवाबदेह मान रहे हैं, भारत का आज का लोकतंत्र इस धंधे में लगी औरत को इससे बेहतर कोई बर्ताव नहीं दे रहा है।
जिस छत्तीसगढ़ में मैं बसा हुआ हूं, यहां पर राजधानी रायपुर नाम के शहर में कोई बीस बरस पहले एक एसपी ने अपनी मर्जी से शहर के बीचोंबीच बसे हुए रेडलाईट एरिया को बंद करवा दिया। वहां धंधा करने वाली दर्जनों, या शायद सौ से अधिक महिलाएं इस तरह भगा दी गईं मानो उनको वहां से हटा देने से वे धरती से ही हट गईं, और इस शहर के बहुत से लोगों की बाजार में औरत के बदन की जरूरत भी खत्म हो गई। सरकार, समाज, मीडिया और उस वक्त तक बहुत मजबूत नहीं हो पाए सामाजिक संगठन, किसी ने भी इसे मुद्दा नहीं माना और भारत के लोकतंत्र में धंधे वाली औरत की कोई जुबान होती नहीं। नतीजा यह हुआ कि वे तमाम महिलाएं इसी शहर के भीतर और इर्दगिर्द चारों तरफ बिखर गईं, कुछ हाईवे पर अपनी रोजी ढूंढने लगीं, तो कुछ अलग-अलग बस्तियों में रहकर अपना पेट, और जरूरतमंद मर्दों का काम चलाने लगीं। तब से लेकर अब तक इस शहर के पास, यहां की सरकार के पास, किसी जनसंगठन के पास ऐसे कोई आंकड़े नहीं हैं, ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि कौन सी महिलाएं धंधे में लगी हुई हैं और उनको किसी तरह की सावधानी की जानकारी कैसे दी जा सकती है, कैसे उनको और उनके ग्राहकों को एक-दूसरे से बीमारी के खतरों से बचाया जा सकता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से लेकर अब तक  यह समाज इस बात के लिए फिक्रमंद नहीं है कि वेश्याओं की अपनी भी सेहत को कोई खतरा है, या उन्हें भी जिंदा रहने का एक हक है। उनके बारे में जब चर्चा होती है तो महज यही होती है कि उनसे औरों की सेहत को क्या खतरा है? छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हमने यह भी देखा है कि  वेश्याओं में जागरूकता फैलाने के नाम पर दिल्ली से आए करोड़ों रूपए किस तरह यहां पर अफसरों और फर्जी जनसंगठनों ने मिलकर जागरूकता अभियान के नाम पर खा लिए। ऐसे में लगता है कि वेश्याओं से सावधान रहने के जो पोस्टर रहते हैं उन पर क्या ऐसे नामीगिरामी लोगों की तस्वीरें नहीं छपनी चाहिए कि ये उन बदनों का हक खाते हैं?
भारत की पाखंडी और दकियानूसी सोच के चलते आज हाल यह है कि यह समाज अपने बच्चों को यौन जागरूकता नहीं दे पाता क्योंकि उसे किसी काल्पनिक भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार देने वाले कुछ मवाली लाठियां लेकर निकल पड़ते हैं। यह देश अपने बच्चों के शोषण के अस्तित्व को भी मानने से इंकार कर देता है क्योंकि इतना कड़वा सच हिन्दुस्तानी समाज चर्चा में भी लाना नहीं चाहता। इसी सिलसिले की एक कड़ी है कि वह समलैंगिकता को अप्राकृतिक लिखता है और अगर अभी कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध के दर्जे से बाहर न किया होता तो समलैंगिक लोग अब भी सजा पाते होते।
ऐसा देश यह आसानी से कभी नहीं मान पाएगा कि किस तरह वेश्यावृत्ति इस समाज से, या दुनिया के किसी भी समाज से पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती क्योंकि सामाजिक व्यवस्था में हमेशा ही बहुत से ऐसे अकेले लोग रहेंगे या ऐसे लोग रहेंगे जिन्हें शरीर की सेवा खरीदने की जरूरत पड़ती ही रहेगी। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, बिना शादी रहते लोग तो अभी ताजा-ताजा बढ़ चले हैं, लेकिन कई कारणों से शरीर को खरीदने वाले लोग हजारों बरसों से चले आ रहे हैं। ऐसी हकीकत से मुंह मोडऩा किसी की भलाई की बात नहीं है। और वेश्यावृत्ति को अपराध के दर्जे में रखने से उनके किसी तरह के हक नहीं रह जाते, अपने शोषण के खिलाफ वे किसी अदालत तक नहीं पहुंच पातीं और उनकी देह को छुए बिना ही उससे फायदा पा लेने वाली ताकतवर ताकतें उनको लूटते चलती हैं।
जब तक वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा नहीं मिलेगा तब तक औरत से मर्द या मर्द से औरत के बीच बीमारियों का आना-जाना नहीं थमेगा। भारतीय समाज को अपने-आपको रेत में सिर छुपाकर आंधी के अस्तित्व को नकार देने वाले शुतुरमुर्ग जैसा बर्ताव छोडऩा होगा वरना भारतीय समाज अपनी आने वाली पीढिय़ों को खतरे में डालकर जाएगा। इस मुद्दे पर हम बहुत सी जुड़ी हुई बातों को यहां जगह की कमी की वजह से नहीं लिख रहे कि किस तरह वेश्यावृत्ति बंद होने से समाज में बलात्कार और बच्चों के देहशोषण के अपराध तेजी से बढऩे का अध्ययन बहुत से संगठनों ने किया हुआ है। आज जरूरत इस मुद्दे पर खुलकर बात करने की है, और इस अप्रिय विषय पर कोई सुनना भी नहीं चाहता। वेश्याएं ये बीमारियां अपनी मां के पेट से लेकर नहीं आतीं, अपनी मर्दानी जरूरतों और कमाई के लिए मर्द ही उन्हें चाकू की नोंक पर बलात्कार और धंधे का शिकार बनाते हैं, और इसके लिए सिर्फ उन्हें गाली देना भी मर्दों के दबदबे का एक सुबूत है।

