पेड़ों को काटने के बजाय दूसरी जगह लगाना सस्ता

6 जुलाई 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के बारे में काफी अरसे से सिर्फ बुरी खबरें ही आती रही हैं। लेकिन कल एक खबर आई जिससे वहां होने वाला एक अच्छा काम भी सामने आया। वहां सरकार ने पेड़ों को काटने के बजाय उनको उखाड़कर दूसरी जगह पहले से की गई तैयारी के तहत लगाने का फैसला लिया है। इन दिनों इंटरनेट पर, और मोबाइल फोन के वाट्सऐप पर एक ऐसा वीडियो चल रहा है जो कि नलकूप खोदने वाली रिग मशीन की तरह ट्रक पर चलने वाली एक मशीन का है, जो कि किसी भी पेड़ को गहराई तक जड़ और मिट्टी के साथ उखाड़कर, दूसरी जगह ले जाकर लगा देती है। यह काम इसी मकसद से बनी हुई मशीन से इतना आसान दिखता है, और बरसों पुराने पेड़ों का कत्ल होना भी इससे रूक सकता है। 
हम छत्तीसगढ़ के सिलसिले में इस बात को खासकर करना चाहते हैं कि यहां पर सरकारी योजनाओं, और निजी निर्माण, दोनों के लिए, और कारखानों-खदानों के लिए लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं। राजधानी रायपुर में जिन लोगों ने जिंदगी गुजारी है, उनको याद है कि हर सौ कदम पर पेड़ हुआ करते थे, और गर्मियों में उनके साये में रिक्शे-ठेले वाले रूककर सांस लेते थे। जिनसे सड़कों का शोर घटता था, हवा ठंडी रहती थी, और जिन पर पंछी भी बसते थे। स्कूल पैदल आने-जाने वाले गरीब बच्चे ऐसे पेड़ों के नीचे कुछ देर रूकते थे, और आंखों को सुकून भी मिलता था। अब राजधानी बनने के बाद चूंकि सरकार के पास शहरों को खूबसूरत बनाने के लिए बहुत बड़ा बजट है, और सत्ता पर बैठे लोगों का बड़ा उत्साह है, शहरी सड़कों को चौड़ा करने की बहुत बड़ी जरूरत है, इसलिए अंधाधुंध रफ्तार से राह में आने वाले हर पेड़ को काट गिराया गया है, और फिर चाहे उसी जगह क्यारियां बनाकर ऐसे पौधे लगाए गए हैं जिनमें पानी डालना जरूरी है। खैर, सरकार की फिजूलखर्ची और बर्बादी की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए हम उस पर गए बिना यहां महज पेड़ों की जिंदगी बचाने की बात करना चाहते हैं। 
छत्तीसगढ़ के शहरी विकास के लिए ही एक तरफ तो पेड़ों को रोड़ा समझकर लगातार उनका कत्ल होता है, और दूसरी तरफ नई सड़कों, या पुरानी सड़कों की नई चौड़ाई के लिए नए पेड़ लगाने के लिए बड़ी महंगी-महंगी कोशिशें होती हैं। गांव-गांव तक नलकूप खोदने वाली सरकारी मशीनें दौड़ती हैं, क्योंकि पानी न मिलने पर वोट डालने वाली जनता सरकार में खोट गिनाती है, और अगले चुनाव में सरकार जा सकती है। लेकिन धरती के पास कोई वोट नहीं है, और न ही पेड़ों के पास। इसलिए धरती को उजाडऩे, और पेड़ों को काटने के बजाय, बाजार में मौजूद रिग मशीनों जैसी मशीनें लाकर पेड़ों को हटाने की नौबत आने पर दूसरी जगह लगाने के काम को कोई जरूरी नहीं समझता। आज अगर हर पेड़ के हाथ सौ-सौ वोट हो जाएं, तो सरकारी नोट तुरंत निकलेंगे, और ऐसी मशीनें आ जाएंगी। 
हमारा यह मानना है कि शहरों की खूबसूरती बढ़ाना जितना जरूरी है, उससे बहुत अधिक जरूरी है धरती को उजडऩे से बचाना। और यह अपने आपमें एक गलत सोच है कि पेड़ों की जगह कांक्रीट लगाकर किसी जगह को खूबसूरत बनाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि अपने शहरी विकास के मद से तुरंत ही ऐसी मशीनों को खरीदे, और राज्य में बारी-बारी से अलग-अलग शहरों में इनका इस्तेमाल पहले से तय किया जाए। यहां हम कुदरत के साथ-साथ आंकड़ों की बात भी करना चाहेंगे कि सरकारी खर्च से किसी पेड़ को बीस बरस तक बड़े करने के बजाय ऐसी मशीनों से उसकी जगह बदलना बहुत अधिक सस्ता भी पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट कटे हुए पेड़ों का मुआवजा जमा करके उससे दुबारा पेड़ लगाने का जिम्मा राज्यों को देता है। केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के पास अब तक ऐसे दसियों हजार करोड़ जमा हो चुके हैं, और छत्तीसगढ़ के हिस्से भी इसमें से सैकड़ों करोड़ रूपए आने हैं। हमारा सुझाव है कि राज्य सरकार एक नीति बनाए कि किसी पेड़ को उसी हालत में काटा जाए जबकि आज बाजार में मौजूद तकनीक उसे बचा न सके। हर हाल में पेड़ों को दूसरी जगह लगाकर हमारी ही अगली पीढ़ी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

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