09 जनवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के कुछ ऐसे पोस्टर सामने आए हैं जिनमें सैनिकों को सावधान किया गया है कि वे वेश्याओं से दूर रहें। इसके खतरों को बताते हुए सैनिकों को बताया गया था कि वेश्याएं सिफलिस और गनोरिया जैसी बीमारियां फैलाती हैं। उसी वक्त के कुछ दूसरे पोस्टरों में यह कहा गया कि वेश्यावृत्ति को कुचल डालो क्योंकि वेश्यावृत्ति से गुप्त रोग फैलते हैं। ऐसे बहुत से पोस्टर उस वक्त प्रचलन में थे और आज भी यही साधारण सोच है कि वेश्याएं बीमारी फैलाती हैं।

लेकिन यह सोचें कि वेश्याएं ये बीमारी लाती कहां से हैं, तो समझ आएगा कि अधिकतर तो एक महिला वेश्या के पास पुरूष ही जाते हैं, और इन दोनों में ही यौन रोग एक-दूसरे को देने की पूरी क्षमता है। आमतौर पर खरीदी गई देह की जुबान कमजोर या चुप ही होती है, और देहसंबंधों में लापरवाही का हक सा खरीददार मर्द को मिला हुआ होता है। करीब पौन सदी पहले के ये पोस्टर आज भी इस बीमारी का कोई इलाज या इस समस्या का कोई हल ढूंढने के बजाय इसी तरह पोस्टर बने हुए हैं। दुनिया की सभ्यता इस पौन सदी में भी यह नहीं समझ पाई है कि दुनिया के इस सबसे पुराने कारोबार कहे जाने वाले धंधे का क्या रास्ता निकाले?
भारत में आज कोई भी राजनीतिक दल और शायद कोई भी अदालत यह सोचने को भी तैयार नहीं है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा दिया जाए। आज अमूमन बेबसी में धंधे में उतरी एक महिला के पीछे खाकीधारी से लेकर खादीधारी तक कई किस्म के ताकतवर मर्द होते हैं, जो बिना वर्दी वाले गुंडों और संगठित अपराधियों के हाथों एक औरत के बदन के बिकने का धंधा काबू करते हैं और उससे कमाई करते हैं। एक वेश्या को बीमारी फैलाने के लिए जवाबदेह ठहरा देना तो आसान है, लेकिन एक बच्ची को उठाकर या खरीदकर, इस धंधे तक चाकू की नोंक पर लाना, उसे बेचना, उसे खरीदना, उससे रात-दिन बलात्कार करना, यह तमाम काम महज मर्दों का होता है। और द्वितीय विश्वयुद्ध के पोस्टर जिस तरह से सिर्फ धंधे वाली औरतों को बीमारी फैलाने के लिए जवाबदेह मान रहे हैं, भारत का आज का लोकतंत्र इस धंधे में लगी औरत को इससे बेहतर कोई बर्ताव नहीं दे रहा है।

जिस छत्तीसगढ़ में मैं बसा हुआ हूं, यहां पर राजधानी रायपुर नाम के शहर में कोई बीस बरस पहले एक एसपी ने अपनी मर्जी से शहर के बीचोंबीच बसे हुए रेडलाईट एरिया को बंद करवा दिया। वहां धंधा करने वाली दर्जनों, या शायद सौ से अधिक महिलाएं इस तरह भगा दी गईं मानो उनको वहां से हटा देने से वे धरती से ही हट गईं, और इस शहर के बहुत से लोगों की बाजार में औरत के बदन की जरूरत भी खत्म हो गई। सरकार, समाज, मीडिया और उस वक्त तक बहुत मजबूत नहीं हो पाए सामाजिक संगठन, किसी ने भी इसे मुद्दा नहीं माना और भारत के लोकतंत्र में धंधे वाली औरत की कोई जुबान होती नहीं। नतीजा यह हुआ कि वे तमाम महिलाएं इसी शहर के भीतर और इर्दगिर्द चारों तरफ बिखर गईं, कुछ हाईवे पर अपनी रोजी ढूंढने लगीं, तो कुछ अलग-अलग बस्तियों में रहकर अपना पेट, और जरूरतमंद मर्दों का काम चलाने लगीं। तब से लेकर अब तक इस शहर के पास, यहां की सरकार के पास, किसी जनसंगठन के पास ऐसे कोई आंकड़े नहीं हैं, ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि कौन सी महिलाएं धंधे में लगी हुई हैं और उनको किसी तरह की सावधानी की जानकारी कैसे दी जा सकती है, कैसे उनको और उनके ग्राहकों को एक-दूसरे से बीमारी के खतरों से बचाया जा सकता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से लेकर अब तक यह समाज इस बात के लिए फिक्रमंद नहीं है कि वेश्याओं की अपनी भी सेहत को कोई खतरा है, या उन्हें भी जिंदा रहने का एक हक है। उनके बारे में जब चर्चा होती है तो महज यही होती है कि उनसे औरों की सेहत को क्या खतरा है? छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हमने यह भी देखा है कि वेश्याओं में जागरूकता फैलाने के नाम पर दिल्ली से आए करोड़ों रूपए किस तरह यहां पर अफसरों और फर्जी जनसंगठनों ने मिलकर जागरूकता अभियान के नाम पर खा लिए। ऐसे में लगता है कि वेश्याओं से सावधान रहने के जो पोस्टर रहते हैं उन पर क्या ऐसे नामीगिरामी लोगों की तस्वीरें नहीं छपनी चाहिए कि ये उन बदनों का हक खाते हैं?

