बढ़ती आबादी बोझ कितना है और संभावना कितना, सोचें...

11 जुलाई 2014
संपादकीय
आज हिन्दुस्तान भर में विश्व जनसंख्या दिवस पर सड़कों पर रैली हैं, और जगह-जगह शाम-रात तक इस पर बहस होगी कि इस देश का जनसंख्या-विस्फोट और कितनी तबाही लाएगा। पिछले कुछ दिनों से इस बारे में जो आंकड़े तैर रहे हैं वे बतलाते हैं कि अगले पंद्रह बरस में भारत चीन की आबादी को पार कर दुनिया का सबसे अधिक लोगों वाला देश हो जाएगा। उस वक्त दोनों देशों की आबादी करीब एक अरब पैंतालीस करोड़ होगी, और उसके बाद भारत इससे आगे बढऩे लगेगा। एक दूसरा अंदाज बतलाता है कि 2060 तक जाकर भारत की आबादी बढऩा रूकेगा, और सन् 2100 तक आबादी में गिरावट आना शुरू होगी। लेकिन इसके पहले भारत करीब एक अरब पैंसठ करोड़ तक पहुंच जाएगा। 
इस खबर के साथ दो और खबरों को जोड़कर देखने से ही हमको पूरी तस्वीर का एक हिस्सा बनते दिखता है, महज आबादी के आंकड़े अपने आपमें आंकड़े होते हैं, और उनसे निकाला जाने वाला मतलब सोचा-समझा या अनजाना सफेद झूठ भी हो सकता है। एक खबर है कि भारत में तीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और वह रोजाना 30-35 रूपये से कम पर जिंदा है, और जिंदा रहने के लिए जरूरी खर्च के इन आंकड़ों पर खासी बहस भी चल रही है। लोग इन आंकड़ों को सरकारी अमानवीयता बतला रहे हैं। एक दूसरी खबर यह है कि इराक से हजारों हिन्दुस्तानियों को निकालकर वापिस भारत लाया जा रहा है, लेकिन वहां के रोजगार से उनको जो कमाई हो रही थी उसके चलते हजारों हिन्दुस्तानी गृहयुद्ध से गुजर रहे इराक में भी रहना चाहते हैं। 
इन तीन बातों को जोड़कर देखने की जरूरत इसलिए है कि हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को जंगल की आग की तरह फैलते हुए खतरे बताने वाले लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी गरीब की खपत क्या है। एक तिहाई आबादी जो रोज 30-35 रूपये पर जिंदा है, उसकी खपत सिर्फ अनाज, पानी, शायद जरा सी बिजली, और शायद महीने भर में सौ रूपये के सामान, बस इतनी ही है। इस एक तिहाई आबादी की कुल खपत को अगर देखें, तो यह देश की ऊपर की एक तिहाई आबादी की खपत के मुकाबले एक फीसदी भी नहीं है। ऊपर की यह एक तिहाई आबादी मकानों वाली है, कारों वाली है, एयरकंडीशनरों या एयरकूलरों वाली है, टीवी और कम्प्यूटर वाली है, फ्रिज और गैस वाली है, पेट्रोल, डीजल, बिजली खर्च करने वाली है, जरूरत से अधिक खाने वाली है, और फिर पसीना बहाने को बिजली खर्च करने वाली है। इस आबादी को पंप और टंकी से पानी मिलता है, इसके घर में लॉन, बगीचा, और बंगले हैं, नहानी में फौव्वारा है। इस एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत मुकाबले नीचे की एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत एक फीसदी भी नहीं है। 
न सिर्फ इराक, बल्कि खाड़ी के तमाम देशों, अमरीका और आस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे अनगिनत देशों में हिन्दुस्तानी मजदूर, कामगार, और खूबियों वाले विशेषज्ञ-जानकार जाकर काम कर रहे हैं, कमा रहे हैं, वापिस हिन्दुस्तान पैसे भेज रहे हैं, उनकी कमाई हिन्दुस्तान की अच्छी खासी कमाई वाली है। और दुनिया के देशों में जैसे-जैसे उनकी स्थानीय संपन्नता बढ़ती जा रही है, उनको मेहनत और मजदूरी वाले, कई बेहतर किस्मों वाले दूसरे कामगार भी लगते हैं, और यह बाकी गरीब देशों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह अपने लोगों को सिखा-पढ़ाकर इन संपन्न देशों में काम के लायक बना सकते हैं। इस तरह भारत में अगर लोगों को दुनिया में मौजूद और बढ़ते हुए रोजगार के लिए तैयार किया जाता है, तो भारत के इंसानी बदन भारत की धरती पर बोझ नहीं रहेंगे, वे भारत की ताकत बनेंगे। इसलिए सबसे गरीब एक तिहाई आबादी की गरीबी को बढ़ती आबादी के बोझ का नतीजा बताने की यह साजिश इस देश की सत्ता ने सोच-समझकर बनाई है, क्योंकि इन गरीबों को देश के लिए उत्पादक बनाने की जिम्मेदारी को सत्ता पूरा नहीं कर पाई, और अब अपनी नालायकी को छुपाने के लिए वह आबादी को बोझ बता रही है। भारत की सामाजिक हकीकत बताती है कि गरीबों के बीच बच्चों की गिनती इसलिए भी अधिक रहती है कि उन्हें यह भरोसा नहीं रहता कि भूख, कुपोषण, और बीमारी के चलते उनके कितने बच्चे जिंदा बचेंगे। इसलिए भी गरीब परिवारों में बच्चे अधिक होते हैं। और आर्थिक हकीकत यह है कि जैसे-जैसे शिक्षा और संपन्नता बढ़ती हैं, वैसे-वैसे लोग परिवार छोटा रखने लगते हैं। इस तरह देश की आबादी को गरीब रखने के लिए जिम्मेदार सत्ता ही आबादी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
आज भी शायद विज्ञान और टेक्नालॉजी ने मिलकर भारत के गरीब इंसानों जितनी सस्ती और उत्पादक कोई मशीन नहीं बनाई है, जो 30-35 रूपये रोज की खपत में आठ घंटे रोज पसीना बहाए। इसलिए भारत की आबादी को बोझ मानने के पहले यहां की मानवशक्ति की संभावनाओं को टटोलने की जरूरत है, जो कि सामने खड़ी हुई हैं, और देश के योजनाकारों, और यहां की सत्ता हांकने वालों को चुनौती दे रही हैं कि  हिन्दुस्तानी जनता की ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करें, बजाय उन्हें बोझ साबित करने के। हिन्दुस्तानी जनता को दुनिया के रोजगार के लायक तैयार करके यहां की सरकारें बाहर होने वाली कमाई को देश में पा भी सकती हैं। केरल, आन्ध्र, पंजाब, गुजरात जैसे कई राज्य हैं जिनके बैंकों में प्रवासी भारतीयों के खातों से डॉलर आकर छप्पर फाड़कर गिरते हैं। और इंसानों की खपत के पर्यावरण के पहलू को देखें, तो भी इस देश की एक तिहाई गरीब आबादी जरा भी कुसूरवार नहीं है, और जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती है, वैसे-वैसे धरती के खिलाफ जुर्म भी बढ़ते चलता है। आबादी की बात करने वालों को यह भी सोचने की जरूरत है। 

