1 दिसंबर 2013
संपादकीय
तरूण तेजपाल के मामले में जब हिन्दी के अखबारों में उन्हें, उनके, वे, जैसे शब्द इस्तेमाल किए जा रहे हैं, तो कुछ संवेदनशील लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि ऐसे एक जुर्म में फंसे हुए व्यक्ति के लिए उसे, उसके, और वह जैसे शब्द क्यों इस्तेमाल नहीं किए जाते? क्यों उसे सम्मान दिया जा रहा है? यह आपत्ति और यह सवाल, दोनों ही बहुत जायज हैं। मीडिया अगर अंग्रेजी का है, तो उसमें इन शब्दों को लेकर अधिक और कम सम्मान वाला कोई फर्क नहीं रहता, और वह भाषा इस परेशानी को नहीं झेलती कि कल तक के इज्जतदार को आज कम इज्जत कैसे दी जाए, कब और कैसे यह इज्जत घटाई जाए। लेकिन दूसरी तरफ हिन्दी जुबान मेें यह परेशानी रहती है कि कल तक की साख को आज की राख देखते हुए कब घटाया जाए, कितना घटाया जाए?
हम खुद इस अखबार में कई बार ऐसी दुविधा से गुजरते हैं, और कई बार हमारी जुबान लोगों को जरूरत से अधिक तीखी, हमलावर, और बेइज्जत करती हुई लगती है। बात सिर्फ तरूण तेजपाल की नहीं है, गुजरात के गृहमंत्री रहे हुए, और आज जेल से जमानत पर छूटे हुए अमित शाह पर लगी तोहमतें अलग किस्म की हैं, अधिक खतरनाक हैं, और आज वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं, तो फिर उन्हें क्यों उन्हें और वे जैसे शब्दों से नवाजा जाए? लालू यादव को सजा हो चुकी है इसलिए अब उनके बारे में चर्चा करते हुए, उनके शब्द क्यों लिखा जाए, उसकी जगह उसके जैसे शब्द को क्यों न लिखें, जो कि कम इज्जत देता है? यह सवाल भाषा का है, सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार का है, लिखने वाले और पढऩे वाले लोगों की संवेदनशीलता का है, आज के हिन्दीभाषी समाज के भीतर सार्वजनिक जीवन के मूल्यों का है। इस तरह बहुत सी बातें जुड़ी हुई हैं, जो यह सोचने पर बेबस करती हैं कि किसी के सम्मान को किस पल से, किस हद तक घटाना चाहिए और कितना इंतजार करना चाहिए?
इसे लेकर मीडिया की अलग से कोई आचार संहिता या कोई नीति नहीं है। लोग अलग-अलग फैसले लेते हैं, और जहां तक कानून का सवाल है तो किसी भी व्यक्ति के बारे में उसके, उसको, जैसे शब्द पर गलत कहने का कोई हक भी नहीं है। आखिर जिस मुद्दे पर हमने लिखना शुरू किया है, उस पर आगे बढ़ें, तो हिन्दी एक ऐसी जुबान है जिसमें शायद धार बहुत सी भारतीय बोलियों के मुकाबले कम है। इस भाषा में लोगों को अपनी इज्जत को साबित करने के लिए खासा वक्त दिया जाता है, और उनको कम इज्जत के लायक मानने के पहले खासा इंतजार किया जाता है। हर देश और काल के मुताबिक भाषा का अलग-अलग इस्तेमाल होता है। आज भारत में आम जनता की सहनशीलता जवाब दे गई है, और किसी भी तबके के ताकतवर लोगों के गलत काम के बाद भी उनके कुर्सी पर रहने, उनके इज्जत पाते रहने की बात लोगों को खटकने लगी है। और बात सिर्फ किसी जुर्म के पहले और बात की नहीं है, मीडिया की जुबान को अगर देखें तो कभी भी किसी छोटे कर्मचारी, किसी गरीब के लिए उन्हें या वे जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं किए जाते। इज्जत को संपन्नता से और ताकत से भाषा ने अनिवार्य रूप से जोड़ रखा है। गरीब और कमजोर किसी इज्जत के हकदार नहीं रहते, और लालू यादव जेल भेजे जाते हैं, वे जेल में काम करते हैं, उन्हें जेल में मजदूरी मिलती है। दूसरी तरफ किसी सड़क दुर्घटना में मरने वाला बेकसूर मजदूर भी किसी खबर में इज्जत का हकदार नहीं माना जाता।
लोग मीडिया की जुबान पर, उसकी नीयत पर, और उसके पाखंड पर, उसके भेदभाव पर जो सवाल उठा रहे हैं, वे जायज हैं। हम चाहते हैं कि इस पर बात आगे बढ़े, और लोग सोचें कि किसी गलत काम के बाद मामला कितना स्थापित हो जाने पर लोगों से इज्जत का उनका दर्जा उसी तरह वापिस ले लिया जाए, जिस तरह सेना में किसी के अपराधी साबित होने पर उसे दिए गए मैडल वापिस ले लिए जाते हैं। इसी तरह गरीब और कमजोर तबके का जिक्र करते हुए मीडिया की जुबान कैसी रहनी चाहिए, जो कि आज बिल्कुल ही नहीं है, उस पर भी चर्चा होनी चाहिए।

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