भारत की पाखंडी और दकियानूसी सोच के चलते आज हाल यह है कि यह समाज अपने बच्चों को यौन जागरूकता नहीं दे पाता क्योंकि उसे किसी काल्पनिक भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार देने वाले कुछ मवाली लाठियां लेकर निकल पड़ते हैं। यह देश अपने बच्चों के शोषण के अस्तित्व को भी मानने से इंकार कर देता है क्योंकि इतना कड़वा सच हिन्दुस्तानी समाज चर्चा में भी लाना नहीं चाहता। इसी सिलसिले की एक कड़ी है कि वह समलैंगिकता को अप्राकृतिक लिखता है और अगर अभी कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध के दर्जे से बाहर न किया होता तो समलैंगिक लोग अब भी सजा पाते होते।
ऐसा देश यह आसानी से कभी नहीं मान पाएगा कि किस तरह वेश्यावृत्ति इस समाज से, या दुनिया के किसी भी समाज से पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती क्योंकि सामाजिक व्यवस्था में हमेशा ही बहुत से ऐसे अकेले लोग रहेंगे या ऐसे लोग रहेंगे जिन्हें शरीर की सेवा खरीदने की जरूरत पड़ती ही रहेगी। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, बिना शादी रहते लोग तो अभी ताजा-ताजा बढ़ चले हैं, लेकिन कई कारणों से शरीर को खरीदने वाले लोग हजारों बरसों से चले आ रहे हैं। ऐसी हकीकत से मुंह मोडऩा किसी की भलाई की बात नहीं है। और वेश्यावृत्ति को अपराध के दर्जे में रखने से उनके किसी तरह के हक नहीं रह जाते, अपने शोषण के खिलाफ वे किसी अदालत तक नहीं पहुंच पातीं और उनकी देह को छुए बिना ही उससे फायदा पा लेने वाली ताकतवर ताकतें उनको लूटते चलती हैं।

जब तक वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा नहीं मिलेगा तब तक औरत से मर्द या मर्द से औरत के बीच बीमारियों का आना-जाना नहीं थमेगा। भारतीय समाज को अपने-आपको रेत में सिर छुपाकर आंधी के अस्तित्व को नकार देने वाले शुतुरमुर्ग जैसा बर्ताव छोडऩा होगा वरना भारतीय समाज अपनी आने वाली पीढिय़ों को खतरे में डालकर जाएगा। इस मुद्दे पर हम बहुत सी जुड़ी हुई बातों को यहां जगह की कमी की वजह से नहीं लिख रहे कि किस तरह वेश्यावृत्ति बंद होने से समाज में बलात्कार और बच्चों के देहशोषण के अपराध तेजी से बढऩे का अध्ययन बहुत से संगठनों ने किया हुआ है। आज जरूरत इस मुद्दे पर खुलकर बात करने की है, और इस अप्रिय विषय पर कोई सुनना भी नहीं चाहता। वेश्याएं ये बीमारियां अपनी मां के पेट से लेकर नहीं आतीं, अपनी मर्दानी जरूरतों और कमाई के लिए मर्द ही उन्हें चाकू की नोंक पर बलात्कार और धंधे का शिकार बनाते हैं, और इसके लिए सिर्फ उन्हें गाली देना भी मर्दों के दबदबे का एक सुबूत है।