मोदी सरकार का पहला बजट, टैक्स पर बड़ी बारीक चर्चा और मोटी टैक्स चोरी पर?

10 जुलाई 2014
संपादकीय
लोकसभा में अभी-अभी वित्त मंत्री अरूण जेटली ने मोदी सरकार का पहला बजट पेश किया है। उनको कुछ ही हफ्ते बजट बनाने के लिए मिले, और पिछले दस बरस की यूपीए सरकार की छोड़ी गई विरासत के साथ जुड़े हुए मिले। लेकिन इतना वक्त भी एक सोच को बताने के लिए काफी होता है, और एनडीए सरकार का नजरिया इस बजट में सामने आया है। हम आनन-फानन इसका विश्लेषण नहीं कर सकते, और उसके लिए अर्थव्यवस्था, टैक्स, योजना, और कारोबार के अधिक जानकार लोग अगले एक-दो दिनों में पोस्टमार्टम करेंगे, अभी हम यहां इसकी कुछ बातों पर ही लिख रहे हैं, जो कि बजट आने के घंटे भर के भीतर सामने आई हैं।
सरकार ने सिगरेट, तंबाकू के सामानों, पानमसाला, और कोल्डडिं्रक पर टैक्स बढ़ाया है, जो कि लोगों की सेहत को बचाएगा, और कुल मिलाकर राज्यों और केंद्र सरकारों के इलाज के खर्च को कम करेगा। लेकिन इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी बात यह है कि सेहत के बचाव के लिए जो प्रतिबंध राज्यों में सार्वजनिक जगहों को लेकर लगाए गए हैं, उन पर कोई अमल नहीं होता, और आज के बजट से टैक्स वसूली की जो संभावना बनती है, वह भी राज्यों में इन सामानों के बिना टैक्स बिकने की वजह से खत्म हो जाती है। इसलिए केंद्र सरकार के आंकड़े उन्हीं सामानों के उतने ही बिकने पर टिके हैं, जो कि राज्यों से आते हैं, लेकिन टैक्स बढऩे के साथ-साथ बिना टैक्स पटाए सामानों की बिक्री भी बढ़ेगी, और राज्यों का सरकारी ढांचा टैक्स से अधिक रिश्वत पर ध्यान देता है, इसलिए केंद्र सरकार को ऐसी तरकीब निकालनी होगी कि उसके तय किए हुए टैक्स की चोरी घट सके। ऐसी बात सिर्फ इन्हीं सामानों पर बढ़े टैक्स या आबकारी ड्यूटी की नहीं है, हर किस्म का टैक्स राज्य सरकारों के ढांचे की कमजोरी से भी कम आता है, और राज्यों के साथ मिलकर टैक्स चोरी, बिना बिल की बिक्री, बिना आबकारी शुल्क पटाए कारखानों से निकासी, इन बातों को रोकना होगा। दरअसल होता यह है कि बाजार में जो उत्पादक टैक्स देता है, उसका सामान टैक्स चोर के बनाए सामान के मुकाबले खासा महंगा हो जाता है। इसलिए सरकारी टैक्स को पटाना बहुत से लोगों को धंधे से बाहर का रास्ता दिखाने लगता है। कागज पर टैक्स के आंकड़ों को बढ़ाने से परे अगर असल में टैक्स वसूली कड़ी और ईमानदार हो जाए, तो ईमानदार कारोबारी बाजार में टिक सकेंगे। एक बुरा कारोबारी भले कारोबारी को बेरोजगार कर देता है। 
अरूण जेटली ने हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए एक हस्तकला-अकादमी बनाने की घोषणा की है, और इसके लिए तीस करोड़ रूपये बजट में रखे हैं। इस बात को हम इसलिए यहां छू रहे हैं, क्योंकि छत्तीसगढ़ का इलाका हस्तशिल्प से संपन्न इलाका रहा है, यह एक और बात है कि राज्य बनने के बाद सरकारी बुलडोजर ने संस्कृति और कला की परंपरागत शैलियों को कुचलकर रख दिया, और आज खुद सरकार हर दिन अतिथियों को छत्तीसगढ़ की कला के नाम पर जो उपहार देती है, उनका यहां के परंपरागत शिल्प से बहुत कम लेना-देना है। हम हस्तशिल्प को लेकर एक अकादमी के साथ-साथ हस्तशिल्प की मौलिकता और विशिष्टता को बनाए रखने के लिए एक अधिक असरदार संस्था की उम्मीद करेंगे, जो कि भारत से निर्यात के लिए मौलिकता की अनिवार्यता को बनाए भी रखे। इस बारे में राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर आंकड़ों और अनुदान से परे संवेदनशीलता के साथ सोचने की जरूरत है। 
बजट का विशेषज्ञ-विश्लेषण आए, उसके पहले हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि केंद्र सरकार को खुद अपने टैक्स विभागों के भयानक भ्रष्टाचार को रोकना चाहिए, और जहां कहीं सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते मिलें, उन पर कैद की कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स वसूली वाले विभाग ईमानदारों को परेशान करने के मौके नहीं छोड़ते, और बेईमानी बढ़ाने के रास्ते निकालने में खासा वक्त खर्च करते हैं। नतीजा यह होता है कि ईमानदारी एक अनचाहे बच्चे की तरह किनारे कर दी जाती है। यह चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि एक-दो फीसदी की कमी और बढ़ोतरी से जो बहस हो रही है, वह इस बात को छूती भी नहीं कि पचीस-पचास फीसदी टैक्स चोरी कैसे होती है? हमारा यह मानना है कि बजट में टैक्स चोरी को रोकने, आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए अलग से, जरूरत हो तो महंगे ही सही, एक ऐसे ढांचे को बनाने की जरूरत है जो कि देश की कमाई बढ़ाए, कालाधन घटाए, और देश की आर्थिक संस्कृति में ईमानदारी लाए।
बजट के और दूसरे पहलुओं पर बातचीत आने वाले दिनों में इसी पन्ने पर।

