पाखंड से उबरे बिना भारत में बलात्कार थमना संभव नहीं

8 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में हुए एक बलात्कार को लेकर एक बार फिर देश की राजधानी की सड़कें और देश का मीडिया उबल रहे हैं। और यह सिलसिला साल में दो-चार बार का हो गया है, और हम भी इस मुद्दे पर साल में दो-चार बार इस जगह पर लिख देते हैं। लेकिन सरकारी इंतजाम से परे कुछ और चीजों पर भी बात करने की जरूरत है जो कि हो नहीं पा रही है। 
भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे समाज में सुधारे बिना ये बलात्कार थमने वाले नहीं हैं। पुलिस हर बलात्कारी को पहचान कर जुर्म के पहले नहीं रोक सकती। और आज के कामकाजी जमाने में महानगरों में महिलाओं को काम करके देर रात लौटना पड़ता है, शहरी जिंदगी में पार्टियों से देर रात आवाजाही होती है, और शहरों से दूर गांव-जंगल में लड़कियों और महिलाओं को रात-बिरात अंधेरे में पखाने जाने के लिए गांव के बाहर सुनसान जगहों पर जाना पड़ता है। स्कूलों में लड़कियां और बच्चियां वहां के शिक्षकों और कर्मचारियों के हवाले रहती हैं, आते-जाते बस के ड्राइवर और कंडक्टर के साथ रहती हैं, और घर पर पड़ोसियों और रिश्तेदारों की पहुंच के भीतर रहती हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की पुलिस मिलकर भी हिन्दुस्तान के बलात्कारों को नहीं रोक सकतीं। केवल एक ही चीज बलात्कारों को कम कर सकती है, वह यह कि भारतीय महिलाओं के अधिकार पुख्ता किए जाएं, समाज में उनको सम्मान दिया जाए। और यह काम किसी कानून को लागू करने के मुकाबले हजार गुना अधिक मुश्किल है, बल्कि नामुमकिन सा है। 
हम देखते हैं कि भाजपा और हिन्दू संगठनों के कई कट्टरपंथी भगवाधारी लोग महिलाओं के खिलाफ जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें करते हैं, वैसी अवैज्ञानिक सोच देश के लोगों को महिला-सम्मान से परे ले जा रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम ममता बैनर्जी जैसी पढ़ी-लिखी और आधुनिक-लड़ाकू महिला को देखते हैं तो वह भी बलात्कार के मामलों में महिला विरोधी बयान देती हैं, पश्चिम बंगाल के कई वामपंथी नेता भी दकियानूसी और कट्टरपंथी बयान देते हैं। महिला के सम्मान को लात मारते हुए जब बलात्कार के एक आरोपी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना मंत्री बनाते हैं, तो देश भर में यह संदेश जाता है कि बलात्कार बुरा नहीं है, और उससे अधिक कोई नुकसान नहीं होता। यह नौबत बदलने के लिए देश के हर ताकतवर तबके और इंसान को समाज की जुबान, समाज की कहावतें, सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए सम्मान और अनुपात की जगह, ऐसे सैकड़ों काम करने पड़ेंगे। किसी औरत को हिन्दुस्तानी समाज में इज्जत दिलाना आसान काम नहीं है, जहां कि उसे पांव की जूती समझा जाता है, जहां उसे पैदा होने के पहले मार डालने लायक पाया जाता है, जहां उसे बचपन में शादी करके बिदा कर देने, कम दहेज लाने पर प्रताडि़त करने और मार डालने तक को जायज माना जाता है। 
हम बात को सिर्फ बलात्कार तक सीमित रखना नहीं चाहते और देश की सोच को वैज्ञानिक बनाने की तरफ बढ़ाने की वकालत करते हैं। आज भारत में जिस अंदाज में पौराणिक काल और वैदिक काल के नामौजूद विज्ञान को स्थापित करने की पाखंडी कोशिश चल रही है, उस तरह की भारत सरकार की कोशिशों के चलते हुए इस देश में महिलाओं का दर्जा वही बने रहेगा जो कि वैदिक काल में था। समाज में वैज्ञानिक और सुधारवादी सोच किस्तों और टुकड़ों में नहीं आती, वह एकमुश्त ही आती है। और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार के बहुत से लोगों को यह गलतफहमी हो रही है कि वैदिक धर्मान्धता की पाखंडी बातों को करने से वोटर हिन्दुत्व के साथ जुड़े रहेंगे। आज हकीकत यह है कि देश के वोटरों का एक बड़ा हिस्सा शहरी जिंदगी के चलते हुए ऐसे पाखंड से बाहर आ चुका है, और भाजपा को पिछले आम चुनाव में अपनी जीत को ऐसे किसी पाखंड की वजह से हुई जीत नहीं मानना चाहिए। वह जीत यूपीए की बदहाली और उसके दीवालियापन की हार थी, उसे अपनी जीत मानकर अगर पूरे देश में कट्टरता और पाखंड का एक एजेंडा अगर बढ़ाया जाएगा, तो वह आगे जाकर भाजपा को चुनावी नुकसान भी देगा। आज देश में सभी को मिलकर पाखंड से उबरने की जरूरत है। 

सरकार सफर सुरक्षित रखने का इंतजाम नहीं कर सकती?

