11 जुलाई 2014
संपादकीय
आज हिन्दुस्तान भर में विश्व जनसंख्या दिवस पर सड़कों पर रैली हैं, और जगह-जगह शाम-रात तक इस पर बहस होगी कि इस देश का जनसंख्या-विस्फोट और कितनी तबाही लाएगा। पिछले कुछ दिनों से इस बारे में जो आंकड़े तैर रहे हैं वे बतलाते हैं कि अगले पंद्रह बरस में भारत चीन की आबादी को पार कर दुनिया का सबसे अधिक लोगों वाला देश हो जाएगा। उस वक्त दोनों देशों की आबादी करीब एक अरब पैंतालीस करोड़ होगी, और उसके बाद भारत इससे आगे बढऩे लगेगा। एक दूसरा अंदाज बतलाता है कि 2060 तक जाकर भारत की आबादी बढऩा रूकेगा, और सन् 2100 तक आबादी में गिरावट आना शुरू होगी। लेकिन इसके पहले भारत करीब एक अरब पैंसठ करोड़ तक पहुंच जाएगा।
इस खबर के साथ दो और खबरों को जोड़कर देखने से ही हमको पूरी तस्वीर का एक हिस्सा बनते दिखता है, महज आबादी के आंकड़े अपने आपमें आंकड़े होते हैं, और उनसे निकाला जाने वाला मतलब सोचा-समझा या अनजाना सफेद झूठ भी हो सकता है। एक खबर है कि भारत में तीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और वह रोजाना 30-35 रूपये से कम पर जिंदा है, और जिंदा रहने के लिए जरूरी खर्च के इन आंकड़ों पर खासी बहस भी चल रही है। लोग इन आंकड़ों को सरकारी अमानवीयता बतला रहे हैं। एक दूसरी खबर यह है कि इराक से हजारों हिन्दुस्तानियों को निकालकर वापिस भारत लाया जा रहा है, लेकिन वहां के रोजगार से उनको जो कमाई हो रही थी उसके चलते हजारों हिन्दुस्तानी गृहयुद्ध से गुजर रहे इराक में भी रहना चाहते हैं।
इन तीन बातों को जोड़कर देखने की जरूरत इसलिए है कि हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को जंगल की आग की तरह फैलते हुए खतरे बताने वाले लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी गरीब की खपत क्या है। एक तिहाई आबादी जो रोज 30-35 रूपये पर जिंदा है, उसकी खपत सिर्फ अनाज, पानी, शायद जरा सी बिजली, और शायद महीने भर में सौ रूपये के सामान, बस इतनी ही है। इस एक तिहाई आबादी की कुल खपत को अगर देखें, तो यह देश की ऊपर की एक तिहाई आबादी की खपत के मुकाबले एक फीसदी भी नहीं है। ऊपर की यह एक तिहाई आबादी मकानों वाली है, कारों वाली है, एयरकंडीशनरों या एयरकूलरों वाली है, टीवी और कम्प्यूटर वाली है, फ्रिज और गैस वाली है, पेट्रोल, डीजल, बिजली खर्च करने वाली है, जरूरत से अधिक खाने वाली है, और फिर पसीना बहाने को बिजली खर्च करने वाली है। इस आबादी को पंप और टंकी से पानी मिलता है, इसके घर में लॉन, बगीचा, और बंगले हैं, नहानी में फौव्वारा है। इस एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत मुकाबले नीचे की एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत एक फीसदी भी नहीं है।
न सिर्फ इराक, बल्कि खाड़ी के तमाम देशों, अमरीका और आस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे अनगिनत देशों में हिन्दुस्तानी मजदूर, कामगार, और खूबियों वाले विशेषज्ञ-जानकार जाकर काम कर रहे हैं, कमा रहे हैं, वापिस हिन्दुस्तान पैसे भेज रहे हैं, उनकी कमाई हिन्दुस्तान की अच्छी खासी कमाई वाली है। और दुनिया के देशों में जैसे-जैसे उनकी स्थानीय संपन्नता बढ़ती जा रही है, उनको मेहनत और मजदूरी वाले, कई बेहतर किस्मों वाले दूसरे कामगार भी लगते हैं, और यह बाकी गरीब देशों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह अपने लोगों को सिखा-पढ़ाकर इन संपन्न देशों में काम के लायक बना सकते हैं। इस तरह भारत में अगर लोगों को दुनिया में मौजूद और बढ़ते हुए रोजगार के लिए तैयार किया जाता है, तो भारत के इंसानी बदन भारत की धरती पर बोझ नहीं रहेंगे, वे भारत की ताकत बनेंगे। इसलिए सबसे गरीब एक तिहाई आबादी की गरीबी को बढ़ती आबादी के बोझ का नतीजा बताने की यह साजिश इस देश की सत्ता ने सोच-समझकर बनाई है, क्योंकि इन गरीबों को देश के लिए उत्पादक बनाने की जिम्मेदारी को सत्ता पूरा नहीं कर पाई, और अब अपनी नालायकी को छुपाने के लिए वह आबादी को बोझ बता रही है। भारत की सामाजिक हकीकत बताती है कि गरीबों के बीच बच्चों की गिनती इसलिए भी अधिक रहती है कि उन्हें यह भरोसा नहीं रहता कि भूख, कुपोषण, और बीमारी के चलते उनके कितने बच्चे जिंदा बचेंगे। इसलिए भी गरीब परिवारों में बच्चे अधिक होते हैं। और आर्थिक हकीकत यह है कि जैसे-जैसे शिक्षा और संपन्नता बढ़ती हैं, वैसे-वैसे लोग परिवार छोटा रखने लगते हैं। इस तरह देश की आबादी को गरीब रखने के लिए जिम्मेदार सत्ता ही आबादी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
आज भी शायद विज्ञान और टेक्नालॉजी ने मिलकर भारत के गरीब इंसानों जितनी सस्ती और उत्पादक कोई मशीन नहीं बनाई है, जो 30-35 रूपये रोज की खपत में आठ घंटे रोज पसीना बहाए। इसलिए भारत की आबादी को बोझ मानने के पहले यहां की मानवशक्ति की संभावनाओं को टटोलने की जरूरत है, जो कि सामने खड़ी हुई हैं, और देश के योजनाकारों, और यहां की सत्ता हांकने वालों को चुनौती दे रही हैं कि हिन्दुस्तानी जनता की ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करें, बजाय उन्हें बोझ साबित करने के। हिन्दुस्तानी जनता को दुनिया के रोजगार के लायक तैयार करके यहां की सरकारें बाहर होने वाली कमाई को देश में पा भी सकती हैं। केरल, आन्ध्र, पंजाब, गुजरात जैसे कई राज्य हैं जिनके बैंकों में प्रवासी भारतीयों के खातों से डॉलर आकर छप्पर फाड़कर गिरते हैं। और इंसानों की खपत के पर्यावरण के पहलू को देखें, तो भी इस देश की एक तिहाई गरीब आबादी जरा भी कुसूरवार नहीं है, और जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती है, वैसे-वैसे धरती के खिलाफ जुर्म भी बढ़ते चलता है। आबादी की बात करने वालों को यह भी सोचने की जरूरत है।