खुशामदखोर, तानाशाह लीडर, गुलाम मानसिकता के सांसद

9 जुलाई 2014
संपादकीय
तमिलनाडु के अन्नाद्रमुक सांसदों की टोली अभी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिली तो वे यह देखते ही रह गए कि सभी 48 सांसद अपनी सफेद कमीज की जेब में पार्टी की मुखिया जयललिता की तस्वीर इस तरह रखे हुए थे कि वह झलकती हुई बाहर से दिख रही थी।  राज्यसभा में अन्नाद्रमुक के नेता ने मोदी को बताया कि वे अपनी नेता की तस्वीर को दिल के करीब रखते हैं। जयललिता अपनी चापलूसी को पसंद करने के लिए जानी जाती है और आए दिन उनकी ऐसी तस्वीरें दिखती हैं जिनमें उनसे अधिक उम्र के बुजुर्ग भी उनके पैरों पर दंडवत पड़े दिखते हैं। पार्टी के बड़े-बड़े नेता उनकी तस्वीरों को ढोते हैं, और वे अपनी पार्टी की तानाशाह मालिक की तरह हर योजना अपने नाम पर रखकर, हर जगह अपनी तस्वीर चस्पा करके एक आत्ममुग्ध नेता बनी रहती हैं। 
संसद के इस नजारे को जब कुछ दिन पहले की एक खबर के साथ जोड़कर देखें, जिसमें कि नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को अपने पैर छूने से मना किया है, और काम पर ध्यान देने को कहा है। भारतीय राजनीति में इन दोनों किस्मों के लोगों की जगह है, लेकिन अधिक लोग चापलूसी का नाश्ता करने वाले दिखते हैं, और फिर कुछ घंटों के बाद चापलूसी के लंच, और सोने के पहले चापलूसी का डिनर करते हैं। कई ऐसे नेता और मंत्री अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त भी हुए जो कि लोगों पर नजर तभी डालते थे, जब उन लोगों के हाथ, और नेता-मंत्री के पैर का सर्किट पूरा हो जाए। छत्तीसगढ़ में एक मंत्री ऐसे भी थे, जो सोफा के सामने के सेंटर टेबिल पर पैर टिकाकर हिलाकर लोगों को याद दिलाते थे कि वे उन चरणों को अनदेखा न करें। 
जयललिता के सांसदों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपनी जेब में सामने उनकी ऐसी तस्वीर रखें। भारतीय राजनीति में चापलूसी की पुरानी और लंबी-चौड़ी परंपरा बहुत ही घातक है। इससे लोकतंत्र की लोकतांत्रिक संभावनाएं खत्म हो जाती हैं, और खुशामदखोर नेता अपने लिए वफादारी का पैमाना ऐसी बातों को मान लेते हैं। बड़े ओहदे पर बैठे हुए बहुत कमउम्र पैर भी बिना ओहदे वाले अधिक उम्र के सिर और हाथों के मुकाबले महान मान लिए जाते हैं। और फिर ऐसे माहौल में जो लोग बिना ऐसी दिखावट के मन में असली सम्मान भी रखते हैं, तो उनको बागी मान लिया जाता है। लेकिन दक्षिण भारत की ऐसी परंपरा खासी लंबी है। पार्टी के नेताओं के लिए उनके समर्थकों, और मतदाताओं के बीच दीवानगी की हद तक या तो चाहत रहती है, या फिर वह तरह-तरह से साबित की जाती है। लोगों को याद होगा कि जब आंध्र के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी गुजरे थे, तो वहां अपनी मौत खुद मरने वाले लोगों के घरवालों से भी ऐसे बयान दिलवाए गए थे, या शायद खरीदे गए थे, कि वे वाईएसआर के सदमे में चल बसे। तमिलनाडु में नेताओं के प्रशंसक कई मौकों पर आत्मदाह कर चुके हैं, और वहां की राजनीति मानो मूर्ति परंपरा पर चलते हुए एक धर्मांध कट्टरता की शिकार है।
लोकतंत्र में इन बातों को खत्म किया जाना चाहिए। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि जो सहयोगी और समर्थक बिना बात अपने नेता के पैर पकड़ते हैं, वे कोई खराब बात होने पर भी उनके हाथ नहीं पकड़ सकते। और अपने ईर्दगिर्द ऐसे गुलामों को बनाए रखना, लोगों को ऐसा गुलाम बनाए रखना बहुत से नेताओं को ठीक लगता है क्योंकि इससे उनकी हुकूमत को कभी कोई चुनौती नहीं मिल सकती। मनोविज्ञान में मालिक और गुलाम की मानसिकता का एक जिक्र है, बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो कि जब तक किसी की गुलामी न करें, वे चैन से जी नहीं सकते, चैन से सो नहीं सकते। एक वक्त इंटरनेट के चैटरूम में ऐसे मास्टर और स्लेव की बातचीत देखने मिलती थी, और लोग वहां सचमुच ही शब्दों में अपने इंटरनेट-मालिक के तलुए चाटते दिखते थे। भारतीय राजनीति में बहुत से नेता ऐसे मिलेंगे जिनके तलुए मुकाबला करती हुई जीभों से घिरे रहते होंगे। ऐसी चापलूसी के खिलाफ लोगों के बीच सोच-विचार की जरूरत है, और इसे खारिज करने की जरूरत भी है। 