7 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में कल एक बार फिर वहां पर बलात्कार के प्रचलित हो चले एक तरीके से बलात्कार हुआ। रात एक अकेली लड़की टैक्सी में घर लौट रही थी, और टैक्सी ड्राइवर ने उससे बलात्कार किया। इसे लेकर देश की राजधानी में यह सवाल खड़ा हो रहा है कि जो शहर चौबीसों घंटे काम करता है, उसमें आने-जाने के लिए क्या लड़कियों और महिलाओं को कोई सुरक्षित बस या टैक्सी सेवा नहीं मिल सकती? 
दिल्ली एक बड़ा शहर तो हो गया है, लेकिन वहां की मेट्रो रेल सेवा को छोड़ दें, तो सड़कों पर लोगों का बर्ताव परले दर्जे का बदतमीज लगता है, और महिलाओं के लिए, बच्चों के लिए किसी तरह की इज्जत लोगों की बातचीत में नहीं दिखती है। लोगों की जुबान गालियों से भरी हुई है, और इस बात का अंदाज किसी को नहीं रहता कि आसपास के कुछ लोगों को यह गालियां बुरी भी लगती होंगी। दिल्ली की बसों और सार्वजनिक जगहों में महिलाओं के साथ शारीरिक बदसलूकी, उनके बदन से छेडख़ानी इतनी आम बात है कि वहां रहने वाली शायद ही कोई लड़की या महिला इस हिंसा से बच पाती हो। लेकिन लोगों के मिजाज को बदलना एक मुश्किल काम है और अकेली सरकार शायद यह न कर पाए। लेकिन दूसरी तरफ मंगल पर अपना यान भेजने वाला हिंदुस्तान अगर अपने शहरों में लोगों की आवाजाही के लिए एक सुरक्षित तरीका नहीं बना सकता है, तो फिर दिल्ली पूरे देश के लिए ऐसी ही बुरी मिसाल बनी रहेगी। बलात्कार होते रहेंगे, दिल्ली में मौजूद टीवी कैमरे उनको बाकी देश के ऐसे हादसों के मुकाबले हजार गुना अधिक दिखाते रहेंगे, और महिला संगठन सड़कों पर रहेंगे। 
हमको हैरानी यह है कि मोबाइल फोन पर गप्पें मारने के लिए दुनिया भर की कंपनियां हर दिन तरह-तरह के एप्लीकेशन पेश करती हैं, लेकिन भारत में 21वीं सदी की कामयाबी के हवाई दावों के बाद भी एक ऐसा इंतजाम नहीं हो पाया है कि रात-बिरात अकेले सफर करती लड़की के फोन के साथ पुलिस का कोई ऐसा नाता जुड़ सके कि पुलिस को उसकी हिफाजत की खबर होती रहे। हमारी बहुत साधारण तकनीकी समझबूझ और आज की फोन की सुविधा से हमारे लिए यह सोचना आसान सा काम लग रहा है कि अकेले सफर करती महिलाएं अपने फोन के मार्फत एक संदेश भेजकर पुलिस के एक ऐसे नेटवर्क से क्यों नहीं जोड़ी जा सकतीं जिससे कि उनके सफर पूरे होने तक उनकी आवाजाही पुलिस को स्क्रीन पर एक संकेत के रूप में दिखती रहे, और उसमें कहीं भी गाड़ी थमने पर पुलिस को उस फोन नंबर के साथ तुरंत यह अलर्ट मिल जाए कि गाड़ी अचानक थम गई है। हमारी जानकारी और समझ के मुताबिक यह एक मुश्किल काम इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि बरसों से दुनिया की टैक्सी कंपनियां ऐसा कर रही हैं, और उनको अपनी गाडिय़ों की रफ्तार भी जरूरत से अधिक बढऩे पर दफ्तर में बैठे हुए कम्प्यूटर पर पता लग जाता है। 
भारत सरकार को देश भर के एक ऐसा चौकसी-नेटवर्क विकसित करना चाहिए जो कि टेलीफोन सेवाओं, इंटरनेट और जीपीएस जैसे लोकेशन बताने वाले एप्लीकेशन से जुड़े हुए हों, और कोई भी नागरिक एक एसएमएस करके पुलिस को खबर कर सकें कि वे अकेले सफर कर रहे हैं, और उन पर नजर रखी जाए। यह काम हमको जरा भी मुश्किल नहीं लग रहा है, और इससे जुर्म कम करना मुमकिन लगता है। कम्प्यूटर मुसाफिर के मोबाइल की लोकेशन के हिसाब से ही ऐसी गाडिय़ों की रफ्तार की रफ्तार पर नजर रख सकेगा, और गाड़ी अचानक थमने पर कम्प्यूटर सतर्क कर देगा।
आज भी मोबाइल फोन पर ऐसी सहूलियत हासिल है कि फोन की दो बटनों को एक साथ दबाने पर लोकेशन के साथ खतरे का संदेश पहले से डाले गए फोन नंबरों पर चले जाता है, और मोबाइल के दोनों कैमरे कुछ-कुछ सेकंड में तस्वीरें खींचकर पहले से डाले गए ऐसे करीब आधा दर्जन नंबरों पर भेजते रहते हैं। यह सुविधा फोन के कुछ मॉडलों पर आज भी आम है, और इसी को आगे बढ़ाकर सरकार एक अधिक आसान इंतजाम कर सकती है। मोदी सरकार को ऐसी पहल करनी चाहिए।
लगे हाथों यहां पर यह याद दिलाना भी ठीक होगा कि जिस अंतरराष्ट्रीय कंपनी की टैक्सी सर्विस की गाड़ी में दिल्ली में कल यह बलात्कार हुआ, वह जीपीएस जैसी आम तकनीक से भी अपनी कंपनी से जुड़ी हुई नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में कारोबार के पहले सुरक्षा के ऐसे इंतजाम करने की शर्त लगाना चाहिए जो कि उन कंपनियों के अपने देशों में पहले से लागू हैं। 
और एक आखिरी बात यह कि कल की इस वारदात में जो लड़की बलात्कार की शिकार हुई है उसके बारे में आई शुरुआती खबरों में यह है कि वह दफ्तर के बाद एक पार्टी से होते हुए अकेले देर रात घर लौट रही थी, और शायद नशे में भी थी। हो सकता है कि ये जानकारियां गलत हों, और किसी का अपमान करना बिना उसका नाम लिए या शिनाख्त जाहिर किए मुमकिन भी नहीं है, इसलिए हम यहां महज यह सलाह देना चाहते हैं कि जब तक देश का माहौल नहीं सुधरता है, और महिलाओं की सुरक्षा कायम नहीं हो पाती है, तब तक हर किसी को अपने-आपको भी बचाकर रखना चाहिए। हमारा यह लिखने का यह मकसद बिल्कुल भी नहीं है कि बलात्कार को रोकना सरकार और समाज का, आदमियों का काम नहीं है, और खुद महिलाओं को ही इसे रोकना चाहिए। लेकिन हम देश की आज की हकीकत को देखते हुए सावधान रहने की समझदारी को महिला विरोधी सलाह नहीं कहेंगे, और सबको सावधान रहने को कहेंगे।

