जुर्म और नाबालिग के बहाने एक चर्चा

2 दिसंबर 2013
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बलात्कार की निर्भया के मां-बाप की अपील पर केन्द्र सरकार को नोटिस भेजा है कि आज नाबालिग उम्र सीमा में आने वाले लोग अगर भयानक अपराध करते हैं, तो क्या उनकी उम्र को लेकर रियायत पर फैसला अदालत करे? इस एक मामले से परे भी देश में पिछले कई महीनों से यह बहस चल रही है कि क्या ऐसे अपराधों के लिए 18 बरस की उम्र सीमा को घटाया नहीं जाना चाहिए? अभी  निर्भया बलात्कार केस में सबसे अधिक खूंखार पाए गए नाबालिग लड़के को सिर्फ तीन बरस के लिए सुधारगृह में भेजने को लेकर देश का एक तबका हक्का-बक्का है, और इसी के खिलाफ निर्भया के मां-बाप अदालत पहुंचे हैं। 
यह मामला थोड़ा जटिल है, और हम खुद अभी इसमें किसी एक नतीजे पर पहुंचे हुए नहीं हैं। लेकिन फिर भी चूंकि सरकार, संसद, अदालत, और देश के दूसरे जुड़े हुए तबके बालिग होने की उम्र को इस एक मामले में, या इस तरह के भयानक जुर्म के दूसरे कुछ मामलों में दुबारा तय करने पर बात करने जा रहे हैं, इसलिए हमारे पाठकों को भी अपने स्तर पर इस बारे में सोचना चाहिए। और यह बात हम इसलिए छेड़ रहे हैं, क्योंकि लोगों को अखबारों में मुफ्त में मिलने वाली पाठकों के पत्र वाले कॉलम में अपनी बात लिखनी चाहिए, जगह-जगह इससे जुड़े मामलों पर जब चर्चा हो, तो उनको सुनना चाहिए, समझना चाहिए, और उस पर धीरे-धीरे अपनी राय भी बनानी चाहिए। बहुत से वैज्ञानिक या मेडिकल पहलू ऐसे हो सकते हैं जो कि समाज शास्त्र को समझने वाले लोगों की समझ के थोड़े बाहर भी हों, लेकिन लोकतंत्र में ऐसे मुद्दों पर भी जनमत सामने आना चाहिए। चूंकि वोट डालते समय जनता की वैज्ञानिक समझ जरूरी नहीं होती, लेकिन उसकी भावना को भी वोट तय करने का हक रहता है इसलिए ऐसे मुद्दों पर भी जनता को अपनी सोच सामने रखनी चाहिए। हमारी दूसरी सलाह यह है कि अपनी सलाह बनाने के पहले जनता को दूसरे लोगों की बातें सुननी भी चाहिए, पढऩी भी चाहिए। इसमें टीवी पर होने वाली बहसों से लेकर अखबारों में लिखी जा रही बातों तक से लोगों को मुद्दे को समझने में मदद मिल सकती है, और फिर लोगों की सोच सामने आने पर उससे अदालतों, संसद और सरकारों को अपनी सोच बनानी में मदद मिल सकती है। 
लोकतंत्र में जनमत की अहमियत को कम नहीं आंकना चाहिए। और जनता को पांच बरस में एक बार वोट देने को लोकतंत्र नहीं मानना चाहिए। वह तो पांच बरस में एक बार होने वाला मतदान रहता है जो कि लोकतंत्र का एक बहुत छोटा सा हिस्सा ही रहता है, लोकतंत्र का बड़ा हिस्सा तो एक जनमत है जो कि वोट के पहले और बाद के बरसों में निरंतर चलता है। आज हम यहां पर नाबालिग मुजरिमों की चर्चा से इस बात को शुरू ही कर रहे हैं, लेकिन हमारी यह सलाह सिर्फ इसी एक मामले पर नहीं है, बहुत से मामलों पर है। और लोगों को अपने घरों में सिर्फ मनोरंजन के चैनल देखने के बजाय, कुछ जरूरी मुद्दों पर होने वाली अच्छी बहस दिखाने वाले अच्छे चैनलों पर भी रोजाना टीवी के अपने घंटों का कुछ समय लगाना चाहिए। अखबारों में खबरों से परे समझदार लोगों के लिखे हुए विश्लेषण और विचार भी पढऩे चाहिए। लोकतंत्र जनता की परिपक्वता का भी नाम है, उसकी समझ बढऩे का भी नाम है। और लोकतंत्र या राजनीति को सिर्फ चुनाव वोटों से जोडऩा गलत है। 
आज सुप्रीम कोर्ट को बहुत से सामाजिक मुद्दों पर फैसले लेने पड़ रहे हैं। हम इसको एक अच्छी स्थिति नहीं मानते, खासकर तब जबकि ये मामले ऐसे रहते हैं जिन पर अदालती दखल के पहले संसद को खुद होकर सोचना चाहिए था। लेकिन भारत में सामाजिक जागरूकता इतनी कम है, और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से लेकर उनकी पार्टियों तक हौसला इतना कम है, कि सामाजिक मुद्दों पर वे संसद में किसी चर्चा से कतराते हुए, अलोकप्रिय दिखते हुए मुद्दों पर फैसले लेने का बोझ अदालतों पर डालते हैं। यह लोकतंत्र की एक शिकस्त है, और जनता का नुकसान है। इसलिए जनता को दो मतदान बीच के बरसों में भी लोकतंत्र में अच्छे और बुरे के बीच अपनी पसंद बनाना और जाहिर करना चाहिए। आज हम यह चर्चा इसीलिए कर रहे हैं कि जनमत के असली फैसले संसद से बाहर देश की हवा में बनने चाहिए, ताकि संसद में उन पर विचार करते समय सांसदों और पार्टियों को जनता की भावनाओं और तर्कों का अंदाज रहे।

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