बात की बात,


9 Jully, 2014

रेल बजट, बजट से परे भी आम सुधार की संभावनाएं

8 जुलाई 2014
संपादकीय
मोदी सरकार के पहले रेल बजट का प्रसारण अभी-अभी खत्म हुआ है, और इसका लंबा-चौड़ा विश्लेषण करने में कुछ वक्त लगेगा। अलग-अलग प्रदेशों की कितनी उम्मीदें पूरी होती हैं, और जनता के किस तबके को कितनी राहत मिलती है, कौन सी बातें बेहतर होती हैं, यह तो आने वाले दिन बताएंगे, क्योंकि आंकड़ों को क्वालिटी में तब्दील होने में खासा वक्त लगता है, और कई बार तो आंकड़े बस आंकड़े ही रह जाते हैं। लेकिन इस बजट की इक्का-दुक्का बातों को लेकर आज हम यहां कुछ चर्चा छेड़ रहे हैं, जो कि पूरे बजट पर आधारित नहीं है। 
भारतीय रेल हिंदुस्तान के सबसे बड़े दो रोजगार देने वाले लोगों में से एक है। रेलवे और सेना, इन दोनों से बड़ा मालिक और कोई नहीं है। और सेना से तो जनता की जिंदगी जुड़ी नहीं रहती है, रेल से तकरीबन हर कोई जुड़े रहते हैं। ऐसी रेलगाड़ी और उसकी स्टेशनों को लेकर जनता के मन में दो किस्म के तनाव हमेशा बने रहते हैं। ट्रेन में रिजर्वेशन मिलेगा या नहीं, और ट्रेन-स्टेशन कितने गंदे मिलेंगे? अब देखा जाए तो इन दोनों बातों का बजट से कोई खास लेना-देना नहीं है, और पिछले बरसों में जो बजट थे, उनके भीतर भी ये दोनों काम आसानी से होने थे, लेकिन हिंदुस्तान रेलवे स्टेशन देश की सबसे गंदी जगहों में से एक बने हुए हैं, और टे्रन में रिजर्वेशन पाने से रिश्वत जुड़ी हुई सी है। आज हम बजट के सिलसिले में नहीं, बजट के मौके पर इस बहुत साधारण बात को याद दिला रहे हैं। और प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे रेलवे स्टेशनों को एयरपोर्ट की तरह साफ और सुविधाजनक बनाने वाले हैं, अगर ऐसा होता है तो मुसाफिरों के अच्छे दिन सचमुच आ जाएंगे। उसके बाद लोग अधिक भाड़ा देने का बुरा भी नहीं मानेंगे। इसके साथ-साथ रेलवे को अपने रिजर्वेशन से भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा, इस काम से जालसाजी खत्म करनी होगी, और देश की सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरत के हिसाब से भीड़ के महीनों में अतिरिक्त ट्रेनों का इंतजाम करना होगा। 
एक दूसरी बात जो आज के बजट में कही गई है वह भी एक बिल्कुल नई सोच है, और पता नहीं क्यों रेल मंत्रियों ने आज तक ऐसा किया क्यों नहीं था। आज संसद में घोषणा की गई कि रेल विश्वविद्यालय खोला जाएगा। अब देश का सबसे बड़ा नौकरी देने वाले मंत्रालय अगर अपने पूरे तकनीकी कामकाज के लिए नौजवानों को शिक्षण-प्रशिक्षण देकर रेलवे के कामों के लिए तैयार करता है, तो इससे नौकरी देने के बाद की ट्रेनिंग की जरूरत खत्म होगी, और सीधे-सीधे रोजगार से जुड़ी हुई पढ़ाई हो सकेगी। इस सोच से ऐसा लगता है कि रेलवे को नए कर्मचारियों में बेहतर क्षमता और तकनीकी दक्षता मिलेगी, और देश को उसका फायदा मिलेगा। 
रेलवे हिंदुस्तान में फौज के साथ-साथ सबसे बड़ी जमींदार भी है। उसके पास इतनी जमीन है कि उसके कारोबारी इस्तेमाल से बहुत बड़ी कमाई हो सकती है। लेकिन हमारा मानना है कि ऐसी कमाई एक बार ही हो सकती है, और उसे रेलवे को एक बार ही लगने वाली लागत में इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ-साथ रेलवे बहुत से बड़े स्टेशनों को देश के प्रमुख विमानतलों की तर्ज पर निजीकरण से विकसित करना चाहती है, और इसमें पूंजीनिवेश करने वाले ठेकेदार वहां से कमाई करके अपनी लागत की भरपाई भी करेंगे। इसमें कोई बुराई नहीं है, अगर इससे जनता को बेहतर सुविधा मिलती है। 
हम रेल बजट को किसी एक राज्य को मिलने वाले फायदे के साथ देखकर जोडऩा नहीं चाहते, क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक जनता को आना-जाना पड़ता है, और उसके लिए सिर्फ अपने राज्य की रेल सुविधाएं काफी नहीं होतीं। इसलिए पूरे देश में अगर रेल सुविधाओं में एक उत्कृष्टता आती है, तो वह अधिक महत्वपूर्ण बात होगी। इस बजट के बाकी पहलुओं पर हम आने वाले दिनों में फिर लिखेंगे।

अब मोदी सीएम आनंदीबेन का तबादला तो कर नहीं सकते थे..