नक्सल इलाकों में ज्यादती पर सामाजिक समझ की जरूरत

संपादकीय
6 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मोर्चे पर लड़ रहे और कई शहादत दे चुके सुरक्षा दस्तों के बर्ताव को लेकर कई तरह के संदेह हमेशा से हवा में रहते हैं। पहले कई मानवाधिकार संगठन और आंदोलनकारी उस इलाके में सक्रिय रहते थे, और वर्दीधारियों की ज्यादती के मुद्दे उठाते थे। ऐसे आंदोलनकारियों की नीयत और मकसद को लेकर सरकार की तरफ से, और कई राजनीतिक ताकतों की तरफ से यह शक किया जाता रहा है कि क्या वे नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक-युद्ध में मददगार निहत्थे हमख्याल लोग हैं, या बस्तर में सचमुच मानवाधिकार का उतना बुरा हाल है? उनके अलावा मीडिया का एक तबका भी इस खतरनाक इलाके में पहुंचकर लोगों से बात करके दुनिया के सामने अपनी देखी हकीकत रखते आया है, और कुछ लोगों को ऐसा भी शक है कि उनकी देखी हकीकत दरअसल वही होती है जो कि उन इलाकों पर काबिज नक्सली दुनिया के सामने रखना चाहते हैं। हो सकता है कि सच इनमें से कोई भी बात हो, और यह भी हो सकता है कि कहीं पर इनमें से एक बात लागू होती हो, और कहीं पर दूसरी बात। 
शहरी मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं, और नक्सल खबरों को इश्तहार के बाजार के लोग कोई खास पसंद नहीं करते। इसलिए किसी वारदात के बाद की खबरों से परे बाद में अधिकतर मीडिया अधिक कुछ दिखता नहीं है। ऐसे में नक्सल बंदूकों और केन्द्र-राज्य सरकारों की वर्दीधारी बंदूकों के पीछे की गोलीबारी में फंसे हुए बस्तर के लगभग बेजुबान इन लोगों का सच इन्हीं के साथ दफन होने का खतरा अधिक दिखता है। राज्य में मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल कल्याण परिषद जैसी संवैधानिक संस्थाएं बस्तर की किसी भी खूनी मुठभेड़ के बाद राजधानी में अपनी-अपनी आरामगाह में अपनी चुप्पी और अनदेखी जारी रखती हैं। और वहां के लिए जो न्यायिक जांच घोषित होती है, उसका बरसों बाद भी क्या हाल रहता है यह इसी जगह पर हम दो-चार बार लिख चुके हैं, और इतिहास उसे दर्ज भी कर चुका है। 
अब सवाल यह उठता है कि जब मानवाधिकार आंदोलनकारी या तो सरकारी रूख के चलते बस्तर से हट से गए हैं, और छत्तीसगढ़ में भी मानवाधिकार आंदोलन कई वजहों से अपनी साख खो चुका है, तब बेजुबान लोगों पर ज्यादती के मुद्दों को आखिर कौन उठाए? फिर इन इलाकों में मीडिया के लिए काम करने वाले लोगों के साथ भी कुछ किस्म की दिक्कतें रहती हैं। नक्सलियों ने मीडिया के लोगों को बहुत सीधे-सीधे तो निशाना नहीं बनाया है, लेकिन एक तरफ नक्सली और दूसरी तरफ पुलिस, इनके बीच किसी भी तरफ के मुखबिर होने की तोहमत का खतरा मीडिया पर रहता है, और गांव-जंगल की जिंदगी में वहां रहते हुए कौन किससे कितना बैर निभा सकता है, यह सोचना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन हम यह कोशिश करते हैं कि जब भी कोई भरोसेमंद अखबारनवीस इन इलाकों तक पहुंचकर वहां की खबर लेकर आए, और उसमें आदिवासियों का पक्ष हो, तो हम उसे छापना चाहते हैं, चाहे उस पर यह आरोप ही क्यों न लगे कि नक्सली दबाव में ग्रामीण पुलिस के खिलाफ बयान देते हैं। हमारा यह मानना है कि देश के प्रधानमंत्री को अपनी बात कहने का जितना हक है, उतना ही हक बस्तर के एक कमजोर आदिवासी को भी होना चाहिए, और उसकी बात पर अविश्वास की कोई वजह तब तक नहीं होनी चाहिए, जब तक कि वैसा सुझाने वाला कोई सुबूत सामने न हो। 
हम सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि अपनी पुलिस को ही अकेला सच मानने के बजाय उसे सामाजिक और राजनीतिक लोगों से भी ऐसे गांव जंगल की हकीकत का अंदाज लगवाना चाहिए। वहां लड़ाई लड़ रही पुलिस की अपनी एक सोच हो सकती है, और पुलिस कई किस्म की कहानियां भी गढ़ सकती है, ठीक उसी तरह जिस तरह की नक्सली या उनके समर्थक भी गढ़ सकते हैं। इसलिए सरकार को अपनी मशीनरी से परे जाकर सूचना के कुछ स्वतंत्र और निष्पक्ष स्रोत भी विकसित करने चाहिए, जिससे कि उसे अपनी खुद की वर्दियों की हकीकत भी मालूम हो सके। सरकार के लिए यह काम तो आसान हो सकता है कि वारदात के बाद, हर मुठभेड़ के बाद, हर आरोप के बाद वह अपने लोगों के साथ जमकर खड़ी रहे, ताकि उनका मनोबल बना रहे। लेकिन अपनी वर्दियों के मनोबल को बनाए रखने के लिए अगर बस्तर के बेजुबान आदिवासियों की बात को भी राज्य और केन्द्र की सरकारें नहीं सुन पाएंगी, तो यह अपने आपमें नक्सल हिंसा के जारी रखने की एक वजह होगी। नक्सल आंदोलन सिर्फ पुलिस के सुलझाने वाला मुद्दा नहीं है, इस बारे में सरकार को एक सामाजिक समझ से ही काम लेना चाहिए, और प्रदेश के सबसे भले, सबसे सीधे आदिवासी तबके पर किसी भी तरफ से होती ज्यादती को रोकना चाहिए। 

जब जुर्म करते पकड़े गए तो तबके की रियायत मांगी

5 दिसंबर 2014
संपादकीय
केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति को लेकर चल रहा विवाद जारी है, और उस मुद्दे पर हम यहां दुबारा लिखते हुए बातों को दुहराना नहीं चाहते, बस इतना चाहते हैं कि आज साध्वी को बचाने के लिए एक केन्द्रीय मंत्री ने यह तर्क दिया है कि चूंकि साध्वी दलित हैं, इसलिए उन पर हमले हो रहे हैं। यह बचाव बहुत ही लचर, अनैतिक, और राजनीतिक बचकानेपन का है। जो साध्वी हिन्दू धर्म की ऐसी जानकार होकर, भगवा पोशाक में एक आक्रामक भाषण दे रही है, और जिसकी तमाम सोच ब्राम्हणवादी-सनातनी हिन्दू सोच है, उसके दलित होने का तर्क देकर उसे बचाना बहस को पटरी से उतारने जैसा है। किसी के दलित होने का फायदा उसे तभी दिया जा सकता है, जब उसकी सोच दलित-कल्याण की सोच हो, और यह भगवा-मंत्री तो जिस सोच को सोच-समझकर सामने रख रही है, वह तो हिन्दू समाज के उसी तबके की सोच है जिसकी वजह से दलितों को हिन्दू धर्म छोड़कर कहीं बौद्ध बनना पड़ा, कहीं मुस्लिम बनना पड़ा। इसी बहस में एक जानकारी यह भी आई है कि केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने जो बचाव सामने रखा है, वह सही नहीं है, और यह साध्वी दलित न होकर ओबीसी तबके की है। लेकिन हम अभी इस विवाद में नहीं जा रहे, और हम सिर्फ इस सोच पर लिख रहे हैं। 
एक बहुत पुरानी बात है जब क्रिकेट खिलाड़ी मो. अजहरूद्दीन के खिलाफ क्रिकेट की मैच फिक्सिंग या सट्टेबाजी का एक केस सामने आया था, और अजहर ने अपने बचाव में यह कहा था कि वे मुस्लिम हैं इसलिए उनके खिलाफ दुर्भावना से केस दर्ज किया गया है। हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह जाति और धर्म के आधार पर, रंग और नस्ल के आधार पर भारत से लेकर अमरीका तक भेदभाव पर लिखा था, लेकिन वह भेदभाव इन तबकों के कमजोर लोगों पर लागू होता है, इन तबकों के संपन्न और ताकतवर लोगों पर नहीं। ताकतवर लोग तो ऐसे भेदभाव के खिलाफ अदालत तक जाकर लडऩे की ताकत रखते हैं जैसे कि आज के इस मामले में यह साध्वी-मंत्री रखती है। 
अब सवाल यह है कि पूरे देश पर हमला करने के लिए जो साध्वी संविधान के खिलाफ जाकर, सज्जनता के खिलाफ जाकर, घोर साम्प्रदायिक हिंसा की बात न सिर्फ मंच और माईक से कहती है, बल्कि बाद में टीवी कैमरों के सामने भी कहती है, और आखिर में घिर जाने पर संसद में बिना मन से और आधी जुबान से माफी मांग लेती है, वह आज अचानक दलित होने की रियायत की हकदार कैसे हो सकती है? ऐसे हमलावर लोग चाहे जिस तबके के हों, अपने तबकों को बदनाम ही करते हैं। खासकर जब किसी का तबका किसी रियायत का हकदार होता है, तब अगर वैसे लोग कोई जुर्म करते हैं, हिंसक और अश्लील बात करते हैं, तो अपने पूरे के पूरे तबके को बदनाम करते हैं, और आरक्षण का फायदा पाने का हकदार समझा जाने वाला तबका ऐसे कुछ गिने-चुने हिंसक लोगों के जुर्म से बदनाम होता है। हमारा यह मानना है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था में आरक्षित तबकों के खिलाफ गैरआरक्षित तबकों का सदियों पुराना एक पूर्वाग्रह चले आ रहा है, और ऐसे पूर्वाग्रह के चलते सवर्ण तबका हर वक्त यह साबित करने के फेर में रहता है कि आरक्षित तबके के लोग हक के लायक नहीं हैं, लीडरशिप के लायक नहीं हैं। ऐसे में इन तबकों को अपने वर्गहित में, अपने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक समझदारी और जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। 
कल नरेन्द्र मोदी ने संसद से अपील की थी कि वे इस साध्वी मंत्री के माफीनामे को मान ले और संसदीय काम को आगे चलने दे। ऐसे में उन्हीं के एक दूसरे मंत्री आज जब एक दलित तर्क को लेकर  विपक्ष पर पूर्वाग्रह का आरोप लगा रहे हैं, तो वे साध्वी के जुर्म को तो कम नहीं कर रहे, अपने प्रधानमंत्री की अपील के वजन को जरूर खत्म कर रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग जिम्मेदारियों की कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें इस तरह की वर्ग, जाति, धर्म, नस्ल, और रंग आधारित रियायत नहीं दी जा सकती। और यह साध्वी मंत्री अपने कई दूसरे मंत्री साथियों की हिंसक और साम्प्रदायिक बातों को लगातार दुहराने वाली रही हैं, और उनके बचाव में एक दलित तर्क का इस्तेमाल सारे दलित तबके का अपमान है। अब इस बहस को हम तथ्यों के लिए छोड़ देते हैं कि वे दलित हैं, या ओबीसी हैं। और भारत में ऐसे तमाम तबकों के गैरराजनीतिक नेताओं को भी चाहिए कि वे अपने तबकों का ऐसा इस्तेमाल होने पर उसके खिलाफ आवाज उठाएं कि मुजरिम इन तबकों को अपनी ढाल की तरह इस्तेमाल न करें। 

