5 जुलाई 2014
संपादकीय
पिछले राज्यपालों के हटने के बाद नए राज्यपाल के आने को इस नजरिए से देखा जा रहा है कि अब भाजपा की पसंद के राज्यपाल राज्यों में जाएंगे, और भाजपा सरकारों वाले प्रदेशों में टकराव घटेगा, और गैरभाजपाई या गैरएनडीए राज्यों में मुख्यमंत्रियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकेंगी। भारत में पिछली आधी सदी में ऐसी दोनों किस्म की मिसालें दर्जनों रही हैं। यूपीए सरकार के मनोनीत छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त और एनडीए गठबंधन की मुखिया भाजपा के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बीच तालमेल देखने लायक था। शेखर दत्त की विदाई के समय सार्वजनिक रूप से इन दोनों प्रमुख लोगों ने एक-दूसरे के लिए जो बहुत ही खास दर्जे का परस्पर सम्मान दिखाया, वह देखने लायक था। औपचारिक बातों से परे भी छत्तीसगढ़ में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच का तालमेल बहुत ही लोकतांत्रिक था, और उससे राज्य का भला भी हुआ। दूसरी तरफ कई ऐसे राज्य इस देश में रहे, और हैं, जहां पर राजभवन और राज्य शासन के बीच लड़ाई अदालतों तक पहुंची हुई है, और जहां पर राजधानी मानो सांप-नेवले के बीच जंगी मुकाबला देखती रहती है।
भारत जैसे संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्य के संबंधों के बीच राज्यपाल की भूमिका एक नजरिए से देखने पर पूरी तरह गैरजरूरी भी लगती है, और अमूमन यह एक रस्मी रबर स्टाम्प सी लगती है। लेकिन जब तक राजभवन नाम की संस्था जारी है, तब तक कुछ बातों पर गौर होना चाहिए। एक तो यह कि राजभवन ऐसी संवैधानिक संस्था है जहां पर बैठे हुए लोग देश की राजनीति में एक-दूसरे से टकराती पार्टियों के बीच पक्षपाती होकर भारी तबाही भी ला सकती है, और राज्य सरकार का जीना मुश्किल कर सकते हैं। दूसरी तरफ अपने को मनोनीत करने वाले गठबंधन की राज्य सरकार होने पर वे राज्य सरकार के गलत कामों, गलतियों, और खामियों को अनदेखा भी कर सकते हैं, जो कि कुल मिलाकर लंबे वक्त में उस गठबंधन के राजनीतिक-चुनावी हितों के खिलाफ जाने वाली बात होती है। इसलिए कोई हिमायती राज्यपाल हमेशा अच्छा ही होता हो, वह भी जरूरी नहीं है।
जिस तरह राज्यसभा में स्तरहीन और खराब लोगों के जाने से इस देश में संसद की इज्जत गिरी है, उसी तरह राजभवनों में भ्रष्ट और दुष्ट लोगों के पहुंचने पर बहुत बुरा होता है। छत्तीसगढ़ में भी हमने कम से कम एक राज्यपाल ऐसा देखा है जिसने राज्य सरकार पर खासा दबाव डालकर लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को निलंबित करवाया था, और आखिर में जाकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अपने उस फैसले के लिए मुंह की खानी पड़ी थी। हमने उस वक्त भी लगातार राज्य सरकार दबाव में वैसा फैसला न करने के लिए आगाह किया था। इसी राज्यपाल के रहते हुए छत्तीसगढ़ राजभवन में कई किस्म की फिजूलखर्ची होती रही, और एक अहंकार सामने आते रहा। इसी राजभवन में एक ट्रस्ट बनाया गया, जिसके लिए प्रदेश के बड़े कारोबारियों से बहुत मोटी रकम ली गई, और उससे स्कॉलरशिप दी गईं। हमने उस ट्रस्ट के खिलाफ भी लगातार लिखा, और बाद में अगले राज्यपाल ने भारत के सॉलिसिटर जनरल की राय लेने पर हमारा लिखा हुआ तर्कसंगत और न्यायसंगत पाया, और पिछले राज्यपाल के उस ट्रस्ट को राजभवन से बाहर निकाल फेंका था।
पिछले राज्यपाल शेखर दत्त ने बस्तर के आदिवासियों की जिंदगी से जुड़े बहुत से मुद्दों पर राज्य सरकार से कड़ाई से कार्रवाई करवाई थी, खुद वहां का दौरा किया था, सरकार से जवाब-तलब किया था। संविधान में राज्यपाल को आदिवासियों की खास देखभाल करने का एक जिम्मा दिया गया है, और एक खास अधिकार भी उन्हें इसके लिए दिया गया है। राज्यपालों को चाहिए कि उनके राज्य में अगर आदिवासी समुदाय है तो उसकी तरफ खास ध्यान दें, बजाय राजभवन को पार्टीबाजी, या भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने के। बूटासिंह जैसे कुछ राज्यपाल ऐसे थे जिनके कुनबे का खुला भ्रष्टाचार खबरों में रहा। एन डी तिवारी ऐसे राज्यपाल थे जिनकी वीडियो क्लिप से आज भी इंटरनेट तपकर लाल है। ऐसे अलग-अलग बहुत से घटिया राज्यपाल भी हुए, और कुछ लोग बहुत शानदार और लोकतांत्रिक काम करके भी गए।
अब अगले पांच बरस में देश के अधिकतर राज्यपाल बदले जाएंगे। आधा दर्जन तो शायद इस हफ्ते ही नए-नए आ जाएंगे। इन सबको हम यह शुभकामना देते हैं कि अपने को मनोनीत करने वाली पार्टी या गठबंधन के बजाय वे लोकतंत्र के तहत उन्हें दी गई संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करें। छत्तीसगढ़ भी अपने राजभवन से ऐसी ही उम्मीद कर रहा है।

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