 7 जुलाई 14
संपादकीय

गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को मिजोरम का राज्यपाल बनाकर भेजा गया है, और इस पर कांग्रेस पार्टी ने खासी कड़ी आपत्ति की है। इस बीच बहुत से दूसरे राज्यों में राज्यपालों को हट जाने की सलाह दी गई, उनमें से कुछ ने यह सलाह मान ली, कुछ ने नहीं मानी। लेकिन अभी तक मोदी सरकार ने यूपीए के मनोनीत किसी राज्यपाल को बर्खास्त नहीं किया है, जो कि एक कानूनी टकराव खड़ा करता। 
अब हम बात करें कमला बेनीवाल को उत्तर-पूर्व के एक छोटे राज्य में राज्यपाल बनाकर भेजने की। भारत में बहुत से राज्य दूसरे राज्यों के दसवें हिस्से जितने भी नहीं हैं। कुछ का राजनीतिक महत्व है, कुछ की सरहदी अहमियत है, कुछ राज्य अपने आंतरिक धार्मिक या सामाजिक टकराव की वजह से महत्व रखते हैं, तो कुछ दूसरे राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता राजभवन के लिए चुनौती खड़ी करती है, कुछ राज्य बहुत अधिक विकसित होने की वजह से अतिसंपन्नता से पैदा दिक्कतों को झेलते हैं, तो कुछ राज्य बहुत अधिक गरीब और अविकसित होने से राजभवन की एक अलग किस्म की भूमिका मांगते हैं। आज देश के आधा दर्जन राज्य बहुत ही गंभीर दर्जे की नक्सल हिंसा झेल रहे हैं, और वहां पर केन्द्र और राज्य के बीच एक अलग तरह का टकराव खड़ा होने का खतरा रहता है, इसलिए वहां राज्यपाल की एक अलग भूमिका है। भारतीय संविधान में आदिवासी इलाकों वाले राज्यों में राज्यपाल को अलग से संवैधानिक जिम्मा दिया है, और अधिकार भी दिए हैं, इसलिए वहां पर राज्यपाल की जरूरत एक अलग किस्म की रहती है। 
इन सैद्धांतिक बातों से परे एक राजनीतिक हकीकत यह भी रहती है कि सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन को अपनी पार्टी के कुछ बुजुर्ग नेताओं का पुनर्वास भी करना रहता है, और राजभवन से अधिक आलीशान वृद्धाश्रम दुनिया और कोई नहीं हो सकते। इसके साथ-साथ हर सत्तारूढ़ पार्टी-गठबंधन में कई ऐसे सरदर्द बुजुर्ग रहते हैं, जिनको उनके राज्यों से हटाकर दूर और बाहर भेजना जरूरी रहता है, ताकि वे अपने राज्य की राजनीति को और अधिक गंदा न कर सकें, ऐसे मामलों में पार्टी अपने गंदे सरदर्द को दूसरे राज्य में सम्मान से स्थापित करके पार्टी को बचाने की कोशिश भी करती है। 
राज्यपालों के बारे में हम दो दिन पहले ही लिखा था, और तब हमें यह अंदाज नहीं था कि गुजरात की राज्यपाल को मिजोरम भेजने को लेकर कांग्रेस इस तरह से विरोध करेगी। गुजरात की राज्यपाल के बारे में यह याद रखने की जरूरत है कि पिछले बरसों में लगातार वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ राज्यपाल का बहुत ही अधिक कड़वा टकराव चल रहा था। अलग-अलग मुद्दों पर उनमें से कौन सही थे, यह एक अलग बात है, लेकिन मोदी की ही पार्टी की, मोदी की ही मनोनीत आज की गुजरात की मुख्यमंत्री का एजेंडा मोदी से बहुत अलग तो रहना नहीं है, ऐसे में मोदी के लिए यह बात बहुत ही स्वाभाविक और जायज है कि वे केन्द्र सरकार के अधिकारों का इस्तेमाल करके वहां की राज्यपाल को दूसरे राज्य भेजें। यह भी देश में कोई पहली बार नहीं हो रहा है कि राज्यपाल को एक राज्य से दूसरे राज्य भेजा जाए। कभी कोई छोटे राज्य से बड़े राज्य में भेजे जाते हैं, तो कभी कोई बड़े राज्य से छोटे राज्य में। लेकिन राज्यों के महत्व को एक-दूसरे से कम आंकना भी ठीक नहीं है। ऐसा करना उत्तर-पूर्व के एक छोटे राज्य मिजोरम के महत्व को अनदेखा करना होगा। 
दूसरी बात यह है कि मिजोरम एक ऐसा राज्य है जो कि अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय की आबादी वाला है, और गैरईसाई लोग वहां पर बिल्कुल ही गिनती के हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के यह काम समझदारी का नहीं होता कि वे भाजपा के किसी ऐसे हिन्दूवादी बुजुर्ग नेता को वहां भेजते जो कि धर्मांतरण के खिलाफ पूरी जिंदगी से बोलते आए हों। कमला बेनीवाल को यह तबादला अपमान का लग सकता है, लेकिन वे एक ऐसी पार्टी की मनोनीत राज्यपाल थीं, जो कि ईसाईयों, या दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ हमदर्दी रखने वाली मानी जाती है। ऐसे में उन्हें मिजोरम भेजने के फैसले में कोई चूक हमको नजर नहीं आती, और यह तो हर सत्ता का हक रहता है कि वह किसे किस कुर्सी पर रखे। केन्द्र सरकार में ही दर्जनों मंत्री रहते हैं, और बराबरी के दर्जे के सैकड़ों अफसर रहते हैं। कभी कोई किसी कुर्सी पर किसी विभाग का काम देखते हैं, तो कभी किसी और विभाग का। ऐसे में बराबरी के दर्जे वाले काम को लेकर अगर कोई विवाद खड़ा करना चाहे, तो देश और हर प्रदेश की सरकारों में रात-दिन कम और अधिक महत्व के ऐसे विवाद चल सकते हैं। 
एक राज्यपाल के तबादले पर राजनीतिक बयानबाजी यह बताती है कि कांग्रेस आज सत्ता की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाई है, और ऐसा करके यह पार्टी अपनी ही कल की मनोनीत राज्यपाल को एक अप्रिय विवाद में घेर रही है। पाठकों को याद होगा कि हमने पिछले एक महीने में एक से ज्यादह बार यह लिखा है कि किसी सरकार के जाने के साथ ही उसके मनोनीत लोगों को खुद होकर कुर्सियां छोड़ देनी चाहिए। ऐसा न करके राज्यपाल अपने आपको तबादलों के लिए उपलब्ध तो करा ही देते हैं, और हम किसी भी सत्ता के किए हुए सामान्य तबादलों पर सवाल खड़े करने को सही नहीं समझते। खुद गुजरात के हित में यही था और है कि राजभवन और मुख्यमंत्री के बीच इतने बुरे दर्जे के टकराव न हुए होते, इनमें से कौन सा पक्ष गलत था वह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन इतने अधिक टकराव की नौबत जब आती है, तो दो में से एक पक्ष को तो हटना ही चाहिए। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री आनंदी बेन का तबादला तो कर नहीं सकते थे। 

