08 जनवरी 2012
संपादकीय
जयपुर में चल रहा प्रवासी भारतीय सम्मेलन पूरी दुनिया से वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों को लेकर आया है। तीन दिनों का यह सालाना जलसा इस बार पैंसठ देशों से आए हुए पन्द्रह सौ प्रवासी भारतीयों का उत्साह देख रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हाथों इसके उद्घाटन के मौके पर जिस बात की कमी हमें लग रही है, वह है देश के अलग-अलग राज्यों में अंतरराष्ट्रीय पहुंच विकसित करने की संभावनाओं की। देश के गिने-चुने ऐसे प्रदेश हैं जहां के लोग दुनिया के दूसरे देशों में जाकर वहां काम करते हैं, वहां नए-नए कारोबार शुरू करते हैं और अपने पीछे अपने परिवार के लोगों, पहचान के लोगों को भी बुलाते हैं। पंजाब, केरल, आंध्र और महाराष्ट्र जैसे राज्य शायद इसमें सबसे आगे होंगे। लेकिन हम इन राज्यों के ऐसे आंकड़ों पर गए बिना यह देखते हैं कि छत्तीसगढ़ और इसके मूल प्रदेश मध्यप्रदेश जैसे बहुत से हिन्दी वाले ऐसे राज्य हैं जहां के लोग बाहर जाने की क्षमता, और उसी वजह से संभावनाओं, दोनों से ही पूरी तरह वंचित हैं।
इस बात को एक बड़ी व्यापक समझ के साथ देखने की जरूरत है कि भूमंडलीयकरण के चलते दुनिया के बहुत से कमजोर देश जब सैनिक ताकत, आयात-निर्यात और पेंटेंट जैसे बहुत से मामलों में दुनिया के बाहुबलियों से पिछड़ रहे हैं, तब भारत जैसे अधिक आबादी वाले देश में अगर अपनी मानवशक्ति के विकास से संभावनाओं को बढ़ाने का काम नहीं होगा, तो न तो भारत की अर्थव्यवस्था में यहां की आबादी का उस किस्म का योगदान हो सकेगा, और न ही व्यक्तियों के रूप में लोग दुनिया भर में जाकर आगे बढ़ सकेंगे। आज मॉरीशस, फिजी जैसे कुछ देश ऐसे हैं जो भारतीय मूल के लोगों को प्रधानमंत्री के रूप में देख चुके हैं और इनके पुरखें वहां किसी बड़ी डिग्री के साथ गए हुए नहीं थे, वे वहां खेतिहर मजदूरों के रूप में गए थे और वहां कि संभावनाओं के आसमान पर उन्होंने ऊंची उड़ान भरी और आज जब वे भारत में अपने गांव लौटते हैं तो पूरा गांव और पूरा प्रदेश उन पर फख्र करता है। ऐसी नौबत और भी बहुत से लोगों के साथ आ सकती है, अगर आज की दुनिया की जरूरतों के मुताबिक भारत के नौजवानों को तैयार किया जाए।
विकसित दुनिया का हाल अब बहुत साफ है, अब वहां पर लोग पांच दिन के हफ्ते को चार दिन का हफ्ता करके तीन दिन छुट्टियां मनाने की संस्कृति विकसित कर रहे हैं। उनकी संपन्नता बढ़ती चल रही है और वहां पर बूढ़ों की आबादी का अनुपात लगातार बढ़ रहा है जिसे कि कामकाजी लोगों की जरूरत होगी। काम करने वाले इंसान वहां पर घटते जा रहे हैं और भारत जैसे देशों से जाकर जो लोग सस्ती मजदूरी वहां मुहैया करवाते हैं, वे भी भारत के मुकाबले बहुत अधिक कमाते हैं और उनकी अगली पीढ़ी वहां पर बराक ओबामा की बराबरी तक पहुंचने का मौका पाती है। ऐसे में हम देश के उन राज्यों को यह सलाह देना चाहते हैं जहां पर कि आज देश के बाहर जाकर काम करने की क्षमता युवा पीढ़ी में नहीं है, कि ऐसे प्रदेशों को एक मिशन बनाकर दुनिया की जरूरतों का अंदाज लगाकर, उसके हिसाब से अपने पढ़े-लिखे या प्रशिक्षित लोगों को और अधिक हुनरमंद बनाकर, उनकी उत्कृष्टता बढ़ाकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार करना चाहिए। हम पहले भी कई बार इस मुद्दे पर लिखते हैं और यह भी लगता है कि सिर्फ सरकार यह पहल करे ऐसा भी जरूरी नहीं है और निजी क्षेत्र के कुछ टाटा सरीखे सामाजिक दिलचस्पी वाले कारोबारी भी ऐसा कोई काम करके सामाजिक जवाबदेही के इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा सकते हैं। यह एक नई सोच है और इससे पांच सालों में बंटे हुए चुनावी-सरकारी नजरिए को एक बार में अधिक फायदा होते नहीं दिखेगा लेकिन हमारा मानना है कि सात समंदर पार की मंजिल को ध्यान में रखकर अगर आज की तारीख में इस मोर्चे पर पिछड़े हुए राज्य काम करना शुरू करेंगे तो वे पांच-दस बरसों में अपनी एक पीढ़ी को बाहरी दुनिया के मुकाबले पेश कर पाएंगे।
यह पूरा काम हर प्रदेश को बिना देर किए शुरू इसलिए करना चाहिए कि जब हम अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर अपने लोगों को तैयार करेंगे तो चाहे वे देश के भीतर ही कहीं काम करें या प्रदेश के भीतर काम करें, उनकी उत्कृष्टता अधिक रहेगी और उनका योगदान भी देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अधिक रहेगा। लोगों को याद होगा कि एक समय भारत में कुछ चीजों को लेकर एक्सपोर्ट क्वालिटी का लेबल लगता था जो बताता था कि ऐसे सामान देश में बिकने वाले सामानों से बेहतर क्वालिटी के हैं। हम एक्सपोर्ट क्वालिटी के हुनर की चर्चा कर रहे हैं जो कि जहां रहेगा वहां अधिक दाम पाएगा, वहां अधिक सम्मान पाएगा और अपने देश-प्रदेश के लिए अधिक योगदान भी कर सकेगा।

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