8 जुलाई 2014
संपादकीय
मोदी सरकार के पहले रेल बजट का प्रसारण अभी-अभी खत्म हुआ है, और इसका लंबा-चौड़ा विश्लेषण करने में कुछ वक्त लगेगा। अलग-अलग प्रदेशों की कितनी उम्मीदें पूरी होती हैं, और जनता के किस तबके को कितनी राहत मिलती है, कौन सी बातें बेहतर होती हैं, यह तो आने वाले दिन बताएंगे, क्योंकि आंकड़ों को क्वालिटी में तब्दील होने में खासा वक्त लगता है, और कई बार तो आंकड़े बस आंकड़े ही रह जाते हैं। लेकिन इस बजट की इक्का-दुक्का बातों को लेकर आज हम यहां कुछ चर्चा छेड़ रहे हैं, जो कि पूरे बजट पर आधारित नहीं है।
भारतीय रेल हिंदुस्तान के सबसे बड़े दो रोजगार देने वाले लोगों में से एक है। रेलवे और सेना, इन दोनों से बड़ा मालिक और कोई नहीं है। और सेना से तो जनता की जिंदगी जुड़ी नहीं रहती है, रेल से तकरीबन हर कोई जुड़े रहते हैं। ऐसी रेलगाड़ी और उसकी स्टेशनों को लेकर जनता के मन में दो किस्म के तनाव हमेशा बने रहते हैं। ट्रेन में रिजर्वेशन मिलेगा या नहीं, और ट्रेन-स्टेशन कितने गंदे मिलेंगे? अब देखा जाए तो इन दोनों बातों का बजट से कोई खास लेना-देना नहीं है, और पिछले बरसों में जो बजट थे, उनके भीतर भी ये दोनों काम आसानी से होने थे, लेकिन हिंदुस्तान रेलवे स्टेशन देश की सबसे गंदी जगहों में से एक बने हुए हैं, और टे्रन में रिजर्वेशन पाने से रिश्वत जुड़ी हुई सी है। आज हम बजट के सिलसिले में नहीं, बजट के मौके पर इस बहुत साधारण बात को याद दिला रहे हैं। और प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे रेलवे स्टेशनों को एयरपोर्ट की तरह साफ और सुविधाजनक बनाने वाले हैं, अगर ऐसा होता है तो मुसाफिरों के अच्छे दिन सचमुच आ जाएंगे। उसके बाद लोग अधिक भाड़ा देने का बुरा भी नहीं मानेंगे। इसके साथ-साथ रेलवे को अपने रिजर्वेशन से भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा, इस काम से जालसाजी खत्म करनी होगी, और देश की सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरत के हिसाब से भीड़ के महीनों में अतिरिक्त ट्रेनों का इंतजाम करना होगा।
एक दूसरी बात जो आज के बजट में कही गई है वह भी एक बिल्कुल नई सोच है, और पता नहीं क्यों रेल मंत्रियों ने आज तक ऐसा किया क्यों नहीं था। आज संसद में घोषणा की गई कि रेल विश्वविद्यालय खोला जाएगा। अब देश का सबसे बड़ा नौकरी देने वाले मंत्रालय अगर अपने पूरे तकनीकी कामकाज के लिए नौजवानों को शिक्षण-प्रशिक्षण देकर रेलवे के कामों के लिए तैयार करता है, तो इससे नौकरी देने के बाद की ट्रेनिंग की जरूरत खत्म होगी, और सीधे-सीधे रोजगार से जुड़ी हुई पढ़ाई हो सकेगी। इस सोच से ऐसा लगता है कि रेलवे को नए कर्मचारियों में बेहतर क्षमता और तकनीकी दक्षता मिलेगी, और देश को उसका फायदा मिलेगा।
रेलवे हिंदुस्तान में फौज के साथ-साथ सबसे बड़ी जमींदार भी है। उसके पास इतनी जमीन है कि उसके कारोबारी इस्तेमाल से बहुत बड़ी कमाई हो सकती है। लेकिन हमारा मानना है कि ऐसी कमाई एक बार ही हो सकती है, और उसे रेलवे को एक बार ही लगने वाली लागत में इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ-साथ रेलवे बहुत से बड़े स्टेशनों को देश के प्रमुख विमानतलों की तर्ज पर निजीकरण से विकसित करना चाहती है, और इसमें पूंजीनिवेश करने वाले ठेकेदार वहां से कमाई करके अपनी लागत की भरपाई भी करेंगे। इसमें कोई बुराई नहीं है, अगर इससे जनता को बेहतर सुविधा मिलती है।
हम रेल बजट को किसी एक राज्य को मिलने वाले फायदे के साथ देखकर जोडऩा नहीं चाहते, क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक जनता को आना-जाना पड़ता है, और उसके लिए सिर्फ अपने राज्य की रेल सुविधाएं काफी नहीं होतीं। इसलिए पूरे देश में अगर रेल सुविधाओं में एक उत्कृष्टता आती है, तो वह अधिक महत्वपूर्ण बात होगी। इस बजट के बाकी पहलुओं पर हम आने वाले दिनों में फिर लिखेंगे।

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