मोदी दुनिया भर में महानता की बातें करें, और उनके मंत्री...

संपादकीय
4 दिसंबर 2014
केन्द्र सरकार की एक मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर संसद दो दिनों से थमी हुई है, और उन्होंने संसद में माफी भी मांगी, और प्रधानमंत्री ने भी संसद से अपील की कि वहां बैठे हुए महान लोग माफी के प्रति नर्म रूख दिखाएं, और देश के बाकी मुद्दे संसद में आगे बढऩे दें। हम किसी भी मुद्दे को लेकर संसद को रोकने के खिलाफ रहते आए हैं, और इस मुद्दे पर भी संसद को रोकना कोई इलाज नहीं है। लेकिन संसद के बाहर इस साध्वी द्वारा भगवा कपड़ों के भीतर से दिए गए इस बहुत ही हिंसक और अश्लील बयान का जुर्म संसद के बाहर अदालत में आसानी से साबित किया जा सकता है। हमारा यह भी मानना है कि देश की अदालतें ऐसे मामलों को सुनने के लिए तैयार रहती हैं, और अदालती इलाज अभी खत्म नहीं हुआ है कि संसदीय इलाज की जिद पर संसद को रोक दिया जाए। हम तो इस बात को अच्छा मानते हैं कि इस साध्वी ने यह बयान संसद के बाहर दिया जिस पर कि उसके खिलाफ जुर्म कायम हो सकता है, और अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता है, अगर वह यह बात संसद के भीतर कहती तो उस पर कुछ भी नहीं हो सकता था। संसद के भीतर होने वाले बड़े-बड़े जुर्म, रिश्वतखोरी और खरीदी-बिक्री पर भी देश का कानून लागू नहीं होता, इसलिए यह तो अच्छा हुआ कि ऐसी हिंसक और घोर साम्प्रदायिक सोच रखने वाली मोदी की इस मंत्री ने यह गलत काम संसद के बाहर किया है, और अब वह देश के कानून के प्रति जवाबदेह है। 
लोगों को दो दिन पहले की इस बकवास की याद दिला दें कि दिल्ली में एक आमसभा के मंच से माइक पर इस भगवाधारी साध्वी-मंत्री ने कहा कि अब यह दिल्ली की जनता को चुनना है कि वह रामजादों की सरकार चाहती है या हरामजादों की। हम इस गाली को यहां पर इसलिए दुहरा रहे हैं कि इसके जिक्र के बिना इसके पीछे की हिंसा और साम्प्रदायिकता को समझना मुमकिन नहीं है। इस साध्वी को हम सजा का हकदार किसलिए मानते हैं, वह बताने के लिए भी इन गालियों का यहां पर जिक्र जरूरी है। भारत के संविधान में इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बताया गया है। लेकिन हिन्दू हमलावर सोच को बढ़ावा देने वाले कई संगठन और कई नेता लगातार इस सोच को बढ़ाते हैं कि इस देश में सिर्फ हिन्दुओं को रहने का हक है, मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए, यहां रहने वाले हर धर्म के लोग सिर्फ हिन्दुओं की औलादें हैं, और हिन्दुस्तान में रहना है तो जय श्रीराम कहना होगा, ऐसे अलग-अलग बहुत किस्म के नारे लगाने वाले लोग मोदी की सरकार आने के बाद से यह मान बैठे हैं कि उनकी साम्प्रदायिकता के अच्छे दिन आ गए हैं। लेकिन ऐसी सोच हिन्दुस्तान में कई बार उफान पर आई है, और झाग के बुलबुलों की तरह वक्त के साथ-साथ बैठ भी गई है। इस साध्वी के कहे हुए दो शब्द तो अखबारी सुर्खियों में आए हैं, लेकिन उसने इस बयान के बाद टीवी कैमरों के सामने बात करते हुए अलग से जो बातें कही हैं, वे घोर हिंसक साम्प्रदायिकता के दावे वाली हैं, और नरेन्द्र मोदी को उसके बारे में भी सोचना चाहिए। 
अब हम इन दो शब्दों पर आते हैं। रामजादों का मतलब राम की संतानों से है, और इसमें से बाद का आधा हिस्सा गैरहिन्दी, उर्दू जुबान का है। राम के नाम के साथ यह एक नया प्रयोग है, और ऐसी तुकबंदी एक गाली के साथ जोड़ बिठाने के लिए की गई है। अब हरामजादों शब्द का मतलब देखें, तो शादी से परे की जो औलाद होती है, वैसे बच्चों को हराम की औलाद या हरामजादा कहा जाता है। अब धर्म का भगवा ओढ़ी हुई एक साध्वी तमाम गैरहिन्दुओं को हरामजादा कह रही है, तो यह बात महज बाद में माफी मांग लेने के लायक नहीं है, नरेन्द्र मोदी को इस सोच के बारे में खुलासा भी करना चाहिए। फिर लगे हाथों हम साम्प्रदायिकता वाली हिंसक गाली-गलौज से परे एक बात और कहना चाहते हैं। न सिर्फ उर्दू में, बल्कि हिन्दी और अंग्रेजी जुबान में भी विवाह से परे के बच्चों को हरामजादा कहने के लिए अलग-अलग शब्द हैं। हम इस गाली के ही खिलाफ हैं। पैदा होने वाला हर बच्चा एक मासूम होता है, और बेकसूर होता है। वह चाहे शादी के बाद पैदा हो, या शादी से परे पैदा हो, इसमें उसका कोई कुसूर नहीं होता। और समाज के रिवाज के तहत अगर किसी बच्चे को नाजायज, अवैध, हरामजादा या बास्टर्ड कहा जाता है, तो यह गाली ही पूरी तरह से नाजायज और हिंसक है। इस शब्द का इस्तेमाल सभ्य समाज में वैसे भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि समाज के रीति-रिवाज जायज और नाजायज हो सकते हैं, लोगों के रिश्ते जायज और नाजायज हो सकते हैं, लेकिन अपने खुद के काबू से परे कोई बच्चा अगर पैदा हो रहा है, तो वह बच्चा किसी तरह नाजायज नहीं हो सकता। 
कुल मिलाकर हम संसद को चलने देने के पक्ष में हैं, इस साध्वी के खिलाफ अदालत में खूब कड़ी लड़ाई के पक्ष में हैं, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी खुद की सरकार की इज्जत के लिए, और देश की इज्जत के लिए इस मंत्री को तुरंत बाहर का दरवाजा दिखाना चाहिए, और पूरे देश से अपनी मंत्री की ऐसी जुबान के लिए सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। ऐसा करके वे अपना कद बढ़ा सकते हैं, और ऐसा करने वाले उनके साथी उनके कद को पहले ही कम तो कर ही चुके हैं। वे घूम-घूमकर देश और दुनिया में महानता की बातें करें, और उनके साथी पूरे देश के तमाम गैरहिन्दुओं को हरामजादा कहें, तो इससे नरेन्द्र मोदी की कोई वाहवाही नहीं बढ़ सकती। 