पेड़ों को काटने के बजाय दूसरी जगह लगाना सस्ता

6 जुलाई 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के बारे में काफी अरसे से सिर्फ बुरी खबरें ही आती रही हैं। लेकिन कल एक खबर आई जिससे वहां होने वाला एक अच्छा काम भी सामने आया। वहां सरकार ने पेड़ों को काटने के बजाय उनको उखाड़कर दूसरी जगह पहले से की गई तैयारी के तहत लगाने का फैसला लिया है। इन दिनों इंटरनेट पर, और मोबाइल फोन के वाट्सऐप पर एक ऐसा वीडियो चल रहा है जो कि नलकूप खोदने वाली रिग मशीन की तरह ट्रक पर चलने वाली एक मशीन का है, जो कि किसी भी पेड़ को गहराई तक जड़ और मिट्टी के साथ उखाड़कर, दूसरी जगह ले जाकर लगा देती है। यह काम इसी मकसद से बनी हुई मशीन से इतना आसान दिखता है, और बरसों पुराने पेड़ों का कत्ल होना भी इससे रूक सकता है। 
हम छत्तीसगढ़ के सिलसिले में इस बात को खासकर करना चाहते हैं कि यहां पर सरकारी योजनाओं, और निजी निर्माण, दोनों के लिए, और कारखानों-खदानों के लिए लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं। राजधानी रायपुर में जिन लोगों ने जिंदगी गुजारी है, उनको याद है कि हर सौ कदम पर पेड़ हुआ करते थे, और गर्मियों में उनके साये में रिक्शे-ठेले वाले रूककर सांस लेते थे। जिनसे सड़कों का शोर घटता था, हवा ठंडी रहती थी, और जिन पर पंछी भी बसते थे। स्कूल पैदल आने-जाने वाले गरीब बच्चे ऐसे पेड़ों के नीचे कुछ देर रूकते थे, और आंखों को सुकून भी मिलता था। अब राजधानी बनने के बाद चूंकि सरकार के पास शहरों को खूबसूरत बनाने के लिए बहुत बड़ा बजट है, और सत्ता पर बैठे लोगों का बड़ा उत्साह है, शहरी सड़कों को चौड़ा करने की बहुत बड़ी जरूरत है, इसलिए अंधाधुंध रफ्तार से राह में आने वाले हर पेड़ को काट गिराया गया है, और फिर चाहे उसी जगह क्यारियां बनाकर ऐसे पौधे लगाए गए हैं जिनमें पानी डालना जरूरी है। खैर, सरकार की फिजूलखर्ची और बर्बादी की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए हम उस पर गए बिना यहां महज पेड़ों की जिंदगी बचाने की बात करना चाहते हैं। 
छत्तीसगढ़ के शहरी विकास के लिए ही एक तरफ तो पेड़ों को रोड़ा समझकर लगातार उनका कत्ल होता है, और दूसरी तरफ नई सड़कों, या पुरानी सड़कों की नई चौड़ाई के लिए नए पेड़ लगाने के लिए बड़ी महंगी-महंगी कोशिशें होती हैं। गांव-गांव तक नलकूप खोदने वाली सरकारी मशीनें दौड़ती हैं, क्योंकि पानी न मिलने पर वोट डालने वाली जनता सरकार में खोट गिनाती है, और अगले चुनाव में सरकार जा सकती है। लेकिन धरती के पास कोई वोट नहीं है, और न ही पेड़ों के पास। इसलिए धरती को उजाडऩे, और पेड़ों को काटने के बजाय, बाजार में मौजूद रिग मशीनों जैसी मशीनें लाकर पेड़ों को हटाने की नौबत आने पर दूसरी जगह लगाने के काम को कोई जरूरी नहीं समझता। आज अगर हर पेड़ के हाथ सौ-सौ वोट हो जाएं, तो सरकारी नोट तुरंत निकलेंगे, और ऐसी मशीनें आ जाएंगी। 
हमारा यह मानना है कि शहरों की खूबसूरती बढ़ाना जितना जरूरी है, उससे बहुत अधिक जरूरी है धरती को उजडऩे से बचाना। और यह अपने आपमें एक गलत सोच है कि पेड़ों की जगह कांक्रीट लगाकर किसी जगह को खूबसूरत बनाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि अपने शहरी विकास के मद से तुरंत ही ऐसी मशीनों को खरीदे, और राज्य में बारी-बारी से अलग-अलग शहरों में इनका इस्तेमाल पहले से तय किया जाए। यहां हम कुदरत के साथ-साथ आंकड़ों की बात भी करना चाहेंगे कि सरकारी खर्च से किसी पेड़ को बीस बरस तक बड़े करने के बजाय ऐसी मशीनों से उसकी जगह बदलना बहुत अधिक सस्ता भी पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट कटे हुए पेड़ों का मुआवजा जमा करके उससे दुबारा पेड़ लगाने का जिम्मा राज्यों को देता है। केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के पास अब तक ऐसे दसियों हजार करोड़ जमा हो चुके हैं, और छत्तीसगढ़ के हिस्से भी इसमें से सैकड़ों करोड़ रूपए आने हैं। हमारा सुझाव है कि राज्य सरकार एक नीति बनाए कि किसी पेड़ को उसी हालत में काटा जाए जबकि आज बाजार में मौजूद तकनीक उसे बचा न सके। हर हाल में पेड़ों को दूसरी जगह लगाकर हमारी ही अगली पीढ़ी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

