10 जनवरी 2012
संपादकीय
देश के सबसे बड़े राज्य के चुनाव के बीच अब लोगों को इंतजार है कि राजनीतिक दल किस-किस तरह की घोषणाएं कर सकते हैं। यह तमिलनाडु तो है नहीं कि टीवी और लैपटॉप, मंगलसूत्र और चावल बांटकर वोटरों को रिझाया जा सके, यह तो उत्तरभारत का दिल है जिसे जातिवाद और आरक्षण से लुभाने का काम अनंतकाल से चले आ रहा है और जाने कब तक यह फार्मूला यहां असरदार बने रहेगा। ऐसी चर्चा है कि कांग्रेस दलितों के बीच दलित और अतिदलित जैसे फर्क को खड़ा करके इस आरक्षित समुदाय के भीतर भी वोटों के जातिगत संतुलन को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है। कहा जा रहा है कि जिस तरह बिहार में नीतिश कुमार ने ओबीसी को दो हिस्सों में बांटा था उसी तरह कांगे्रस यहां दलितों के साथ करना चाह रही है। कांगे्रस ने मुस्लिमों को ओबीसी में शामिल करने की बात सामने रखकर आरक्षण को सीधे-सीधे चुनावी गणित से जोडऩे का काम कुछ महीने पहले से शुरू कर ही दिया है, अब चुनावी वायदे ऐसी कुछ और बातें देख सकते हैं। मजे की बात यह है कि पूरे देश में आधी आबादी को फायदा दिला सकने वाले महिला आरक्षण की बात भी बंद हो गई है क्योंकि देश की महिलाएं मतदाताओं के किसी एक तबके में, किसी एक घेरे के भीतर खड़ी हुई नहीं हैं।
महिला आरक्षण की हिमायत ने कुछ नया कहने को नहीं है सिवाय इसके कि राजनीतिक दल संसद के भीतर और संसद के बाहर लगातार पूरी तरह बेईमान बने हुए हैं क्योंकि इन पार्टियों के भीतर फैसला लेने वाले लोग पुरूषप्रधान सोच के प्रतीक हैं, और ऐसे लोगों के कब्जे से सोनिया गांधी जैसे लोग भी बाहर नहीं आ पाते। लेकिन आज हम यहां पर महिला आरक्षण पर चर्चा के बजाय, मौजूदा आरक्षित तबकों की बात करना चाहते हैं जो कि कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा देने के नाम पर उन तबकों के ताकतवर लोगों के हाथों में उस फायदे को देने का काम कर रहे हैं। दलित, आदिवासी या ओबीसी, जिस भी जाति के आधार पर आरक्षण तय किया गया उसका मकसद था कि ये समाज देश के भीतर बहुत कमजोर हैं और इसलिए उन्हें बाकी लोगों की बराबरी तक लाने के लिए आरक्षण की जरूरत है। लेकिन इन तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने की आर्थिक और शैक्षणिक क्षमता उस मलाईदार तबके में ही लगभग सीमित रह गई है जो कि जाति से इन तबकों का होने के बाद भी ताकतवर हो चुका है और आगे बढ़ चुका है। जब तक किसी भी आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से हटाया नहीं जाएगा तब तक उन जातियों के सबसे कमजोर लोगों को आरक्षित वर्ग के भीतर ही सीमित सीटों पर अपने ही ताकतवर लोगों के बराबर तक मुकाबले में पहुंच पाना नसीब ही नहीं हो सकता। आरक्षित तबके के एक सांसद, विधायक, अफसर या करोड़पति के बच्चे किसी दाखिले के लिए या नौकरी के लिए जितनी तैयारी कर सकते हैं, उतनी तैयारी उनकी जातियों के बाकी 99 फीसदी बच्चे नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि कमजोर समुदायों के भीतर, जाति और रक्त के आधार पर, एक ऐसे ताकतवर तबके का एकाधिकार सा आरक्षित सीटों पर हो चला है जो कि एक दूसरे नजरिए से देखें तो सामान्य तबके के अधिकांश लोगों से भी बहुत अधिक ताकतवर हो चुका है।
ऐसे में संसद से लेकर अदालत तक और सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक जागरूकता का एक ऐसा आंदोलन छेडऩे की जरूरत है जो मलाईदार तबके को देश के किसी भी आरक्षण से बाहर करने के लिए हो। ऐसा कानून लिखकर तैयार करने वाले और ऐसा कानून बनाने वाले लोग चूंकि ऐसे ही मलाईदार तबकों के लोग हैं इसलिए ऐसी राय भी इनके वर्गहित के खिलाफ की है। लेकिन भारत के वामपंथी दलों को इस सामाजिक हकीकत को उठाने की जरूरत है और इसे एक बहुत बड़ा चुनावी राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत है क्योंकि राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना, वोटों पर असर का खतरा खड़े किए बिना इस देश में ऐसा कोई फैसला सत्ता पर बैठे लोग खुद होकर नहीं लेंगे। यहां पर हम अदालतों में आरक्षण पर बहस के दौरान इस बारे में कही गई बहुत सी बातों को लाना नहीं चाहते क्योंकि कानून की तकनीकी बारीकियों से परे व्यापक जनहित की और सबसे कमजोर तबके की मदद करने की एक सोच जरूरी है जो कि तकनीकी बातों की चर्चा में उलझकर रह जाएगी।

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