पिटाई करने वाली बहनों के दो वीडियो से उठी बात

संपादकीय
3 दिसंबर 2014
हरियाणा की दो बहनों का एक वीडियो सामने आया जिसमें कि वे बस में एक लड़के को बुरी तरह से पीट रही हैं। इसके बारे में बताया गया कि इन लड़कों ने छेडख़ानी की थी, और लड़कियों ने हौसले के साथ उनको खुद ही मारा। इस बात पर भी सवाल उठाए गए कि बस के बाकी मुसाफिरों ने इन लड़कियों का साथ नहीं दिया। बात की बात में हरियाणा सरकार ने इन लड़कियों का सम्मान करने की घोषणा कर दी, और केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने बयान दिया कि देश की बाकी लड़कियों को भी ऐसा ही हौसला दिखाना चाहिए। इस वीडियो को दिखा-दिखाकर देश के मीडिया ने टीवी और अखबारों में इस बहादुरी की तारीफ की। लेकिन अगले दिन एक और वीडियो सामने आया जिसमें ये ही दोनों बहनें एक बगीचे में एक और लड़के को बुरी तरह से पीट रही हैं। फिर बस में मार खाने वाले लड़के की तरफ से कुछ लोगों ने बताया कि झगड़ा छेड़छाड़ का नहीं था, वह सीट नंबरों को लेकर झगड़ा था, जिसे छेडख़ानी की शक्ल देकर इन बहनों ने उस लड़के को बेल्ट उतारकर पीटा। इन लड़कियों के गांव वालों के बयान सामने आए कि उन्होंने पहले भी बहुत से लोगों से ऐसी मारपीट की है। 
मौके पर खड़े-खड़े इंसाफ करने का अंदाज खतरनाक होता है। उनमें कभी तो किसी मुजरिम को सजा मिल जाती है, जिससे कि अदालत में शायद गुनहगार साबित नहीं किया जा सकता। लेकिन दूसरी तरफ इसमें बहुत से ऐसे बेगुनाह फंस सकते हैं जो कि भीड़ की बददिमागी से, या गलतफहमी से किसी शक में घिर गए हैं, और मौके पर इंसाफ की सजा पा रहे हैं। भीड़ की मार देखने में बहुत अच्छी लगती है, और तब तक ही अच्छी लगती है जब तक वह अपने सिर पर न पड़ती हो। छेड़छाड़ की शिकार हो, या गलतफहमी की शिकार, किसी लड़की का हमला हो, या किसी दूसरे मामले में सड़क पर से पीटते हुए ले जाती पुलिस हो, भीड़ का इंसाफ खतरनाक इसलिए होता है कि वह लोकतंत्र की सारी प्रक्रिया को खत्म करने वाला होता है। 
अभी पिछले दिनों ही नागपुर का एक समाचार आया जिसमें वहां के एक स्थानीय संदिग्ध बदमाश को भीड़ ने अदालत में घुसकर मार डाला था। अदालत के भीतर या अदालत के अहाते में की गई इस हत्या को मुकदमे में साबित नहीं किया जा सका। लेकिन अदालत से परे, कानून से परे ऐसे कत्ल की इजाजत, ऐसी पिटाई की इजाजत नहीं दी जा सकती। भीड़ का इंसाफ देश भर में जगह-जगह सामने आता है, और यह हिंसा से भरा हुआ होता है, पता नहीं कितने मामलों में यह इंसाफ की जगह बेइंसाफी साबित होता है। हम हरियाणा की इन बहनों की इस कार्रवाई को किसी जायज वजह से की गई, या नाजायज वजह से की गई बात पर अभी नहीं जाते। लेकिन भारत में अदालती इंसाफ में खप जाती एक-दो पीढिय़ों को देखकर थके हुए लोग, पुलिस या सरकार के बेअसर होने से थके हुए लोग, या समाज के भीतर बदमाशी से थके हुए लोग ऐसी पिटाई को देखकर तालियां बजाने लगे, और मीडिया ने भी इन बहनों को बहादुरों की तरह पेश किया। अब अगर पल भर को बहस के लिए यह मान लें कि यह मामला छेडख़ानी का नहीं था, और सीट के झगड़े का था, तो ऐसे हमले से किसी लड़के या आदमी की इज्जत भी मटियामेट हो गई, और अगला वीडियो सामने आने से एक नया शक भी खड़ा हो गया कि क्या ये बहनें सचमुच ही झगड़ालू हैं जो कि किसी को पीटकर उसकी वीडियो बनवाती हैं। 
कानून चाहे कम असरदार हो, या बेअसर हो, सड़कों पर इंसाफ उसका विकल्प नहीं हो सकता। कल के कल दो-तीन ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें छेडख़ानी का आरोप लगाकर किसी को पीटा गया है। आन्ध्रप्रदेश का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें पुलिस ने पचास बरस के एक आदमी को सड़क पर पीटा है, और उस पर छेडख़ानी का आरोप लगाया है। भीड़ और पुलिस इन दोनों को न्याय की प्रक्रिया से गुजरे बिना हाथों-हाथ फैसला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। नक्सल इलाकों के जंगल-गांव में नक्सली जिस तरह जनसुनवाई का नाम देकर जिसका चाहे उसका गला काट देते हैं, वैसी हरकत शहरी सड़कों पर नहीं करने दी जा सकती। और आज के जमाने में मारपीट के किसी हिस्से के वीडियो को देखकर कुछ फैसला लेने के पहले अपनी सामान्य समझबूझ से भी काम लेना चाहिए, और उस वीडियो से बनती हुई पूरी तस्वीर को जब संदेह से परे समझ लिया जाए, तभी उस पर खबर बनानी चाहिए। 