Bat ke bat, बात की बात,

5 july 2014

नए राज्यपालों से उम्मीदें

5 जुलाई 2014
संपादकीय

पिछले राज्यपालों के हटने के बाद नए राज्यपाल के आने को इस नजरिए से देखा जा रहा है कि अब भाजपा की पसंद के राज्यपाल राज्यों में जाएंगे, और भाजपा सरकारों वाले प्रदेशों में टकराव घटेगा, और गैरभाजपाई या गैरएनडीए राज्यों में मुख्यमंत्रियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकेंगी। भारत में पिछली आधी सदी में ऐसी दोनों किस्म की मिसालें दर्जनों रही हैं। यूपीए सरकार के मनोनीत छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त और एनडीए गठबंधन की मुखिया भाजपा के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बीच तालमेल देखने लायक था। शेखर दत्त की विदाई के समय सार्वजनिक रूप से इन दोनों प्रमुख लोगों ने एक-दूसरे के लिए जो बहुत ही खास दर्जे का परस्पर सम्मान दिखाया, वह देखने लायक था। औपचारिक बातों से परे भी छत्तीसगढ़ में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच का तालमेल बहुत ही लोकतांत्रिक था, और उससे राज्य का भला भी हुआ। दूसरी तरफ कई ऐसे राज्य इस देश में रहे, और हैं, जहां पर राजभवन और राज्य शासन के बीच लड़ाई अदालतों तक पहुंची हुई है, और जहां पर राजधानी मानो सांप-नेवले के बीच जंगी मुकाबला देखती रहती है। 
भारत जैसे संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्य के संबंधों के बीच राज्यपाल की भूमिका एक नजरिए से देखने पर पूरी तरह गैरजरूरी भी लगती है, और अमूमन यह एक रस्मी रबर स्टाम्प सी लगती है। लेकिन जब तक राजभवन नाम की संस्था जारी है, तब तक कुछ बातों पर गौर होना चाहिए। एक तो यह कि राजभवन ऐसी संवैधानिक संस्था है जहां पर बैठे हुए लोग देश की राजनीति में एक-दूसरे से टकराती पार्टियों के बीच पक्षपाती होकर भारी तबाही भी ला सकती है, और राज्य सरकार का जीना मुश्किल कर सकते हैं। दूसरी तरफ अपने को मनोनीत करने वाले गठबंधन की राज्य सरकार होने पर वे राज्य सरकार के गलत कामों, गलतियों, और खामियों को अनदेखा भी कर सकते हैं, जो कि कुल मिलाकर लंबे वक्त में उस गठबंधन के राजनीतिक-चुनावी हितों के खिलाफ जाने वाली बात होती है। इसलिए कोई हिमायती राज्यपाल हमेशा अच्छा ही होता हो, वह भी जरूरी नहीं है। 
जिस तरह राज्यसभा में स्तरहीन और खराब लोगों के जाने से इस देश में संसद की इज्जत गिरी है, उसी तरह राजभवनों में भ्रष्ट और दुष्ट लोगों के पहुंचने पर बहुत बुरा होता है। छत्तीसगढ़ में भी हमने कम से कम एक राज्यपाल ऐसा देखा है जिसने राज्य सरकार पर खासा दबाव डालकर लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को निलंबित करवाया था, और आखिर में जाकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अपने उस फैसले के लिए मुंह की खानी पड़ी थी। हमने उस वक्त भी लगातार राज्य सरकार दबाव में वैसा फैसला न करने के लिए आगाह किया था। इसी राज्यपाल के रहते हुए छत्तीसगढ़ राजभवन में कई किस्म की फिजूलखर्ची होती रही, और एक अहंकार सामने आते रहा। इसी राजभवन में एक ट्रस्ट बनाया गया, जिसके लिए प्रदेश के बड़े कारोबारियों से बहुत मोटी रकम ली गई, और उससे स्कॉलरशिप दी गईं। हमने उस ट्रस्ट के खिलाफ भी लगातार लिखा, और बाद में अगले राज्यपाल ने भारत के सॉलिसिटर जनरल की राय लेने पर हमारा लिखा हुआ तर्कसंगत और न्यायसंगत पाया, और पिछले राज्यपाल के उस ट्रस्ट को राजभवन से बाहर निकाल फेंका था। 
पिछले राज्यपाल शेखर दत्त ने बस्तर के आदिवासियों की जिंदगी से जुड़े बहुत से मुद्दों पर राज्य सरकार से कड़ाई से कार्रवाई करवाई थी, खुद वहां का दौरा किया था, सरकार से जवाब-तलब किया था। संविधान में राज्यपाल को आदिवासियों की खास देखभाल करने का एक जिम्मा दिया गया है, और एक खास अधिकार भी उन्हें इसके लिए दिया गया है। राज्यपालों को चाहिए कि उनके राज्य में अगर आदिवासी समुदाय है तो उसकी तरफ खास ध्यान दें, बजाय राजभवन को पार्टीबाजी, या भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने के। बूटासिंह जैसे कुछ राज्यपाल ऐसे थे जिनके कुनबे का खुला भ्रष्टाचार खबरों में रहा। एन डी तिवारी ऐसे राज्यपाल थे जिनकी वीडियो क्लिप से आज भी इंटरनेट तपकर लाल है। ऐसे अलग-अलग बहुत से घटिया राज्यपाल भी हुए, और कुछ लोग बहुत शानदार और लोकतांत्रिक काम करके भी गए। 
अब अगले पांच बरस में देश के अधिकतर राज्यपाल बदले जाएंगे। आधा दर्जन तो शायद इस हफ्ते ही नए-नए आ जाएंगे। इन सबको हम यह शुभकामना देते हैं कि अपने को मनोनीत करने वाली पार्टी या गठबंधन के बजाय वे लोकतंत्र के तहत उन्हें दी गई संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करें। छत्तीसगढ़ भी अपने राजभवन से ऐसी ही उम्मीद कर रहा है। 