स्वमोहित मायावती पर परदा


09 जनवरी 2012
संपादकीय

उत्तरप्रदेश में हाथी और उसके साथी की प्रतिमाएं अब खबरों में बनी रहेंगी। दुनिया भर जो मीडिया भारत के इस सबसे बड़े राज्य के चुनाव देखने के लिए पहुंचेगा उनके लिए मायावती का खुला चेहरा और उनके बुतों का ढंका चेहरा अच्छी तस्वीरों के काम आएगा। दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में यह भी लोगों को हैरान करेगा कि किस तरह एक लोकतांत्रिक देश में लोग तानाशाह की तरह अपनी प्रतिमाएं लगवा सकते हैं। और ये प्रतिमाएं अपने सैकड़ों करोड़ के खर्च के लिए वैसे भी देश भर में बुरी तरह से आलोचना पा चुकी हैं।
हम इस बात को लेकर हैरान हैं और उससे भी अधिक, तकलीफ में हैं कि कुपोषण के शिकार एक प्रदेश में सैकड़ों करोड़ रूपए अपनी मूर्तियों पर कोई निर्वाचित खर्च करे, और उस पर इस देश के कानून का कोई काबू न हो! फिर एक दूसरी तकलीफदेह बात इससे जुड़ी हुई यह भी है कि सदियों से कुचले हुए दलित समाज की बेटी अपने-आपको बताने वाली मायावती ने अपने साथ-साथ इस लोकतंत्र के संविधान के मुख्य लेखक डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाएं भी खड़ी करवा दी हैं। क्या अंबेडकर ने किसी समय दलित जवाब के नाम पर इस तरह की नौबत सोची थी?
दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि लेनिन से लेकर सद्दाम हुसैन तक बहुत से लोगों की प्रतिमाएं सही या गलत तर्कों के साथ वक्त गिरा देता है। इतिहास में नाम बुतों से नहीं लिखाता, वरना संगतराश इतिहासकार हुए होते। उत्तरप्रदेश में गरीब जनता के कौर को छीनकर जिस तरह दलितों के अधिकार के नाम पर मायावती ने बेशर्मी का यह काम किया है, उसके बारे में वहीं की एक दूसरी बड़ी पार्टी, समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कह भी रखा है कि उनकी पार्टी सरकार में आने पर मायावती की प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी। अगर एक मायावती अपने तानाशाह अंदाज में सैकड़ों करोड़ की ऐसी बर्बादी करती है तो लोकतंत्र अगली सरकार को कुछ लाख रूपए और बर्बाद करके ऐसी मिसाल को हमेशा के लिए मिटा देने का हक भी देगा, और आज इस पल हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि मुलायम सिंह के ऐसे बुलडोजरों को हम किस तर्क से रोक सकेंगे।
यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है और एक जिंदा देश को, भूख से भरे हुए देश को, बिना कफन मरे हुए देश को, सत्तर फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे वाले देश को ऐसी किसी बर्बादी का कोई हक नहीं है। आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित, अहंकारी, महत्वोन्मादी, तानाशाह, अलोकतांत्रिक और बेशर्म लोग ही अपनी गरीब जनता के हक से अपने जीते-जी ऐसा महिमामंडन कर सकते हैं। हमने कुछ महीने पहले भी इसी जगह संपादकीय में लिखा था कि जितनी अदालतों में जितने भारी-भरकम मुकदमे मायावती झेल रही हैं, उनमें अगर उन्हें सजा होती है, तो उस वक्त एक अपराधी की प्रतिमा के इर्दगिर्द जेल सरीखी सलाखें किसके पैसों से लगाई जाएंगी? इसकी लागत मायावती की अनुपातहीन जब्त संपत्ति से निकलेगी, या फिर अदालती आदेश से उत्तरप्रदेश की सरकार को वह खर्च करना पड़ेगा? यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है जिसमें लोकतंत्र के तहत तानाशाह इस तरह से पनपते हैं, और मनमानी कर पाते हैं। चूंकि भारत के राजनीतिक दल किसी तरह के सार्वजनिक मूल्यों पर एकमत नहीं हो सकते हैं, इसलिए हमको लगता है कि सतह पर जो सरकारी सा फैसला लगता है, मूर्तियां लगाने के वैसे फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को एक आदेश देना चाहिए। जिंदा लोगों के ऐसे स्मारक, या मर चुके लोगों के दूसरे किस्म के स्मारकों पर जनता का पैसा खर्च करने पर रोक लगनी चाहिए। कहने को भारत की संवैधानिक व्यवस्था में यह कार्यपालिका के फैसलों में न्यायपालिका का दखल होगा, लेकिन मायावती जैसे लोग हमें मजबूर कर रहे हैं कि हम अदालत को ऐसे दखल के लिए उकसाएं।
उत्तरप्रदेश की जनता की समझ पर हमें भरोसा है, ठीक वैसे ही जैसे आपातकाल के तुरंत बाद हुए चुनाव में हमें जनता की समझ पर भरोसा था और उसने इंदिरा-संजय को उखाड़कर फेंक दिया था। दिल्ली से लेकर बस्तर के जंगलों तक, नेहरू की बेटी और उनके नाती को खारिज कर दिया गया था। हम उत्तरप्रदेश की आज की चुनावी स्थिति के किसी समीकरण को ध्यान में रखे बिना एक मोटी बात यह कहना चाहते हैं कि जनता ऐसी तानाशाही और ऐसी आत्मस्तुति के खिलाफ जाएगी, अब यह एक अलग बात है कि उसके ऐसे फैसले के लिए मायावती के विरोधी उसे कोई भरोसेमंद विकल्प दे पाते हैं या नहीं।