बस्तर की ताजा शहादत को लेकर कुछ नई-पुरानी बातें

संपादकीय
2 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल फिर एक नक्सल हमले में दर्जन भर से अधिक सुरक्षा कर्मचारियों-अधिकारियों की शहादत हो गई। हर बरस ऐसे कुछ मामले सामने आते हैं, और एक-दो दिन सुर्खियों में रहने के बाद सब कुछ फिर उसी तरह चलने लगता है। इस मौके पर हम एक रणनीति-विशेषज्ञ की तरह सरकार और सुरक्षा बलों को कोई राह सुझाना नहीं चाहते, लेकिन एक साधारण समझबूझ के आधार पर हम मंजिल सुझाना जरूर चाहते हैं। मंजिल यह है कि न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश के दूसरे आधा दर्जन प्रदेशों से भी नक्सल हिंसा खत्म होनी चाहिए। अब जिस तरह चिकित्सा विज्ञान में कैंसर को खत्म करने के लिए जांच के बाद जरूरत के मुताबिक दवा, रेडिएशन-सिंकाई, और सर्जरी, तीनों में से किसी एक-दो का, या तीनों का इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह किसी देश के भीतर उग्रवाद या आतंकवाद को सुलझाने के लिए बंदूकों के मोर्चे के साथ-साथ बातचीत भी जरूरी होती है, और जमीन पर ऐसा विकास भी जरूरी होता है जिसके न रहने की वजह से ऐसे उग्रवाद या आतंकवाद के उपजने और पनपने का मौका आता है। 
छत्तीसगढ़ का नक्सल मोर्चा ऐसी तमाम बातों वाला है कि यहां पर अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से दूरी सबसे अधिक होने की वजह से यहां प्रशासन सबसे कमजोर रहा, विकास सबसे कम रहा, और शोषण सबसे अधिक रहा। कुल मिलाकर बस्तर की हालत ने नक्सलियों को न्यौता दिया कि आओ और दबे-कुचले लोगों के हक के लिए लड़ाई लड़ो, क्योंकि बस्तर में सरकारी मशीनरी और राजनीतिक पार्टियां, इन दोनों ने दशकों तक, आजादी से लेकर राज्य के निर्माण तक वहां के लोगों को लूटने का ही काम किया था। इसलिए विरासत में मिली हुई नक्सल हिंसा आज भी जारी है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके जिन-जिन राज्यों में हैं, वहां राज्य सरकारों को अपने भ्रष्टाचार को घटाना होगा, और सरकारी कामकाज को बेहतर और संवेदनशील बनाना होगा। विकास और जनकल्याण के बिना वहां की जनता की हमदर्दी सरकार के साथ नहीं रहेगी, और ऐसे साथ के बिना सरकार अपने कितने भी खजाने से वहां काम नहीं कर पाएगी। इसलिए बस्तर जैसे इलाके को महज पुलिसिया-समस्या मानकर चलना ठीक नहीं है, और वहां पर आदिवासियों के साथ हमदर्दी रखने वाले बेहतर अफसरों की जरूरत है। 
यह तो एक बात हुई, लेकिन कल सुरक्षा बलों पर नक्सलियों ने जिस तरह से हमला किया, और जितने लोगों को मारा, उससे एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि केन्द्र और राज्य की सरकारें अपने लोगों की मौतों को और कितना बर्दाश्त करेंगी, कब तक शहीदों के ताबूतों को सलामी देते रहेंगी, और अगर ऐसा नहीं करेंगी, तो उनके पास विकल्प क्या है? बस्तर के नक्सल मोर्चे पर पिछले डेढ़ दशक से केन्द्र और राज्य के सुरक्षा बल मिलकर लड़ाई लड़ रहे हैं, और मानवाधिकार हनन की कुछ शिकायतों को छोड़ दें, तो सुरक्षा बलों ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की है जैसी कि हथियारबंद उग्रवाद को खत्म करने के लिए मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्य में भारत की फौज ने की थी। जिन लोगों को देश के भीतर, देश के उग्रवादी या आतंकी लोगों पर फौजी कार्रवाई बस्तर जैसे मामले में जरूरी लगती है, उनको ऐसी कार्रवाई में बड़ी संख्या में मारे जाने वाले बेकसूर लोगों का अंदाज नहीं है। कुसूरवार आतंकियों के साथ-साथ उस इलाके के लोग उनसे कहीं अधिक गिनती में मारे जा सकते हैं, इसीलिए समझदार सरकारें फौजी कार्रवाई से बचती हैं। लेकिन क्या आज बस्तर में सुरक्षा बलों की तैनाती जरूरत के मुकाबले कम है? क्या आधे-अधूरे मन से यह लड़ाई लड़ी जा रही है? क्या और अधिक तैनाती से नक्सल हिंसा खत्म हो सकेगी? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब ऐसे मोर्चों के जानकार लोग बेहतर दे सकते हैं, हम इस मुद्दे को महज उठा रहे हैं। 
अब कैंसर के तीसरे किस्म के इलाज की तरह एक आखिरी इलाज है बातचीत का। जब देश के बाहर के आतंकी देशों, या विमान हाईजैक करने वाले लोगों से भी भारत सरकार बात करती है, तो देश के भीतर के उग्रवादियों और आतंकियों से बात करने में कोई नुकसान नहीं है। लेकिन यह बात करना मोर्चे से परे भी हो सकता है, और हमको इस बात पर कुछ निराशा भी है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बाद भाजपा सरकार, देश में एनडीए के बाद यूपीए सरकार के करीब डेढ़ दशक में भी नक्सलियों से बातचीत की कोई जमीन नहीं बन पाई। हमारा यह मानना है कि बाकी मोर्चों पर सरकार जो ठीक हो वह तो करे, लेकिन साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी निकाले। और यह रास्ता नक्सली नहीं निकालेंगे, क्योंकि उनको बातचीत में भरोसा नहीं है, लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है। यह रास्ता तो लोकतांत्रिक सरकारों को ही निकालना होगा। 
यह घटना ताबूतों के उठने के साथ ही फिर आई-गई हो जाएगी, ऐसा ही खतरा हमको अधिक दिखता है। कुछ समय पहले जब छत्तीसगढ़ के एक कलेक्टर का नक्सल-अपहरण हुआ था, और उसके रिहाई के लिए नक्सलियों और सरकार के बीच कुछ लोगों की एक कमेटी बनी थी, वैसी ही कमेटी को बातचीत की एक जमीन तैयार करनी चाहिए। वह कमेटी आज भी अस्तित्व में है, और उसके लोगों पर इन दोनों पक्षों का भरोसा भी है। उसके बाद भी उस कमेटी का एक बेहतर और अधिक इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया, क्यों नहीं किया गया, यह हमारी समझ से परे है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि नक्सल समस्या से निपटारे के बाकी तरीकों के साथ-साथ वह एक वैचारिक पहल और करे, जिससे कि बातचीत का कोई रास्ता खुल सके। ऐसा अगर हो सकेगा, तो वह इस राज्य से परे भी, बाकी देश के अमन-चैन के लिए एक बड़ी बात होगी। 