लोकतंत्र और सरकार में ताजा खून की अहमियत

04 जुलाई 2014
संपादकीय
देश में मोदी सरकार के काम के तौर-तरीके को लेकर रोज दिल्ली से खबरें आ रही हैं। एक तरफ देश में महंगाई बढ़ रही है, चीजों के दाम काबू के बाहर दिख रहे हैं, और दूसरी तरफ सरकार के काम करने के तौर-तरीकों को लेकर कुछ अच्छी बातें भी रोज निकलकर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले चुनाव अभियान के और पहले से, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही इंटरनेट, सोशल मीडिया, और जनसंचार के बाकी तमाम किस्म के डिजिटल औजारों का इस्तेमाल करके घर-घर मोदी को हकीकत कर ही दिया था। अब वे सरकार के विभागों, और मंत्रियों के साथ-साथ बहुत से और काम भी सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, जो कि भारत के एक शहरी, या शिक्षित, या संपन्न तबके तक पहुंच रखता है। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि मोदी सरकार क्या-क्या अच्छा करती है, या क्या-क्या बुरा करती है, लेकिन आज जो माहौल उन्होंने देश में बनाया है उसमें एक नयापन है, एक ताजगी है, और लोगों को इन तौर-तरीकों से कुछ उम्मीद बंध रही है। वे अपने मंत्रियों और अफसरों से ओवरटाइम करने की उम्मीद करते हैं, और एक पेशेवर अंदाज में मेहनत करवा रहे हैं। अभी पीएमओ की खबर आई है कि वहां पहुंचने वाली सबसे जरूरी किस्म की फाईलों में से मंत्रिमंडल तक जाने वाली फाईलें तीन दिन के भीतर वापिस विभाग में चली जाएं। ऐसे बहुत से दूसरे फैसले या निर्देश खबरों में हैं, और हम इससे ज्यादा मिसालें आज की अपनी बात के लिए देना नहीं चाहते। 
दरअसल मंत्री हों या अफसर, कुछ-कुछ बरसों के बाद इनके कामकाज में अगर फेरबदल होता है, जैसा कि भारत में सरकार में उम्मीद भी की जाती है, तो इन लोगों की क्षमताओं का इस्तेमाल अलग-अलग किस्म के मामलों में भी हो सकता है, और हर किस्म के मामलों में कुछ बरसों के बाद एक नई सोच वाले मंत्री और अफसर की क्षमता का फायदा भी मिल सकता है। जिस तरह कई मरीजों को एक नए खून की जरूरत पड़ती है, और किसी दूसरे सेहतमंद का ताजा खून उसे चढ़ाया जाता है, उसी तरह जिंदगी के बहुत से दायरों में फ्रेश-ब्लड अहमियत रखता है। एक नई सोच, नई कल्पना, नई चुनौती, इन सबकी अपनी अहमियत है। एक ही काम को बरस-दर-बरस बहुत लंबे समय तक करने के बाद लोग अपनी सर्वोच्च क्षमता उस काम में दिखा चुके होते हैं, और अधिकतम संभव उत्कृष्टता भी इस्तेमाल कर चुके रहते हैं। ऐसी नौबत में इस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद वे कुछ और जोड़ नहीं पाते। जिस तरह पिछले दस बरसों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, या उनके मंत्रियों का योगदान आखिरी के पांच बरसों में बहुत कम रहा, घटते चले गया, गिरते चले गया, और नुकसानदेह होते चले गया। इसलिए जब लोग किसी कुर्सी पर बिना किसी चुनौती के, बिना किसी उत्साह के सिर्फ रोजमर्रा के काम को आगे बढ़ाने में लगे रहें, तब उन जगहों पर वे संभावनाओं की राह में रोड़ा भी बन जाते हैं। वैसे तो इस बात के खिलाफ तर्क बहुत से मिल जाएंगे, जो कि अलग-अलग मिसालों को गिनाते हुए खड़े किए जाएंगे। लेकिन मिसालों से परे मोटे तौर पर जो सोच समाज के लिए, देश के लिए, या किसी संगठन और कारोबार के लिए भी हो सकती है, वह यही है कि वक्त के साथ लोगों में और उनके कामों में फेरबदल आते रहना चाहिए। 
अमरीका का राष्ट्रपति पर इस बात की एक मिसाल है कि चार-चार बरस के दो कार्यकालों के बाद अमरीकी राष्ट्रपति देश के किसी भी सरकारी या संवैधानिक पद पर नहीं लौट सकते। इसके बाद वे अपनी क्षमताओं का कोई सार्वजनिक इस्तेमाल कर लें, तो कर लें, इससे परे देश के ढांचे में उनकी कोई जगह नहीं रहती। जिस उम्र में अमरीकी राष्ट्रपति आठ बरस पूरे करके निकल चुके रहते हैं, उस उम्र में हिन्दुस्तान में लोग प्रधानमंत्री बन भी नहीं पाते। उम्र का बहुत अधिक महत्व नहीं है, लेकिन कार्यकाल की सीमा का एक महत्व जरूर है। और पूरे देश में, किसी भी तरह के कामकाज के लिए हमारा मानना है कि लोगों के एक कुर्सी पर रहने की एक सीमा होनी चाहिए, और उसके बाद उनकी क्षमताओं का दूसरी जगह इस्तेमाल होना चाहिए। शासन और प्रशासन के सिद्धांत भी अधिकतर जिम्मेदारियों के लिए हमारी इस सोच का समर्थन करते हैं, और आज देश में सरकार बदलने पर सोच और तौर-तरीकों की जो नई लहर सामने आई है, वह उसी पुराने गठबंधन के लौटने पर तो देखने मिल नहीं सकती थी।