छोटी सी बात


8 जनवरी 2012
छोटी सी बात
जो लोग डिक्शनरी बगल में रखकर पढञते हैं, वे ही नए शब्द सीख पाते हैं। छपी हुई, या ऑनलाइन..., डिक्शनरी पास रखें, खली रखें।

एक्सपोर्ट क्वालिटी का हुनर तैयार करने की जरूरत


08 जनवरी 2012
संपादकीय

जयपुर में चल रहा प्रवासी भारतीय सम्मेलन पूरी दुनिया से वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों को लेकर आया है। तीन दिनों का यह सालाना जलसा इस बार पैंसठ देशों से आए हुए पन्द्रह सौ प्रवासी भारतीयों का उत्साह देख रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हाथों इसके उद्घाटन के मौके पर जिस बात की कमी हमें लग रही है, वह है देश के अलग-अलग राज्यों में अंतरराष्ट्रीय पहुंच विकसित करने की संभावनाओं की। देश के गिने-चुने ऐसे प्रदेश हैं जहां के लोग दुनिया के दूसरे देशों में जाकर वहां काम करते हैं, वहां नए-नए कारोबार शुरू करते हैं और अपने पीछे अपने परिवार के लोगों, पहचान के लोगों को भी बुलाते हैं। पंजाब, केरल, आंध्र और महाराष्ट्र जैसे राज्य शायद इसमें सबसे आगे होंगे। लेकिन हम इन राज्यों के ऐसे आंकड़ों पर गए बिना यह देखते हैं कि छत्तीसगढ़ और इसके मूल प्रदेश मध्यप्रदेश जैसे बहुत से हिन्दी वाले ऐसे राज्य हैं जहां के लोग बाहर जाने की क्षमता, और उसी वजह से संभावनाओं, दोनों से ही पूरी तरह वंचित हैं।
इस बात को एक बड़ी व्यापक समझ के साथ देखने की जरूरत है कि भूमंडलीयकरण के चलते दुनिया के बहुत से कमजोर देश जब सैनिक ताकत, आयात-निर्यात और पेंटेंट जैसे बहुत से मामलों में दुनिया के बाहुबलियों से पिछड़ रहे हैं, तब भारत जैसे अधिक आबादी वाले देश में अगर अपनी मानवशक्ति के विकास से संभावनाओं को बढ़ाने का काम नहीं होगा, तो न तो भारत की अर्थव्यवस्था में यहां की आबादी का उस किस्म का योगदान हो सकेगा, और न ही व्यक्तियों के रूप में लोग दुनिया भर में जाकर आगे बढ़ सकेंगे। आज मॉरीशस, फिजी जैसे कुछ देश ऐसे हैं जो भारतीय मूल के लोगों को प्रधानमंत्री के रूप में देख चुके हैं और इनके पुरखें वहां किसी बड़ी डिग्री के साथ गए हुए नहीं थे, वे वहां खेतिहर मजदूरों के रूप में गए थे और वहां कि संभावनाओं के आसमान पर उन्होंने ऊंची उड़ान भरी और आज जब वे भारत में अपने गांव लौटते हैं तो पूरा गांव और पूरा प्रदेश उन पर फख्र करता है। ऐसी नौबत और भी बहुत से लोगों के साथ आ सकती है, अगर आज की दुनिया की जरूरतों के मुताबिक भारत के नौजवानों को तैयार किया जाए।
