09 जनवरी 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में हाथी और उसके साथी की प्रतिमाएं अब खबरों में बनी रहेंगी। दुनिया भर जो मीडिया भारत के इस सबसे बड़े राज्य के चुनाव देखने के लिए पहुंचेगा उनके लिए मायावती का खुला चेहरा और उनके बुतों का ढंका चेहरा अच्छी तस्वीरों के काम आएगा। दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में यह भी लोगों को हैरान करेगा कि किस तरह एक लोकतांत्रिक देश में लोग तानाशाह की तरह अपनी प्रतिमाएं लगवा सकते हैं। और ये प्रतिमाएं अपने सैकड़ों करोड़ के खर्च के लिए वैसे भी देश भर में बुरी तरह से आलोचना पा चुकी हैं।
हम इस बात को लेकर हैरान हैं और उससे भी अधिक, तकलीफ में हैं कि कुपोषण के शिकार एक प्रदेश में सैकड़ों करोड़ रूपए अपनी मूर्तियों पर कोई निर्वाचित खर्च करे, और उस पर इस देश के कानून का कोई काबू न हो! फिर एक दूसरी तकलीफदेह बात इससे जुड़ी हुई यह भी है कि सदियों से कुचले हुए दलित समाज की बेटी अपने-आपको बताने वाली मायावती ने अपने साथ-साथ इस लोकतंत्र के संविधान के मुख्य लेखक डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाएं भी खड़ी करवा दी हैं। क्या अंबेडकर ने किसी समय दलित जवाब के नाम पर इस तरह की नौबत सोची थी?
दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि लेनिन से लेकर सद्दाम हुसैन तक बहुत से लोगों की प्रतिमाएं सही या गलत तर्कों के साथ वक्त गिरा देता है। इतिहास में नाम बुतों से नहीं लिखाता, वरना संगतराश इतिहासकार हुए होते। उत्तरप्रदेश में गरीब जनता के कौर को छीनकर जिस तरह दलितों के अधिकार के नाम पर मायावती ने बेशर्मी का यह काम किया है, उसके बारे में वहीं की एक दूसरी बड़ी पार्टी, समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कह भी रखा है कि उनकी पार्टी सरकार में आने पर मायावती की प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी। अगर एक मायावती अपने तानाशाह अंदाज में सैकड़ों करोड़ की ऐसी बर्बादी करती है तो लोकतंत्र अगली सरकार को कुछ लाख रूपए और बर्बाद करके ऐसी मिसाल को हमेशा के लिए मिटा देने का हक भी देगा, और आज इस पल हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि मुलायम सिंह के ऐसे बुलडोजरों को हम किस तर्क से रोक सकेंगे।
यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है और एक जिंदा देश को, भूख से भरे हुए देश को, बिना कफन मरे हुए देश को, सत्तर फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे वाले देश को ऐसी किसी बर्बादी का कोई हक नहीं है। आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित, अहंकारी, महत्वोन्मादी, तानाशाह, अलोकतांत्रिक और बेशर्म लोग ही अपनी गरीब जनता के हक से अपने जीते-जी ऐसा महिमामंडन कर सकते हैं। हमने कुछ महीने पहले भी इसी जगह संपादकीय में लिखा था कि जितनी अदालतों में जितने भारी-भरकम मुकदमे मायावती झेल रही हैं, उनमें अगर उन्हें सजा होती है, तो उस वक्त एक अपराधी की प्रतिमा के इर्दगिर्द जेल सरीखी सलाखें किसके पैसों से लगाई जाएंगी? इसकी लागत मायावती की अनुपातहीन जब्त संपत्ति से निकलेगी, या फिर अदालती आदेश से उत्तरप्रदेश की सरकार को वह खर्च करना पड़ेगा? यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है जिसमें लोकतंत्र के तहत तानाशाह इस तरह से पनपते हैं, और मनमानी कर पाते हैं। चूंकि भारत के राजनीतिक दल किसी तरह के सार्वजनिक मूल्यों पर एकमत नहीं हो सकते हैं, इसलिए हमको लगता है कि सतह पर जो सरकारी सा फैसला लगता है, मूर्तियां लगाने के वैसे फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को एक आदेश देना चाहिए। जिंदा लोगों के ऐसे स्मारक, या मर चुके लोगों के दूसरे किस्म के स्मारकों पर जनता का पैसा खर्च करने पर रोक लगनी चाहिए। कहने को भारत की संवैधानिक व्यवस्था में यह कार्यपालिका के फैसलों में न्यायपालिका का दखल होगा, लेकिन मायावती जैसे लोग हमें मजबूर कर रहे हैं कि हम अदालत को ऐसे दखल के लिए उकसाएं।
उत्तरप्रदेश की जनता की समझ पर हमें भरोसा है, ठीक वैसे ही जैसे आपातकाल के तुरंत बाद हुए चुनाव में हमें जनता की समझ पर भरोसा था और उसने इंदिरा-संजय को उखाड़कर फेंक दिया था। दिल्ली से लेकर बस्तर के जंगलों तक, नेहरू की बेटी और उनके नाती को खारिज कर दिया गया था। हम उत्तरप्रदेश की आज की चुनावी स्थिति के किसी समीकरण को ध्यान में रखे बिना एक मोटी बात यह कहना चाहते हैं कि जनता ऐसी तानाशाही और ऐसी आत्मस्तुति के खिलाफ जाएगी, अब यह एक अलग बात है कि उसके ऐसे फैसले के लिए मायावती के विरोधी उसे कोई भरोसेमंद विकल्प दे पाते हैं या नहीं।

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