धान के खेत-खलिहान में फंसी छत्तीसगढ़ सरकार

संपादकीय
1 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ में आज से सरकारी धान खरीदी शुरू हो रही है। पिछले बरसों में राज्य सरकार ने किसानों की उपज का एक-एक दाना खरीदा था, और उस भरोसे के चलते हुए किसान इस बरस भी वही उम्मीद कर रहे थे। हाल ऐसा था कि पड़ोस के ओडिशा से भी जगह-जगह से धान बिकने के लिए छत्तीसगढ़ आ जाता था, और इस राज्य को  यूपीए सरकार की तरफ से धान के रिकॉर्ड उत्पादन का पुरस्कार भी मिला था। धान खरीदी के आंकड़े धान की उपज के आंकड़े मान लिए गए थे, और ओडिशा के योगदान से छत्तीसगढ़ को कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी का पुरस्कार मिल गया था। लेकिन चुनाव में छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा ने जिस तरह के धान बोनस का वायदा किया था, वह वायदा पूरा करने में केन्द्र सरकार ने हाथ नहीं बंटाया, और राज्य सरकार की अपनी खुद की घाटा उठाने की ताकत चुक गई, और अब सरकार ने सीमित मात्रा में धान खरीदी की नीति घोषित की है। इसके चलते राज्य के किसान जगह-जगह आज धान की बिक्री न करके विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, और कई जगहों पर उन्होंने धान न बेचना तय किया है। 
आने वाले दिनों में नौबत सुधर जाए तो अच्छा है, वरना आज हाल यह है कि सरकार प्रति एकड़ 10 क्विंटल धान ही समर्थन मूल्य पर खरीद रही है, और उस पर ही किसानों को बोनस मिलेगा। इससे परे की उपज उनको खुले बाजार में मंडी के आढ़तियों या बिचौलियों को बेचनी होगी, और बाजार का दाम समर्थन मूल्य से कम भी है, और उस पर सरकारी बोनस का तो सवाल ही नहीं उठता। इस तरह किसान अपनी उपज का एक हिस्सा पांच-छह सौ रूपए प्रति क्विंटल के कम मुनाफे पर बाजार में बेचेगा, और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय मंडी में जो हाल रहता था, वह हाल फिर से होने का एक खतरा खड़ा हो गया है। 
छत्तीसगढ़ दरअसल सरकारी अनुदान की उस व्यवस्था में भी फंस गया है, जिसमें जनता को राहत देने के लिए या खुश करने के लिए तरह-तरह के फायदे दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में धान पर नुकसान झेलकर सरकार ने कृषि अर्थव्यवस्था के लिए जो नौबत इन बरसों में ला खड़ी की है, उसे देखते हुए आज धान के किसान कुछ और करने के लायक भी नहीं बचे हैं, और शायद इतना घाटा झेलने के लायक भी नहीं। हमको याद पड़ता है कि जब यह राज्य बना था, तब फसल चक्र परिवर्तन की बात हुई थी और खेतों की उपज में विविधता लाने की बात भी हुई थी। छत्तीसगढ़ में ही कुछ हिस्सों में चने जैसी दूसरी फसलें कामयाबी के साथ ली जा रही हैं, और उनके किसान खासा फायदा कमा रहे हैं, और सरकार पर मोहताज नहीं हैं। अब हम इस जगह पर छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था की बारीकियों पर तो नहीं जा सकेंगे, लेकिन आज धान को लेकर जो नौबत आई है, उसे देखते हुए यह समझने की जरूरत है कि किस तरह धान से परे की दूसरी फसल लेने की जरूरत है, और सरकार को मेहनत करके किसानों के काम में, उनकी फसलों में फर्क लाना पड़ेगा। अगर किसान परंपरागत उपज धान पर ही टिके रहेंगे, तो वे सरकार की रियायत के मोहताज भी रहेंगे। सरकार को तकलीफ उठाकर, दिक्कत झेलकर भी लोगों को दूसरी फसलों की तरफ मोडऩा पड़ेगा, और वह सब्सिडी वाली खरीदी के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल काम भी होगा। 
राज्य के दीर्घकालीन हित में यही है कि किसानों को अधिक फायदे वाली दलहन और तिलहन जैसी, और गेहूं या दूसरे किस्म की फसलों की तरफ ले जाया जाए, इसके लिए उन्हें अच्छे बीज, और अच्छी तकनीक भी दी जाए। आज डरे और सहमे किसान धान के अलावा कुछ छूना नहीं चाहते, क्योंकि बाकी बीजों को लेकर उनका भरोसा नहीं है, और राज्य के बीज विकास निगम का रिकॉर्ड नकली या घटिया बीज सप्लाई करने का भी रहा है। राज्य सरकार को धान के इस मोर्चे पर खरीदी से परे भी लंबी मेहनत करने की जरूरत है, और हम इस मुद्दे को आज छू भर रहे हैं, इससे जुड़ी हुई बाकी बातें यहां मुमकिन नहीं हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के लिए उन पर चर्चा करके एक रास्ता निकालना बहुत जरूरी है। 

ऑटो रिक्शा पलटने से हुई मौतों को लेकर चर्चा

संपादकीय
30 नवंबर 2014
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक ऑटो रिक्शा पलटा, और उसमें सवार दर्जन भर से अधिक लोगों में से चार मारे गए, और बहुत से जख्मी हो गए। वैसे तो यह खबर आती-जाती रहनी चाहिए, और इस पर आम तौर पर किसी गंभीर चर्चा का कोई रिवाज इस प्रदेश में नहीं है, फिर भी हम समाज और सरकार दोनों के सामने सोचने लायक इस मुद्दे को उठा रहे हैं कि सड़कों पर दिनदहाड़े, पूरे दुस्साहस के साथ कारोबारी गाडिय़ां जिस तरह जिंदगी के साथ खेलती हैं, उनको बर्दाश्त करने की पुलिस की क्या बेबसी है? और यह बात हम सिर्फ बस्तर जैसे जंगलों से भरे गांव-देहातों के बारे में नहीं कह रहे, जहां कि पुलिस को नियम-कानून लागू करना मुश्किल हो सकता है, हम तो राजधानी रायपुर जैसे शहरी इलाकों की बात कर रहे हैं जहां पर कि हर चौराहे से नियम तोड़ते हुए ऑटो जैसी दूसरी गाडिय़ां निकलती हैं, और उनमें चारों तरफ से लोग बाहर निकले या लटके रहते हैं। चौराहों पर ये गाडिय़ां रूकती भी हैं, लेकिन पुलिस को नहीं दिखतीं। एक तरफ तो छत्तीसगढ़, और खासकर रायपुर की पुलिस बड़े-बड़े जुर्म सुलझा रही है, और करोड़ों की नगदी के साथ चोर-डकैत-लुटेरे सभी को पकड़कर ला रही है, कत्ल को सुलझा रही है, और दूसरी तरफ सूरज की रौशनी में आंखों से दिखने वाले इस शहरी जुर्म को पकडऩे से वह पूरी तरह बचती है। और ऐसा बचना किस वजह से होता है, इसे हर कोई समझते हैं।
लेकिन हम सिर्फ भ्रष्टाचार और रिश्वत को लेकर यह बात लिखना नहीं चाहते। हम लोगों की जिंदगी को लेकर इस पर लिख रहे हैं, जिनको कि खतरे में डालकर सरकारी विभाग और अफसर-कर्मचारी नियम तोडऩे वाले गाड़ी वालों के साथ भागीदारी निभाते हैं। ऐसी भागीदारी इस प्रदेश में रोज दर्जनभर जिंदगियां ले रही है, और मौतों से कम, घायल होने वालों के आंकड़े भी सामने नहीं आते। इस सिलसिले को पूरी तरह खत्म करना चाहिए। पिछले कुछ महीनों में राज्य सरकार के परिवहन विभाग ने धीरे-धीरे अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर काबू पाना शुरू किया है, और उससे बहुत से लोगों में बेचैनी खड़ी हो गई है। इस काम को कड़ाई से आगे बढ़ाना चाहिए, क्योंकि आरटीओ और ट्रैफिक का भ्रष्टाचार जिंदगियां बेचने वाला भ्रष्टाचार होता है। 
हम किसी भी प्रदेश में राजधानी को हांडी के उस दाने की तरह मानते हैं जिसे निकालकर देखा जाता है कि खाना पका है या नहीं। जब प्रदेश की राजधानी की सड़कों पर भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का ऐसा नंगा नाच चल रहा हो, तब न सिर्फ निजी गाडिय़ों के लोगों के मन में नियमों के लिए हिकारत खड़ी रहती है, बल्कि पुलिस को कमजोर जानकर लोग तरह-तरह की दूसरी गुंडागर्दी करने का हौसला भी पाते हैं। हमारा यह लंबा अनुभव रहा है कि पुलिस अगर किसी एक दायरे में भी कड़ाई से काम करती है, तो उसका असर आसपास के दूसरे दायरों पर भी पड़ता है। अगर सड़कों पर मनमानी के खिलाफ सख्ती होगी, तो छेडख़ानी और गुंडागर्दी भी घटेंगी। 
बस्तर की इस घटना पर हो सकता है कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से पहले से तैयार शोक संदेशों में नाम बदलकर उन्हें फिर से जारी कर दिया जाएगा, लेकिन ऐसे संदेशों के बजाय सरकार को कड़ाई से अपनी यह न्यूनतम जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। जब सड़कों पर कानून पूरे समय तोड़ा जाता है, तो नई पीढ़ी इसी सीख के साथ बड़ी होती है, और उसे फिर दुरूस्त करना बहुत मुश्किल होता है। राज्य सरकार ने आधे-अधूरे मन से हेलमेट लागू करने की कोशिश की है, लेकिन पुलिस की ढिलाई से वह काम भी अब नाकामयाब होते दिख रहा है। हम जिन बातों को लिख रहे हैं उनमें से किसी के लिए भी किसी उच्च तकनीक की जरूरत नहीं है, किसी बाहरी सहयोग की जरूरत नहीं है, यह बहुत आसान काम है, और इसके लिए नक्सल मोर्चे जैसे हौसले की जरूरत भी नहीं है। हमको बार-बार ऐसी चर्चा के बीच याद आता है कि दुर्ग जिले में एक समय रमेश शर्मा एसपी थे, और उन्होंने अकेले अपने दम पर हेलमेट लागू करवा दिया था। आज अगर मुख्यमंत्री दर्जन भर बार कहने के बाद भी अगर राजधानी में न हेलमेट लागू हो पा रहा, न ही कारोबारी गाडिय़ों की मनमानी कम हो रही, तो इसके पीछे सिर्फ पुलिस की कमजोरी है। यही पुलिस बड़े-बड़े जुर्म पकड़ रही है, लेकिन सड़कों पर छोटे-छोटे चालान नहीं कर पा रही है। इस बारे में राज्य सरकार को भी और लोगों को भी सोचना चाहिए। 

