मोदी सरकार का पहला बजट, टैक्स पर बड़ी बारीक चर्चा और मोटी टैक्स चोरी पर?

10 जुलाई 2014
संपादकीय
लोकसभा में अभी-अभी वित्त मंत्री अरूण जेटली ने मोदी सरकार का पहला बजट पेश किया है। उनको कुछ ही हफ्ते बजट बनाने के लिए मिले, और पिछले दस बरस की यूपीए सरकार की छोड़ी गई विरासत के साथ जुड़े हुए मिले। लेकिन इतना वक्त भी एक सोच को बताने के लिए काफी होता है, और एनडीए सरकार का नजरिया इस बजट में सामने आया है। हम आनन-फानन इसका विश्लेषण नहीं कर सकते, और उसके लिए अर्थव्यवस्था, टैक्स, योजना, और कारोबार के अधिक जानकार लोग अगले एक-दो दिनों में पोस्टमार्टम करेंगे, अभी हम यहां इसकी कुछ बातों पर ही लिख रहे हैं, जो कि बजट आने के घंटे भर के भीतर सामने आई हैं।
सरकार ने सिगरेट, तंबाकू के सामानों, पानमसाला, और कोल्डडिं्रक पर टैक्स बढ़ाया है, जो कि लोगों की सेहत को बचाएगा, और कुल मिलाकर राज्यों और केंद्र सरकारों के इलाज के खर्च को कम करेगा। लेकिन इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी बात यह है कि सेहत के बचाव के लिए जो प्रतिबंध राज्यों में सार्वजनिक जगहों को लेकर लगाए गए हैं, उन पर कोई अमल नहीं होता, और आज के बजट से टैक्स वसूली की जो संभावना बनती है, वह भी राज्यों में इन सामानों के बिना टैक्स बिकने की वजह से खत्म हो जाती है। इसलिए केंद्र सरकार के आंकड़े उन्हीं सामानों के उतने ही बिकने पर टिके हैं, जो कि राज्यों से आते हैं, लेकिन टैक्स बढऩे के साथ-साथ बिना टैक्स पटाए सामानों की बिक्री भी बढ़ेगी, और राज्यों का सरकारी ढांचा टैक्स से अधिक रिश्वत पर ध्यान देता है, इसलिए केंद्र सरकार को ऐसी तरकीब निकालनी होगी कि उसके तय किए हुए टैक्स की चोरी घट सके। ऐसी बात सिर्फ इन्हीं सामानों पर बढ़े टैक्स या आबकारी ड्यूटी की नहीं है, हर किस्म का टैक्स राज्य सरकारों के ढांचे की कमजोरी से भी कम आता है, और राज्यों के साथ मिलकर टैक्स चोरी, बिना बिल की बिक्री, बिना आबकारी शुल्क पटाए कारखानों से निकासी, इन बातों को रोकना होगा। दरअसल होता यह है कि बाजार में जो उत्पादक टैक्स देता है, उसका सामान टैक्स चोर के बनाए सामान के मुकाबले खासा महंगा हो जाता है। इसलिए सरकारी टैक्स को पटाना बहुत से लोगों को धंधे से बाहर का रास्ता दिखाने लगता है। कागज पर टैक्स के आंकड़ों को बढ़ाने से परे अगर असल में टैक्स वसूली कड़ी और ईमानदार हो जाए, तो ईमानदार कारोबारी बाजार में टिक सकेंगे। एक बुरा कारोबारी भले कारोबारी को बेरोजगार कर देता है। 
अरूण जेटली ने हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए एक हस्तकला-अकादमी बनाने की घोषणा की है, और इसके लिए तीस करोड़ रूपये बजट में रखे हैं। इस बात को हम इसलिए यहां छू रहे हैं, क्योंकि छत्तीसगढ़ का इलाका हस्तशिल्प से संपन्न इलाका रहा है, यह एक और बात है कि राज्य बनने के बाद सरकारी बुलडोजर ने संस्कृति और कला की परंपरागत शैलियों को कुचलकर रख दिया, और आज खुद सरकार हर दिन अतिथियों को छत्तीसगढ़ की कला के नाम पर जो उपहार देती है, उनका यहां के परंपरागत शिल्प से बहुत कम लेना-देना है। हम हस्तशिल्प को लेकर एक अकादमी के साथ-साथ हस्तशिल्प की मौलिकता और विशिष्टता को बनाए रखने के लिए एक अधिक असरदार संस्था की उम्मीद करेंगे, जो कि भारत से निर्यात के लिए मौलिकता की अनिवार्यता को बनाए भी रखे। इस बारे में राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर आंकड़ों और अनुदान से परे संवेदनशीलता के साथ सोचने की जरूरत है। 
बजट का विशेषज्ञ-विश्लेषण आए, उसके पहले हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि केंद्र सरकार को खुद अपने टैक्स विभागों के भयानक भ्रष्टाचार को रोकना चाहिए, और जहां कहीं सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते मिलें, उन पर कैद की कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स वसूली वाले विभाग ईमानदारों को परेशान करने के मौके नहीं छोड़ते, और बेईमानी बढ़ाने के रास्ते निकालने में खासा वक्त खर्च करते हैं। नतीजा यह होता है कि ईमानदारी एक अनचाहे बच्चे की तरह किनारे कर दी जाती है। यह चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि एक-दो फीसदी की कमी और बढ़ोतरी से जो बहस हो रही है, वह इस बात को छूती भी नहीं कि पचीस-पचास फीसदी टैक्स चोरी कैसे होती है? हमारा यह मानना है कि बजट में टैक्स चोरी को रोकने, आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए अलग से, जरूरत हो तो महंगे ही सही, एक ऐसे ढांचे को बनाने की जरूरत है जो कि देश की कमाई बढ़ाए, कालाधन घटाए, और देश की आर्थिक संस्कृति में ईमानदारी लाए।
बजट के और दूसरे पहलुओं पर बातचीत आने वाले दिनों में इसी पन्ने पर।

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