विकसित दुनिया का हाल अब बहुत साफ है, अब वहां पर लोग पांच दिन के हफ्ते को चार दिन का हफ्ता करके तीन दिन छुट्टियां मनाने की संस्कृति विकसित कर रहे हैं। उनकी संपन्नता बढ़ती चल रही है और वहां पर बूढ़ों की आबादी का अनुपात लगातार बढ़ रहा है जिसे कि कामकाजी लोगों की जरूरत होगी। काम करने वाले इंसान वहां पर घटते जा रहे हैं और भारत जैसे देशों से जाकर जो लोग सस्ती मजदूरी वहां मुहैया करवाते हैं, वे भी भारत के मुकाबले बहुत अधिक कमाते हैं और उनकी अगली पीढ़ी वहां पर बराक ओबामा की बराबरी तक पहुंचने का मौका पाती है। ऐसे में हम देश के उन राज्यों को यह सलाह देना चाहते हैं जहां पर कि आज देश के बाहर जाकर काम करने की क्षमता युवा पीढ़ी में नहीं है, कि ऐसे प्रदेशों को एक मिशन बनाकर दुनिया की जरूरतों का अंदाज लगाकर, उसके हिसाब से अपने पढ़े-लिखे या प्रशिक्षित लोगों को और अधिक हुनरमंद बनाकर, उनकी उत्कृष्टता बढ़ाकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार करना चाहिए। हम पहले भी कई बार इस मुद्दे पर लिखते हैं और यह भी लगता है कि सिर्फ सरकार यह पहल करे ऐसा भी जरूरी नहीं है और निजी क्षेत्र के कुछ टाटा सरीखे सामाजिक दिलचस्पी वाले कारोबारी भी ऐसा कोई काम करके सामाजिक जवाबदेही के इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा सकते हैं। यह एक नई सोच है और इससे पांच सालों में बंटे हुए चुनावी-सरकारी नजरिए को एक बार में अधिक फायदा होते नहीं दिखेगा लेकिन हमारा मानना है कि सात समंदर पार की मंजिल को ध्यान में रखकर अगर आज की तारीख में इस मोर्चे पर पिछड़े हुए राज्य काम करना शुरू करेंगे तो वे पांच-दस बरसों में अपनी एक पीढ़ी को बाहरी दुनिया के मुकाबले पेश कर पाएंगे।
यह पूरा काम हर प्रदेश को बिना देर किए शुरू इसलिए करना चाहिए कि जब हम अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर अपने लोगों को तैयार करेंगे तो चाहे वे देश के भीतर ही कहीं काम करें या प्रदेश के भीतर काम करें, उनकी उत्कृष्टता अधिक रहेगी और उनका योगदान भी देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अधिक रहेगा। लोगों को याद होगा कि एक समय भारत में कुछ चीजों को लेकर एक्सपोर्ट क्वालिटी का लेबल लगता था जो बताता था कि ऐसे सामान देश में बिकने वाले सामानों से बेहतर क्वालिटी के हैं। हम एक्सपोर्ट क्वालिटी के हुनर की चर्चा कर रहे हैं जो कि जहां रहेगा वहां अधिक दाम पाएगा, वहां अधिक सम्मान पाएगा और अपने देश-प्रदेश के लिए अधिक योगदान भी कर सकेगा।