हजार करोड़ के अफसर वाला बहुत गरीब देश...

29 नवंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली के आसपास उत्तरप्रदेश में कई सरकारी विभागों और संस्थानों का काम देखने वाले एक बड़े इंजीनियर पर आयकर विभाग का छापा पड़ा, और पहली खबरों के मुताबिक उसकी दौलत हजार करोड़ की हो सकती है। सैकड़ों करोड़ के गहने, जिनमें हीरों के गहने ही दो किलो बताए जा रहे हैं, कार में दस करोड़ नगदी, ऐसी आंखें फाड़ देने वाली जानकारियां हैं। हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि अदालत में आखिर तक यह काली कमाई हजार करोड़ साबित हो पाएगी या सौ दो सौ करोड़ पर टिकेगी, लेकिन जितनी भी है, वह पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बदनाम राजनीति से परे सरकारी अफसरों की कमाई का क्या हाल है। और केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों के तहत इस तरह की कमाई करने का मौका लोगों को कैसे मिलता है, और यह जाहिर है कि जब कोई अफसर कारोबारियों को दस-बीस हजार करोड़ का फायदा देने की हालत में होगा, तो ही जाकर उसके पास हजार करोड़ की दौलत जुट पाएगी।
हम छत्तीसगढ़ के बारे में सोचते हैं तो इस राज्य में भ्रष्ट अफसरों के सैकड़ों मामले राज्य बनने के बाद से पकड़ में आए हैं, और शायद ही किसी को सजा मिलते लोगों ने देखा होगा। जांच में मामलों को कमजोर कर देना, सारी कोशिश के बाद भी अगर कोई मामला मजबूत बन गया है, तो उसे अदालत तक जाने की इजाजत नहीं देना, और अगर अदालत चले भी गया है तो उसे बरसों तक खींचते चले जाना, यह सब लोग देख-देखकर थक चुके हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ का सरकारी इतिहास इस बात का गवाह है कि हर किस्म के भ्रष्ट व्यक्ति को निलंबन के बाद कुछ अरसा गुजरने पर फिर खासी कमाई और खासे भ्रष्टाचार की संभावना वाली कुर्सी पर तैनात कर दिया जाता है, और फिर ऐसे लोग चेहरे पर नकाब बांधे बिना ही लूटपाट में लग जाते हैं। जांच कभी पूरी नहीं होती, और पूरी हो भी जाती है, तो सरकार ऐसी फाईलों पर जमकर और टिककर बैठ जाती है, कि मानो भ्रष्ट की कमाई बंद न हो जाए। 
सरकार के कुछ जानकार लोगा के मुताबिक मध्यप्रदेश सरकार के तहत भ्रष्टाचार के ऐसे ही मामलों किसी के पकड़ाने पर सरकार उसे जेल से निकलने का मौका नहीं देती, और किसी भी हालत में उसे सरकारी कुर्सी पर दुबारा नहीं बैठने देती। छत्तीसगढ़ में अभी आर्थिक अपराध ब्यूरो ने कुछ अफसरों को गिरफ्तार करके जेल भेजा है जो कि लंबे समय से भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हुए थे, लेकिन अदालत और जेल से परे खुले घूम रहे थे। पूरे देश में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार का जो बुरा हाल है, उसके चलते एक बात जरूरी लगती है कि जो लोग रिश्वत लेते पकड़ाएं, कोई घपला करते पकड़ाएं, या अनुपातहीन संपत्ति के साथ पकड़ाएं, उनको सरकार किसी कुर्सी पर न बैठने दे, काम न करने दे, वही सस्ता पड़ेगा। ऐसे तमाम मामलों में मध्यप्रदेश से जब लोग छत्तीसगढ़ की तुलना करते हैं, तो छत्तीसगढ़ भ्रष्ट लोगों के लिए बड़ा रहमदिल साबित होता है। परले दर्जे के भ्रष्ट लोग पुख्ता मामलों के बावजूद फिर अपने विभागों में, या दूसरे विभागों में फिर कमाऊ कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं, और जनता की खजाने को दीमक की तरह खोखला कर देते हैं। 
जनता के बीच से सरकार पर एक दबाव पडऩा चाहिए कि भ्रष्ट लोगों को अदालत से बेकसूर साबित होने के पहले सरकारी कामकाज से अलग रखा जाए। ऐसा न होने पर यह देश-प्रदेश लुटना कभी भी बंद नहीं होगा। अब हजार करोड़ से अधिक का अफसर आने के बाद ही क्या देश-प्रदेश की सरकारों को होश आएगा?